BREAKING NEWS

बीकानेर : ऊॅटों का देश

( Read 3533 Times)

04 Jun 19
Share |
Print This Page

बीकानेर : ऊॅटों का देश

बीकानेर : ऊॅटों का देश
राजस्थान के रेगिस्तान में उत्तर-पूर्व में अवस्थित बीकानेर को मरूस्थल का मोती कहे तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। अपने खूबसूरत महलों, मन्दिरां एवं इमारतां के लिये खास पहचान बनाता है। महाभारत काल में कुरू जांगल देश के नाम से जाना जाने वाला बीकानेर पाकिस्तान के साथ अन्तर्राष्टी्रय सीमा पर स्थित है। भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, राजस्थान राज्य अभिलेखाकार, एशिया की सबसे बड़ी ऊनी मण्डी, पलाना में लिग्नाईट के भण्डार, विश्व का सबसे बडा सयुक्ंत शस्त्र प्रशिक्षण केन्द्र, डाडाथोरा में लघु पाषाण कालीन अवशेषां का पाया जाना,विसरार में देश की सबसे बड़ी जिप्सम उत्पादन कम्पनी, रेत का तीतर के लिये विख्यात गजनेर अभयारण्य, रियासत की प्रसिद्व मांड गायिका अल्ला जिला बाई एवं इन्द्रागांधी नहर जैसी विशेषताओं वाला बीकानेर जिला हमारी राजस्थान यात्रा का अगला पड़ाव है। 
मध्यकालीन भव्यता आज भी बीकानेर शहर की जीवन शैली में देखने को मिलती है। रेगिस्तान का जहाज ऊंट यहॉ के जन जीवन का अविभाज्य अंग है। ऐतिहासिक दृष्टि से बीकानेर का इतिहास 1488 ई. पुराना है जब राठौड राजकुमार राव बीका जी (जोधपुर के संस्थापक राव जोधा के पुत्र) ने अपना राज्य यहॉ स्थापित किया था। उन्हांने इस बीहड़ क्षैत्र को आकर्षक शहर में बदल दिया और इसलिये बीका जी को बीकानेर का संस्थापक कहा जाता है। बीकानेर 5 द्वारां के साथ-साथ 7 किलोमीटर लंम्बी पंक्तिबंद दीवार से घिरा है। लाल गुलाबी बलुये पत्थर के महल,किले समृद्व वास्तुशिल्प के नमूने हैं। 
भौगोलिक दृष्टि से यह जिला 27011’ से 200 03’ उत्तरी अक्षांश एवं 71054 से 74012’ पूर्वी देशान्तर के मध्य स्थित है। जिले के उत्तर की ओर श्रीगंगानगर, पश्चिम की ओर जैसलमेर एवं पाकिस्तान, पूर्व की ओर श्री डूंगरगढ एवं नागौर तथा दक्षिण-पूर्व की ओर जोधपुर जिले की सीमाएं हैं। 
जिले का क्षेत्रफल 27,244 वर्ग कि.मी है। यहॉ की जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार 23 लाख 67 हजार 745 तथा साक्षरता दर 65.92 प्रतिशत है। जिले में औसतन 243 मि.मी. वर्षा होती है। यहॉ चारो और रेत के टीले नजर आते हैं। जलवायु शुष्क है। यह राज्य का सबसे गर्म जिला है। पिछले सालों में गर्मियां में अधिकतम तापमान 490 से. ग्रे. तक पहुचाने लगा है तथा सर्दियों में तापमान जमाव बिन्दु तक चला जाता है। जिले में गजनेर, अनूप सागर, कोलायत मीठे पानी की झीले हैं तथा लूणकरणसर खारी झाल है जिससे नमक बनाया जाता है। यहॉ पाया जाने वाले खेजडी, रोहिड़ा बैर, शीशम, पीपल,खजूर एवं सफेदा मुख्य वनस्पति हैं। जिले में भारतीय मृग, ब्लैक बक, तीतर,चिंकारा, लौमडी गीदड, साहि ,गिलहरी, जंगली रीछ, सुअर एव भेड़िया वन्य जीव पाये जाते हैं।  गजनेर वन्यजीव अभयारण्य प्रसिद्व है। बीकानेर में एक जन्तुआलय स्थित है। देशनोक, मुकाम, जोरबीड एवं बज्जू शिकार निषिद्व क्षैत्र हैं।
