“ईश्वर न होता तो यह जगत और वेद ज्ञान भी न होता”

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12 Oct 19
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-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

“ईश्वर न होता तो यह जगत और वेद ज्ञान भी न होता”

इस दृश्यमान जगत में ईश्वर का अस्तित्व एक यथार्थ सत्य है परन्तु वह ईश्वर हमारी आंखों का विषय नहीं है इसलिये वह हमें दिखाई नहीं देता। आंखों के विषय जड़ स्थूल पदार्थ ही होते हैं। ईश्वर सर्वातिसूक्ष्म होने से मनुष्य की आंखों से दृष्टिगोचर नहीं होता। वह निराकार व सर्वव्यापक होकर भी सब जड़ व चेतन जगत का द्रष्टा अर्थात् सबको देखनेवाला है। जगत व इसकी रचना को देखकर हमें इसके उत्पत्तिकर्ता वा स्रष्टा का अनुमान होता है। किसी उत्सव आदि में भोजन करने पर यदि भोजन स्वादिष्ट लगता है तो हम भोजन बनाने वाले पाचक व हलवाई की प्रशंसा करते हैं जबकि वह व्यक्तिरूप में हमारे सामने नहीं होता। ईश्वर भी सृष्टि को बनाता व इसका पालन करता है परन्तु निराकार, सर्वातिसूक्ष्म, सर्वव्यापक और सर्वान्तर्यामी होने के कारण वह आंखों से दिखाई नहीं देता। हमारे ऋषि, मुनि व योगी वेदों तथा ऋषियों के ग्रन्थों का स्वाध्याय कर ईश्वर के स्वरूप वा गुण, कर्म, स्वभाव को जानते थे और योगाभ्यास वा ध्यान एवं समाधि द्वारा उसके स्वरूप का साक्षात्कार किया करते थे। दर्शन ग्रन्थों का सिद्धान्त है कि गुणों को देखकर गुणी का ज्ञान होता है। गन्ध पृथिवी का गुण होता है। नासिका से गन्ध का ग्रहण होता है। नासिका से गन्ध का ग्रहण होकर हमें पृथिवी के होने का अनुमान होता है। किसी बाग-बगीचे में जाते हैं तो वहां नाना प्रकार के सुन्दर पुष्पों को देखते हैं। रंग-बिरंगे सुगन्धित फूलों को देखकर हमें विवेक बुद्धि से बाग के सभी फूल पृथिवी की मिट्टी का विकार प्रतीत होते हैं। यह पुष्प् सुन्दर होने सहित प्रयोजन से युक्त होते हैं तथा मनुष्य के लिए उपयोगी एवं हितकारी तथा वायु शोधक होते हैं। फूलों से इत्र तो बनता ही है, मधुमक्खी भी इससे रस लेकर शहद का निर्माण करती है। इन सब बातों पर जब हम विचार करते हैं तो हमें मिट्टी से स्वतः फूल बन जाने का ज्ञान न होकर पृथिवी व आकाश में छिपी एक सर्वव्यापक निराकार चेतन व ज्ञानवान सत्ता का ज्ञान होता है जो फूलों, वनस्पतियों व संसार के अपौरुषेय पदार्थों को बनाती व उन्हें व्यवस्थित रखती है। इससे ईश्वर का अस्तित्व होना सिद्ध होता है।

 

                वेदों तथा ऋषियों के ग्रन्थों का अध्ययन करने पर ईश्वर के स्वरूप व गुण, कर्म एवं स्वभाव का ज्ञान होता है। ईश्वर ही इस संसार का रचयिता, पालनकर्ता तथा प्रलयकर्ता है। सत्यार्थप्रकाश के प्रथम व सातवें सम्मुलास का अध्ययन कर भी ईश्वर के विषय में सत्य व यथार्थ ज्ञान प्राप्त किया जाता सकता है। ईश्वर ने इस संसार को अपने किसी निजी प्रयोजन के लिये नहीं बनाया है अपितु मनुष्यों व पशु-पक्षी आदि विभिन्न योनियों में विद्यमान जीवों के पूर्वजन्म के कर्मों का फल भोग कराने तथा मनुष्य जीवन में सुख व उन्नति को प्राप्त करने के लिये शुभ कर्म करने के लिये बनाया है। जिस प्रकार हम अपने व अपने परिवार के निवास के लिये घर वा आवास बनाते हैं उसी प्रकार से ईश्वर ने अपनी समस्त जैवीय प्रजा के निवास के लिये इस सृष्टि की रचना की है। इस सृष्टि में नाना गुणों से युक्त जटिल व महनीय रचनाओं को देखकर ईश्वर की महत्ता व उसकी सर्वज्ञता एवं सर्वशक्तिमान होने का ज्ञान होता है। अतः ईश्वर आंखों से दिखाई न देने पर भी अस्तित्व रखता है और वही इस संसार का संचालन कर रहा है। हमें स्तुति, प्रार्थना व उपासना के द्वारा उसका सान्निध्य प्राप्त कर उससे सुख प्राप्ति की कामना करनी है जिससे हम अपने जीवन को सुख से युक्त कर दूसरों को भी सुख प्रदान करने का कारण व साधन बनें।

 

