“देश और समाज से गुरुकुलों और गुरुकुलीय पद्धति को न्याय नहीं मिल रहा हैः आचार्य डा0 धनंजय”

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09 Nov 19
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-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

“देश और समाज से गुरुकुलों और गुरुकुलीय पद्धति को  न्याय नहीं मिल रहा हैः आचार्य डा0 धनंजय”

लगभग ढाई वर्ष पूर्व देश के सभी वैदिक गुरुकुलों का एक संगठन ‘श्रीमद्दयानन्द वैदिक गुरुकुल परिषद के नाम से गठित किया गया था। इसका दूसरा वृहद तीन दिवसीय अधिवेशन गुरुकुल महोत्सव के रूप में आचार्य डा0 धनंजय आर्य जी के संयोजन में 8 से 10 नवम्बर, 2019 को गुरुकुल पौंधा-देहरादून में आयोजित हो रहा है। आज उत्सव के प्रथम दिन प्रातः सन्ध्या व यज्ञ का अनुष्ठान किया गया। यज्ञ के ब्रह्मा सुप्रसिद्ध आर्य विद्वान डा0 सोमदेव शास्त्री, मुम्बई थे। यज्ञ के बाद ध्वजारोहण किया गया। परिषद के अध्यक्ष स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती जी ने ओ३म् ध्वज फहराया। इस अवसर पर सब उपस्थित बन्धुओं ने मिलकर ध्वज गीत का गान किया। स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती जी ने इस अवसर पर सम्बोधन में महोत्सव में पधारे सभी स्पर्धार्थियों को उत्साह से भाग लेने की प्रेरणा की और कहा कि यदि कोई स्पर्धार्थी पुरस्कार के लिये चयनित न हो तो उसे निराश नहीं होना चाहिये। अगले वर्ष उसे और अधिक तैयारी कर स्पर्धा में भाग लेना चाहिये। इसके बाद कुछ समय के लिये प्रातराश के लिये अवकाश रखा गया और प्रातः 10.00 से उद्घाटन समारोह का आयोजन गुरुकुल के वृहद सभागार वेद भवन में सम्पन्न किया गया। यह समारोह देहरादून के वैदिक साधन आश्रम तपोवन के यशस्वी मंत्री श्री प्रेमप्रकाश शर्मा जी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। इसका संचालन गुरुकुल के सुयोग्य स्नातक एवं प्रो0 डा0 रवीन्द्र कुमार आर्य ने योग्यतापूर्वक किया। उन्होंने संस्कृत में भी अपनी बातों को कहा तथा विद्वानों के वक्तव्यों पर अपनी महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। स्वामी प्रणवानन्द जी का परिचय देते हुए आचार्य रवीन्द्र आर्य ने कहा कि उन्होंने गुरुकुलों के संचालन एवं स्थापना में अपना सारा जीवन लगाया है। स्वामी जी ने गुरुकुलों के माध्यम तथा अपने उपदेशों के द्वारा संस्कृत को बढ़ावा दिया है। स्वामी प्रणवानन्द जी द्वारा केरल राज्य सहित देश के उड़ीसा, हरियाणा, उत्तरप्रदेश तथा दिल्ली आदि में 9 गुरुकुलों का संचालन किया जा रहा है। गुरुकुल पौंधा का उल्लेख कर उन्होंने इस गुरुकुल के पूर्व स्नातक श्री दीपक कुमार द्वारा दोहा के एशियन खेलों में रजत पदक की प्राप्ति की चर्चा की। उन्होंने बतया कि वर्ष 2020 में जापान के टोक्यो में होने वाले ओलम्पिक खेलों में दीपक कुमार जी का चयन होना गुरुकुल पौंधा एवं समस्त गुरुकुल परिवार के लिये गौरव की बात है।

 

