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गोमाता का दूध व घी स्फूर्ति देता है और मस्तिष्क को लाभ

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11 Jun, 18 11:24
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मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून

गोमाता का दूध व घी स्फूर्ति देता है और मस्तिष्क को लाभ श्रीमद्दयानन्द ज्यातिर्मठ आर्ष गुरुकुल, पौन्धा-देहरादून के तीन दिवसीय वार्षिकोत्सव के दूसरे दिन 2 जून, 2018 के प्रातःकालीन सत्र में यज्ञ के बाद गो-कृष्यादि रक्षा सम्मेलन का आयोजन किया। इस सम्मेलन में प्रसिद्ध वैदिक विद्वान डा. रघुवीर वेदालंकार सहित अन्य विद्वानों के सम्बोधन हुए। डा. रघुवीर वेदालंकार एवं ऋषि भक्त ठाकुर विक्रम सिंह जी के सम्बोधन हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं।

अपना सम्बोधन आरम्भ करते हुए डा. रघुवीर वेदालंकार ने कहा कि गोरक्षा की जानी चाहिये। हमें उसकी योजना बनानी चाहिये। ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन में गोरक्षा के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए इसके आर्थिक पक्ष को आधार बनाया था। हमारे विरुद्ध ईसाई, मुसलमान, हिन्दू व अन्य लोग खड़े हैं। कुछ न्यायाधीश भी गोमांस खाते हैं। कुछ सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि गोमांस उन्हें अच्छा लगता है। मुसलमान कहते हैं कि गोमांस खाना उनका अधिकार है। वह कुरान का हवाला देते हैं और कहते हैं कि उसमें गोमांसाहार का विधान है। आचार्य रघुवीर जी ने कहा कि हिन्दू क्यों नहीं कहता कि ईश्वर से प्राप्त संसार के आदि ग्रन्थ धार्मिक ग्रन्थ वेदों में गोरक्षा का विधान है तथा गोहत्या व गोमांसाहार का विधान नहीं है। विद्वान वेदाचार्य ने कहा कि हमें एकजुट होना होगा। गोहत्या का होना और गोरक्षा के नाम पर हिन्दुओं का एक जुट न होना हमारे लिए शर्म की बात है। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य स्वामी दयानन्द जी की कुछ बातों को स्वीकार करते हैं। ऐसे भी हिन्दू हैं जो कहते हैं कि वेदों में गोहत्या का विधान है।

डा. रघुवीर वेदालंकार ने कहा कि हमें गाय से होने वाले आर्थिक लाभों को प्रमाणों के साथ प्रस्तुत करना होगा। केवल भाषण देने से काम नहीं चलेगा। उन्होंने कहा कि स्वामी रामदेव जी इस काम को कर सकते हैं। विद्वान वक्ता ने कहा कि गुरुकुल भी इस काम को कर सकता है। आचार्य जी ने कहा कि आजकल हिन्दू गाय कम तथा भैंस को अधिक पालते हैं। आचार्य जी ने कहा कि गाय का दूध सस्ता और भैंस का दूध गाय के दूध से महंगा बिकता है और फिर भी हिन्दू भैंस का दूध लेना पसन्द करते हैं। आचार्य जी ने गाय के दूध के गुणों को लोगों में प्रचारित करने को कहा। गाय का घृत खाने की आचार्य जी ने लोगों को सलाह दी। उन्होंने कहा कि गाय के दूध व घी को खाने से फैट, मोटापा या रक्त में कोलेस्ट्राल नहीं बढ़ता। मैं गाय का दूध पीता हूं और गाय का घी भी यथेष्ट खाता हूं। आचार्य जी ने बताया कि वह अपने परिवार के सभी सदस्यों को भी गाय का दूध पिलाते हैं। हम सब मन, मस्तिष्क और हृदय से शुद्ध, बलवान व स्वस्थ हैं। हमें कोई रोग नहीं हो सकता। आचार्य जी ने गाय के दूध व उससे बनी दही, मक्खन व घृत आदि के सेवन करने का प्रचार करने की सलाह दी।

वेदाचार्य डा. रघुवीर वेदालंकार जी ने कहा कि गाय मनुष्य की माता के समान मनुष्यों का उपकार व हित करती है। गाय माता से होने वाले उपकारों का प्रचार आर्यसमाज को करना चाहिये। उन्होंने कहा कि भूमि भी हमारी माता के समान है। वह अपने गोबर की अमृतोपम खाद के द्वारा अन्न व ओषधियुक्त वनस्पतियां प्रदान कर हमारा उपकार व पालन कर रही है। गाय का दूध हिन्दू व मुसलमान दोनों के लिए समान रूप से उपयोगी, हितकर व लाभप्रद है। इसका भी प्रचार किया जाना चाहिये। राष्ट्रीय पक्ष की चर्चा कर विद्वान आचार्य जी ने कहा कि गोमांस का निर्यात निरन्तर बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि गोमांस के निर्यात पर रोक लगनी चाहिये। उन्होंने इसके लिए आर्यसमाज को संघर्ष करने की सलाह दी। जब तक धर्म को कर्म रुप में परिणत नहीं किया जायेगा, कोई लाभ नहीं होगा। उन्होंने गोरक्षक विषयक वेद और ऋषियों के विचारों को आचरण में लाने की सलाह दी। आचार्य जी के पूछने पर लोगों ने हाथ उठाकर सहमति दी की वह भविष्य में गोमाता का ही दूध पीयेंगे और घी खायेंगे। आचार्य जी ने कहा कि गोमाता का दूध व घी आपको स्फूर्ति देगा और इससे आपके मस्तिष्क को लाभ होगा। यह आपको और आपकी सन्तानों को चिरजीवी बनायेगा।

