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साहित्य की गंगा में रस घोलती डॉ.संगीता सिंह

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14 Apr 24
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डॉ.प्रभात कुमार सिंघल, कोटा

साहित्य की गंगा में रस घोलती डॉ.संगीता सिंह

आध्यात्म, देश प्रेम, नारी विमर्श, प्रकृति, पर्यावरण और सामाजिक सरोकारों के काव्य सृजन में रत डॉ. संगीता सिंह ऐसी कवियित्री है जिन्होंने अपनी रचनाओं से साहित्य में  ऐसा रस घोला है कि पाठक उनकी कविताओं की गहराई में खो सा जाता है। पद्य विधा में कविता इनकी सबसे पसंदीदा विधा है जब कि ये पद्य की अन्य विधाओं पर भी लेखनी चलाती है। इनका काव्य सृजन पर हिंदी, राजस्थानी, अंग्रेजी भाषाओं में समान अधिकार हैं तथा तीनों ही भाषाओं में पद्य लिखती हैं।
    इन्होंने तीन अंतरराष्ट्रीय रचनाओं का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किया है। उजबेक कवियित्री उक्तामोय  के कविता संग्रह के अनुवाद में योगदान कर ' विरह की वेदना' पुस्तक प्रकाशित हुई। ए ज्वेल ऑफ माई सोल का हिंदी अनुवाद "मेरी आत्मा का रतन" और द व्हिस्परिंग सेंस काव्य संग्रह का हिंदी अनुवाद" सरगोशियां " नाम से किया है।
      हिंदी काव्य सृजन में छात्राओं का मार्गदर्शन प्रोत्साहित करने के साथ-साथ फेसबुक पर हिंदी, अंग्रेजी एवं राजस्थानी भाषा में 5 लेखन पेज चल रहे हैं। कामकाजी महिलाओं चाहे वह मजदूर हो या ऑफिस कर्मी उनकी समस्याओं पर अंग्रेजी भाषा में काव्य रचनाएं लिखती हैं। अंग्रेजी साहित्य में हिंदू धर्मशास्त्रों की झलक, नारी विमर्श, अध्यापन इत्यादि विषयों पर कई शोध पत्र प्रकाशित। सेवाकाल के दौरान जिन महाविद्यालयों में पदस्थापित रही  उनकी पत्रिकाओं में  हिंदी एवं अंग्रेजी दोनों भाषाओं के साहित्यिक लेखन के साथ-साथ संपादन में सतत योगदान दिया। हिंदी, राजस्थानी  में लिखी काविताएं, कहानियां और समीक्षा कई साहित्यिक पत्रिकाओं में एवं वेबसाइट पर
प्रकाशित हुई हैं। प्रसार भारती, आकाशवाणी कोटा से भी कविताएं प्रसारित होती रहती हैं।
     इनकी कविता को मात्र कविता  मान कर पढ़े  तो वह महज़ एक कविता ही लगती है परन्तु  इसके आंतरिक भावों को समझे तो अहसास होता है कवियित्री ने कितनी गहराई से लिखा है, जो इनके सृजन की विशेषता है। इनकी लिखी कविता "अंजुरी" एक कविता ही नही वरन ईश्वर की सत्ता में आस्था और आध्यात्म का कितना गहरा भाव लिए है..............
शून्य हूँ प्रभु मैं, कर्ता आप हैं।
कुछ नही करती मैं, सब कुछ करते आप हैं।
ज्ञान है यह, 
भान भी करवाते आप हैं।
करवा रहे हो जो भी कुछ, 
पता है कि कारण आप हैं।
कर्म और फल के बीच भी कहीं "मैं" नहीं, 
ज्ञात है मुझे कि भोक्ता भी आप हैं।
हो रहा जो प्रभु मेरे आस-पास, समझ आता है कि आप मेरे पास हैं।
सुन लिया जो सरल, कुटिल किसी से,
उस से भी मुझे कहलवा रहे आप हैं।
मैं नहीं प्रसन्न, दुखी सुन के, क्योंकि वो भी सुन रहे बस आप हैं।
यदि कभी किसी ने दिया मान अपमान है, देने वाले और लेने वाले भी आप हैं।
यदि कभी कुछ अच्छा हुआ मुझसे  जाने अनजाने,
तो बस उस सभी के अधिकारी आप हैं।
हुआ यदि बुरा मुझसे कहीं, कभी नही किया आपने, वो तो सिर्फ  मेरे  और मेरे पाप हैं।
क्योंकि तुम करते नही कभी कुछ बुरा प्रभु जी, कैसे मानूँ कि कारक उसका भी आप हैं?
