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प्रातः सायं सन्ध्या की परम्परा सबके लिये शिक्षाप्रद

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15 Jul 19
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-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

प्रातः सायं सन्ध्या की परम्परा सबके लिये शिक्षाप्रद

वैदिक धर्म एवं अन्य मतों में अनेक अन्तर है। वैदिक धर्म ईश्वर प्रदत्त धर्म है जबकि अन्य धार्मिक संगठन व संस्थायें, राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय, धर्म न होकर मत व मजहब आदि हैं। मत कहते हैं जिसे कोई मनुष्य आरम्भ करता व चलाता है। मत मनुष्य से ही चलता भले ही कोई कुछ भी कहे। मत धार्मिक व सामाजिक दोनों प्रकार के हो सकते हैं। राजनीतिक भी हो सकते हैं। कांग्रेस भी एक राजनीतिक दल होने के साथ कुछ लोगों की अपनी विचारधारा है जो ईश्वर से पुष्ट नहीं है। कांग्रेस की स्थापना परतन्त्र भारत में अंग्रेजों से सहानुभूति रखने वाले कुछ विदेशी अंग्रेजों ने भारतीयों के सहयोग से की थी। उन्होंने स्वप्न में भी देश को अंग्रेजों की दासता से आजादी दिलाने का विचार नहीं किया था। स्वराज्य प्राप्ति की भावना व विचार तो एक परिस्थितियजन्य आवश्यकता एवं लोगों के हृदय की भावना से स्वतः स्फूर्त विचार थे। इसमें प्रमुख कारण आर्यसमाज की वेदों पर आधारित विचारधारा सहित ऋषि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश एवं उनके अन्य ग्रन्थों में देश की आजादी के स्वराज्य विषयक विचारों का प्रभाव माना जा सकता है। आर्यसमाज ने सन् 1884 में ही स्पष्ट शब्दों में सत्यार्थप्रकाश के माध्यम से घोषणा कर दी थी कि कोई कितना ही करे किन्तु जो स्वदेशीय राज्य होता है वह सर्वोपरि उत्तम होता है। अथवा मत-मतान्तर के आग्रह रहित, अपने और पराये का भेद शून्य, प्रजा पर माता-पिता के समान कृपा, न्याय और दया के साथ भी विदेशियों (अंग्रेज व यवनों आदि) का राज्य पूर्ण सुखदायक नहीं हो सकता। ऋषि दयानन्द की ईश्वरोपासना विषयक आर्याभिविनय पुस्तक में इसी स्वदेशी व स्वराज्य की भावना के दर्शन होते हैं। इसी प्रकार से भारत सहित संसार में जितने धार्मिक प्रकृति के संगठन व संस्थायें हैं वह किसी व किन्हीं अल्पज्ञ व्यक्तियों व आचार्यों द्वारा चलाये गये मत हैं। ऋषि दयानन्द योगी, ऋषि तथा वैदिक साहित्य के ज्ञात विद्वानों में अपूर्व मर्मज्ञ विद्वान होने पर भी स्वयं को अल्पज्ञ ही मानते थे। संसार में जन्में सभी मनुष्य अल्पज्ञ ही होते हैं व हुए है।, अतः उनका प्रत्येक विचार व सिद्धान्त शत प्रतिशत वा पूर्ण सत्य नहीं हो सकता। पूर्ण सत्य का ज्ञाता तो केवल एक सर्वव्यापक ईश्वर ही है और उसके द्वारा प्रदत्त ज्ञान ही पूर्ण सत्य विद्याओं से निहित होता है। ऐसा ज्ञान संसार में केवल वेद है जो सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा से चार ऋषियों को मिला था और उसके बाद वेदों का वही ज्ञान ऋषि-परम्परा से ऋषि दयानन्द व अनेक कालों के इतर सभी ऋषियों व उनके द्वारा प्रजाजनों तक पहुंचा है। वर्तमान लोगों को वेदों व उसके महत्व आदि का ज्ञान ऋषि दयानन्द की कृपा से प्राप्त हुआ है।

