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नवरात्रि’ को ‘नवदिन’ क्यों नहीं कहा जाता?

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11 Oct 21
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नवरात्रि’ को ‘नवदिन’ क्यों नहीं कहा जाता?

-नीति गोपेंद्र भट्ट

नई दिल्ली ।शक्ति और भक्ति के पर्व नवरात्रि के ‘नवरात्र’ शब्द में  नव विशेष रात्रियों का बोध होता है, क्योंकि सम्पूर्ण विश्व में इस समय शक्ति के नवरूपों की उपासना हर्षोल्लास के साथ की जाती है। रात्रि शब्दसिद्धि का बोधक है। भारतीय ऋषि-मुनियों ने रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है, इसलिएदीपावली, होलिका, शिवरात्रि और नवरात्रि आदि उत्सवों को रात में ही मनाने की परंपरा है। यदि रात्रि का कोईविशेष रहस्य न होता तो ऐसे उत्सवों को रात्रि न कहकर दिन ही कहा जाता, लेकिन नवरात्र के दिन, नवदिन, शिवरात्रि के शिवदिन नहीं कहे जाते। 

राजस्थान के चित्तौडगढ़ जिले के निंबाहेड़ा में स्थित  श्री कल्लाजी वैदिक विश्वविद्यालय में ज्योतिषविभागाध्यक्ष डॉ. मृत्युञ्जय तिवारी ने नवरात्री और अन्य त्योहारों में रात के महत्व का बहुत रोचक तरीके सेविश्लेषण किया है।

भारतीय मनीषियों ने वैदिक काल से ही वर्ष में दो  बार नवरात्रों का विधान बनाया है। वैज्ञानिक दृष्टि से सभीजानते हैं कि पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के काल में एक वर्ष  की चार  संधियां हैं। उनमें मार्च व सितंबर माहमें पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो  मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। लगभग यही समय 21 मार्च और 23 सितम्बरहोता है, जब दिन और रात्रि का समय एक समान होता है। इस समय रोगाणुओं के आक्रमण की सर्वाधिकआशंका होती है। ऋतु संधियों में शारीरिक बीमारियां बढ़ती हैं। अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए, खान पानपर नियंत्रण रखकर शरीर को शुद्ध रखने के लिए और तन-मन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए कीजाने वाली प्रक्रिया का नाम ही नवरात्र है। विक्रम संवत के पहले दिन अर्थात चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदापहली तिथि से 9 दिन अर्थात नवमी तक और इसी प्रकार ठीक 6 मास बाद आश्विन मास शुक्ल पक्ष कीप्रतिपदा से महानवमी अर्थात विजयादशमी के एक दिन पूर्व तक नवरात्र का समय होता है, परंतु सिद्धि औरसाधना की दृष्टि से शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है। 

इन नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम, यज्ञ, भजन, पूजन, योग-साधना आदि करते हैं। 

कुछ साधक इन रात्रियों में पूरी रात पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर आंतरिक त्राटक या बीज मंत्रों के जापद्वारा विशेष सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। नवरात्रों में शक्ति की 51 पीठों पर भक्तों का समुदाय बड़ेउत्साह से शक्ति की उपासना के लिए एकत्रित होता है, जो उपासक इन शक्तिपीठों पर नहीं पहुंच पाते, वेअपने निवास स्थल पर ही शक्ति का आह्वान करते हैं। मनीषियों ने नवरात्र के महत्व को अत्यंत सूक्ष्मता केसाथ वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में समझने और समझाने का प्रयत्न किया है। रात्रि में प्रकृति के बहुत सारे अवरोधस्वतः समाप्त हो जाते हैं। आधुनिक विज्ञान भी इस बात से सहमत है। हमारे ऋषि-मुनि आज से कितने हीहजारों वर्ष पूर्व ही प्रकृति के इन वैज्ञानिक रहस्यों को जान चुके थे। दिन में आवाज दी जाए तो वह दूर तक नहींजाएगी किंतु रात्रि को आवाज दी जाए तो वह बहुत दूर तक जाती है। इसके पीछे दिन के कोलाहल के अलावाएक वैज्ञानिक तथ्य यह भी है कि दिन में सूर्य की किरणें आवाज की तरंगों और रेडियों तरंगों को आगे बढ़ने सेरोक देती हैं। रेडियों इस बात की सत्यता का उदाहरण है। कम शक्ति के रेडियों स्टेशनों को दिन में पकड़नाअर्थात सुनना मुश्किल होता है, जबकि सूर्यास्त के बाद छोटे से छोटा रेडियों स्टेशन भी आसानी से सुना जासकता है।