अर्थव्यवस्था की दृष्टि से इन्द्रागांधी नहर आने से यहॉ कृषि उत्पादन बढा है। गेहूॅ, दाल, बाजरा, गन्ना, ग्वार एवं खजूर की खेती जाती है। पशुपालन भी काफी समृद्व हैं। उरमूल एवं आंनद डेयरी का राज्य में नाम है। नाली, मगरा, पूगल नस्ल की भेड़ें यहॉ पाई जाती हैं। ऊंट यहॉ का सबसे लोकप्रिय पशु है। जोरबीड में राष्ट्रीय उष्ट अनुसंधान केन्द्र स्थापित है। स्टेट वूलन मिल, उरमूल डेयरी, तिलम संघ एवं ऊन आधारित उधोग प्रमुख हैं। कुटिर उधोग, स्टील फेब्रिकेशन, रंगाई-छपाई, कागज निर्माण, भुजिया-पापड़ एवं रसगुल्ला आदि उधोग भी प्रचुरता से हैं। यह शहर पापड, भुजिया एवं सरगुल्ले के उधोग में पूरे भारत में प्रसिद्व है। 
 कला- सस्ंकृति में हस्तशिल्प की दृष्टि से यहॉ की ऊस्ताकलां प्रसिद्व है। ऊटं की खाल पर स्वर्ण मीनाकारी एवं मुनवत का बेमिसाल कलात्मक कार्य ऊस्ताकलां कहा जाता है। पद्म श्री से सम्मानित हिजामुद्वीन ऊंस्ता इस कला के सिद्व हस्थ कलाकार है। ऊटं की खाल से कुप्पियॉ, डिब्बियां आदि बनाई जाती हैं। ऊंनी गलीचे एवं दरियां भी प्रसिद्व हैं। 
जसनाथी संप्रदाय के कलाकारों द्वारा जलते अंगारां पर किये जाने वाला ’’अग्नि नृत्य’’ प्रसिद्व लोकनृत्य है। कातरियासर गांव को इस नृत्य का उद्गम स्थल माना जाता है होली पर रम्मत खेल प्रमुख लोकनाट्य है। ऐतिहासिक एवं पौराणिक आख्यानों पर आधारित होता है। यह लोक नाट्य। रम्मतां का खेल फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक किया जाता हैं। संत जम्मेश्वर जी एवं वीर बिग्गा जी प्रमुख लोक देवता हैं। बीकानेर शैली के चित्रां पर जैन एवं मुगल शैली का प्रभाव नजर आता है। महलों मे दीवारां पर चित्र नजर आते हैं। अनेक चित्रकार रामसिंह जी के समय बाहर से आकर यहॉ बस गये। प्रति वर्ष जनवरी माह में बीकानेर का ऊटं उत्सव, मार्च-अप्रेल मे देशनोक में करनी माता का मेला तथा कोलायत में कार्तिक मास की पूर्णिमा  को आयोजित कपि मुनि का मेला राजस्थान में विख्यात हैं। मुकाम, कोलायत एवं देशनोक जिले के प्रमुख तीर्थ स्थल हैं। 
बीकानेर शहर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 11,15 एवं 89 पर स्थित हैं। भारत के सभी प्रमुख शहरों से बीकानेर बस सेवा से जुड़ा है। बीकानेर दिल्ली से 456 किमी. जयपुर से 334 किमी. एवं जैसलमेर से 333 किमी. दूरी पर है। बीकानेर रेल सेवा के माध्यम से दिल्ली, आगरा, जोधपुर, भटिंडा, कोलकाता,  हरिद्वार आदि शहरो से जुड़ा है। समीपस्त एयरपोर्ट जोधपुर मे 253 किमी. दूरी पर हैं। टेक्सी, ऑटो रिक्शा एवं तांगा स्थानीय यातायात के साधन हैं। 
 

