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मेरी सौग़ात

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28 Feb 22
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मृदुला अग्रवाल

मेरी सौग़ात

हे प्रभु,हे ईश्वर !
पहले सौग़ात देते हो, आशीर्वाद देते हो,
छोटी छोटी नन्हीं  तितलियों  के पीछे दौड़ना सिखाते हो।
जब वो पनप जाए, उड़ जाए,
 अपना रंग बिखेरना शुरू कर दें, 
उनका जन्मदाता,जननी ख़ुशी से फूले ना समाते हों,
सारा जीवन उनके नाम कर देना चाहते हों,
हर बुरी नज़र,धूप छाँव से बचाते हों,
चोट लगने पर दिनरात सहलाते हों,
 उनके फलने फूलने की कामना कर फूले ना समाते हों।
अचानक एक दिन एक झटके में ही अपनी दी हुई सौग़ात वापिस ले जाते हो।
ऊपर से अगले पिछले जन्मों का खाता कार्मिक चक्र बता कर तुम उलझाते हो।
कितना दर्द होता है ? 
कुछ पता है तुम्हें , क्या होता है दर्द ?
हाथ काट लेते हैं, पैर काट लेते हैं,जननी को या जो भी पैदा करें जो भी सजा चाहे दे देते हो।
अपना खाता हिसाब ठीक रखते, 
तो भी उतना दर्द है ना होता ।
जो उसे नौ माह पेट में रखकर और फिर प्रसव वेदना सह कर हुआ था।
45 वर्ष लगा दीए थे,
रात दिन एक कर दिया था, 
उसकी उदासी मिटाने में,
उसके चेहरे पर एक छोटी सी ख़ुशी देखने को।  
पता नहीं तुम जिगर रखते भी हों या नहीं? 
 बूँद -बूँद करके उसके आँसू पिए थे मैंने,
तब जाकर भोर हुई थी उसकी ज़िंदगी में।
किस तरह छीन ली तुमने मेरी सौग़ात,
और मुझे कंगाल करके  चलते बने।
ये भी ना सोचा उसने भी कुछ रंग जमा किये थे अपना घरौंदा सजाने को।
अरे ! मुझे किसने आवाज़ दी थी ? 
मैं तो दरवाज़े पर टकटकी लगाए तुम्हारा इंतज़ार ही करती रह गयी। 
मेरी सौग़ात,  तुम कहाँ हो ? कहाँ हो तुम ? किसने दी थी दरवाज़े पर दस्तक? 
फटी आँखों से अब भी दरवाज़े को ही देख रही हूँ।
ईश्वर ! एक बार मेरी भी सुन लो,
 इतना दर्द देना ठीक नहीं ।
यदि किसी को सौग़ात दो तो, उसके जीते जी वापिस कभी ना लेना।
माँ का दर्द महसूस करोगे तो फिर शायद ये गलती नहीं होगी। 
बस अब एक आख़िरी इच्छा !
जब मुझे अपने पास ले आओ तो  मेरी सौग़ात मुझे लौटा देना,
कभी वापस ना लेने के लिए, 
 मुझे लौटाना , जन्म जन्मांतर के लिए।


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