“आर्यसमाज देश की प्रमुख राष्ट्रवादी देशभक्त संस्था”

( Read 1202 Times)

08 Oct 19
Share |
Print This Page

मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

“आर्यसमाज देश की प्रमुख राष्ट्रवादी देशभक्त संस्था”

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।आर्यसमाज की स्थापना ऋषि दयानन्द सरस्वती ने 10 अप्रैल, सन् 1875 को की थी जब हमारा देश अंग्रेजों का पराधीन था। आर्यसमाज की स्थापना की आवश्यकता क्यों पड़ी थी, इसका उत्तर है कि देश से अज्ञान, अविद्या, अन्धविश्वास, मिथ्या-परम्पराओं आदि को दूर कर देश को स्वतन्त्र कराना था। देश की स्वतन्त्रता की प्राप्ति के लिए देश से अज्ञान को दूर कर देशवासियों में देश के प्राचीन गौरव के प्रति स्वाभिमान का भाव उत्पन्न करना एवं देशवासियों में देशप्रेम को भरना भी था। वेद सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा द्वारा चार आदि ऋषियों को दिया गया सत्य विद्याओं का ज्ञान है जिसमें भौतिक वा परा विद्याओं सहित अपरा विद्याओं अर्थात् ईश्वर व जीवात्मा का भी पूर्ण ज्ञान दिया गया है। वेद जैसा ज्ञान संसार के किसी ग्रन्थ में नहीं है क्योंकि वेद सर्वज्ञ व पूर्ण परमात्मा का ज्ञान हैं जबकि संसार के वेदेतर सभी ग्रन्थ अल्पज्ञ अर्थात् अल्पज्ञानी मनुष्यों द्वारा बनाये गये हैं। जब तक मनुष्य वेदों का अध्ययन कर उसके यथार्थ अर्थों को जान व समझ नहीं लेता तब तक वह ईश्वर, जीवात्मा तथा भौतिक पदार्थों के विज्ञान को भलीभांति जानकर उनका मानवता के हित में सदुपयोग नहीं कर सकता। आज के समय में हमने भौतिक उन्नति तो बहुत की है परन्तु उसका लाभ कुछ सीमित लोग ही उठा रहे हैं क्योकि इसने देश में उपभोक्तावाद को जन्म दिया है जिसका उद्देश्य धन व सम्पत्ति का अर्जन व सुख-सुविधाओं का भोग है। हमारी व्यवस्था ऐसी व्यवस्था है जिसमें एक प्रतिभाशाली युवक व युवती व्यवस्था की खामियों के कारण उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपने व्यक्तित्व का उचित निर्माण नहीं कर पाते और अन्याय व शोषण के कारण अपने प्राकृतिक व ईश्वर प्रदत्त समानता के अधिकार से भी वंचित रह जाते हैं।

वर्तमान समय में हमारे देश में सभी देशवासियों व उनके बच्चों को शिक्षा प्राप्ति में समानता का अधिकार नहीं है। जो धनाड्य है वही महंगे स्कूलों में शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। एक श्रमिक व निर्धन किसान का बच्चा प्रतिभावान होकर भी उच्च शिक्षा से वंचित रहता है और उसे प्राथमिक शिक्षा प्राप्त कर रोजगार में लगने को मजबूर होना पड़ता है। इसी कारण अधिकांश श्रमिकों व किसानों की सन्ताने श्रमिक व किसान बनकर ही रह जाती हैं और एक छोटी संख्या में कुछ अतीव प्रतिभावान एवं प्रारब्ध की धनी सन्तानें ही व्यवस्था की खामियों को चीरकर अग्रणीय व शिखर पर पहुंच पाती हैं। यह स्थिति वैदिक ईश्वरीय व्यवस्था एवं शिक्षा के अधिकारों के विरुद्ध दीखती है। शिक्षा के विषय में आर्यसमाज के संस्थापक ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश के तीसरे समुल्लास में प्रकाश डाला है जहां वह गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति का समर्थन करते हुए वेद आदि ग्रन्थों को भी अन्य पाठ्य पुस्तकों में सम्मिलित करते हैं और शिक्षा को अनिवार्य, निःशुल्क एवं राजा व निर्धन सबके लिये समान होने के पक्ष में अपनी भावना को व्यक्त करते हैं। इतिहास में जब हम राम व कृष्ण की शिक्षा को देखते हैं तो वह हमें आधुनिक शिक्षा के दोषों से मुक्त दीखती है। कृष्ण व निर्धन सुदामा एक ही गुरु से पढ़े और दोनों में दो आदर्श मित्रों का सा प्रेम बना रहा, ऐसा होना आधुनिक शिक्षा में सम्भव नहीं है, अपवाद हो सकता है।