उद्घाटन समारोह में अनेक विद्वानों सहित गुरुकुलों की अनेक आचार्यायें और आचार्य भी मंच पर उपस्थित थे। प्रथम पंक्ति में स्वामी प्रणवानन्द जी तथा उनके निकट श्री प्रेमप्रकाश शर्मा, आचार्य डा0. धनंजय आर्य जी, आचार्य वत्स शास्त्री, डा0 सोमदेव शास्त्री, डा0 यज्ञवीर जी, स्वामी विश्वानन्द जी, पं0 धर्मपाल शास्त्री, आचार्य शुद्ध बोध तीर्थ आदि विद्वान आसीन थे। समारोह का आरम्भ दीप प्रज्जवलन से हुआ जिसे स्वामी प्रणवानन्द जी सहित अनेक विद्वानों ने किया। मंच पर उपस्थित सभी विद्वानों का गुरुकुल के अधिष्ठाता श्री चन्द्रभूषण आर्य जी द्वारा अभिनन्दन किया गया। समारोह में प्रथम सम्बोधन श्री वत्स शास्त्री जी का था। उन्होंने धारा प्रवाह संस्कृत बोल कर अपने विचार प्रस्तुत किये जिससे श्रोतागण प्रसन्न व आनन्द का अनुभव कर रहे थे। श्री रवीन्द्र आर्य ने गुरुकुल महोत्सव के आयोजन को भव्य एवं अपूर्व बताया। उन्होंने बताया कि इस आयोजन की योजना आचार्य डा0 धनंजय जी के मस्तिष्क की देन है। स्वामी विश्वानन्द सरस्वती जी ने अपने सम्बोधन के आरम्भ में गुरुकुल विषयक कुछ प्रभावशाली संस्कृत के श्लोकों को अति मधुर शब्दों में गाकर सुनाया। स्वामी जी ने कहा कि गुरुकुल परम्परा में अध्ययन करने से युवक युवतियां मनुष्य जीवन की वास्तविकता को जान सकते हैं। उन्होंने कहा कि आजकल की विद्या धन कमाने की विद्या है। उनके अनुसार आज की संस्कार विहीन विद्या समाज के लिये घातक है। मनुष्य के जीवन का परम लक्ष्य मुक्ति को प्राप्त करना है। स्वामी जी ने सन्ध्या के समर्पण मन्त्र तथा योग दर्शन का उल्लेख किया और कहा कि मनुष्य के जीवन मे अनुशासन होना चाहिये। उन्होंने कहा कि जीवन में अनुशासन होने को भी योग कहते हैं। स्वामी विश्वानन्द जी ने आशा व्यक्त की कि गुरुकुलों में पढ़ने वाले सभी छात्र छात्रायें वेदों के विद्वान बनकर वेद प्रचार का कार्य करेंगे ओर इसके साथ ईश्वर की प्राप्ति का भी प्रयत्न करेंगे। इस उद्देश्य को पूरा करने के पक्ष में बड़ी संख्या में छात्र व छात्राओं ने अपने हाथ उठाकर स्वामी जी की बात का समर्थन किया और कहा कि वह सब अपने अपने जीवन में इस कार्य को करेंगे। स्वामी विश्वानन्द जी ने ऋषि दयानन्द और उनके कार्यों का स्मरण कर अपने सम्बोधन को विराम दिया।

 

