logo

वेदों की देन है सत्य और अहिंसा का सिद्धान्त

( Read 17144 Times)

30 Mar, 18 13:50
Share |
Print This Page

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

आजकल सत्य और अहिंसा की बात बहुत की जाती है। वस्तुतः सत्य और अहिंसा क्या है और इनका उद्गम स्थल कहां हैं? इसका उत्तर है कि इन शब्दों का उद्गम स्थल वेद और समस्त वैदिक साहित्य है । वेद वह ग्रन्थ हैं जो सृष्टि की आदि में ईश्वर से मनुष्यों को प्राप्त हुए थे। वेद का अर्थ ज्ञान होता है। सत्य का अर्थ सत्तावान होता है। इसे इस प्रकार भी समझ सकते हैं कि जिस पदार्थ की सत्ता है, उसके गुण, कर्म व स्वभाव अवश्य होते हैं, उनका यथार्थ वा ठीक ठीक ज्ञान सत्य कहलाता है। ईश्वर की सत्ता है तथा जीवात्मा और प्रकृति की भी सत्ता है। अतः यह तीनों पदार्थ सत्य कहे व माने जाते हैं। इसी प्रकार ईश्वर तथा जीवात्मा और प्रकृति के जो गुण कर्म व स्वभाव उनका यथार्थ ज्ञान सत्य कहा जाता है। सत्य के बाद अहिंसा क्या है, इस पर विचार करते हैं। अहिंसा का अर्थ होता है नहीं+हिंसा अर्थात् हिंसा न करना। इसका भाव है कि दूसरों के प्रति वैर भावना का त्याग करना। हम दूसरों के प्रति हिंसा तभी करते हैं जब हमारा दूसरों के प्रति वैर भाव होता है या फिर हमारा निजी स्वार्थ होता है। हिंसा क्यों नहीं करनी चाहिये? इसका उत्तर है कि हम नहीं चाहते कि दूसरे लोग व प्राणी हमारे प्रति हिंसा करें। हिंसा जिसके प्रति की जाती है उसको हिंसा से दुःख व पीड़ा होती है। यदि हम चाहते हैं कि कोई हमारे प्रति हिंसा का व्यवहार न करे तो हमें भी दूसरों के प्रति हिंसा का त्याग करना होगा। इसके लिए हमें दूसरों के प्रति अपने मन व हृदय में प्रेम व स्नेह का भाव उत्पन्न करना होगा तभी हिंसा दूर हो सकती है। इससे हमारे मन व हृदय में शान्ति उत्पन्न होगी जिससे हमारा मन व मस्तिष्क ही नहीं अपितु शरीर भी स्वस्थ एवं दीघार्यु होगा। अतः हर उस व्यक्ति को दूसरे प्राणियों के प्रति अहिंसा का व्यवहार करना चाहिये जो दूसरों के द्वारा अपने प्रति हिंसा का व्यवहार करना पसन्द नहीं करता है। वेदों के आधार पर वेद मर्मज्ञ ऋषि दयानन्द ने एक नियम बनाया है जिसमें कहा गया है ‘सत्य के ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये।’ एक नियम यह भी है मनुष्य को अपना हर काम सत्य व असत्य का विचार करके करना चाहिये। सत्य का ग्रहण और उसका पालन ही सभी मनुष्यों का धर्म होता है। जो मनुष्य सत्य को नहीं जानता और सत्य का पालन व आचरण नहीं करता वह धार्मिक नहीं होता। धार्मिक तभी होता है कि जब वह असत्य व अज्ञान अर्थात् अविद्या का त्याग करे। जिस प्रकार अपने गंतव्य पर पहुंचने के लिए हमें उस गंतव्य की ओर जाने वाले मार्ग व साधनों का ज्ञान होना आवश्यक है, उसी प्रकार से मनुष्य जीवन को सफल करने के लिए भी सत्य का ज्ञान व उसका पालन आवश्यक होता है। कहा भी जाता है ‘सांच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप। जाके हृदय सांच है ताके हृदय आप।।’ अर्थात् सत्य से बढ़कर तप व धर्म नहीं है और झूठ से बढ़कर पाप नहीं है। इसके हृदय में सत्य विद्यमान है उसके हृदय में जानों ईश्वर विराजमान है। वेद सब सत्य विद्या के ग्रन्थ हैं। संसार में ऐसा कोई मत व पंथ नहीं है जो यह सिद्ध करे कि उसके मत व धर्म के ग्रन्थ पूर्णतया सत्य पर आधारित हैं। ऋषि दयानन्द ने अपने विश्व प्रसिद्ध व संसार की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक ‘सत्यार्थप्रकाश’ में सभी मतों की असत्य मान्यताओं को प्रस्तुत कर ज्ञान व विद्या के आधार पर उनकी समालोचना की है और सभी मतों में विद्यमान असत्य