दर्शनीय स्थल

जूनागढ़ किला
जूनागढ़ स्थापत्य शिल्प, भौगोलिक स्थिति, विलक्षण कला सज्जा का अनुपम उदाहरण है।  जूनागढ़ की नींव 30जनवरी 1586 को रखी गयी थी और यह इसका निर्माण आठ साल बाद 17 फरवरी   1594 में पूरा हुआ। गढ़ की सरंचना मध्ययुगीन स्थापत्य-शिल्प में गढ़, महल और सैनिक जरूरतों के अनुरूप बना है। जूनागढ़ बहुत कुछ आगरे के के किले से मिलता जुलता है। चतुर्भुजाकार ढांचे में डेढ़ किलोमीटर के दायरे में किला पत्थर व रोडों से निर्मित है। परकोटे की परिधि 968 मीटर है जिसके चारों और नौ मीटर चौड़ी व आठ मीटर गहरी खाई है। किले 37 बुर्जे बनी है जिन पर कभी तोपें रखी जाती थी। 
किले पर लाल पत्थरों को तराश कर बनाए गए कंगूरे देखने में बहुत ही सुन्दर लगते हैं। गढ़ के पूरब और पश्चिम के दरवाजे  कर्णपोल और चांदपोल हैं। मुख्य द्वार सूरजपोल के अलावा दौलतपोल, फतहपोल, तरनपोल और धुर्वपोल है। प्रवेश द्वार की चौडी गली पार करने के बाद दोनों और काले पत्थरों की बनी महावत सहित हाथियों की ऊँची प्रतिमाएं बनी है। ऊपर गणेश जी की मूर्ति और राजा राय सिंह की प्रशस्ति है।             सूरजपोल जैसलमेर के पीले पत्थरों से बना है। दौलतपोल में मेहराब और गलियारे की बनावट अनूठी है। किले के भीतरी भाग में आवासीय इमारतें, कुँए, महलों की लम्बी श्रृंखला है जिनका निर्माण समय -समय पर विभिन्न राजाओं ने अपनी कल्पना अनुरूप करवाया था। सूरजपोल के बाद एक काफी बड़ा मैदान है और उसके आगे नव दुर्गा की प्रतिमा द्य समीप ही जनानी ड्योढी से लेकर त्रिपोलिया तक पांच मंजिला महलों की श्रंखला है पहली मंजिल में सिलहखाना, भोजनशाला, हुजुरपोडी बारहदरिया, गुलाबनिवास, शिवनिवास, फीलखाना और गोदाम के पास पाचों मंजिलों को पार करता हुआ ऊँचा घंटाघर है। 
गढ़ की दूसरी मंजिल में जोरावर हरमिंदर का चांक और विक्रम विलास है। रानियों के लिए ऊपर जालीदार बारहदरी है। भैरव चौक, कर्ण महल और 33 करौड़ देवी देवताओं का मंदिर दर्शनीय है। इसके बाद कुंवर-पदा है जहाँ सभी महाराजाओं के चित्र लगे हैं। जनानी ड्योढी के पास संगमरमर का तालाब है फिर कर्ण सिंह का दरबार हाल है जिसमे सुनहरा काम उल्लेखनीय है। पास में चन्द्र महल, फूल महल, चौबारे, अनूप महल, सरदार महल, गंगा निवास, गुलाबमंदिर, डूंगर निवास और भैरव चौक है। चौथी मंजिल में रतननिवास, मोतीमहल, रंगमहल, सुजानमहल और गणपत विलास है। पांचवी मंजिल में छत्र निवास पुराने महल, बारहदरियां आदि महत्वपूर्ण स्थल है। अनूप महल में सोने की पच्चीकारी एक उत्कृष्ट कृति है। इसकी चमक आज भी यथावत है। गढ़ के सभी महलों में अनूप महल सबसे ज्यादा सुन्दर व मोहक है। महल के पांचों द्वार एक बड़े चांक में खुलते हैं।