वरिष्ठ वैदिक विद्वान डा0 सोमदेव शास्त्री जी ने अपने सम्बोधन में ऋषि दयानन्द के शब्दों को स्मरण कराया जिसमें उन्होंने कहा है कि ऋषियों के बनाये आर्ष ग्रन्थों को पढ़ना समुद्र में गोता लगाना और बहुमूल्य मोतियों को पाने के समान है। काशी शास्त्रार्थ का उल्लेख कर डा0 सोमदेव शास्त्री जी ने कहा कि काशी के राजा ईश्वरीनारायण सिंह ने काशी के अपने पण्डितों को कहा था कि ऋषि दयानन्द स्वामी विरजानन्द सरस्वती, मथुरा के शिष्य हैं जो हर बात का वेद प्रमाण मानते हैं। इस पर पण्डितों ने 15 दिन वेद प्रमाण ढूंढने के लिये मांगे थे। डा0 सोमदेव जी ने कहा कि काशी के शीर्ष 27 पण्डित भी अकेले स्वामी दयानन्द का मुकाबला नही ंकर सके थे। आचार्य सोमदेव शास्त्री जी ने वेद के वचन वीर भोग्या वसुन्धरा का उच्चारण कर गुरुकुलों के छात्र और छात्राओं को कहा कि अपने को विद्यावान बनाकर ही हम जीवन में सफल हो सकते हैं। आचार्य जी ने गुरुकुल पौंधा के प्राचार्य डा0 धनंजय जी के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की और उनके पुरुषार्थ का उल्लेख किया। उन्होंने छात्र-छात्राओं को अपनी योग्यता बढ़ाने का प्रयत्न करने को कहा। उन्होंने कहा कि हमें अपनी योग्यता को बढ़ाने के लिये अपने भीतर आत्मा, मन व मस्तिष्क से प्रयत्न करने चाहिये। डा0 सोमदेव जी ने कहा कि आप योग्य बनकर समाज को अपनी योग्यता से लाभ पहुंचा सकते हैं। आपने संस्कृत की महत्ता बताने सहित व्याकरण विषयों में विवाद व समाधान के कुछ रोचक तथा ज्ञानवर्धक प्रसंग भी प्रस्तुत किये। आचार्य जी ने कहा कि यदि अपने आप को योग्य बनाओंगे तो दुनिया का हर क्षेत्र आपका सम्मान करेगा। उन्होंने कहा कि समाज में योग्य व्यक्ति को ही पूजा जाता है। आचार्य सोमदेव शास्त्री जी ने कहा कि शास्त्रों की रक्षा करने के लिये उसका अध्ययन करना अति आवश्यक है।

 

कार्यक्रम के संचालक डा0 रवीन्द्र कुमार आर्य जी ने जोशीमठ के एक पौराणिक विद्वान का उल्लेख कर बताया कि उन्होंने रवीन्द्र जी को कहा था कि अष्टाध्यायी ग्रन्थ की रक्षा आर्यसमाज ने की है। सभा में उपस्थित द्रोणस्थली कन्या गुरुकुल की आचार्या डा0 सुश्री अन्नपूर्णा जी ने अपना सम्बोधन संस्कृत भाषा में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि हमारा सौभाग्य है कि इस गुरुकुल महोत्सव में संस्कृत की प्रतियोगिताओं का अयोजन किया गया है। संस्कृत को उन्होंने जीवित भाषा बताया। उन्होंने सभी छात्र छात्राओं को अपनी ओर से आशीर्वाद एवं शुभकामनायें दीं। कबड्डी के कोच आचार्य नन्द किशोर जी ने भी सभा को सम्बोधित किया। उन्होंने गुरुकुल के छात्र-छात्राओं को क्रीड़ा के महत्व पर अपने विचार बताये। उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता कर रहे श्री प्रेम प्रकाश शर्मा ने गुरुकुल महोत्सव का शुभारम्भ किये जाने पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आर्यसमाज के देश में जितने भी गुरुकुल चल रहे उन सबका एक पाठ्यक्रम होना चाहिये। अलग अलग राज्यों में वहां की शिक्षा नीति के अनुसार पाठ्यक्रम को बदलना नहीं चाहिये। शर्मा जी ने आर्ष पाठ विधि के अनुसार संस्कृत व्याकरण का अध्ययन कराने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि गुरुकुलों के स्नातकों को किसी आर्यसमाज में न्यूनतम 6 महीने तक वेद प्रचार का कार्य करना चाहिये। उन्होंने आगे कहा कि आर्यसमाजों तथा आर्य संस्थाओं को गुरुकुलों के योग्य विद्वान नहीं मिलते। श्री प्रेमप्रकाश शर्मा जी ने कहा कि आर्यसमाज के विद्वानों को अतिवृष्टि, सूखा, भूकम्प एवं प्राकृतिक आपदाओं को रोकने के लिये अनुसंधान करना चाहिये।

 

