“ईश्वर के मुख्य एवं निज नाम ओ३म् पर विचार एवं चर्चा”

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26 Sep 19
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-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

“ईश्वर के मुख्य एवं निज नाम ओ३म् पर विचार एवं चर्चा”

जिस सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान तथा सर्वज्ञ चेतन सत्ता ने इस संसार की रचना करने सहित हमारे शरीरों को बनाया है और जो इस सब जगत को चला रही है उस सत्ता को परमात्मा या ईश्वर नाम से पुकारते हैं। वह सूक्ष्मतम सर्वव्यापक चेतन सत्ता दिखाई नहीं देती और न ही अविद्या से युक्त मनुष्यों को उसका समुचित ज्ञान होता है। अविद्या की निवृति और विद्या की वृद्धि होने पर ही हम उसे जान व समझ सकते हैं। वह ईश्वरीय सत्ता कब से है इसका शास्त्राध्ययन व विवेक अथवा चिन्तन-मनन से निश्चय किया जा सकता है। विज्ञान का नियम है कि अभाव से किसी पदार्थ की उत्पत्ति नहीं हो सकती और न ही उत्पन्न पदार्थ को नष्ट कर उसका पूर्णतया अभाव किया जा सकता है। जो भी पदार्थ उत्पन्न होता है वह किसी पूर्व उपादान कारण व सत्ता से ही उत्पन्न होता है और जब वह नष्ट वा अदृश्य होता है तो उसका अभाव नहीं होता अपितु वह सूक्ष्म होने से अपनी आकृति को नष्ट करता है और जगत में विद्यमान रहता है।

हमारा यह संसार भी ऐसी ही अदृश्य एवं सूक्ष्म जड़ सत्ता से उत्पन्न हुआ है जिसे प्रकृति कहते हैं। प्रलयावस्था में यह प्रकृति सत्व, रज एवं तमोगुण की साम्यवस्था कहलाती है। इस प्रकृति रूपी उपादान कारण से ही इस सृष्टि का निमित्त कारण परमात्मा इसमें ईक्षण व हलचल उत्पन्न कर अपने ज्ञान व विज्ञान तथा अपनी बल रूपी सामथ्र्य से इस कार्य सृष्टि को अस्तित्व में लाता है। ईश्वर सृष्टि की रचना का कार्य इस कारण कर पाता है क्योंकि वह अनादि, नित्य, सर्वातिसूक्ष्म, सर्वाव्यापक एवं सर्वान्तर्यामी है और वह अनादि काल से उपादान कारण प्रकृति से सृष्टि की रचना व प्रलय करता आ रहा है। ईश्वर अनन्त, सीमातीत व सर्वव्यापक, सर्वत्र एक समान व एकरस है। हमारा शरीर जड़ है जो कार्य व कारण प्रकृति का विकार है। यह शरीर स्वमेव कोई क्रिया नहीं करता अपितु आत्मा व मन की प्रेरणा से कार्य करता है। आत्मा मन को निर्देशित करता है और मन इन्द्रियों व शरीर के अंगों को प्रेरित करता है जिससे आत्मा की इच्छित क्रिया शरीर में होती है। हम आंख मीचते, खोलते व बन्द करते हैं। यह क्रिया मन के द्वारा व उसको अभ्यास होने से स्वचालित रूप से होती जाती है। हमें यदि कहीं जाना है तो हम आत्मा में इसकी इच्छा करते हैं और हमारा मन उस इच्छा को ग्रहण कर शरीर के उस इच्छा से सम्बन्धित अंग को प्रेरित कर देता है जिससे वह हम चलने वा आने-जाने की क्रिया करते हैं। इसी प्रकार से ईश्वर भी इस सृष्टि में सर्वव्यापक एवं सर्वान्तर्यामी होने से वह अपनी प्रेरणा की शक्ति से इस सृष्टि का निर्माण करते हैं। इस सृष्टि को परमात्मा ने ही धारण किया हुआ है। इसी कारण सूर्य, चन्द्र, पृथिवी एवं अन्य सभी ग्रह-उपग्रह व लोक लोकान्तर आपस में टकराते नहीं है अपितु ईश्वर द्वारा निर्धारित पथ पर पूरी पूरी समयबद्धता एकूरेसी के साथ गति करते हैं। 1.96 अरब वर्षों से यह संसार बिना किसी व्यवधान के चल रहा है। इस संसार को ईश्वर ने ही बनाया है और वही इसको चला रहा है। ईश्वर ने ही मनुष्य सहित सभी प्राणियों के शरीरों को अपनी विद्या व ज्ञान के अनुसार बनाया है और वहीं इन्हें भी अपने नियम व व्यवस्था के अनुसार चला रहा है। यह संसार अपनी शेष अवधि में भी पूर्व व वर्तमान की तरह से चलता जायेगा और अवधि पूर्ण होने पर इसका प्रलय ईश्वर के द्वारा होगा। प्रलय आने में अभी लगभग 2.36 अरब वर्ष शेष हैं।