महल के नक्काशीदार स्तम्भ, मेहराब आदि की बनावट अनुपम है। फूल महल और चन्द्र महल में कांच की जडाई आमेर के चन्द्र महल जैसी ही उत्कृष्ट है। फूल महल में पुष्पों का रूपांकन और चमकीले शीशों की सजावट दर्शनीय है। अनूप महल के पास ही बादल महल है। यहाँ की छतों पर नीलवर्णी उमड़ते बादलों का चित्रांकन है। बादल महल के सरदार महल है। पुराने जमाने में गर्मी से कैसे बचा जा सकता था, इसकी झलक इस महल में है। गज मंदिर व गज कचहरी में रंगीन शीशों की जडाई बहुत अच्छी है। छत्र महल तम्बूनुमा बना है जिसकी छत लकड़ी की बनी है। कृष्ण-रासलीला की आकर्षक चित्रकारी इस महल की विशेषता है। इन महलों में हाथी दांत का सुन्दर काम भी देखने योग्य है। महलों की वास्तुकला राजपूत, मुगल गुजराती शैली का सम्मिलित रूप है। 
लालगढ़ महल
नगर के बाहर की इमारतों में लालगढ़ महल बड़ा भव्य है। इस महल का निर्माण महाराजा गंगा सिंह ने अपने पिता महाराजा लालसिंह की स्मृति में बनवाया था।  महल लाल पत्थर का बना है, जिसपर खुदाई का बड़ा उत्कृष्ट काम है। भीतर के फर्श संगमरमर के हैं। महल काफी विशाल है तथा इसमें सौ से अधिक भव्य कमरे हैं। महल के अहाते में मनोहर उद्यान बने हैं, जिनमें कहीं सघन वृक्षों, कहीं लताओं और कहीं रंग-बिरंगे फूलों से भरी हुई हरियाली की छंटा दर्शनीय है। इस महल में महाराजा लालसिंह की सुन्दर प्रस्तर-मूर्ति खड़ी है। महल के एक भाग में तरणताल है। इस महल के भीतर एक पुस्तकालय है जिसमें कई हस्तलिखित पुस्तकों का संग्रह है। महल की दीवारों पर सुंदर चित्रकारी है।
शिवधाम-शिवबाड़़ी
बीकानेर में यूं तो शिव के बहुत से प्राचीन मंदिर हैं परन्तु शिवबाड़ी में सचमुच शिव का वास है। शिवबाड़ी माने श्री लालेश्वर महादेव मंदिर राजा- महाराजाओं के समय में निर्मित इस मंदिर की खास बात है-यहां का सुम्य परिवेश। बीकानेर शहर से नौ किलोमीटर दूर इस मंदिर का निर्माण महाराजा डूगरसिंह ने करवाया था। डूंगरसिंह के पिता थे लालसिंह। डूंगरसिंह ने पिता के नाम पर भगवान शिव मंदिर की स्थापना की थी अतः यह मंदिर कहलाया-लालेश्वर मंदिर। वैशाख शुक्ला दशमी, संवत् 1937 को अर्थात 19 मई, 1880 में इस भव्य मंदिर की स्थापना हुई।
शिवबाड़ी में शिवलिंग पंचमुखी है। दिव्य और भव्य भगवान शिव का यह विग्रह रूप अत्यधिक मोहक है। छोटे किलेनुमा परकोटे और बुर्जों से घिरा शिवबाड़ी का मंदिर राजसी वैभव से अपनी ओर खींचता है। किले के सदृश है यहां का प्रवेश द्वार।