मान्यताओं को तर्क व प्रमाणों से सिद्ध किया है। अतः वेद, वेदानुकूल दर्शन, कुछ उपनिषद व सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थ ही सत्य विद्याओं के ग्रन्थ सिद्ध होते हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि वैदिक साहित्य के इन ग्रन्थों से ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृति सहित मनुष्य के कर्तव्यों व लक्ष्य का यथार्थ बोध होता है। दूसरों को पीड़ा देना अधर्म कहलाता है। कोई भी विवेकी मनुष्य व विद्वान इस कृत्य को उचित नहीं कह सकता। अतः मनुष्य हो या पशु-पक्षी, किसी को भी पीड़ा देना अधर्म व महापाप होता है। दूसरों को पीड़ा देना उनके प्रति हिंसा ही कही जाती है। इसका उपाय यह है कि हम स्वयं को अहिंसक स्वभाव व भावना वाला बनाये। ऐसा करने पर हम वस्तुतः मनुष्य बनते हैं। वेद मनुष्य को मनुष्य बनने की प्रेरणा व आज्ञा देते हैं। ‘मनुर्भव’ इस एक शब्द में ईश्वर ने वेद के द्वारा मनुष्य को मनुष्य बनने अर्थात् मननशील होकर सत्य का ज्ञान प्राप्त करने व उसका आचरण करने की प्रेरणा की है। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि हमें सबसे यथायोग्य व्यवहार करना चाहिये। यथायोग्य का अर्थ होता है जैसे को तैसा। यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो हम असत्य व हिंसक आचरण करने वाले मनुष्य का सुधार नहीं कर सकते। हमारे विरोध न करने से उसकी हिंसा की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा। इसका दोष हम पर ही होगा। मनुष्य को सुधारने के चार तरीके होते हैं साम, दाम, दण्ड और भेद। जो व्यक्ति सज्जन है उसे प्रेम से समझाया जा सकता है। यदि वह नहीं सुधरता तो कुछ दमन करना होता है। उस पर भी यदि वह न सुधरे और हिंसा का आचरण यदि करें तो फिर उसको दण्डात्मक हिंसा से ही सुधारा जा सकता है। अहिंसा का यह अर्थ कदापि नहीं होता कि कोई हमारे प्रति हिंसा का व्यवहार करें और हम मौन होकर उसे सहन करें। यदि ऐसा करेंगे तो हिंसक मनुष्य का स्वभाव और अधिक हिंसा वाला होगा और वह अन्य सज्जन लोगों को भी दुःख देगा। वेद हिंसक मनुष्य या प्राणियों के प्रति यथायोग्य व्यवहार की ही प्रेरणा देते हैं। गीता में कृष्ण जी ने भी कहा है कि ‘विनाशाय च दुष्टकृताम्’ दुष्टता करने वाले मनुष्य की दुष्टता को कुचल दो। ऐसा करके ही अहिंसा का पालन व सत्य की रक्षा अनेक अवसरों पर होती है। अतः मनुष्यों को अहिंसा का प्रयोग करते हुए विवेक से कार्य लेना चाहिये। यह भी कहा जाता है कि अहिंसा कायर लोगों का आभूषण होता है। कुछ सीमा तक यह बाद है भी ठीक। हमें एक सीमा तक ही लोगों का बुरा व्यवहार सहन करना चाहिये और यदि वह न सुधरे तो फिल उसका समुचित निराकरण यथायोग्य व उससे भी कठोर व्यवहार करके करना चाहिये। योगदर्शन की भी कुछ चर्चा कर लेते हैं। योगदर्शन वेदों का एक उपांग है। अष्टांग योग में योग का पहला अंग यम है। यम पांच होते हैं जो कि अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य व अपरिग्रह हैं। महाभारत से भी पूर्व व भारत में बौद्ध व जैन मत की स्थापना से भी हजारों व लाखों वर्ष पूर्व से हमारे योगी, ऋषि-मुनि व वैदिक धर्मी लोग अहिंसा व सत्य सहित पांचों यमों का पालन करते आये हैं। यह यम किसी एक मत के लिए नहीं अपितु यह सार्वजनीन हैं अर्थात् सभी मनुष्यों के पालन व आचरण करने योग्य हैं। सभी को इसे जानकर इसकी मूल भावना के अनुसार सेवन व आचरण करना चाहिये। इसी से मनुष्य जीवन शोभायमान होता है। ओ३म् शम्।

Source :
This Article/News is also avaliable in following categories : Chintan
Your Comments ! Share Your Openion

You May Like