ऋषि दयानन्द ने आर्यसमाज को एक राष्ट्रवादी तथा देशभक्त संस्था बनाया। आर्यसमाज के नियम और साहित्य में इसके संकेत मिलते हैं। यही कारण था कि प्रायः शतप्रतिशत आर्य समाज के अनुयायी राष्ट्रवादी तथा देशभक्त बने और उन्होंने देश की आजादी में अनेक प्रकार से सहयोग किया। स्वामी श्रद्धानन्द जी ने शिक्षा एवं देश की आजादी के आन्दोलन में अग्रणीय भूमिका निभाई। रालेट एक्ट के विरोध में उन्होंने दिल्ली के चांदनी चैक में एक बड़े जलूस का नेतृत्व किया था और अंग्रेजों द्वारा गोली चलाने की स्थिति आने पर उन्होंने सबसे आगे आकर अंग्रेज अधिकारी को चुनौती देते हुए अपनी छाती खोलकर कहा था कि हिम्मत है तो चलाओं गोली। इस साहसपूर्ण दृश्य को देखकर अंग्रेज अधिकारी विस्मृत हो गये थे और उनके गुरखा सैनिकों को अपनी बन्दूकें व संगीने नीचे झुकानी पड़ी थी। लाला लाजपत राय जी भी आजादी के आन्दोलन के प्रमुख नेता था। वह ऋषि दयानन्द को पिता और आर्यसमाज को अपनी माता मानते थे। भाई परमानन्द जी अफ्रीका में गांधी जी के गुरु के समान रहे। वहां गांधी जी ने उनका सामान भी श्रद्धावश अपने कन्धे पर उठाया था। इस नेता को आजादी के आन्दोलन में मृत्यु दण्ड दिया गया था जो बाद में कालापानी की सजा में बदल दिया गया था। पं0 रामप्रसाद बिस्मिल का जीवन तो आर्यसमाज में बना व बढ़ा। देश को आजाद कराने के संस्कार उन्होंने केवल और केवल ऋषि दयानन्द, सत्यार्थप्रकाश और आर्य पुरुषों से ही लिये थे। आर्यसमाज के देश प्रेम के कारण ही अंग्रेज सरकार ने पटियाला के आर्यसमाज में ताला लगा कर वहां का सारा रिकार्ड जब्त कर लिया था और सभी आर्यसमाज के सदस्यों को जेल में डाल दिया था। ऐसे अनेकों उदाहरण है जहां आर्यसमाज के अनुयायियों ने देश की आजादी में अपना योगदान किया है। वीर सावरकर के राजनीतिक गुरु क्रान्तिकारियों के आद्य गुरु श्यामजी कृष्ण वर्मा थे जो लन्दन में आक्सफोर्ड विद्यालय में संस्कृत के प्रोफेसर थे। उन्होंने वहां इण्डिया हाउस की स्थापना की थी। देश के सभी युवा क्रान्तिकारी इण्डिया हाउस में ही रहते थे ओर इन्होंने वहां क्रान्तिकारी घटनाओं को अंजाम दिया था। लन्दन में रहते हुए ही वीर सावरकर ने सन् 1857 की देश की आजादी की प्रथम लड़ाई का इतिहास लिखा था जिसे प्रकाशन से पूर्व ही अंग्रेज सरकार ने जब्त कर लिया था। हमारा सौभाग्य है कि हमें उसे पढ़ने का अवसर मिला है। वह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण दस्तावेज है जिसे सभी देशप्रेमी बन्धुओं को पढ़ना चाहिये। अंग्रेजी सरकार ने सभी प्रयत्न किये कि वीर सावरकर लिखित यह पुस्तक जनता तक न पहुंचे परन्तु फिर भी यह पुस्तक लन्दन से भारत पहुंची, इसका प्रकाशन भी हुआ, भगतसिंह आदि क्रान्तिकारियों ने इसे पढ़ा और इससे प्रेरणा ग्रहण अपना जीवन देश पर आहूत कर दिया।