शिवबाड़ी के मुख्य मंदिर का गर्भग्रह काले कस्तूती पत्थर से बना है। मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते ही ऊपर मुख्य मंदिर का प्रवेश द्वार। प्रवेश द्वार से पहले नदी की विशाल पीतल प्रतिमा है। कस्तूती काले पत्थरों से निर्मित शिवलिंग। पंचमुखी शिवलिंग के अलावा छोटे से मंदिर में महागौरी का सुन्दर विग्रह है। गणेश और कर्तिकेय भी सफेद मार्बल से बने हैं और विशाल पंचमुखी शिवलिंगक के ठीक समने नंदी विराज रहे हैं। मुख्य शिव मंदिर के गभगृह के बाहर की फेरी के चार कोनों उत्तर, पश्चिम, पूर्व और दक्षिण में शिव के छोटे-छोटे मंदिर और शिवराचार्य और महर्षि वेदव्यास की दो प्रतिमाएं भी गर्भगृह के पश्चिम कोने में स्थापित की गई।
शिवबाड़ी के मुख्य मंदिर की दीवारों और छतों पर की गई चित्रों की आभा आकर्षक है। भित्ति चित्रों की बीकानेरी परम्परा के अंतर्गत छतों पर भगवान कृष्ण की लीलाओं का वर्णन है। बांसुरी बजाते, गोपियों को रिझाते। गायों को अपनी बांसुरी से मोहित करते कृष्ण मंदिर की दीवारों व खिड़कियों आदि पर पत्थर की सुन्दर नक्काशी भी अद्भुत है।
शिवबाड़ी परिसर में ही भव्य मुख्य मंदिर के उत्तर-पश्चिम में है प्रचीन डूंगरेश्वर महादेव मंदिर। अमृत बावड़ी पर बने इस मंदिर का निर्माण 19 अप्रैल, 1882 ई. को किया गया। कहते हैं यहां के शिवलिंग को पवित्र नर्मदा नदी से यहां लाया गया था। शिव परिवार के अलावा यहां 16 और भी छोटे शिवलिंग अलग से ध्यान खींचते हैं। अमृत बावड़ी पर बने इस शिव मंदिर की सीढ़ियां उतरते हैं तो सामने ही दिखाई देगी एक बावड़ी एवं सफेद मार्बल से निर्मित मृत्युंजय प्रतिमा। चारों कोनों में कलात्मक छतरियां एवं पास ही भव्य यज्ञशाला भी बनाई गई हैं।
भांडाशाह जैन मन्दिर 
 जैन मन्दिरों की कड़ी में बीकानेर स्थित पांचवीं सदी का प्राचीन जैन मन्दिर भांडाशाह जैन धर्म का आस्था स्थल होने के साथ-साथ पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यह मन्दिर वास्तु व शिल्पकला में बेजोड़ है। यह मन्दिर जैन धर्म के पांचवें तीर्थंकर सुमतिनाथ को समर्पित है। मन्दिर के शिलालेख से ज्ञात होता है कि मन्दिर का निर्माण संवत् 1571 में आसोज सुदी दूज को महाराजा लूणकरण सिंह के समय करवाया गया था। मन्दिर का संचालन चिन्तामणि जैन मन्दिर प्रन्यास द्वारा किया जाता है। 
प्राप्त जानकारी के अनुसार जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ के आचार्य जिनकीर्ति रत्नसूरि के भ्राता के पुत्र मालाशाह थे जिनके चार बेटे सांडाशाह, भांडाशाह, तूंडाशाह और सूंडाशाह हुए। सेठ भांडाशाह ने उस समय नगर के चारों ओर लम्बे क्षेत्र में सर्वाच्च स्थान का चिन्हीकरण कर इस मन्दिर का निर्माण कराया था। मन्दिर के पीछे तत्कालीन नगर दुर्ग का निर्माण भी करवाया गया था। वर्तमान में वहां भगवान गणेश व अन्य देवी-देवताओं के साथ बीकानेर के सर्वाधिक लोकप्रिय लक्ष्मीनाथ जी का मन्दिर है। 