किसी ने जो कुछ अनिष्ट किया मेरा,
 वो तो मेरे पीछे पड़े कुछ शाप हैं।
आता जो यह  अतिप्रिय अहसास है,
श्रेय भी और प्रेय भी बस आप हैं।
नहीं जानती मैं ये सब कुछ प्रभु
ये जो लिखवा रहे हैं, बस आप हैं।
लय हूँ, लीन हूँ, तल्लीन हूँ आपमे,
उस सब की प्रेरणा और शक्ति आप हैं।
देखकर ये सब यदि कोई कह बैठे, 
भक्ति है कितनी!!
तो बस, फिर ये भी सब आपके हाथ है।
दिख ही जाते हैं कभी चक्र और खड्ग, और दिखते त्रिशूल और चाप हैं।
यदि नही मैं आपसे कुछ अलग, तो भक्त और भगवान दोनो आप हैं।
    आध्यात्म से ही प्रेरित श्री कृष्ण जमाष्टमी पर लिखी रचना के भाव भी दृष्टव्य हैं..........
ओ सारथी
अर्जुन के ही नहीं  मेरे भी सारथी हो तुम
तुमसे ही सीखा है व्यवहारिक धर्म,
कभी कभी फूंक देते हो कान में निष्काम कर्म।
तुम्हारा मोर पंख मुझे सिखाता है कि 
मोर की तरह से ज्यादा  उपर नहीं उड़ना
अधिकतर जमीन पर ही  रहना।
जब तक इस संसार में हूं
कर्मठ बने रहना।
इस चक्र में कब तक घुमाओगे मुझे?
निकाल लो इसमें से मुझे ।
अनंत ज्ञान, अनंत चेतना की ओर।
ले चलो  वहां जहां 
मैं छूट जाऊं इस आवागमन से।
भाग नहीं रही हूं मैं इस  संसार से,
काट दो मेरे फंद भव बंधन के ।
निर्बल नहीं हूं मैं।
फिर से नहीं पढ़ना एल के जी से 
पी एच डी।
ले चलो निराले ज्ञान की दिशा में 
और भी उच्च ज्ञान, अनंत शांति- मोक्ष की ओर।
    ईश्वरीय आस्था के संदेश के साथ कवियित्री का देश प्रेम भी " अमन का पैगाम " में यूं  छलकता है। काव्य रचना के कुछ अंश देखिए..
रोशनी इल्म की पैदा करो,
घर के चरागों को मशाल क्यों बनाया जाए।
ठंड से बचने को अलाव काफी है,
अपने ही गुलिस्तां को क्यों जलाया जाए।
कानो में पिघला सीसा भर जाए,
ऐसी दास्तान को ना सुनाया जाए।
सुन कर बहे आंखों से दरिया,
ऐसे गीतों को ना लिखा जाए।
मुकम्मल सी बातें करो, 
अपना ही वक़्त न जाया जाए।
आबे अमन से ही बुझेगी नफरत की आग,
यूँ फालतू ही  खून न बहाया जाए।
    महाविद्यालय की देहरी पर आशा और विश्वास के दो दीप कविता के रूप में जला कर छात्राओं को हर दृष्टि से सक्षम बनाने के लिए किए गए प्रयासों के साथ उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना को शब्दों में पिरो कर किया गया प्रभावी सृजन देखते ही बनता है। अपनी " यज्ञ " काव्य रचना में लिखती हैं ......
है परीक्षा की घड़ी,  
और  बिना विचलित हुए।
मिला कर कंधे से कंधा 
सब काम पर जुटे हुए ।
एक एक दिन है अमोल
पग पग सीढ़ी चढ़ते हुए, 
है संयुक्त प्रयास  सबके, 
यज्ञ में आहुति देते हुए।
जोड़ लें माला में मोती,
कर्म के बिखरे हुए
तभी हम कह पाएंगे कि
हमारे प्रयास सफल हुए।
रक्षा सेवा में अपना कैरियर बनाने वाली छात्राओं के लिए विश्वास से भरी दूसरी रचना
" लक्ष्य "  में लिखती हैं ................