अपने सम्बोधन में स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती जी ने कहा कि हमें ईश्वर का आशीर्वाद मिल रहा है। हम इन प्रतियोगिताओं की विगत एक वर्ष से प्रतीक्षा कर रहे थे। स्वामी जी ने कहा कि हमें शास्त्रीय प्रतियोगितायें आयोजित करने का अनेक लोगों से सुझाव मिला था। स्वामी जी ने कहा कि स्पर्धा करना धर्म एवं पुण्य का काम है। ईष्र्या करना पाप है। स्वामी जी ने सभी प्रतियोगियों को विश्वास दिलाया कि यहां जो प्रतियोगितायें हो रही हैं उनके परिणाम पूर्ण निष्पक्षता से युक्त होंगे। स्वामी जी ने कहा कि प्रतियोगिताओं में विजय पर अहंकारी नहीं होना चाहिये और असफल होने पर निराश नहीं होना चाहिये। स्वामी जी ने सभी छात्र-छात्राओं से पूरे उत्साह से प्रतियोगिताओं में भाग लेने की प्रेरणा की। उन्होंने सभी आचार्य व आचार्याओं को प्रेरणा की कि वह योग्य विद्वान करते रहें।

 

गुरुकुल पौंधा के प्राचार्य डा0 धनंजय जी कुछ दिनों से अस्वस्थ चल रहे थे। वह अस्पताल में भर्ती थे। उन्होंने अस्पताल से अल्पकाल के लिये अवकाश लिया और कार्यक्रम में पधारे। डा0 रवीन्द्र कुमार आर्य जी ने उन्हें भी अपना सम्बोधन देने के लिये आमंत्रित किया। आचार्य धनंजय जी ने कहा कि आज शास्त्रीय प्रतियोगिताओं का शुभ दिन गया जिस दिन की हम विगत लम्बे समय से प्रतीक्षा कर रहे थे। आचार्य जी ने कहा कि देश समाज में गुरुकुंलों को उनका उचित स्थान प्राप्त नहीं है। उनका संकेत था कि स्कूल, कालेज समाज के लोग गुरुकुलीय शिक्षा को स्कूल कालेज की शिक्षा से निम्नतर मानते हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा में पोप लीला करने वाले लोगों को महत्व दिया जाता है। आचार्य जी के अनुसार आर्ष परम्पराओं को उचित महत्व नहीं मिल रहा है। धनंजय जी ने कहा कि हमें आगे बढ़ना है। हमें अपनी योग्यता को समाज में स्थापित करना है। उन्होंने आगे कहा कि हमें जीवटता से अध्ययन करने सहित सभी कार्य करने हैं। हमें इन प्रतियोगिताओं में स्वयं को योग्य सिद्ध करने का प्रयत्न करना चाहिये। हमें निराश नहीं होना है। हमें अधिक अच्छा करने का प्रयास करना है और अपनी क्षमताओं में वृद्धि करनी है। उन्होंने कार्यक्रम में भाग लेने वाले सभी आचार्यगणों एवं छात्र-छात्राओं सहित सभी उपस्थित लोगों को धन्यवाद दिया।

 

डा0 रवीन्द्र कुमार आर्य जी ने बताया कि इसके बाद आज पांच प्रतियोगितायें आयोजित की जा रही हैं। यह प्रतियोगितायें थी 1- अष्टाध्यायी सूत्र कण्ठ-पाठ, 2- धातुकोष कण्ठ-पाठ, 3- त्रिभाषा कोष कण्ठ-पाठ, 4- वेद मन्त्रों की अन्त्याक्षरी तथा 5- कबड्डी प्रतियोगिता। यह सभी प्रतियोगितायें पृथक पृथक टैण्ट लगाकर कर बनाये गये विस्तृत हालों में आयोजित की गईं। गुरुकुल महोत्सव में लगभग 50 गुरुकुलों के 450 छात्र-छात्रायें भाग ले रहे हैं। सभी अतिथियों के लिये भोजन एवं निवास की अच्छी व्यवस्था की गई है। गुरुकुल के सभी ब्रह्मचारी अतिथियों की सेवा में संलग्न देखे गये। गुरुकुल परिसर में आज जो कुछ देखने व सुनने को मिला वह अत्यन्त दुर्लभ व महत्वपूर्ण था। हमारा सौभाग्य था कि हम इसके साक्षी बने। इस आयोजन के लिये स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती, आचार्य धनंजय एवं समस्त आयोजन समिति बधाई की पात्र है। ओ३म् स्वस्ति।

-मनमोहन कुमार आर्य


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