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’’नदी बजरी (रेती) खनन की समस्याऍं एवं विकल्प’’राष्ट्रीय कार्यशाला एवं प्रर्दशनी

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15 Apr 18
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रेती की उपयोगिता तो सर्व विदित ही है। कोई भी निर्माण कार्य हो भवन निर्माण, मल्टीस्टोरी बिल्डिंग्स, पुल निर्माण अथवा सडक निर्माण अथवा डेम-नहर या तालाब निर्माण का कार्य रेती को उपयोग में लेना ही पडता है। प्राकृतिक रूप में रेती नदियों में पानी के बहाव के साथ कंकड, पत्थर मिट्टी को अपने साथ बहाकर लाती है और उससे रेती का निर्माण होता है।

रेती के जमाव से नदी के किनारों का कटना व चौडाई में बढ जाना, कृषि की उपजाउ भूमि में रेती के समावेश से कमी होना, नदी के पैंदे में जमाव से उथला (कम गहराई) हो जाना, धरा के प्रवाह में परिवर्तन हो जाना इत्यादि कई प्रकार के प्रभाव होते है साथ ही पर्यावरण पर भी प्रभाव के कारण बनते है।

इन्हीं सभी कारणों को ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय, भारत ने १६ नवम्बर, २०१७ को बजरी के खनन को प्रतिबंधित किया हैं साथ ही बजरी के खनन को प्रतिबंधित किया है साथ ही सरकार को पाबंदित किया है कि बजरी खनन के पश्चात वैज्ञानिक तौर पर बजरी को पुर्नभरण रिपोर्ट प्राप्त नहीं हो जाती है तब तक तथा बजरी खनन के सभी पट्टाधारियों को भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से अनुमति नहीं प्राप्त करलें बजरी खनन पर रोक रहेगी।

इन सभी बातों के लेकर राज्य सरकार ने भी सर्वोच्च न्यायालय में अपना पक्ष प्रस्तुत किया साथ ही ’’नेशनल ग्रीन ट्रीब्युनल’’ में भी अपना पक्ष प्रस्तुत किया है। परन्तु अभी भी बजरी खनन पर रोक यथावत बनी हुई है।

इससे बजरी (रेती) की कमी भयंकर रूप से महसूस की जा रही है। कई सरकारी परियोजना, मल्टीस्टोरी परियोजना एवं अन्य निर्माण कार्य रूक गये है।

इनमें प्रमुख तौर पर नेशनल हाइवे का दिल्ली-मुम्बई ६-लेन प्राजेक्ट किशनगढ से अहमाबाद, पेट्रोलियम रिफाईनरी का २१० करोड रूपये का निर्माण कार्य, जयपुर मेट्रो रेल का १७५ करोड रूपये का कार्य, प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री जन आवास योजना २००० करोड रूपये, २३०० करोड के शहरी विकास कार्य एवं जल संसाधन विभाग के ६७५० करोड रूपये के चालू कार्य बुरी तरह से प्रभावित हुए है।

इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए माईनिंग इंजिरियरिंग एसोशियशन ऑफ इंडिया, राजस्थान चेप्टर, उदयपुर एवं खान व भू-विज्ञान विभाग, राजस्थान सरकार तथा खनन अभियांत्रिकी विभाग,सीटीएई, उदयपुर की सहभागिता में २१ व २२ अप्रेल, २०१८ को ’’नदी बजरी (रेती) खनन की समस्याऍं एवं विकल्प’’ विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला एवं प्रर्दशनी का आयोजन प्रौद्योगिकी एवं अभियांत्रिकी महाविद्यालय, उदयपुर के सभागार में आयोजित की जा रही है।

बजरी के विकल्प के तौर पर भी कई प्राईवेट क्रसिंग इकाईयां पत्थर गिट्टी एवं अन्य पदार्थो से बजरी का निर्माण कर रहे है। और वह बजरी (रेती) भी व्यावसायिक उपरयोग हेतु उपयोग में ली जा रही है,साथ ही अन्य मेटेरियल्स जैसे कि ताप बिजलीघरों की फलाई ऐश इत्यादि से भी बजरी(रेती) का निर्माण किया जा रहाह है। इस सभी विकल्पों पर भी इस राष्ट्रीय कार्यशाला में मंथन होगा। यह एम-सेंड अर्थात (मेन्यूफेक्चर्ड सेंड) उत्पादित बजरी निमार्ण कार्यो के (स्पेसीफिकेशन) विशिष्टाओं पर कितनी खरी है, यह भी विवेचन होगा।

बजरी(रेती) की कमी से केवल राजस्थान राज्य ही नहीं अपितु पूरा भारत इससे प्रभावित है और निर्माण कार्य रूकने से बेरोजगारी एवं देश के विकास की गति धीमी हुई है।


इस अवसर पर प्रौद्योगिकी एवं अभियांत्रिकी महाविद्यालय, उदयपुर प्रांगण में एक प्रर्दशनी का भी आयोजन किया गया है जिसमें (मेन्यूफेक्चर्ड सेंड) उत्पादित बजरी की क्रसिंग प्रणाली एवं उनकी प्रयोगशाला में टोस्टिंग की रिपोर्टस भी दर्शाई जायेगी।

इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में वाछिंत सभी तकनीकी पत्रों का समावेश प्रकाशित स्मारिका में किया जावेगा। करीब ३०० प्रतिभागी देश के विभिन्न भागों से भाग लेगें।

यह संगोष्ठी रेती (बजरी) से झुझते हुए देश के लिए उसक विकल्प एवं नदी बजरी के खनन की वास्तविक समस्याओं से रूबरू होने का एक बहुत अच्छा अवसर होगा और बजरी की उपलब्धता सुनिश्चित करने मं एक मील का पत्थर साबित होगा।

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