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खत्री की काव्य कृति सुगंध है समाज एवं संस्कृति की अनुभूति और अभिव्यक्ति: डॉ कृष्णा कांत पाठक

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27 Mar 22
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खत्री की काव्य कृति सुगंध है समाज एवं संस्कृति की अनुभूति और अभिव्यक्ति: डॉ कृष्णा कांत पाठक

जैसलमेर।। जैसलमेर के लोक संस्कृति अध्येता एवं लेखक लक्ष्मीनारायण खत्री द्वारा रचित एवं राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित हुई कृति की भूमिका राजस्थान कैडर के आई.ए.एस तथा सुप्रसिद्ध दार्शनिक विचारक तथा लेखक डॉ कृष्णा कांत पाठक ने लिखी है श्री पाठक ने भूमिका के प्रारंभ में लिखा है कि लक्ष्मीनारायण खत्री जी सुदूर मरुधरा में स्वर्णिम जैसलमेर की संस्कृति के अमिट हस्ताक्षर हैं। संस्कृति का अनुराग उनका अंतर्निहित वैशिष्ट्य है। साहित्य सृजन के लिए उनकी उसी संवेदना का द्वितीय आयाम है। अब वह कविता संकलन के रूप में सुगंध शीर्षक के साथ प्रकाशित हो रही है। सुगंध की सुगंधि सुदूर तक मोहित करे, यह कामना तो रहेगी ही। खत्री जी सुदूर मरुधरा में स्वर्णिम। संस्कृति का अनुराग उनका अंतर्निहित वैशिष्ट्य है। साहित्य सृजन के लिए उनकी उसी संवेदना का द्वितीय आयाम है। अब वह कविता संकलन के रूप में सुगंध शीर्षक के साथ प्रकाशित हो रही है।


डॉ पाठक ने अपनी बात कहते हुए लिखा है कि कविता स्वस्फूर्त प्रेरणा भी होती है और असंख्य के लिए प्रेरणा भी। वह स्वान्त:सुखाय होकर भी अनंत के हृदय का स्पंदन बनती है। श्री खत्री जी की कविताएं अनेक के हृदयों को स्पंदित करने में समर्थ होगी। कविता स्वस्फूर्त प्रेरणा भी होती है और असंख्य के लिए प्रेरणा भी। वह स्वान्त:सुखाय होकर भी अनंत के हृदय का स्पंदन बनती है। श्री खत्री जी की कविताएं अनेक के हृदयों को स्पंदित करने में समर्थ होगी। साहित्य के क्षेत्र में जगत् के आदर्श और यथार्थ में समन्वय कठिन रहा है। यथार्थ में एक प्रकार की तिक्तता होती है। वह हमें आहत करती है, वह हमें सजग भी करती है।

विद्वान डॉ पाठक ने समीक्षात्मक टिप्पणी करते हुए लिखा है कि श्री लक्ष्मीनारायण खत्री की कविताएं समकालीन संसार की साहित्यिक संवेदना से भरी हैं। उनकी कविताओं में वंचित, उपेक्षित, निराश्रित वर्ग के लिए सहज करुणा है। उनमें देश की सुरक्षा, समाज की जिम्मेदारी, कोरोना की विभीषिका, स्त्री पर हिंसा, व्यक्ति की संकटपरक दशा-दिशा आदि सब पर प्रचुर लेखन किया गया है। एक ओर जिंदगी और पहिया में जीवन की दैनंदिनी है, तो दूसरी ओर जिंदगी जश्न मनाएगी, जिंदगी में हंसना, जीवन की चढ़ाई इत्यादि में जीवन का उल्लास है। कहीं तीज-त्योहार की संस्कृति हैं, तो कहीं मांगणियार व कालबेलिया के रंग; कहीं शिल्प साधना,हवेलियाँ, खंडहर व विरासत को अमर रहने दो में संस्कृति की चिंता है, तो कहीं नशे से नाश, श्मशान में जश्न की त्रासदी, कहीं बाल श्रमिकों की विडंबना है, तो कहीं दरिद्रता का डेरा; जाति की व्यथा,सती की चीख, विधवा की व्यथा में सामाजिक चिंता घनीभूत है, तो बेटियां, मेरे दादा, माँ की महिमा व पिता में पारिवारिक व हार्दिक संबंधों के प्रति विह्वलता झलकती है।
पृथ्वी की उपेक्षा, तालाब की महिमा, अकाल में कंकाल, आंधी का क्षण गर्मी का तांडव, वर्षा का उपहार, वर्षा से अभिलाषा व खेजड़ी में प्रकृति के विविध आयाम हैं। ऐसी ही विविधता से भरे इस संकलन के लिए सहज शुभेच्छा रहेगी। पाठक ने भूमिका के उपसंहार में लिखा है कि श्री लक्ष्मीनारायण खत्री शब्दों के चयन में सहज रहे हैं, इस कारण गहन अनुभूति को सुंदर अभिव्यक्ति देने में सफल रहे हैं। जिस भावप्रवणता व सहजता से वे प्रकृति का चित्रण करते हैं, उसी उदारता व विदग्धता से संस्कृति का भी और यही मणिकांचन संयोग उनके साहित्य को मृदुल व संप्रेषणीय बनाता है।


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