वैदिक धर्म संसार का पहला व सबसे पुराना धर्म है जिसका प्रादुर्भाव व प्रचार ईश्वर प्रदत्त चार वेदों के ज्ञान से चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य, अंगिरा और ब्रह्मा जी आदि ने मिलकर किया। वेदज्ञान ईश्वर प्रदत्त ज्ञान था तथा प्रचार करने वाले ईश्वर का साक्षात्कार किये हुए हमारे ऋषि थे। ऋषियों ने ही संसार को बताया है कि मनुष्य का कर्तव्य है कि वह परमात्मा द्वारा बनाई गई सृष्टि और जीवात्माओं को उनके पूर्वजन्मों के कर्मानुसार मनुष्यादि का जन्म देने तथा उन्हें माता-पिता, कुटुम्बीजन व मानव शरीर प्रदान करने के लिये प्रातः व सायं ईश्वर का धन्यवाद करें। ऐसा ईश्वर के उपकारों के प्रति कृतज्ञता का भाव प्रदर्शित करने के लिये किया जाता है। ईश्वर का ध्यान वा उपासना करने से अन्य अनेक लाभ भी होते हैं। सबसे बड़ा लाभ तो ज्ञानवृद्धि सहित ईश्वर का साक्षात्कार होना होता है। ईश्वर के साक्षात्कार के तुल्य कोई धन व भौतिक सुख नहीं होता। अतः सभी मनुष्यों को वेदों के आधार पर ऋषियों द्वारा प्रचलित ईश्वर के ध्यान की विधि ‘‘संन्ध्या” को जानना चाहिये और उसे नियमित विधि व विधान के साथ करना चाहिये। सन्ध्या में हम मुख्यतः ईश्वर स्तुति, प्रार्थना व उपासना के कुछ मंत्रों का पाठ व विचार करके ईश्वर से धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति की कामना करते हैं। इस कार्य सन्ध्या को व्यवस्थित रूप देने के लिये प्रथम शरीर की शुद्धि करके गायत्री मन्त्र के जप व पाठ से अपने मन को बाह्य जगत से हटाकर ईश्वर में स्थिर करना होता है। इसके बाद सन्ध्या का प्रयोजन सूचित करने वाले आचमन मंत्र का ईश्वर के स्वरूप का ध्यान करते हुए पाठ कर उससे पवित्र एवं अभीष्ट कामनाओं की प्राप्ति तथा सुखों की वर्षा की कामना की जाती है।

आचमन मंत्र सन्ध्या में की जाने वाली ईश्वर की स्तुति व प्रार्थना आदि का पूरक मन्त्र है। हम ईश्वर की स्तुति व प्रार्थना सहित जप व तप आदि अनुष्ठान तभी कर सकते हैं जब कि हमारा शरीर स्वस्थ हो। इसलिये अपने शरीर पर दृष्टि डाल कर हम उसके प्रत्येक अंग के स्वस्थ एवं बलवान रहने व होने की कामना करते हैं। इस काम को इन्द्रिय स्पर्श के मन्त्रों का उच्चारण कर किया जाता है। इसमें हम अपनी वाणी, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, नाभि आदि का उल्लेख कर उनके स्वस्थ एवं बलवान होने की प्रार्थना करते हैं। हमारा शरीर व इन्द्रियां स्वस्थ और बलवान होने सहित पवित्रता से युक्त भी होनी चाहियें। इसके लिये मार्जन मंत्रों का विधान किया गया है। शरीर को स्वस्थ एवं निरोग रखने सहित मन को एकाग्र करने के लिये प्राणायाम का महत्व निर्विवाद है। इसलिये ऋषि दयानन्द जी ने मार्जन मन्त्रों के बाद मन्त्रोच्चार पूर्वक प्राणायाम का विधान किया है। प्राणायाम के मन्त्र का अर्थपूर्वक चिन्तन करने सहित न्यूनतम तीन व अधिक प्राणायाम कर मन को एकाग्र किया जाता है। इस विधि को करने के पश्चात पाप व अधर्म से दूर रहने के लिये तीन अघमर्षण मन्त्रों से ईश्वर द्वारा सृष्टि की रचना व उसकी महिमा का ध्यान करते हैं। जब हम ईश्वर के सर्वशक्तिमान रूप सहित इसके सृष्टि रूपी कार्य पर विचार करते हैं तो हमें यह भी विदित होता है कि ईश्वर हमारे प्रत्येक कर्म का साक्षी और उनका फल प्रदाता एवं न्यायकर्ता है। अतः ईश्वर द्वारा पापों के फल दुःखों से बचने के लिये हम अघमर्षण मन्त्रों का पाठ करके एक प्रकार से जीवन में कभी कोई पाप न करने का संकल्प लेते हैं।

