“ऋषि दयानन्द द्वारा किये वेद-प्रचार का महत्व और हमारा कर्तव्य”

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13 Jul 19
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-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

“ऋषि दयानन्द द्वारा किये वेद-प्रचार का महत्व और हमारा कर्तव्य”

ऋषि दयानन्द ने अपना जीवन ईश्वर के सत्यस्वरूप की खोज एवं मृत्यु पर विजय पाने के उपायों को जानने के लिये देश के अनेक स्थानों पर जाकर विद्वानों की संगति व दुर्लभ पुस्तकों के अध्ययन में बिताया था। इस प्रयोजन के लिये ही उन्होंने अपने माता-पिता सहित बन्धु-बान्धवों, कुटुम्बियों व जीवन के सभी सुखों का त्याग किया था। ऋषि दयानन्द अपनी आयु के 22वें वर्ष में अपने घर व परिवार के सदस्यों से दूर चले गये थे। जीवन का एक-एक पल उन्होंने अपने मिशन व लक्ष्य को अर्पित किया था। अथक तप व पुरुषार्थ से वह अपने उद्देश्य में सफल हुए थे। वह एक सच्चे योगी थे जो लगभग 18 घंटे की निरन्तर समाधि लगा सकता था। उन्होंने उस समाधि अवस्था को प्राप्त किया था जिसे लाखों व करोड़ों मनुष्यों में कोई एक साधक ही प्राप्त कर पाता है। हम जानते हैं कि समाधि अवस्था में योगी, साधक व उपासक को सर्वव्यापक व सृष्टि के रचयिता ईश्वर का साक्षात्कार होता है। ऋषि दयानन्द समाधि का अभ्यास यदा-कदा नहीं अपितु प्रातः व रात्रि प्रतिदिन दोनों समय करते थे और इस अवधि में उन्हें ईश्वर का साक्षात्कार हुआ करता था। स्वामी दयानन्द जी सिद्ध योगी तो बन ही चुके थे परन्तु वेद व आर्ष विद्या की प्राप्ति उन्हें सन् 1863 में गुरु विरजानन्द सरस्वती से मथुरा में दीक्षा लेने पर हुई थी। विद्या प्राप्ति के बाद ऋषि दयानन्द जी को अपना कर्तव्य निर्धारित करना था। इस कार्य में उनके विद्यागुरु स्वामी विरजानन्द जी ने प्रेरणा व सहयोग प्रदान किया था। उन्होंने ऋषि दयानन्द को बताया था कि वह संसार से अविद्या को दूर करने का प्रयत्न करें जिससे लोग अज्ञान, अन्धविश्वास एवं मिथ्याचारों से बच सकें। मिथ्या भक्ति व उपासना के स्थान पर वह ईश्वर की यथार्थ उपासना को जानकर उसे करें और लाभान्वित हों। उपासना के लाभ ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश में वर्णित किये हैं। स्वामी विरजानन्द जी के इस सुझाव को अपनाने से देश व समाज के सभी मनुष्यों सहित प्राणी मात्र का उपकार होना था। ऋषि दयानन्द ने अपने गुरु जी की बात को उचित व हितकर जानकर स्वीकार किया था।

 

                गुरु विरजानन्द जी से मथुरा से विदा लेकर स्वामी जी आगरा आये थे। आगरा में लगभग 2 वर्ष व कुछ कम अवधि तक रहकर अविद्या दूर करने के उपायों व सद्धर्म प्रचार की शैली निर्धारित करने पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया था। वेदाध्ययन में सबसे अधिक महत्व वेदांग के अन्तर्गत शिक्षा, व्याकरण एवं निरुक्त का ज्ञान होना होता है। इनकी सहायता से वेदमन्त्रों के प्रत्येक पद का अर्थज्ञान होने सहित मन्त्र के अर्थ व तात्पर्य की संगति लगाई जा सकती है। ऋषि दयानन्द इन तीन वेदांगों सहित अन्य तीन वेदांगों छन्द, कल्प एवं ज्योतिष में भी प्रवीण थे। इस कारण उनका किया हुआ वेदभाष्य जहां एक सिद्ध योगी, ऋषि व आप्त पुरुष सहित वेदों के अंग एवं उपांगों के विद्वान का किया हुआ भाष्य है, वहीं उनका भाष्य वैदिक परम्पराओं को अपने जीवन में धारण किये हुए एक पूर्ण विद्वान का किया हुआ भाष्य भी है। ऋषि दयानन्द के वेदभाष्य सहित सभी ग्रन्थों का महत्व अवर्णनीय है। ऋषि के ग्रन्थों का अध्ययन करने व उसके अनुकूल आचरण करने से मनुष्य का जीवन सफल होकर धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर होता है। वेदमार्ग पर चलने से सभी मनुष्यों का जीवन सन्तोषजनक व सुखपूर्वक व्यतीत होकर परजन्म को सुधारने व उसकी उन्नति में भी हितकर सिद्ध होता है। अतः संसार में प्रत्येक मनुष्य के लिये ऋषि दयानन्द के वेदभाष्य सहित उनके ग्रन्थों का अध्ययन व आचरण परमधर्म एवं परम कर्तव्य है। जो मनुष्य ऐसा करते हैं वह जन्म-जन्मान्तरों में उन्नति को प्राप्त होकर मानव जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति में अग्रसर होकर लाभान्वित होते हैं। अतः सभी मनुष्यों को अज्ञान दूर करने के लिये सभी प्रकार के स्वार्थों का त्याग कर ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों का अध्ययन एवं उनको उपयोगी पाने पर उनका आचरण अवश्यमेव करना चाहिये। मनुष्य जीवन को वैदिक जीवन से अच्छी प्रकार जीने का संसार में अन्य कोई मार्ग व जीवन पद्धति नहीं है।