 भांडाशाह जैन मन्दिर तिमंजिला है जिसमें मूलनायक सुमतिनाथ, दूसरी मंजिल में जैन धर्म के उन्नीसवें तीर्थंकर मल्लीनाथ व ऊपर की तीसरी मंजिल की प्रतिमा प्राचीन व उसके चिन्ह धूमिल होने से नजर नहीं आती एवं यहीं मन्दिर निर्माता भांडाशाह की प्रतिमा भी है। मन्दिर के अधिष्ठायक देव भैरव हैं। यह मन्दिर चतुर्मुख जिनेश्वर प्रमिमाएं होने के कारण चार भागों में विभक्त है। मन्दिर के प्रत्येक भाग में 6 तीर्थंकर, दो यक्ष एवं चार नर्तकियां उत्कीर्ण हैं। इस प्रकार मन्दिर में कुल 24 तीर्थंकर, 8 यक्ष एवं 16 पुतलिकाएं प्रतिमाएं बनी हैं। मन्दिर में भरतमुनि के नाट्यशास्त्र से संबंधित वाद्ययंत्रधारी एवं नृत्य मुद्रा में देवांगनाओं की प्रतिमाएं सजीव रूप से तराशी गई हैं। 
 मन्दिर का सभा मण्डप बीकानेर के उस्ता कला के शिल्पियों द्वारा निर्मित आकर्षक चित्रों से सजाया गया है। अपने समय के विख्यात चित्रकार मुराद बक्श ने यहां कई वर्षां तक इस सभा मण्डप को चित्रों से सुसज्जित करने का कार्य किया। 
लोक देवी करणी माता
देशनोक का करणी माता मंदिर पांच शताब्दियों से देशी- विदेशी पर्यटकों व श्रद्धालुओं के कौतुहल व आस्था का प्रमुख स्थल बना हुआ है। चूहों वाली देवी के रूप में विश्व विख्यात करणी माता का मंदिर शिल्प व कला की दृष्टि से भी अपने आप में अनूठा है।
 बीकानेर से 30 किलोमीटर दूर देशनोक का करणी माता मंदिर पांच शताब्दियों से देश-विदेश के पर्यटकों व श्रद्धालुओं के कौतुहल व आस्था का प्रमुख स्थल बना हुआ है। शारदीय एवं चैत्र नवरात्रा के दौरान दर्शनार्थियों की भीड़ उमड़ पड़ती है। श्रद्धालु पैदल व विभिन्न वाहनों से इस शक्ति पीठ पर पहुंचकर शीश नवाते हैं, वे माता के मंदिर में जोत करवाते तथा नारियल व प्रसाद आदि चढ़ाकर मनोकामना पूरी करने की प्रार्थना करते हैं। करणी माता के काबी यानी चूहों को भी लड्डू खिलाया जाता है तथा दूध पिलाया जाता है।
लोक देवी के रूप में विख्यात करणी माता का अवतार अश्विन शुक्ला 7 संवत् 1444 को हुआ था। राजपूत और चारण जाति ही नहीं अनेक जातियों की अराध्य देवी ने बचपन में ही अनेक चमत्कार किए तथा अनेक वर्षों तक तप-साधना कर अलौकिक देवी के रूप में प्रतिष्ठत हुई।
देशनोक में करणी माता के पांच सौ वर्ष प्राचीन मंदिर का निर्माण विभिन्न चरणों में हुआ। सर्वप्रथम करणी माता की सूखी लकड़ी की नेहड़ी बनाकर रोपित की जहां वर्तमान में खेजड़े का वृक्ष स्थापित है। नेहड़ीजी वर्तमान में सुन्दर मंदिर के रूप में प्रतिष्ठित होगया है। देशनोक करणी माता के मंदिर में दर्शन करने वाले भक्त मंदिर से एक किलोमीटर दूर नेहड़ीजी में भी दर्शन करने जाते हैं।
