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संतों-महात्माओं की अस्मिता का दागी होना

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19 Jun, 18 20:36
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संतों-महात्माओं की अस्मिता का दागी होना
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ललित गर्ग-/एक तरफ भारत के धर्मगुरुओं, संतों और महात्माओं की तरफ संसार आशा भरी दृष्टि से निहार रहा है और दूसरी ओर उनकी अनैतिक, अधार्मिक एवं भोगवादी गतिविधियों ने स्तब्ध किये हुए है। मदन दाती महाराज पर यौन उत्पीडन का आरोप लगना हो या कथित पारिवारिक कलह के कारण भैय्यू महाराज की आत्महत्या की मामला-धर्मगुरुओं ने अपने अस्तित्व एवं अस्मिता को धुंधला दिया है, कलंकित कर दिया है। जिन्हें अणु से विराट के साथ या आत्मा से परमात्मा के साथ जोड़ने का सेतु मानते हैं, जिनका भारतीय चिन्तन एवं व्यवहार में विशिष्ट स्थान रहा है, उनके चरित्र पर दाग लगना, उनका बलात्कारी हो जाना, उनका व्यवसायी बन जाना, ऐसे दंश है, जिससे सम्पूर्ण धर्म एवं अध्यात्म का जगत शर्मसार हो गया है। समाज को जितनी हानि इन धार्मिक पाखंडियों एवं तथाकथित धर्मगुरुओं ने पहुंचाई है, उतनी तो अधार्मिकों ने भी नहीं पहुंचाई।
संतों के 13 प्रमुख अखाड़ों की शीर्ष संस्था अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने कई महत्वपूर्ण निर्णय लिये हैं, जिनमें मुख्य है कि वह धर्म-अध्यात्म क्षेत्र की विवाहित हस्तियों को संत का दर्जा नहीं देती। महंत नरेंद्र गिरि जी के अनुसार वर्तमान परिस्थितियों में सभी अखाड़ों द्वारा अपने महात्माओं की कार्यप्रणाली की जांच करवाना आवश्यक हो गया है। उन्होंने मदन दाती पर लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच करवाने के बाद उनके विरुद्ध कार्रवाई तथा इस बात को सुनिश्चित करने की मांग की है ताकि भविष्य में फिर कोई ऐसी घटना न दोहराए। लाखों लोगों द्वारा समादृत आध्यात्मिक व्यक्तित्वों का पतन किसी ज्यादा गहरी बीमारी की ओर इशारा करता है, जिसका इलाज आम लोगों की सजग भागीदारी से ही संभव हो पाएगा। धार्मिक संस्थाओं को भी इस मामले में कठोर कदम उठाने होंगे। क्योंकि विभिन्न धर्मों के संत, महात्मा और बाबाओं की आये दिन पोल खुल रही है, जो न केवल विस्मय में डाल रही है, बल्कि गहरी चिन्ता का सबब भी बन रही है। स्वामी प्रेमानंद, स्वामी सदाचारी, स्वामी भीमानंद, संत आसाराम, गुरमीत राम रहीम, नारायण साई, वीरेंद्र देव दीक्षित, नित्यानंद, कौशलेंद्र फलाहारी महाराज, मदन दाती (दाती महाराज) आदि के विरुद्ध बलात्कार के आरोपों से समाज स्तब्ध है, दुखी है।