वैज्ञानिक सिद्धांत यह है कि सूर्य की किरणें दिन के समय रेडियों तरंगों को जिस प्रकार रोकती हैं, उसी प्रकारमंत्र जाप की विचार तरंगों में भी दिन के समय रुकावट पड़ती है, इसीलिए ऋषि-मुनियों ने रात्रि का महत्व दिनकी अपेक्षा बहुत अधिक बताया है। मंदिरों में घंटे और शंख की आवाज के कंपन से दूर-दूर तक वातावरणकीटाणुओं से रहित हो जाता है। यह रात्रि का वैज्ञानिक रहस्य है, जो इस वैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुएरात्रियों में संकल्प और उच्च अवधारणा के साथ अपने शक्तिशाली विचार तरंगों को वायुमंडल में भेजते हैं, उनकी कार्यसिद्धि अर्थात मनोकामना सिद्धि, उनके शुभ संकल्प के अनुसार उचित समय और ठीक विधि केअनुसार करने पर अवश्य होती है। अमावस्या की रात से अष्टमी तक या प्रतिपदा से नवमी की दोपहर तकव्रत-नियम चलने से नौ रात यानी नवरात्र नाम सार्थक है। यहां रात गिनते हैं इसलिए नवरात्र यानी नौ रातों कासमूह कहा जाता है। रूपक द्वारा हमारे शरीर को 9 मुख्य द्वारों वाला 2 आंखे, 2 कान, 2 नाक के स्वर, 1 मुख, 1 लिंग या योनि और 1 गुदा बताया गया है। इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गादेवी है। इन मुख्य इन्द्रियों के अनुशासन, स्वच्छता, तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में शरीर तंत्र को पूरेसाल के लिए सुचारु रूप से क्रियाशील रखने के लिए 9 द्वारों की शुद्धि का पर्व 9 दिन मनाया जाता है। इनकोव्यक्तिगत रूप से महत्व देने के लिए 9 दिन 9 दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं। जिस तरह घर को साफ सफाईकिया जाता है, ठीक उसी प्रकार शरीर को सुचारु रखने के लिए विरेचन, सफाई या शुद्धि प्रतिदिन तो हम करतेही हैं किंतु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई करने के लिए हर 6 माह के अंतर से सफाई अभियानचलाया जाता है। सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुद्धि, साफ-सुथरे शरीर में शुद्ध बुद्धि, उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म, कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमश: मन शुद्ध होता है और यह तो सामान्यतया हमसभी जानते हैं कि स्वच्छ मन-मंदिर में ही ईश्वर की शक्ति का स्थाई निवास होता है।

*सृष्टि आरम्भ की पहली फसल थी जौ, नवरात्रि में अन्न के प्रति सम्मान का सूचक है जवारे उगाना*

श्री कल्लाजी वैदिक विश्वविद्यालय निंबाहेड़ा के ज्योतिष विभागाध्यक्ष डॉ. मृत्युञ्जय तिवारी के अनुसारभारतीय सनातन परम्परा में नवरात्रि के समय देवी मां की पूजा आराधना के अलावा भी ढेर सारी परंपराएंनिभाई जाती हैं। जिनमें से एक हर वर्ष मिट्टी के बर्तन में ज्वारे यानि कि जौं बोने का भी है। शास्त्रों में कहा हैकि माता जी की पूजा में हर जगह ज्वारे पहले बोए जाते हैं। ज्वारे बोना बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, धर्मग्रंथों में ज्वारे बोने की मान्यता को विशेष बल पूर्वक कहा है, क्योंकि सामान्य पूजा पाठ हो या बड़ा अनुष्ठानजौ के आहुति के बिना यज्ञ पूजा संपन्न नहीं माना जाता। नवरात्रि पूजा में व्रत उपवास और पूजा-आराधना केअलावा ज्वारे का महत्व इसलिए माना जाता, क्योंकि हमारे धर्म ग्रंथों में सृष्टि की शुरूआत के बाद पहलीफसल जौ की ही हुई थी। इसलिए जब भी देवी-देवताओं की पूजा की जाती है, तो हवन में भी इसका प्रयोगकिया जाता है।

जौ की उत्पत्ति के विषय में पौराणिक कथानक है कि माता शक्ति के क्रोध से बचने के लिए महर्षि मेधा नेशरीर का त्याग कर दिया था और उनका अंश पृथ्वी में समा गया और वहां पर जौ और चावल की उत्पत्ति हुई।ज्योतिष शास्त्र के शकुन-अपशकुन की मान्यता है कि नवरात्रि में जो जौं बोई जाती है, वह आपको भविष्य मेंआने वाले संकेतों के बारे में जानकारी देते हैं। इसके अलावा यह भी एक कारण है कि जौ अन्न ब्रह्म है और हमेंअन्न का हमेशा सम्मान करना चाहिए। इसका स्थान उच्च रखना चाहिए। अन्न का कभी अपमान नहीं करनाचाहिए। बोया गया जौ यदि नवरात्रि के शुआत के तीन दिन में ही अंकुरित हो जाता है, तो यह शुभ संकेतोंवाला माना जाता है। जौ यदि बिलकुल भी अंकुरित न हों तो भविष्य के लिए यह अच्छा संकेत नहीं माना जाताहै। इसका अर्थ होता है कि आपको कड़ी मेहनत के बाद भी फल में न्यूनता दिखेगी। यदि जौ का रंग नीचे सेआधा पीला और ऊपर से आधा हरा हो इसका अर्थ है कि आने वाले वर्ष का आधा समय ठीक रहेगा आधाकष्टकारी बीतेगा। यदि जौ का रंग नीचे से आधा हरा है और ऊपर से आधा पीला हो जाता है तो यह इस बातका संकेत होता है की आपका आने वाला समय शुरुआती अच्छा बीतेगा, परन्तु  इसके बाद वाले समय में थोड़ीसमस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। यदि आपका बोया हुआ जौ सफेद या हरे रंग में उग रहा है तो यहबहुत ही शुभ माना जाता है। इसका अर्थ होता है कि आपका आने वाला समय खुशहाल रहने वाला है।


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