शरीर को स्वस्थ एवं पवित्र करने की प्रार्थना सहित पाप न करने के संकल्प के बाद ईश्वर की हम पर कृपा दृष्टि बनी रहे और हमें ईश्वर का प्रत्यक्ष वा साक्षात्कार हो जाये, इसके लिये हमें न तो किसी मनुष्य व प्राणी से द्वेष करना है और न ही दूसरों के द्वेष से स्वयं को हानि होने देनी है। इसके लिये हम सर्वव्यापक, सर्वदेशी, सर्वशक्तिमान ईश्वर की उपस्थिति का अपने चारों ओर एवं नीचे व ऊपर की दिशाओं में ध्यान कर उसे अपना रक्षक स्वीकार मानते हुए उससे दूसरों के हमारे प्रति द्वेष और हमारे दूसरों के प्रति द्वेष को त्याग कर ईश्वर की न्याय व्यवस्था में अर्पित कर स्वयं को द्वेष मुक्त करते हैं। सभी प्रकार के द्वेषों से मुक्त व्यक्ति ही ईश्वर की उपासना को एकाग्र चित्त होकर भली प्रकार से कर सकते हैं। इस स्थिति के सम्पादित होने पर उपस्थान के चार मन्त्रों से ईश्वर की सत्ता का अपने बाहर व भीतर अनुभव कर उससे प्रार्थनायें करते हैं। ईश्वर-उपस्थान के चार मन्त्रों से प्रार्थना करते हुए हम कहते हैं कि हे परमेश्वर! आप अन्धकार से पृथक् प्रकाशस्वरूप हैं। आप प्रलय के पश्चात् भी सदा विद्यमान रहते हैं। आप प्रकाशकों के प्रकाशक, चराचर जगत के आत्मा ओर ज्ञानस्वरूप हैं। आपको सर्वश्रेष्ठ जानकर श्रद्धपूर्वक हम आपकी शरण में आये हैं। हे नाथ! आप हमारी रक्षा कीजिए। उपस्थान के दूसरे मन्त्र में प्रार्थना है कि वेद की श्रुति और जगत् के नाना पदार्थ आपका पता देने वाले झण्डों के समान हैं। यह वेदज्ञान एवं ईश्वर के बनाये पदार्थ हमें उस दिव्य गुणयुक्त, सर्वप्रकाशक, चराचर के आत्मा, वेद प्रकाशक भगवान् को सब सत्य विद्याओं की प्राप्ति के लिये उत्तम रीति से उसका ज्ञान कराते और उन्हें प्राप्त कराते हैं। तीसरे उपस्थान मन्त्र में हम विचार करते हैं कि ईश्वर सब देवों में श्रेष्ठ और बलवान् है। वह सूर्यलोक, प्राण, अपान और अग्नि का भी प्रकाशक है। वही परमात्मा द्युलोक, अन्तरिक्ष और पृथिवीलोक में व्यापक है। वही जड़ और चेतन जगत का आत्मा अर्थात् जीवन है। वह परमात्मा हमारे हृदयों में सदा सर्वदा प्रकाशित रहें। चौथा मन्त्र बोलकर हम कहते हैं कि हमारा परमात्मा सबका द्रष्टा है। वह धार्मिक विद्वानों का परमहितकारक, सृष्टि से पूर्व, पश्चात् और मध्य में सत्यस्वरूप से विद्यमान रहनेवाला है। हम उस सर्व जगदुत्पादक ब्रह्म को सौ वर्ष तक देखें। उसके सहारे से सौ वर्ष तक जीयें। सौ वर्ष तक उसका ही गुण-गान सुनें। उसी ब्रह्म का हम सौ वर्ष तक उपदेश करें। उसी की कृपा से हम सौ वर्ष तक किसी के अधीन न रहें। उस ईश्वर की आज्ञापालन और कृपा से सौ वर्ष के उपरान्त भी हम लोग देखें, जीवें, सुनें, सुनावें और स्वतन्त्र व स्वाधीन रहें।

