उदयपुर में हुए जल शिक्षण व् जल प्रबन्धन प्रयोग से सीखेगा पूरा देश

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07 Nov 19
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उदयपुर में हुए जल शिक्षण व् जल प्रबन्धन प्रयोग से सीखेगा पूरा देश

उदयपुर  उदयपुर में हुए जल शिक्षण व् जल प्रबन्धन में ग्राम सहभागिता के सफल प्रयोग व् अनुभव से सीख कर देश के गांव गांव में जलदूत तैयार किये जायेंगे जो सहभागिता पूर्ण जल प्रबन्धन को सुनिश्चित करेंगे ।

पुणे में बुधवार को आयोजित समारोह में केन्द्रीय जल शक्ति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने जलदूत शिक्षण पुस्तिका का लोकार्पण किया। लोकार्पण समारोह में मंत्रालय के सचिव श्री यू पी सिंह , उदयपुर के हीन्ता गांव निवासी प्रोफ़ेसर बसंत माहेश्वरी उपस्थित रहे ।

भारत सरकार के जलशक्ति मंत्रालय व् मारवी योजना द्वारा सुरक्षित व् स्थाई जल भविष्य के लिए ग्रामीण समुदाय के सशक्तिकरण के बनाई गई इस पुस्तक के निर्माण में विद्या भवन, महाराणा प्रताप कृषि विश्वविद्यालय ऑस्ट्रेलियन सेंटर फॉर इंटरनेशन एग्रीकल्चर रिसर्च, ऑस्ट्रेलिया सरकार, वेस्टर्न सिडनी विश्विद्यालय, सी एस आई आर ओ, डेवलपमेन्ट सपोर्ट सेंटर, एरिड कम्युनिटीज एंड टेक्नोलॉजीज इत्यादि संस्थाओ ने सहभागिता की है ।

मारवी योजना : ग्राम समुदाय की सहभागिता से भूजल पुनर्भरण एवं सुप्रबंधन की मारवी योजना ( Managing Aquifer Recharge and Sustaining Groundwater Use through Village-level Intervention– MARVI ½ : ऑस्ट्रेलिया सेन्टर फोर इन्टरनेशनल एग्रीकल्चर रिसर्च (ए.सी.आई.ए.आर.) के वित्तीय सहयोग से वर्ष 2011-12 में प्रारंभ हुई इस योजना के तहत साझेदार संस्थाओं( ऑस्ट्रेलियन सेंटर फॉर इंटरनेशन एग्रीकल्चर रिसर्च, ऑस्ट्रेलिया सरकार, वेस्टर्न सिडनी विश्विद्यालय, सी एस आई आर ओ, डेवलपमेन्ट सपोर्ट सेंटर, एरिड कम्युनिटीज एंड टेक्नोलॉजीज, इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टिट्यूट, महाराणा प्रताप कृषि विश्वविद्यालय, विद्या भवन) एवं अलग-अलग विषयों, विधाओं, संस्थाओं के 32 प्रमुख वैज्ञानिक तथा 36 ग्राम वैज्ञानिक (भूजल जानकार) सहभागिता कर रहे हैं । मारवी योजना गुजरात के मेघराज व राजस्थान के धारता जलग्रहण (वाटर शेड) क्षेत्र में क्रियान्वित हुई है । योजना के द्वारा ग्रामवासी किसान साथियों की सहभागिता से सहभागितापूर्ण विधियों, तरीकों व साधनों का विकास हुआ है जिसमे कि सहयोग, समन्वय एवं वैज्ञानिक सोच के साथ ग्रामवासी स्वयं के स्तर पर भूजल का प्रबंधन कर रहे हैं। ग्रामवासी स्वयं भूजल दोहन की मात्रा का निर्धारण कर सम्पूर्ण क्षेत्र में भूजल भण्डारों में वृद्धि करने, सहकारिता के आधार पर भूजल उपलब्धता को सभी के लिए स्थायी व सतत बनाने तथा सामाजिक-आर्थिक व पर्यावरणीय स्थिति में रचनात्मक परिवर्तन लाने, सर्व खुषी एवं सर्व कल्याण की भावना को सुनिष्चित कर सकने में सक्षम बने हैं ।

भूजल जानकार : इस उद्देष्य की पूर्ति में सहायक बने हैं ग्रामवासी भूजल जानकार( बी जे) । भूजल जानकार वें किसान साथी है जिन्हें सरल वैज्ञानिक व तकनीकी विधियों का प्रषिक्षण देकर उनकी भूजल विज्ञान, वैज्ञानिक कृषि, स्वास्थ्य समृद्धि इत्यादि विषयों में ज्ञान, क्षमता व समझ को मजबूत बनाया गया। उन्हें सरल साधन ( वर्षा मापक, जल गुणवत्ता मापक , जल स्तर मापक इत्यादि) दिए गए जिससे कि वे क्षेत्र में सतही जल व भूजल की उपलब्धता, उपयोग, पुनर्भरण, प्रवाह को निरन्तर रूप से माप सके-- शोध संस्थानों, विष्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों के साथ उपलब्ध आंकड़ों, जानकारियों को बांटतें हुए प्रभावी भूजल प्रबंधन को सुनिष्चित कर सकें। आज भूजल जानकार ग्राम समुदाय, सरकार, स्वैच्छिक संस्थाओं, शोध संस्थाओं तथा वैज्ञानिकों के लिए एक महत्वपूर्ण माध्यम व कड़ी बन प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं।

भूजल जानकर मानसून के दिनों में प्रतिदिन बरसात की मात्रा, तालाबों में जलस्तर परिवर्तन तथा वर्ष पर्यन्त प्रति सप्ताह, निकटवर्ती खुले कुओं (कुल 360 कुंवे ) के जल स्तर में परिवर्तन को मापते हैं। आँकड़ों को एक सरल मोबाइल एप “माईवेल” के माध्यम से वैज्ञानिकों के साथ साझा करते हैं। उन्नत व वैज्ञानिक कृषि पर समझ को बढ़ाकर साथी ग्रामवासीयों के साथ बांटते हैं। इस प्रकार किसान प्रबंधित भूजल व्यवस्था द्वारा वर्ष भर इकट्ठा हुये आंकड़ों से किसान यह ज्ञात करने में सक्षम हो गये हैं कि कितना जल पुनर्भरण हो रहा है, कितना दोहन हो रहा है एवं कितना पानी फसल उगाने के लिए उपलब्ध है। किसानों को यह जानकारी भी उपलब्ध कराई गई कि किन-किन फसलों को कितना-कितना पानी चाहिए। इस आधार पर किसान साथी स्वयं यह तय कर लेते है कि उन्हें कौनसी फसल कितने क्षेत्र में उगानी है। किसान साथी ग्रामस्तरीय भूजल सहकारिता समितियों का गठन कर भूजल प्रबंधन व उपलब्ध जल के न्यायपूर्ण, मितव्ययी उपयोग से अधिकतम उत्पादन व रोजगार को प्राप्त करने में प्रवृत हुए हैं।


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