 

                हम सृष्टिकर्ता ईश्वर की बात कर रहे हैं। उस ईश्वर के कितने व किस प्रकार के नाम हैं जिनका उपयोग हम उसे सम्बोधन व उसके अस्तित्व पर विचार करने के लिये कर सकते हैं, इसकी चर्चा कर रहे हैं। इस विषय में संसार के सबसे प्राचीन ग्रन्थ वेदों पर दृष्टि डालते हैं तो वहां हमें ईश्वर के अनेक नामों का उल्लेख मिलता है। एक ईश्वर के एक से अधिक नाम होने का कारण है कि ईश्वर में अनन्त गुण, कर्म एवं स्वभाव हैं। उसके उन गुणों व स्वरूप को बताने व जानने के लिये उसके गुणवाचक सहस्रों नामों का प्रयोग वेदों में हुआ है जिसको लोग अपने बोलचाल के व्यवहार में भी करते हैं। ऋषि दयानन्द वेदों के विद्वान थे। उन्होंने अपने वैदिक ज्ञान के आधार पर ही सत्यार्थप्रकाश आदि अनेक ग्रन्थों की रचना की है। ईश्वर के नामों की चर्चा करते हुए वह बताते हैं कि ‘ओ३म्’ यह ओंकार शब्द परमेश्वर का सर्वोत्तम नाम है। ईश्वर का ओ३म् नाम क्यों है इसका कारण है कि इस शब्द में जो अ, उ और म् तीन अक्षर मिलकर एक (ओ३म्) समुदाय हुआ है, इस एक नाम से परमेश्वर के बहुत नाम आते हैं जैसे कि अकार से विराट्, अग्नि और विश्वादि। उकार से हिरण्यगर्भ, वायु और तैजस आदि। मकार से ईश्वर, आदित्य और प्राज्ञ आदि। ओ३म् नाम इन सभी नामों का वाचक और ग्राहक है अर्थात् यह ओ३म् शब्द ईश्वर के इन सब नामों से कहा जाता है व इन शब्दों में जो गुण हैं सब इस ओ३म् शब्द में निहित हैं। ऋषि दयानन्द जी लिखते हैं कि ईश्वर का ऐसा ही व्याख्यान वेदादि सत्यशास्त्रों में स्पष्ट रूप से किया गया है। प्रकरणानुकूल यह सब नाम परमेश्वर के ही हैं। परमात्मा के अन्य बहुत से नाम ऐसे हैं जो अन्य पदार्थों के भी हैं। अतः जहां जैसा प्रकरण होता हैं, वहां उन शब्दों व नामों से उसके अनुरूप अनेक अर्थों को प्रसंग के अनुसार ही ग्रहण करना चाहिये। यदि ईश्वर का प्रसंग है तो ईश्वर परक अर्थ लेना उचित है और यदि प्रसंग किसी सांसारिक विषय का हो, तो उसके अनुसार ही शब्दों का अर्थ किया जाना उचित होता है।

 