देशनोक में करणी माता की मूर्ति की स्थापना उनके लौकिक देह के ज्योतिलीन होने के चार दिन पश्चात विक्रम संवत् 1595 चैत्र शुक्ला चतुर्दशी को उŸारा-फाल्गुनी नक्षत्र में हुई। कहा जाता है कि जिस गुफा में वर्तमान मंदिर है इसका निर्माण स्वयं माताजी ने किया। यह बड़े-बड़े किसी पर्वतीय चट्््टानी के टुकड़ों को बिना ईंट-गोरे के एक पर एक रखकर बनाया गया है। इसकी छत जाल वृक्ष की लड़कियां रखकर बनाई गई। गुम्भारे के प्रवेश द्वार से लगभग पांच फीट का सकड़ा रास्ता है। इसके बाद गुम्भारे गोलाकार रूप में बना हुआ है और यह लगभग दस से बारह फीट के क्षेत्र में है। माताजी स्वयं अपना नित्य कर्म, पूजा व ध्यान इसी गुम्भारे में रहकर करती थीं।
इस गुम्भारे में करणी माता के उस रूप की मूर्ति मुख्य मूर्ति है जिसका दर्शन श्री बने खाती को नेत्र ज्योति मिलने पर हुआ और उसने यह मूर्ति जैसलमैरी पत्थर पर उसी के अनुसार बनवाई। इस मूर्ति में मां का चेहरा सौम्य रूप में मुस्कराता है। नेत्र मुदित हैं परन्तु ठोड़ी पर दाढ़ी का चित्रण किया गया हुआ है तथा गले में हार है और दो लड़ी मोतियों की माला है, हाथों में भुजबंध व चूड़ा है जो कि कंधे से कोहनी तक स्पष्ट अंकित है। पैरों में पायल, कमर में करधनी, कांचली व धावली पहने हैं। दाहिने हाथ में त्रिशूल है जिसके नीचे महिषासुर का सिर है। बायें हाथ में नरमुण्ड की चोटी पकड़े हुए हैं। इस मूर्ति के बिलकुल पास में बायें व दायें काले व गोरे भैरव की मूर्तियां हैं। दाहिनी ओर माताजी की पांच बहनों की मूर्तियां पत्थर पर खुदी हुई स्थापित हैं और आवड़ माता की मूर्तियां पाषाण पर खुदी हुई स्थापित है। मूर्ति की पीठ पर स्वर्ण का तोरण बना हुआ है। मूर्ति के बायीं तरफ कारणीजी की सातों बहनों और दायीं ओर आवड़ माता की सातों बहनों की मूर्तियां लगी हैं।
प्रारम्भ में गुम्भारे के ऊपर एक कच्ची ईंटों का मंदिर (मढ़) बीकानेर राव जैतसी ने कामरान के साथ भटनेर (हनुमानगढ़) युद्ध में विजय पाप्त करने के उपलक्ष्य में बनाया था। कालान्तर में बीकानेर नरेश सूरतसिंह ने कच्चे मढ़ की जगह पक्का गुम्बज द्वार मंदिर, इसके चारों ओर परकोटा तथा मंदिर सिंहद्वार बनाया। बीकानेर रियासत के महाराजा गंगासिंह करणी माता के अनन्य भक्त थे, इस मंदिर को उन्होंने संगमरमर का बनवा दिया। निज मंदिर के बाहर एक संगमरमर की तिबारी है जिसे पंखाशाल कहते हैं, इसमें नगारों की जोड़ी रखी है तथा चांदी का घंटा है।
करणी माता के मंदिर की दांहिनी ओर आवड़ माता का मंदिर है जिसमें इन्द्र बाइसा की प्रतिमा लगी हुई है। मंदिर सिंहद्वार पर आगे का संगमरमर का स्थापत्य कला पूर्ण दरवाजा बीकानेर के स्वर्गीय सेठ चांद मल ढढ्ढा ने बनाया था। संगमरमर के द्वार पर बारीक ऊंकेरी गई बेलबूटों व पिŸायों का काम देखते ही बनता है। बेलासर के चलवे मघजी सुथार ने यह उत्कृष्ट कार्य अपने सान्निध्य में करवाया जो आज भी उनकी कला कौशल की कहानी कहता नजर आता है। जिस शिलाखण्ड पर आकृतियां बनी हुई हैं उनमें कहीं भी जोड़ नजर नहीं आता। इस द्वार