मार्ग को प्रशस्त कर,
दुश्मन के किले ध्वस्त कर,
सुरक्षा की कमान तुम संभाल लो।
जज्बा हो बुलंद, 
चाहे टूटे प्रेमछंद,
देश की तकदीर तुम संवार दो।
गृहस्थ छोड़ना पड़े,
 ममत्व तोड़ना पड़े,
देश भक्ति का तुम प्रमाण दो।
नारी विमर्श की कविताओं में इन्होंने नारी जाति के संबंध में जो धारणाएं हैं उनके प्रति नारी जाति को मार्गदर्शन देने का संदेश दिया गया है कि सदियों से चली आ रही नारी जाति की इस नकारात्मक छवि को मिटाने का प्रयास स्वयं नारी जाति को ही सृजनात्मक एवं सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ प्रगति के पद पर बढ़ते हुए करना होगा अपने 
 पर्यावरण की चिंता को  " चिरैया कब आओगी " काव्य रचना में वक्त करते हुए चिरैया की खुशी और  वेदना को संजो कर पर्यावरण बचाने का अंदाजे बयां भी देखते ही बनता है,....................
चिरैया कब आओगी ?
सुना है बाज उसकी नस्ल को खा जाता है 
और खाता रहा है , पर फिर भी उसकी नस्ल कम नहीं होती थी।
वह दिखती थी आंगन में फुदकती हुई, चहचहाती हुई।
लेकिन अब उसको देखने को आंखें तरस जाती है। 
कब आओगी प्यारी चिरैया ?
घास फूस से कब घोंसला बनाओगी सुंदर गौरैया?
लोहे और कंक्रीट के जंगल  हैं सब ओर,
मेरे लिए सुरक्षित नहीं कोई अब छोर।
कहती है वो कहीं दूर असली जंगल से,  
घबराती हूं, मोबाइल के टावर से।
शुभ है वह इतनी, जैसे नक्षत्रों में पुष्य,
परंतु लालच में अंधे कुछ मनुष्य,
बाज नहीं आते, बाज बन जाते हैं कुछ मनुष्य।
आपकी प्रतीकात्मक एक रचना की बानगी भी कविता " चिड़ियाघर " में  देखिए.......
चिड़ियाघर
जंगल है या चिड़ियाघर
समझ से परे है इसके पर
कहीं मुर्गे के साथ बैठा है अजगर!!
मुंडेर पर बैठे हैं
 कुछ चील, गिद्ध, कौव्वे
प्रतीक्षा में आंख गड़ाए 
 कि कब कोई कमजोर पड़े, 
झुंड से अलग हो,
लड़खड़ा कर गिर पड़े,
और उसका सब कुछ लील जाएं हम।
सोचते हैं वो कि,
 अंततः सब कुछ उनका है।
देखी थी मैंने एक दिन
दो मुंह की सर्पिणी
थोड़ी थोड़ी देर में 
बदल देती थी
अपनी दिशा
और चलने लगती थी 
बिल्कुल विपरीत
क्षण भर में।
वो पिंजरा भी अजीब है
उसमे कोई चूहा नही फंसता
गिरगिट आते हैं
उनको पता है 
 वहां कोई शीशा नही है
कि कोई उनके बदलते रंग
उनको दिखा सके।
परिचय : 
अपने सृजन संसार से सामाजिक चेतना जाग्रत करती और आध्यात्म भाव से प्रेरित कवियित्री
 डॉ संगीता सिंह का जम 26 फरवरी 1964 को पिता स्व. नरेंद्र बहादुर सिंह एवं माता आशालता सिंह के आंगन में कोटा में हुआ। आपके पिता व्याख्याता थे और माता जिला शिक्षा अधिकारी रही। आपने अंग्रेजी साहित्य से स्नातकोत्तर कर पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। निकट भविष्य में काव्य संग्रह प्रकाशित कराने की इनकी योजना है। आप जानकी देवी बजाज राजकीय कन्या महाविद्यालय कोटा के अंग्रेजी विभाग से सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं।
संपर्क :
303 नवनिधि राज अपार्टमेंट्स
सिविल लाइंस, कोटा (राजस्थान)
मोबाइल : 94143 31103
 


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