भारत जैसी ऋषिप्रधान भूमि के लिए यह चिंतनीय प्रश्न है कि वर्तमान में गुरु अपनी गुरुता को क्यों छोड़ते चले जा रहे हैं? उनका आचरण और व्यवहार धर्म को भी लज्जित कर रहा है। भारत जैसे आध्यात्मिक देश में लाखों साधु संन्यासी और धर्मगुरु हैं, उनमें कुछ सरोवर के कमल की भांति निर्लिप्त हैं, वे समाज का पथदर्शन करते हैं, सम्यक् दिशाबोध देते हैं, सतत गतिशील रहने एवं जीवन को उच्च बनाने की प्रेरणा देते हैं। उनमें कुछ तथाकथित वेशधारी भी हैं जिनका जीवन आडंबर, प्रदर्शन, छल और कपट से युक्त हैं, उनकी सोच ऊंच-नीच के भेदों से जुड़ी है, ऐसी स्थिति में देश और समाज को जगाने का दायित्व किस पर रहेगा? समाज के तथाकथित धर्मगुरुओं की विडम्बनापूर्ण स्थिति से लगने लगा है कि धर्म भी एक तरह का उत्पाद हो गया है। उसकी भी एक इंडस्ट्री है, जिसमें कच्चा माल खरीदने के लिए पूंजी नहीं लगानी पड़ती, सिर्फ भगवा कपड़े पहनिए, कोई एक मूर्ति स्थापित कीजिए और लच्छेदार भाषा में औंधा-सीदा जो आता हो, बोलना शुरू कर दीजिए, आपका व्यापार चल पड़ेगा। बड़े साम्राज्य स्थापित होते ही आप आधी-अधूरी धार्मिकता को भी ताक पर रख दिजिये और जो मन में आये करते जाइये। चाहे बलात्कार हो, व्यभिचार हो, गरीब का शोषण हो, राजनीतिक में दखल हो या हिंसा फैलाना। यही कारण है कि अक्सर विभिन्न धर्मों के संत, महात्मा और बाबा यौन शोषण, भोगवादी गतिविधियों के आरोपों में संलिप्त पाए जाते रहे हैं। पिछले ही दिनों गाजियाबाद के एक मदरसे में 10 वर्षीय बच्ची से बलात्कार के मामले में एक मौलाना को गिरफ्तार किया गया जबकि एक अन्य घटना में नरेला में एक 70 वर्षीय मदरसा टीचर को एक 9 वर्ष की बच्ची के साथ जघन्य अपराध करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया।
अंधेनैव नीयमानाः यथान्धाः- मुण्डकोपनिषद् का यह सूक्त ऐसे ही अंधविश्वासों, ढ़ोंगी, भोगी और कदाग्राही लोगों को उन्मार्ग पर ले जाने वाले तथाकथित धर्मगुरुआंे की ओर संकेत कर रहा है। स्वामी विवेकानंद के अनुसार धर्मगुरु का वास्तविक काम है, आध्यात्मिक शक्ति का संचार करना, न कि बुद्धिवृत्ति या अन्य शक्ति को उत्तेजित करना। केवल शब्दाडम्बर के चक्कर में पड़ने वाले गुरु धर्म के मूल मर्म को खो बैठते हैं। उनके अनुसार गुरु का सबसे बड़ा वैशिष्ठ्य है-निष्पक्षता और उच्च चरित्र क्योंकि वाणी की अपेक्षा जीवन से जो निकलेगा, वह अधिक प्रभावी होगा। धर्म के क्षेत्र में गुरु का महत्वपूर्ण स्थान है। उनकी सत्संगति व्यक्ति के भीतर के अंधकार को दूर करती है। गुरु शिष्य के भीतर केवल ऊर्जा ही संप्रेषित नहीं करते, अपितु मस्तिष्क की धुलाई भी करते हैं। लेकिन आज शिष्यों से अधिक गुरुओं की धुलाई की आवश्यकता है।
महंत और मठाधीश धर्म के नाम पर गरीब लोगों को लूट रहे हें। उन्हें भेंट चढ़ाए बिना धर्म की आराधना नहीं हो सकती। किसी देवता की मूर्ति का दर्शन करना है तो पैसे चढ़ाओ, चांदी के रुपये चढ़ाओ, चांदी के छत्र चढ़ाओ, नारियल चढ़ाओ और कहीं-कहीं पर तो भैंसो और बकरियों की ही नहीं बल्कि इंसानों की बलि देना भी धर्म है। आज महंत और मठाधीश धर्म की कमाई से मौज कर रहे हैं, समाज में दुराचार और अनाचार फैला रहे हैं। धर्म का रूप विकृत हो गया है अतः समाज-सुधारक कहते हैं कि ऐसा धर्म दुनिया से उठ जाए तो मानव का महाकल्याण हो।