की नयनाभिराम छवि निहारते जी नहीं भरता। परियों का झुमका, हंस पर आरूढ़ सरस्वती की मूर्ति, बीन बजाते सपेरे, ध्यानावस्थित महात्मा, कंदराओं में सुस्ताते सिंह कलाकार की कला की प्रशंसा करने को मजबूत कर देते हैं। मंदिर के मुख्य द्वार में सफेद संगमरमर के साथ बीच में काले संगमरमर की मूर्तियां, हाथी अपनी अलग ही छटां बिखेरते हैं। द्वार की कोरे पर काबों चूहों की अविरल श्रृंखला की अलग ही पहचान है। दोनों ओर बनी चौकियों पर संगमरमर के सिंह की कलात्मक आकृतियां भी आकर्षण का केन्द्र बनी हैं।
    मंदिर में वैसे तो सैकड़ां की तादाद में काबे यानी चूहे हैं परन्तु सफेद चूहे का अलग महत्व है। लोग सफेद चूहे के दर्शन कर अपनी तीर्थ यात्रा को सफल मानते हैं। मंदिर के अंदर बड़े-बड़े कढ़ाव रखे हैं जिनके नाम साव और भदवा हैं। सबसे बड़ा पूजन प्रसाद इन्हीं में बनता है। इन दोनों कढ़ावों में 90 मण बाट यानी साढ़े तीन क्विंटल से अधिक की लापसी बनती है। ये कढ़ाव 2 मीटर गहरे हैं। इनका घेरा 15 मीटर के लगभग है।
    पिछले दो तीन दशक से मंदिर का निरन्तर विकास हो रहा है। मंदिर को सुरक्षा की दृष्टि से भी सुरक्षित किया गया है। दानदाताओं व भामाशाहों के सहयोग से द्वार भी बनाए गए हैं तथा मंदिर के बाहर चौक पर बेरीकेटिंग आदि लगाए गए हैं।
गजनेर झील
      बीकानेर से लगभग २० मील दक्षिण-पश्चिम में बसा क्षेत्र है। यह महाराजा गजसिंह के समय आबाद हुआ था और बीकानेर राज्य के प्रसिद्ध तालाब गजनेर के नाम पर ही इसकी प्रसिद्धि है। यहां पर डूंगर निवास, लाल निवास, शक्त निवास और सरदार निवास नामक सुन्दर महल हैं। खंभे,झरोखें,महल की स्क्रीन इस स्मारक का प्रमुख आकर्षण रहे हैं जिन पर जटिलता से नक्काशी का काम किया गया है। महल के बाहर पर्यटक प्रवासी पक्षियों को देख सकते हैं। पक्षियों में,काले हिरण चिंकारा, नीले बैल, नील गाय को यहाँ देखा जा सकता है।
     शीतकाल में बत्तखों, भड़तीतरों आदि के आ जाने के कारण कुछ दिनों के लिए यह उत्तम शिकारगाह बन जाता था। गजनेर के उद्यान में नारंगी और अनार के वृक्ष बहुतायत से हैं तथा कई प्रकार की सुंदर लताएं आदि भी हैं। तालाब का जल आरोग्यप्रद न होने के कारण इसका उपयोग कम होता है। यहां पर निर्मित झील काफी सुंदर है। यह स्थल पूरे बीकानेर के सबसे सुंदर स्थलों में से एक है।
        वर्तमान में यह एक पर्यटन स्थल है, जहां एक वन्य जीवन अभयारण्य भी स्थित है। गजनेर झील बीकानेर जिले से 32 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। यह एक छोटी झील है, जो लगभग 0.4 कि.मी. लम्बी तथा 183 से 274 मीटर चौड़ी है।

 


Source :
This Article/News is also avaliable in following categories : Bikaner News
Your Comments ! Share Your Openion

You May Like