काम दहन के साथ सात्त्विक उमंग, उल्लास का पर्व है होली - स्वामी संवित् सोमगिरिजी महाराज

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18 Mar 19
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काम दहन के साथ सात्त्विक उमंग, उल्लास का पर्व है होली - स्वामी संवित् सोमगिरिजी महाराज

बीकानेर (विवेक मित्तल) । मानव प्रबोधन प्रन्यास तथा श्रीमती शशिबाला मित्तल स्मृति चेरिटेबल ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित ‘होली-पर्व’ प्रपत्र का विमोचन श्रीलालेश्वर महादेव मन्दिर, शिवमठ, शिवबाड़ी के अधिष्ठाता स्वामी संवित् सोमगिरिजी महाराज के कर कमलों द्वारा हुआ। इसमें होली-पर्व से सम्बन्धित वैदिक, पौराणिक सन्दर्भ तथा आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक दृष्टिकोण लिए वर्तमान समय में सामाजिक प्रासंगिकता तथा होली पूजन एवं दहन विधि जैसे सारगर्भित जानकारी प्रकाशित की गई है जिसे आमजन में होली दहन से पूर्व वितरित कर होली के विषय में जनजाग्रति का कार्य किया जायेगा। इस अवसर पर स्वामी संवित् सोमगिरिजी महाराज ने अपने उद्बोधन के कहा कि भारतीय संस्कृति यज्ञमयी संस्कृति है, पर्यावरणीय संस्कृति है। सारा पर्यावरण स्थूल, सूक्ष्म और बीज रूप में एक यज्ञचक्र में संचालित है। मनुष्य के अलावा सभी प्राणी उस यज्ञचक्र के अनुसार अपनी जीवन अवधि पूर्ण करते हैं। केवल मनुष्य में यह क्षमता है कि वह अपने पूरे जीवन को दोष रहित बना कर सूक्ष्म स्तर तक सशक्त बनाकर इस विश्व यज्ञ में अपनी सहभागिता को निभाये। उसी का उत्कृष्ट प्रदर्शन होता है होली के पर्व में। वैदिक सन्दर्भ के अनुसार इसमें अष्टमूर्ति की कृपा से, पर्यावरण की कृपा से फसलें तैयार हो जाती हैं तो उन्हें अग्नि के माध्यम से समर्पित करके ही उस अन्न का उपयोग हमको करना चाहिए, यही वैदिक दृष्टि है। पौराणिक दृष्टि में होली का पर्व काम दमन का पर्व है। प्रत्येक प्राणी में कामना होती है। मनुष्य अपनी कामना को लेकर विश्व नियम का उल्लंघन कर सकता है। ऐसे विश्व नियम का उल्लंघन करने वाले काम को यह पर्यावरण स्वयं दण्ड देता है। उसी को शिव के तीसरे नेत्र से निकली हुई अग्नि किस प्रकार मुण्डमय दर्पित कामदेव को आग बना देती है, उसका यह होली का पर्व है। वैसी ही दूसरा प्रतीक है हिरण्यकशिपु प्रहलाद को मारता चाहता है, वह बहन होलिका जो आग से नहीं जलती थी उसकी गोद में भक्त प्रहलाद को बैठा कर आग लगाई जाती है पर भक्ति की अग्नि इतनी तीव्र होती है कि प्रदलाद उससे जलता नहीं है,  होलिका ही जल जाती है। जो ‘काम’ धर्म के विरूद्ध है उसे लोक-कल्याण की शक्ति दग्ध कर देती है। होली अपने मन के काम, क्रोध, लोभ, राग-द्वेष आदि दोषों को हटाने के साथ-साथ सात्त्विक उमंग, उल्लास व आनन्द को प्रकट करने का पर्व है। सामाजिक समरसता, छुआछुत, ऊँच-नीच, वर्ग-भेद व वर्ण-भेद से ऊपर उठकर सबको आत्मीय-दृष्टि से अपनाने के लिए है। इस अवसर पर स्वामी समानन्दगिरिजी, रमेश चन्द्र शर्मा, ख्यालीराम, विनोद कुमार शर्मा, घनश्याम स्वामी, मंजुलता शर्मा, डा. शशि गुप्ता, सुशीला व्यास, कैलाशचन्द्र शर्मा, विकास गुप्ता, नन्द किशोर भाटी, रामनारायण, प्रदीप देवड़ा सहित अनेक साधकगण उपस्थित थे।  


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