उपस्थान के इन महत्वपूर्ण मन्त्रों के पाठ व तदनुरूप चिन्तन व भावों के बाद गायत्री मन्त्र का पाठ व उसके अर्थ के अनुसार अपने हृदय व मन में भाव उत्पन्न करने का विधान है। गायत्री मन्त्र में ईश्वर से प्रार्थना है कि वह सच्चिदानन्दस्वरूप, सकल जगदुत्पादक, प्रकाशकों के प्रकाशक परमात्मा के हम सर्वश्रेष्ठ, पापनाशक तेज का ध्यान करते हैं। हमारा परमेश्वर हमारी बुद्धि और कर्मों को उत्तम प्रेरणा प्रदान करें अर्थात् वह हमें बुरे कर्मों से छुड़ाकर अच्छे कामों में प्रवृत्त करे। गायत्री मन्त्र के बाद समर्पण मन्त्र है जिसमें हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि हे दया के भण्डार परमेश्वर! आपकी कृपा से हमने जो जप, उपासना वा सन्ध्या आदि कर्म किये हैं उससे हमें धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की सिद्धि शीघ्र वा आज ही प्राप्त हो। सन्ध्या का प्रयोजन ईश्वर का साक्षात्कार करना भी है। हमें लगता है कि समर्पण मन्त्र में जो काम शब्द आता है, उसमें सभी अभीष्ट पदार्थों की प्राप्ति सहित ईश्वर साक्षात्कार की कामना व भावना भी निहित है। ईश्वर साक्षात्कार के बाद ही मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है। अतः यह स्पष्ट है कि ईश्वर से धर्म, अर्थ व काम की प्रार्थना में ईश्वर का साक्षात्कार भी निहित है।

समर्पण मन्त्र के बाद नमस्कार का मन्त्र है। यह एक प्रकार से ईश्वर को नमस्कार करते हुए सन्ध्या की पूर्णता व समाप्ति का द्योतक है। सन्ध्या प्रतिदिन प्रातः व सायं करने का विधान है। इसकी न्यूनतम अवधि एक घंटा होती है। इससे अधिक कर सकें तो ऐसा करना लाभदायक होता है। सन्ध्या की अवधि एक घंटा न्यूनतम अवधि है। इससे हम अभीष्ट उद्देश्यों व लक्ष्यों की प्राप्ति कर सकते हैं। ऋषि दयानन्द का जीवन इसका साक्षात् उदाहरण था। हम यह भी अनुभव करते हैं कि संसार में जितने मत हैं उन्हें वैदिक सन्ध्या से लाभ उठाना चाहिये। सन्ध्या का समय प्रातः सूर्योदय से पूर्व एवं सायं सूर्यास्त के पश्चात होता है। यही समय ईश्वर का ध्यान करने का उत्तम होता है। सभी मतों के लोगों को वैदिक सन्ध्या से प्रेरणा ग्रहण कर अपने मतों की उपासना विधि में सुधार करना चाहिये। हम अनुभव करते हैं कि संसार में प्रचलित सभी उपासना पद्धतियों में वैदिक सन्ध्या सर्वोत्तम ही है और इससे धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष के लक्ष्य प्राप्त होते व हो सकते हैं। लक्ष्य की प्राप्ति हमारे अपने प्रयत्नों सहित सही विधि से सन्ध्या करने पर निर्भर है। वैदिक सन्ध्या की विधि सर्वथा दोषरहित एवं उचित है। हमें सन्ध्या में निरन्तरता को बनाये रखने के साथ दीर्घ काल तक इस सन्ध्या रूपी साधन को करना है। मृत्यु पर्यन्त हमें इसे पूर्ण श्रद्धा से करना है। ऋषि दयानन्द ने अपनी मृत्यु व प्राणों का त्याग करते समय भी ईश्वर की उपासना के मन्त्रों का पाठ सहित प्रार्थना के कुछ मार्मिक शब्द कहे थे। हमें भी इसका अनुसरण करना है। इसका सुखद परिणाम हमें अवश्य मिलेगा। ओ३म् शम्।

 


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