दुख के साथ कहना पड़ता है कि आज त्यागी गुरु कहां हैं? गुरु नाम धराने वालों के यदि कारनामे देखे जाएं तो आंखों में पानी आ जाएगा। उसे सुनने के लिए कान बहरे हो जाएंगे। जो गुरु त्याग का उपदेश करते थे, वे आज भोग करते हैं। हाय! अगर बाड़ भी ककड़ी को खाने लग गई तो उसकी रक्षा कौन करेगा? त्यागी जब हाथ पसारने लगें तो क्या त्याग का उपदेश भोगी देंगे? सच तो यही है कि आज भोगी ही उपदेश दे रहे हैं।
इतना ही नहीं, वे परस्पर कलह और छींटाकशी कर रहे हैं, एक-दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयत्न कर रहे हैं। मुझे बड़े खेद के साथ कहना पड़ता है कि दो विरोधी विचारधारा के राजनेता परस्पर मिल सकते हैं, शांतिपूर्वक विचार-विनिमय कर सकते हैं, किन्तु दो पंडित, दो धर्माचार्य नहीं मिल सकते। यदि कदाचित् मिलते भी हैं तो शांतिपूर्वक बातचीत नहीं कर सकते। अपने-अपने अहं और झूठी प्रतिष्ठा की ओट में लड़ते-झगड़ते हैं, कदाग्रह करते हैं। जब धर्मगुरु भी कलह, ईष्र्या और विद्वेष फैलायेंगे, तब इसका अर्थ हुआ कि पानी में आग लग गई हैं।
गृहस्थ संतों का मसला उतना गंभीर नहीं हैं, क्योंकि भारत के लगभग सारे प्राचीन ऋषि विवाहित जीवन बिताते थे और हाल तक गृहस्थ संतों का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। क्या कबीर को सिर्फ इस वजह से संत नहीं माना जाएगा कि वह गृहस्थ थे? या फिर गुरुनानक को, जिन्होंने अपने पुत्र श्रीचंद को गुरु पद इसलिए नहीं सौंपा, क्योंकि वह गृहस्थ आश्रम छोड़कर उदासीन हो चले थे? पिछले चार-पांच वर्षों में कुछेक बाबाओं और साध्वियों के बड़े घपलों में फंस जाने से भारतीय समाज में धर्म और अध्यात्म के स्तर पर भी बेचैनी देखी जा रही है। इस बेचैनी के वास्तविक कारणों को खोजना होगा। एक महत्वपूर्ण कारण तो धर्म का राजनीति में बढ़ता दखल भी है। इससे धर्मगुरुओं के काले-कारनामों पर परदा डाल दिया जाता है और कुछ लोग तो इसी का लाभ उठाने के लिये धर्मगुरु का चैला पहनने लगे हैं। ऐसे साधु-संतों को बेनकाब किया जाना जरूरी है। प्रयाग में आयोजित कुंभ में उठे महामंडलेश्वर विवाद के बाद से अखाड़ा परिषद ने अनियमितताओं के खिलाफ कदम उठाने शुरू किए हैं। जैसे, संतों की सूची जारी करना और बाकायदा नाम लेकर घोषित करना कि अमुक-अमुक व्यक्ति को संत न माना जाए। हमारे देश में साधु संस्था की गरिमामय परंपरा रही है, वह सांस्कृतिक धरोहर है, उसके उच्च आचार है, उस लक्ष्मण रेखा से बाहर निकलकर जब-जब वे मर्यादा का अतिक्रमण करें तो उसके विरोध में अंगुलिनिर्देश करना चाहिए, जिससे वह गलती अपना पांव न जमाए और साधु का आचरण प्रश्नचिन्ह न बने। वे अपने भक्तों को केवल खुश रखने की कोशिश न करके उन्हें जीवन-विकास की प्रेरणा दें। मठों, पीठों और मंदिरों का मोह छोड़कर भक्तों को नैतिक एवं चरित्रवान बनाने का प्रयत्न करें। उन्हें हर परिस्थिति में संतुलित और शांत रहने का उ
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