 

                ऋषि दयानन्द ने वेदों का प्रचार करने से पूर्व वेदों को प्राप्त किया और उनका आद्योपान्त अध्ययन कर उनकी महत्ता की पुष्टि की। उन्होंने पाया कि वेद में सर्वत्र विद्यायुक्त बातें ही हैं और अविद्या किंचित नहीं है। उनके लिए ऐसा करना आवश्यक था, इसलिये कि यदि कोई उनकी मान्यताओं के विरुद्ध प्रमाण उपस्थित कर देता तो उन्हें उत्तर देने में कठिनाई हो सकती थी। वेद सब सत्य विद्याओं के पुस्तक हैं, इस निर्णय को करने में स्वामी दयानन्द जी को समय लगा और निश्चय हो जाने पर उन्होंने वेदों का प्रचार करना और वेद विरुद्ध मान्यताओं व सिद्धान्तों का खण्डन करना आरम्भ कर दिया। वेद प्रचार से पूर्व वह आश्वस्त थे कि वेदों में न तो मूर्तिपूजा का विधान है अथवा न ही किसी प्रकार की जड़ मूर्तियों की पूजा की कहीं प्रेरणा ही है। अवतारवाद के समर्थन में भी वेद में कहीं कोई वचन या कथन उपलब्ध नहीं है। मृतक श्राद्ध का भी वेदों में कही उल्लेख नहीं है और न ही इसका किसी प्रकार से समर्थन ही होता है। फलित ज्योतिष का प्रचलन भी वेद विरुद्ध था जिसका भी किसी विद्वान को अद्यावधि कोई प्रमाण नहीं मिला है। ऋषि दयानन्द जी की दृष्टि में वेदों का ज्ञान मनुष्यमात्र के लिये था और वेदों पर द्विजेतर लोगों के अध्ययन-अध्यापन पर जो प्रतिबन्ध थे वह भी विद्वानों व पण्डितों के कपोल-कल्पित विधान व विचार थे। ऋषि दयानन्द ने ही स्त्री व शूद्रों सहित प्रत्येक मनुष्य को वेदाध्ययन का अधिकार दिया और इसके समर्थन में यजुर्वेद का एक मन्त्र प्रस्तुत कर सभी जन्मना ब्राह्मणों व विद्वानों को निरुत्तर कर दिया। विवाह के सम्बन्ध में भी ऋषि दयानन्द ने वेदों के अनुकूल मनुस्मृति के तर्क एवं बुद्धियुक्त विधानों का सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों के माध्यम से प्रचार किया। राजनीति विषयक नीतियों के सम्बन्ध में भी वह रामायण एवं महाभारत आदि ग्रन्थों सहित नीति ग्रन्थों को स्वीकार करते थे। सत्यार्थप्रकाश के षष्ठम् समुल्लास में उन्होंने राजधर्म विषयक समुल्लास में वेद एवं मुख्यतः मनुस्मृति के आधार पर ही राजधर्म का निरुपण किया है। अतः ऋषि दयानन्द ने वेदों को नित्य एवं ईश्वर प्रणीत न केवल स्वीकार ही किया अपितु इसके अनेक प्रमाण भी अपने ग्रन्थों में दिये हैं।

 

