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पादप सूत्रकृमि: फसल उत्पादन में बड़ा अवरोध

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07 Apr 21
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पादप सूत्रकृमि: फसल उत्पादन में बड़ा अवरोध

महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के सूत्रकृमि विज्ञान विभाग, राजस्थान कृषि महाविद्यालय, उदयपुर द्वारा पादप सूत्रकृमियों के द्वारा होने वाली बीमारियां, लक्षण, हानि एवं प्रबंधन के बारे में जानकारी कृषि वैज्ञानिकों, छात्रों, कृषि प्रसार अधिकारियों, प्रगतिशील किसानों को देने हेतु राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कुलपति डाॅ. नरेन्द्र सिंह राठौड़ ने वर्तमान परिदृश्य में पादप सूत्रकृमियों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए इनके प्रबंधन हेतु पर्यावरण अनुकूल व किसान हितैषी तकनीकी विकसित करने पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि पादप सूत्रकृमि-संरक्षित खेती व उद्यानिकी फसलों में भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं। उन्होंने इस हेतु नवीनतम तकनीकी एवं उपकरणों के माध्यम से अधिक उत्पादन देने वाली सूत्रकृमि रोगरोधक किस्में व तकनीकियां विकसित करने पर बल दिया। कार्यक्रम में देश के जाने-माने सूत्रकृमि वैज्ञानिक डाॅ. एच.एस. गौड़, पूर्व कुलपति सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, मेरठ व पूर्व अखिल भारतीय सूत्रकृमि परियोजना समन्वयक ने पादप सूत्रकृमियों के इतिहास से लेकर अब तक हुए अनुसंधान कार्यों का उल्लेख किया। उन्होंने विश्व में होने जा रहे वातावरण परिवर्तन, फसल क्रमों व सघन खेती को देखते हुए भविष्य में पादप सूत्रकृमियों द्वारा ओर अधिक नुकसान होने का अनुमान लगाया। डाॅ. गौड़ ने पादप सूत्रकृमियों के आकारिकी, पारिस्थितिकी, जीवन चक्र, लक्षण व प्रबंधन के विभिन्न विधियों का विस्तार से उल्लेख किया। डाॅ. गौड़ ने वैज्ञानिकों को आह्वान किया कि वे नवीनतम तकनीकियों का प्रयोग कर नये रसायन, जैव कारक, पादप उत्पाद, रोगरोधक किस्मों को जल्द विकसित कर किसानों को सूत्रकृमियों द्वारा होने वाली हानियों से निजात दिलाए। उन्होंने बताया कि वर्तमान में संरक्षित खेती, अनार, अमरूद, पपीता, सब्जियां, मूंग, चावल, गेहूं, मक्का, तिलहनी व दलहनी आदि फसलों में सूत्रकृमि प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावी गुणात्मक व मात्रात्मक नुकसान पहुंचा रहे हैं। साथ ही किसान व कृषि प्रसार अधिकारियों को सूत्रकृमि के बारे में जानकारी नहीं होने से वे इनके द्वारा होने वाली बीमारियों व नुकसान को नहीं समझ पा रहे हैं। अतः विभिन्न माध्यमों से पादप सूत्रकृमियों के बारे में जानकारी को ओर अधिक प्रचार-प्रसार करने, स्नातक स्तर पर सूत्रकृमि विज्ञान और प्रशिक्षीत युवाओं को कृषि विभाग में नियोजन की आवश्यकता बताई।

कार्यक्रम में डाॅ. दिलीप सिंह, अधिष्ठाता, राजस्थान कृषि महाविद्यालय, डाॅ. एस.के. शर्मा, अनुसंधान निदेशक, डाॅ. एस.एल. मूंदड़ा, प्रसार शिक्षा निदेशक ने भी पादप सूत्रकृमियों के बारे में अपने अनुभव व ज्ञान को प्रतिभागियों के बीच प्रभावी रूप से रखा। इन्होंने प्रकृति प्रदत्त (गर्मियों में गहरी जुताई, मृदा सौरीकरण, कार्बनिक व पादप उत्पाद और जैव कारकों का प्रयोग आदि) तकनीकियों का उल्लेख भी किया, जिससे पादप सूत्रकृमियों द्वारा होने वाले आर्थिक नुकसान को काफी कम किया जा सके। इन्होंने बताया कि कृषि वैज्ञानिकों, विद्यार्थियों व किसानों को पादप सूत्रकृमियों की जानकारी बढ़े इसे हेतु सहज भाषा में कृषि साहित्य, प्रदर्शन, प्रशिक्षण व कार्यशालाओं का अधिक से अधिक आयोजन हो।

वेबिनार का संचालन विश्वविद्यालय के विशेषाधिकारी डाॅ. वीरेन्द्र नेपालिया ने बखूबी किया। कार्यक्रम को सफल बनाने हेतु पीयूष चैधरी, मन्जू कुमारी व मनोज का विशेष सहयोग रहा। आयोजन सचिव डाॅ. बसन्ती लाल बाहेती ने सभी अतिथियों, मुख्य वक्ता, प्रतिभागियों व अन्य सहयोगियों को धन्यवाद ज्ञापित करते हुए बताया कि वेबिनार से पादप सूत्रकृमियों के बारे में कई ज्ञात व अज्ञात जानकारियाँ कृषि वैज्ञानिकों, छात्रों, प्रसार अधिकारियों व प्रगतिशील किसानों को मिली जिससे भविष्य में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से कृषि उत्पादन बढ़ाने में सहयोग मिलेगा व किसानों की आर्थिक व सामाजिक दशा सुधार में गुणात्मक परिवर्तन हो सकेगा।

  


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