परम देशभक्त वीर सावरकर लिखित ‘सन् 1857 का प्रथम स्वतन्त्रता समर’ एक ऐसा ग्रन्थ है कि जिसे सन् 1857 की क्रान्ति का विस्तृत इतिहास कह सकते हैं। जिसने यह इतिहास नहीं पढ़ा वह इस आजादी की लड़ाई के सैनिकों के ऋण से उऋण नहीं हो सकता। आज की युवा पीढ़ी भोगवादी संस्कृति का अनुसरण कर रही है जिसमें देशभक्ति का वह जज्बा जो आजादी के दिनों में क्रान्तिकारियों में होता था, उसके नाममात्र भी दर्शन नहीं होते। हमारे देश की सरकारों ने भी क्रान्तिकारियों व देशभक्तों का सच्चा इतिहास हमारे सम्मुख नहीं आने दिया। उन्होंने ऐसे इतिहासकारों को मान्यता दी जिन्होंने अपनी राजनीतिक विचारधारा के अनुसार इतिहास को तोड़ा मरोड़ा है। स्कूलों के पाठ्यक्रम में भी आजादी के सैनिकों के सच्चे इतिहास को न पढ़ाकर उनसे न्याय नहीं किया गया। आर्यसमाज के अनुयायी आजादी के आन्दोलन में, चाहे वह क्रान्तिकारी आन्दोलन हो या अहिंसात्मक, सभी में बढ़ चढ़ कर भाग लेते रहे। शहीद भगत सिंह भी आर्यसमाज के अनुयायी ऋषि दयानन्द भक्त सरदार अर्जुन सिंह के पौत्र थे। अर्जुन सिंह जी के ही संस्कार उनके पुत्रों अजीतसिंह जी और किशनसिंह जी तथा स्वर्णसिंह जी से होते हुए भगत सिंह में आये थे। सरदार अर्जुन सिंह जी ऐसे ऋषि भक्त थे जो प्रतिदिन अग्निहोत्र यज्ञ करते थे। उनका व उनके परिवार का आजादी में अविस्मरणीय योगदान है परन्तु हमारी सरकारों ने उनके योगदान को भी उचित महत्व नहीं दिया। यदि प्रसिद्ध चरित्र अभिनेता व चलचित्र निर्माता श्री मनोज कुमार ने “शहीद” फिल्म न बनाई होती तो देश के बहुत से लोग उनके योगदान को जान न पाते।

आर्यसमाज की प्रत्येक गतिविधि व कार्य राष्ट्रवादी होता है और उसमें देशभक्ति भी निहित होती है। आर्यसमाज में किसी भी कार्यक्रम के बाद जो जयघोष किये जाते हैं उसमें वैदिक धर्म की जय के भारत माता की जय तथा गोमाता की रक्षा हो आदि घोष सम्मिलित हंै। भारत माता की जय बोलना आर्यसमाज को राष्ट्रवादी संस्था सिद्ध करता है। जो व्यक्ति व संस्थायें भारतमाता की जय बोलने तथा वन्देमातरम गीत गाने में आपत्ति करती हैं वह राष्ट्रवादी लोग व संस्थायें नहीं कही जा सकतीं। आर्यसमाज इस लिये भी राष्ट्रवादी संस्था है क्योंकि आदि सृष्टि में ब्रह्मा से लेकर जैमिनी पर्यन्त सभी ऋषियों सहित राम, कृष्ण, युधिष्ठिर, चाणक्य और दयानन्द जी आदि को आर्यसमाज अपना पूर्वज स्वीकार करता है व उनके बनाये वेदानुकूल ग्रन्थों को ही अपना कर्तव्य व धर्म मानता है। आर्यसमाज भारत भूमि में उत्पन्न सभी ऋषियों व विद्वानों को जो वेदमार्ग का अनुसरण करते थे अपना पूर्वज मानता है। इन आदि ऋषियों व लोगों ने ही आर्यावत्र्त देश को बसाया था। इन्हीं का महाभारत काल पर्यन्त पूरेे विश्व पर चक्रवर्ती राज्य रहा। वेदों में स्पष्ट कहा गया है कि ईश्वर ने यह समस्त भूमि वा पृथिवी आर्यों को दी है। आर्य कोई जाति, मत व मजहब नहीं है अपितु आर्य सद्गुण से सम्पन्न मनुष्य को कहते हैं। वेद के सिद्धान्तों के अनुसार संसार के सभी मनुष्य ईश्वर की सन्ताने हैं। यह सभी लोग गुण, कर्म व स्वभाव के भेद से आर्य व अनार्य हैं। आर्य श्रेष्ठ गुणों को धारण किये हुए मनुष्यों की संज्ञा है और अनार्य जो श्रेष्ठ गुणों से हीन हैं, उन्हें कहते हैं। यदि विश्व में कहीे कोई सच्चा ईश्वर भक्त, वेदानुयायी और सद्गुणों से युक्त स्त्री व पुरुष है तो संस्कृत भाषा में उसे आर्य ही कहेंगे।