                ऋषि दयानन्द ने वेदों को सर्वोपरि धर्मग्रन्थ स्वीकार करने सहित वेदों को स्वतः प्रमाण भी स्वीकार किया है। ऋषि दयानन्द को वेद कब, कहां व किससे प्राप्त हुए, इस पर ऋषि जीवन से सम्बन्धित साहित्य में प्रकाश नहीं पड़ता। वर्तमान समय में हमें चारों वेद ग्रन्थ रूप में अनेक प्रकाशकों एवं पुस्तक विक्रेताओं से उपलब्ध होते हैं। ऋषि दयानन्द के काल 1825-1883 में वेद किसी पुस्तक विक्रेता तथा प्रकाशक आदि से उपलब्ध नहीं होते थे। वेदों का कभी किसी ने प्रकाशन किया हो, इसका उल्लेख नहीं मिलता। उनके समय में प्रा. मैक्समूलर द्वारा अंग्रेजी में अनुदित व सम्पादित ऋग्वेद का अनुवाद इंग्लैण्ड से प्रकाशित अवश्य हुआ था। बाद में स्वामी दयानन्द जी को इसकी प्रतियां अपने सहयोगियों से जयपुर के पुस्तकालय से प्राप्त कर देखने के लिये सुलभ हुइंर् थीं। स्वामी जी से पूर्व आचार्य सायण ने संस्कृत में चतुर्वेद भाष्य किया था। यह भाष्य स्वामी दयानन्द जी को सुलभ था। इसका प्रमाण स्वामी दयानन्द जी द्वारा अपने भाष्य व लेखों में सायण भाष्य की समालोचना व समीक्षा करना है। हम नहीं जानते कि ऋषि दयानन्द के समय व उससे पूर्व सायण का भाष्य देश में किसी प्रकाशक ने प्रकाशित किया था? हो सकता है किया हो और हो सकता है कि न भी किया हो? हमें प्रतीत होता है कि स्वामी दयानन्द जी को वेद प्राप्त करने में भी अत्यधिक पुरुषार्थ करना पड़ा और किसी ऐसे व्यक्ति को ढूढना पड़ा जिसके पास चार वेदों की हस्तलिखित संहितायें थी और जिसने स्वामी जी के अनुरोध करने पर उन्हें चारों वेद भेंट स्वरूप प्रदान किये थे। हमारा अनुमान है कि धौलपुर या करौली आदि किसी स्थान से स्वामी जी को यह वेद प्राप्त हुए थे और उसके बाद जब वह सन् 1867 के हरिद्वार के कुम्भ में पहुंचे थे तो चारों वेद उनके उपलब्ध पास थे। इसका उल्लेख पं0 लेखराम जी के ऋषि जीवन चरित में मिलता है। ऋषि जीवनचरित में वर्णन हुआ है कि हरिद्वार के कुम्भ मेले में देहरादून के कबीर पंथी साधु स्वामी महानन्द जी ने ऋषि दयानन्द के डेरे में चारों वेद देखे थें।

 

                ऋषि दयानन्द ने वेद प्राप्ति में जो पुरुषार्थ किया वह अत्यन्त प्रशंसनीय है। यदि वह वेद प्राप्त कर वेदों का प्रचार करने सहित वेद भाष्य का महान कार्य न करते तो आज हम वेदों के मन्त्रों के सत्य अर्थों से वंचित रहते। स्वामी जी ने वेद भाष्य करते हुए जिस प्रकार प्रत्येक मन्त्र का पदच्छेद, अन्वय, संस्कृत भाषा में पदार्थ, हिन्दी भाषा में पदार्थ तथा भावार्थ दिया है और कुछ स्थानों पर कुछ मन्त्रों के सायण आदि भाष्यकारों की समालोचना भी की है, वह ऋषि दयानन्द जी के उच्च कोटि के ज्ञान, उनकी योग्यता, ईश्वर के उन पर सहाय एवं तप व पुरुषार्थ के कारण सम्भव हुआ है। हमें यह सब लाभ अनायास ही प्राप्त हो गया है। इस कारण हम वेद भाष्य का महत्व नहीं जानते। वेद हमारा सर्वस्व हैं। वेद साक्षात् ईश्वर की वाणी व उनका दिया हुआ ज्ञान है। वेद मन्त्रों के कर्ता ऋषि नहीं अपितु इन मंत्रों के कर्ता व दाता स्वमेव परमेश्वर हैं। इस दृष्टि से वेद के प्रत्येक मन्त्र, प्रत्येक पद व शब्द का महत्व है। हमें अपने जीवन में वेदों के स्वाध्याय को महत्व देना चाहिये। वेदों के प्रचार एवं वेदाचरण से ही मनुष्यों के मध्य खड़ी की गई मत-मतान्तर एवं जातिवाद सहित ऊंच-नीच की दीवारों को ध्वस्त किया जा सकता है और एक श्रेष्ठ विचारों वाले विश्व व समाज का निर्माण किया जा सकता है। हमें वेदों का स्वाध्याय करने के साथ अपने निकटवर्ती बन्धुओं में भी वेदों के सन्देश का प्रचार व प्रसार करना है। इसीसे मानवमात्र का हित होगा। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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