आचार्य डा. रघुवीर वेदालंकार जी ने कहा कि गाय के दूघ में जो गुण हैं, वैसे गुण किसी अन्य पशु के दूध में नहीं हैं। आचार्य जी ने कहा कि दूध न देने वाली बूढ़ी गायों से होने वाले लाभों को आपको जानना चाहिये और उन की रक्षा में भी योगदान करना चाहिये। आचार्य जी ने कहा कि गाय पालिये और इसके दूध का घी बनाईयें। गाय का घृत भैंस के घृत से महंगा मिलता है। उन्होंने कहा कि छाछ भी अमृत के समान है। गाय का दूध अधिक हो तो उसे बेचिये मत, उसका घी बनाईये और स्वयं व परिवार को सेवन कराईये। अपने वक्तव्य को विराम देते हुए आचार्य डा. रघुवीर वेदालंकार ने कहा कि गाय से होने वाले आर्थिक लाभों को जानिये और उसका प्रचार कीजिये। यह कार्य बहुत जरुरी है।

गोरक्षा सम्मेलन को आर्यसमाज के प्रमुख व प्रसिद्ध दानवीर ठाकुर विक्रम सिंह जी ने भी सम्बोधित किया। ठाकुर विक्रम सिंह जी ने ऋषि भक्त महात्मा लट्टूर सिंह जी की चर्चा की। उन्होंने बताया कि उनका जन्म मोह खास ग्राम में हुआ था। उनका कद 6’2’’ था। वह प्रतिदिन 5 सेर दूध पीते थे। गाय के 5 सेर दूध की खीर खाते थे। रामपुर में उनका प्रवचन हो रहा था। अपने प्रवचन में उन्होंने कहा कि गाय के दूध में ताकत है मांस में नहीं। व्याख्यान में उपस्थित एक पहलवान मोहम्मद वली खां खड़ा हुआ। उसने कहा कि मैं गोमांस खाता हूं। उसने महात्मा जी को चुनौती दी कि फैसला हो जाये कि गाय के दूध में ताकत है या माय के मांस में। ठाकुर विक्रम सिंह जी ने कहा कि कायर व कमजोर आजादी के बाद पैदा हुए। पहले सब दण्ड बैठक करते थे। महात्मा जी कुश्ती लड़ने को तैयार हो गये। रामपुर के नवाब मुहम्मद शौकत अली वहां उपस्थित थे। तय हुआ कि आरपार की कुश्ती होगी। ठाकुर विक्रम सिंह जी ने बताया कि मुहम्मद वली खां विश्व प्रसिद्ध पहलवान गामा के जोड़ का पहलवान था। वह उससे कुश्ती लड़ चुका था। महात्मा जी के शरीर में गाय के दूध का बल व शक्ति थी। उन्होंने अपने से ज्यादा वजन के पहलवान को 3 मिनट की कुश्ती में अपने हाथो से ऊपर उठा लिया और उसे जमीन पर पटक दिया। तीन दिन बाद इस पहलवान की मृत्यु हो गयी। उसकी पसलियां टूट गयीं थीं। इससे गाय के दूध व उसकी शक्ति का अनुमान किया जा सकता है। ठाकुर विक्रम सिंह जी ने यह भी बताया कि महात्मा लट्टूर सिंह जी व आचार्य भीष्म जी उनके घर पर आया करते थे। ठाकुर विक्रम सिंह जी ने बताया कि गाय के दूध में अनेक गुण हैं। उन्होंने कहा कि उनके पुत्र व पुत्रियों की लम्बाई अपने माता-पिता से अधिक है। बच्चों की लम्बाई बढ़ाने के लिए उन्होंने बचपन से उन्हें गोदुग्ध का सेवन कराया है। उन्होंने अपने बच्चों को हृष्ट-पुष्ट रखने तथा उनकी लम्बाई आदि पढ़ाने के लिए उन्हें जन्म से ही देशी गाय का दूध व घृत का सेवन कराने की सलाह दी।

ठाकुर विक्रम सिंह जी ने बताया कि सन् 1966 में गोरक्षा आन्दोलन चला था। दिनांक 7 नवम्बर सन् 1966 को दिल्ली में पार्लियामेन्ट चौक पर एक विशाल सभा की गई थी। यहां पर आर्यसमाज के विद्वान नेता एवं सांसद स्वामी रामेश्वरानन्द सरस्वती जी का सम्बोधन हुआ था। उन्होंने सभा में कहा था कि सरकार को आज गोहत्या बन्द करनी होगी। उनके व अन्य नेताओं के निर्णय के अनुसार संसद को गोभक्तों ने चारों ओर से घेर लिया था। उन दिनों श्रीमती इन्दिरा गांधी प्रधानमंत्री थी। उस भीड़ पर बरबरतापूर्वक निहत्थे गोभक्तों व साधुओं पर गोलियां चलाई गईं। वहां पर 350 लाशों को गिना गया था। विद्वान वक्ता ने कहा कि आजादी के बाद से गोभक्तों के साथ ऐसा ही होता आ रहा है। उन्होंने श्रोता गोभक्तों को कहा कि 7 नवम्बर, 1966 के उस दिन को हमेशा याद रखना। ऋषि भक्त विद्वान ने गोमाता पर एक भावपूर्ण कविता का पाठ किया जिसका मुख्य भाव था कि गाय का पालन किया करों तभी गाय की रक्षा होगी। ओ३म् शम्।

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