                ईश्वर ने सृष्टि के अनादि कारण सत्व, रज व तम गुणों वाली प्रकृति की साम्यावस्था में अपने सृष्टि रचना के विज्ञान के अनुसार क्रिया व गति उत्पन्न कर उसे पूर्वकल्पों की भांति रचा है। जड़ सृष्टि की रचना हो जाने के बाद वनस्पति जगत तथा मनुष्येतर प्राणियों की सृष्टि की गई। इन सबके बाद मनुष्य को अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न किया है। मनुष्य शिशु रूप में जन्म लेता है तो उसका पालन करने के लिये माता-पिता की आवश्यकता होती है। सृष्टि के आरम्भ में माता-पिता नहीं होते। अतः परमात्मा युवावस्था में अमैथुनी सृष्टि करता है जिससे वह अपना कुशलक्षेम स्वयं कर सकें और सन्तानों को जन्म भी दे सकें। अमैथुनी सृष्टि में जो मनुष्य उत्पन्न किये जाते हैं उनको ज्ञान देने वाले माता-पिता व आचार्य भी नहीं होते। ज्ञान के बिना मनुष्य संसार में जीवन व्यतीत नहीं कर सकता। ईश्वर सर्वज्ञ है और उसने अपनी सर्वज्ञता वा ज्ञान की पराकाष्ठा से ही इस सृष्टि को रचा है। वह ज्ञान का भण्डार है। अतः मनुष्य की आवश्यकता के अनुरूप वह सृष्टि के आरम्भ में चार ऋषियों को वेदों का ज्ञान देता है। ईश्वर वेदों का ज्ञान चार ऋषियों के माध्यम से सभी मनुष्यों को उपलब्ध कराता है। अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा ऋषियों को एक-एक वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद का ज्ञान मिलता है। यह चारों ऋषि ब्रह्मा जी नाम के ऋषि से मिलते हैं और उन्हें एक-एक करके वेद का ज्ञान देते हैं। इस प्रकार ब्रह्मा जी को आदि चार ऋषियों से एक एक वेद का ज्ञान मिलता है और वह इस प्रकार से चारों वेदों के विद्वान व ज्ञानी हो जाते हैं। उन्हीं से वेदों परम्परा आरम्भ होती है जो प्रलय तक चलती रहती है।

 

                परमात्मा यदि सृष्टि की आदि में वेदों का ज्ञान दे तो मनुष्य ज्ञान व भाषा को प्राप्त नहीं हो सकते। ज्ञान व भाषा परस्पर एक दूसरे पर आश्रित होते हैं। बिना भाषा के ज्ञान नहीं रहता अर्थात् ज्ञान भाषा में ही रहता है। अतः ज्ञान का प्रमुख आधार भाषा व वेद होते हैं। जिन मनुष्यों ने वेद व वैदिक साहित्य नहीं पढ़ा है, वह बोलना तो जान सकते हैं परन्तु विद्वान मुख्यतः ईश्वर, जीव, उपासना, मोक्ष आदि के साधनों के ज्ञान से युक्त नहीं हो सकते। परमात्मा का अस्तित्व होने से ही यह सृष्टि तथा वेद ज्ञान अस्तित्व में आयें हैं। मनुष्य इस संसार में आता है और यहां अनायास उसे माता-पिता के सभी पदार्थ व उनकी सम्पत्तिां प्राप्त हो जाती हैं। इस समस्त सृष्टि, इसके सभी पदार्थों तथा वेद का दाता व स्वामी परमात्मा ही है। वह न होता तो न सृष्टि की रचना हो सकती थी, न जीवात्माओं को मनुष्यादि योनियों में जन्म मिल सकता था और न ही हमें वेदों का ज्ञान प्राप्त हो सकता है। इसके लिये संसार के सभी मनुष्य इस सृष्टि में व्याप्त सर्वव्यापक ईश्वर के आभारी व ऋणी हैं। हमारा शरीर व सृष्टि का कोई भी पदार्थ हमारा नहीं है। हम इस संसार में अपने पूर्वजन्म का कोई भौतिक पदार्थ व सम्पत्ति लेकर नहीं आते। हमारे पास जो कुछ भी है, वह तथा हमारा शरीर भी हमारा अपना नहीं है। यही कारण है कि जब मृत्यु का समय आता है तो हमें सभी पदार्थों को यहीं पर छोड़कर जाना पड़ता है। हमें अपने जीवन में स्वयं को ईश्वर का ऋणी अनुभव करना चाहिये। उसको प्रसन्न करने के लिये सद्कर्म करने सहित ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना तथा उपासना करनी चाहिये। वेदों का अध्ययन कर ईश्वर सहित संसार के सभी पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। हमें निर्बलों की रक्षा व सहायता करनी चाहिये तथा अन्यायकारियों के बल की हानि करनी चाहिये। हमें अपने कर्तव्यों के ज्ञान के लिये भी वेदों का अध्ययन चाहिये। ऐसा करने से ही हमारा जीवन सार्थक हो सकता है। हम इस जन्म में भी शारीरिक रूप से स्वस्थ रह सकते हैं तथा वैदिक ज्ञान के आधार पर सद्कर्मों को करते हुए मानसिक व वैचारिक दृष्टि से भी उन्नत व सन्तुष्ट रह सकते हैं।

 

                ईश्वर है और उसने जीवों पर दया करके इस संसार को बनाया है। उस जगदीश्वर ने हमारे पूर्वजों को वेदों का ज्ञान दिया जो वर्तमान में हमें भी उपलब्ध है। परमात्मा ने जीवात्माओं को जन्म देकर उन्हें उनके कर्मों के अनुसार सुख आदि दिये हैं और जन्म व मरण के बन्धनों से छूटकर मोक्ष प्राप्ति का मार्ग भी वेदों में बताया है। यदि वह जगतकर्ता परमात्मा न होता तो हमें यह सब पदार्थ व सुख प्राप्त न होते। उसको हमारा नमन है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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