आर्यसमाज ने सृष्टि के आरम्भ से चली आ रही बुद्धिसंगत श्रेष्ठ परम्पराओं को ही अपनाया है और अन्धविश्वासों एवं मिथ्या परम्पराओं का त्याग किया है। आर्यसमाज सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में विश्वास करता है। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश का संशोधित संस्करण सन् 1883 ईसवी में तैयार किया था। यह ग्रन्थ ही आर्यसमाज का प्रमुख आचार शास्त्र एवं धर्मग्रन्थ के तुल्य है। आर्यसमाज का मुख्य धर्मग्रन्थ चार वेद हैं परन्तु सत्यार्थप्रकाश आद्यान्त वेदानुकूल होने से यही आर्यसमाज का मान्य ग्रन्थ है। इसमें स्वदेश, स्वशासन तथा स्वतन्त्र की महत्ता को रेखांकित किया गया है। ऋषि दयानन्द के वचन हैं ‘कोई कितना ही करे परन्तु जो स्वदेशीय राज्य (शासन) होता है वह सर्वोपरि उत्तम होता है। अथवा मत-मतान्तर (ईसाई-मुस्लिम-हिन्दू आदि) के आग्रहरहित, अपने और पराये का पक्षपातशून्य, प्रजा पर पिता माता के समान कृपा, न्याय और दया के साथ विदेशियों (अंग्रेजों व अतीत में यवनों) का राज्य भी पूर्ण सुखदायक नहीं है।’ इन पंक्तियों में स्वदेशीय राज्य व शासन को सर्वापरि उत्तम कहा गया है। प्रकारान्तर से इस वाक्य में देशवासियों को देश में स्वशासन स्थापित करने की प्रेरणा स्पष्ट दिखाई देती है अन्यथा इस बात को लिखने का अन्य कोई प्रयोजन नहीं था। दूसरी बात यह भी बताई है कि विदेशियों अर्थात् अंग्रेजों का राज्य कितना भी निष्पक्ष व प्रजा के प्रति माता-पिता के समान दया का व्यवहार होने पर भी पूर्ण सुखदायक नहंी हो सकता। ऋषि दयानन्द की यह पंक्तियां अंग्रेजों की पराधीनता के शासन काल में स्पष्ट बगावत की प्रेरणा करने वाली पंक्तियां हैं। इन्हीं पंक्तियों से प्रेरणा लेकर आर्यसमाज के अनुयायियों ने स्वयं को देशसेवा व देश की आजादी के लिये समर्पित किया था जिसमें से कुछ प्रमुख नामों का हम उल्लेख पूर्व पंक्तियों में कर चुके हैं।

ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश के ग्यारहवें समुल्लास में ब्राह्मसमाज और प्रार्थनासमाज की मान्यताओं एवं कार्यकलापों की भी समीक्षा की है। उन्होंने लिखा है कि ‘परन्तु इन लोगों में स्वदेशभक्ति बहुत न्यून है। ईसाइयों के आचरण बहुत से ले लिये हैं। खानपान विवाहादि के नियम भी बदल दिेये हैं।’ इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त कर वह कहते हैं ‘यह (ब्राह्मसमाजी और प्रार्थनासमाजी) अपने देश की प्रशंसा वा पूर्वजों की बड़ाई करनी तो दूर उस के स्थान में पेट भर निन्दा करते हैं। व्याख्यानों में ईसाई आदि अंगरेजों की प्रशंसा भरपेट करते हैं। ब्रह्मादि महर्षियों का नाम भी नहीं लेते प्रत्युत ऐसा कहते हैं कि बिना अंगरेजों के सृष्टि में आज पर्यन्त कोई भी विद्वान नहीं हुआ। आर्यवत्र्ती लोग सदा से मूर्ख चले आये हैं। इन की उन्नति कभी नहीं हुई।’ ऋषि दयानन्द ने इन पंक्तियों में अंग्रेजों के समर्थकों का आलोचना कर स्वयं के लिये कठिनाईयां व मुसीबते उत्पन्न कीं थी। ऋषि दयानन्द ने इसी प्रकरण में इनकी अन्य कमियां भी कही हैं। इन सब बुराईयों का खण्डन करते हुए तथा देशभक्ति से पूर्ण विचार व्यक्त करते हुए वह लिखते हैं कि ‘जब आर्यावत्र्त में उत्पन्न हुए हैं और इसी देश का अन्न व जल खाया पिया, अब भी खाते पीते हैं। अपने माता, पिता, पितामहादि के मार्ग को छोड़ दूसरे विदेशी मतों पर अधिक झुक जाना, ब्राह्मसमाजी और प्रार्थनासमाजियों का एतद्देशस्थ संस्कृत विद्या से रहित अपने को विद्वान् प्रकाशित करना, इंगलिश भाषा पढ़के पण्डिताभिमानी होकर झटिति एक मत चलाने में प्रवृत्त होना, मुनष्यों का स्थिर और वृद्धिकारक काम क्योंकर हो सकता है?’ इन पंक्तियों में ऋषि दयानन्द के राष्ट्रवादी व देशभक्त होने के प्रत्यक्ष सन्देह निहित है।

हमने उपर्युक्त पंक्त्यिों में जो लिखा है वह यह बताने के लिये कि ऋषि दयानन्द और उनके द्वारा संस्थापित संस्था आर्यसमाज एक सच्ची देशभक्त राष्ट्रवादी संस्था थी व है। देश की आजादी में इसका गौरवपूर्ण स्थान है। वर्तमान में ऐसे व्यक्तियों को महान बताया जा रहा है जिनका आजादी के आन्दोलन में किसी प्रकार का योगदान नहीं है और न ही उन्होंने देश की आजादी के पक्ष में कोई विचार व चिन्तन दिया। गौण रूप में वह अंग्रेजों के ही समर्थक थे। वह अन्तद्र्वन्द अर्थात् परस्पर विरोधी विचारों से ग्रस्त थे। देश का कोई भी राजनीतिक दल व धार्मिक व सामाजिक संगठन हो, सबने ऋषि दयानन्द व उनके देश व समाज को योगदान की उपेक्षा की है। हमारी राजनीति में जिसके नाम पर अधिक वोट मिलते हैं वह सबसे बड़ा महान और जो सत्य व स्पष्ट वक्ता रहा हो, जिसने देश हित की बातें की हैं तथा जो राजनीतिक लाभ नहीं दिला सकता, उसकी उपेक्षा की जाती है। ऋषि दयानन्द को भी सत्य वा कटु सत्य कहने और असत्य का खण्डन करने के कारण देश की आजादी के दिनों व उसके बाद से अब तक उनकी उपेक्षा की जा रही है। न केवल उनकी अपितु वीर शिवाजी तथा महाराणा प्रताप की भी उपेक्षा की गई है। सभी दलों ने अपनी अपनी पार्टी के कुछ नेताओं को महान मान लिया है जिसका उनके ज्ञान के स्तर व आचरण से कोई लेना देना नहीं है। हम समझते हैं कि राम, कृष्ण, दयानन्द, शिवाजी, राणा प्रताप, गुरु गोविन्द सिंह जी आदि के जीवनों से शिक्षा लेकर ही हमारा देश एक महान राष्ट्र बन सकता है। हम यह भी बता दें कि हम इस विषय के पूर्ण अधिकारी विद्वान नहीं है। हमारे शीर्ष विद्वान इस विषय पर विस्तृत एवं प्रभावशाली लेख लिख सकते हैं। वह ऐसा करते है ंतो हमें प्रसन्नता होगी। इसी के साथ इस चर्चा को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।


Source :
This Article/News is also avaliable in following categories : National News
Your Comments ! Share Your Openion

You May Like