                ओ३म् ईश्वर का ही नाम है और इसका वर्णन अनेक वैदिक शास्त्रों में हुआ है। इसका उल्लेख भी ऋषि ने सत्यार्थप्रकाश में किया है। यह पूरा विवरण सत्यार्थप्रकाश के प्रथम समुल्लास में ही देखना चाहिये। संक्षेप में कुछ बातें यहां प्रस्तुत करते हैं। ऋषि बताते हैं कि ईश्वर के ओ३म् आदि नाम सार्थक हैं निरर्थक नहीं है। सब प्राणियों की रक्षा करने से ईश्वर ओ३म् कहलाता है। आकाशवत् व्यापक होने से खम् और सब से बड़ा होने से ईश्वर का नाम ब्रह्म है। ओ३म् उस सत्तावान पदार्थ ईश्वर का नाम है जो कभी नष्ट नहीं होता। उसी की उपासना सब मनुष्यों को करनी चाहिये अन्य किसी की नहीं। यहां ऋषि शास्त्रीय वचनों के आधार पर बता रहे हैं कि ईश्वर, जीव व प्रकृति में से जो प्रथम ईश्वर की सत्ता है वही उपासनीय है। उसके अतिरिक्त अन्य कोई उपासनीय नहीं है। माण्डूक्य उपनिषद के वचन ‘ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानम्’ के अनुसार सब वेदादि शास्त्रों में परमेश्वर का प्रधान और निज नाम ‘ओ३म्’ को कहा है। ईश्वर के अन्य सब नाम गौणिक नाम हैं। कठोपनिषद् के अनुसार चारों वेद सब धर्मानुष्ठानरूप तपश्चरण जिसका कथन और मान्य करते हैं और जिसकी प्राप्ति की इच्व्छा करके ईश्वरोपासक ब्रह्मचर्याश्रम करते हैं, उसका नाम ‘ओ३म्’ है। ओ३म् नामी ईश्वर सब को शिक्षा देनेहारा, सूक्ष्म, स्वप्रकाशस्वरूप, समाधिस्थ बुद्धि से जानने योग्य है, उसको परम पुरुष जानना चाहिये। ओ३म् शब्द का प्रयोग केवल ईश्वर के लिये होता है अन्य किसी सांसारिक पदार्थ के लिये नहीं। इस लिये ओ३म् शब्द ईश्वर का मुख्य एवं निज नाम ही है। इस नाम में ईश्वर के सब गौणिक आदि एवं सम्बन्ध सूचक नाम आ जाते हैं। अतः जब भी ईश्वर को पुकारना हो तो ओ३म् नाम से ही पुकारना चाहिये। महर्षि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश में लिखा है कि ‘ओ३म्’ यह तो केवल परमात्मा ही का नाम है और अग्नि आदि नामों से परमेश्वर के ग्रहण में प्रकरण और विशेषण नियमकारक हैं। इससे यह सिद्ध हुआ कि जहां-जहां स्तुति, प्रार्थना, उपासना, सर्वज्ञ, व्यापक, शुद्ध, सनातन और सृष्टिकर्ता आदि विशेषण लिखे हैं वहीं-वहीं इन नामों से परमेश्वर का ग्रहण होता है।

 

                ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश के प्रथम समुल्लास में ईश्वर के एक सौ नामों की व्याख्या की है। जिस विद्वता से ऋषि ने ईश्वर के नामों का उल्लेख किया है वैसा उल्लेख किसी पूर्व ग्रन्थ में उपलब्ध नहीं होता। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ के प्रथम समुल्लास में ईश्वर के नाम विषयक सामग्री भी ऋषि दयानन्द कीएक महत्वपूर्ण देन है। ईश्वर के एक सौ नामों का उल्लेख कर वह कहते हैं कि यह सौ नाम परमेश्वर के लिखे हैं परन्तु इन से भिन्न परमात्मा के असंख्य नाम हैं। क्योंकि जैसे परमेश्वर के अनन्त गुण, कर्म, स्वभाव का एक-एक नाम है। इस से ये मेरे लिखे नाम समुद्र के सामने विन्दुवत् हैं। वेदादि शास्त्रों में परमात्मा के असंख्य गुण, कर्म, स्वभाव व्याख्यात किये हैं। उनके पढ़ने पढ़ाने से ईश्वर के नामों व उसके गुण, कर्म व स्वभाव का बोध हो सकता है। अन्य पदार्थों का ज्ञान भी उन्हीं लोगों को पूरा-पूरा हो सकता है जो वेदादिशास्त्रों को पढ़ते हैं। ऋषि दयानन्द ने ग्रन्थों के आदि में ‘ओ३म्’ व ‘अथ’ शब्द लिखने को ही वेदसम्मत माना है और हरिः ओम्, श्रीगाणेशाय नमः, सीतारामाभ्यां नमः, राधाकृष्णाभ्यां नमः आदि लिखने का निषेध किया है क्यों कि ऐसा करना वेदसम्मत न होकर वेद विरुद्ध है।

 

                ओ३म् ईश्वर का मुख्य और निज नाम है और इस एक नाम में ईश्वर के सभी नाम आ जाते हैं। इसी नाम से ईश्वर का स्मरण व जप करना चाहिये। ओ३म् वा प्रणव का जप ईश्वर के सत्यस्वरूप को अपने भावों में उपस्थित कर करना चाहिये। इससे हमारी आत्मा के दोष अविद्यादि का नाश होता है। वेदों व आर्ष ग्रन्थों सहित ऋषि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों का स्वाध्याय व अध्ययन भी सभी धर्म प्रेमी सज्जनों को अपनी आत्मा की उन्नति तथा परजन्म में श्रेष्ठ मनुष्य योनि की प्राप्ति सहित मोक्ष प्राप्ति के लिये भी करना आवश्यक है। ऋषि दयानन्द ने हमारे वर्तमान व भविष्य को समुज्जवल करने के लिये ही अपने जीवन के सभी सुखों का त्याग व समाधि में मिलने वाले सुख की अवधि को न्यून किया था। हमारा कर्तव्य व धर्म है कि हम उनके विचारों व ग्रन्थों से लाभ उठाये और अपने जीवन को वेद प्रचार व वेदाचरण में लगा कर इसे सन्मार्ग पर चलायें। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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