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“ईश्वर विश्व के मनुष्यादि सभी प्राणियों का महानतम न्यायधीश है”

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14 Mar, 18 12:54
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इस संसार में तीन शाश्वत सत्तायें हैं जिनके नाम हैं ईश्वर, जीव व प्रकृति। ईश्वर एक सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, अनादि, अजन्मा, नित्य, अविनाशी, अमर, सृष्टिकर्ता व जीवात्माओं को उनके कर्मानुसार जन्म-मरण आदि के द्वारा भोग अर्थात् सुख व दुःख प्रदान करने वाली निष्पक्ष, सक्षम, न्याय करने वाली व उसका पूर्ण रूप से पालन कराने वाली सत्ता है। ईश्वर ऐसी सत्ता है जो किसी एक जीवात्मा व प्राणी को भी छोटे से छोटा अपराध करने पर छोड़ती नहीं अपितु प्रत्येक प्राणी को उसके छोटे व बड़े सभी कर्मों का सुख व दुख रूपी फल अवश्यमेव प्रदान करती है। इसी विशेषता के कारण आदि काल से लेकर महाभारतकाल व उसके बाद भी विज्ञ व ज्ञानी मनुष्यजन अपने जीवन का आरम्भ गुरुकुलों में वेदों की शिक्षा से करते थे। वह वहां वेदों की भाषा संस्कृत का अध्ययन करते थे। ईश्वर, जीवात्मा, प्रकृति सहित सभी सांसारिक व्यवहारों को जान व समझ कर अपना जीवन ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना व त्याग भाव से संसार का भोग करने में बिताते थे। हमारे पूर्वज अपने पूर्व जन्मों का कर्म भोगते हुए श्रेष्ठ गुण, कर्म व स्वभाव को धारण करते थे और सात्विक कर्मों से अपने जीवनयापन हेतु आवश्यक सामग्री व पदार्थों को जुटाते थे। वह अधिक सुखों के भोग को न तो स्वयं के लिए आवश्यक मानते थे और न ही दूसरों को उनके अत्यधिक भोग करने की प्रेरणा ही करते थे। महाभारत काल तक ऐसी ही व्यवस्था देश में विद्यमान थी जिस कारण से देश में वर्तमान समय से अधिक सुख व समृद्धि का अनुमान किया जा सकता है।
ईश्वर को जानना मनुष्य के लिए अतीव आवश्यक है। ईश्वर को यथार्थ रूप में जान लेने पर मनुष्य पापों से बच जाता है और श्रेष्ठ गुण, कर्म व स्वभाव धारण कर देश व समाज की उन्नति सहित अपनी उन्नति भी करता है। संसार के तीन प्रमुख पदार्थों में जीवात्मा का स्थान दूसरे स्थान पर है। जीवात्मा भी अनादि, अनुत्पन्न, नित्य, अमर, अविनाशी, चेतन पदार्थ, एकदेशी, ससीम, अल्पज्ञ, जन्म-मरण के बन्धनों में फंसा हुआ एक सत्तावान पदार्थ है। जीवों की संख्या मनुष्यों की दृष्टि में अनन्त है परन्तु ईश्वर की दृष्टि में यह अनन्त न होकर सभी जीव सीमित ही कहे जा सकते हैं। अल्पज्ञ होने के कारण जीव अविद्या को प्राप्त हो जाता है जिसका परिणाम बन्धन अर्थात् जन्म व मरण के चक्र में फंसना होता है। जीवात्मा जब मनुष्य का जन्म लेता है तो अपनी अल्पज्ञता, सीमित ज्ञान व स्वभाव के अनुसार अच्छे व बुरे कर्म करता है। इन अच्छे व बुरे कर्मों का फल इसे संसार का एकमात्र न्यायाधीश ईश्वर अपने सर्वव्यापक व सर्वशक्तिमान स्वरूप से प्रदान करता है।
यह ध्यातव्य है कि मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है और उनके फल भोगने में ईश्वर की व्यवस्था के अन्तर्गत पराघीन होता है। ईश्वर सर्वव्यापक होने के साथ सर्वातिसूक्ष्म है जबकि जीवात्मा भी सूक्ष्म तो है परन्तु ईश्वर उससे भी सूक्ष्म है। इस अति सूक्ष्मता के कारण ईश्वर जीवात्मा के भीतर भी विद्यमान रहता है। ईश्वर सर्वज्ञ है अतः वह जीव के भीतर उठने वाले संकल्प व विकल्पों सहित उसकी बाह्य सभी अच्छी व बुरी चेष्टाओं को भी जानता है। यह ऐसा ही है कि जैसे हम अपनी आंखों से अपने सामने होने वाले लोगों व उनके कार्यों को देखते हैं, उनकी बातों को सुनते हैं, उनसे वार्तालाप करते हैं और उनसे विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। ईश्वर भी हमारी आत्मा के भीतर व बाहर व इस जगत में सर्वव्यापक होने के कारण सभी जीवों के सभी कार्यों चाहे वह रात्रि में एकान्त में ही क्यूं न करें, भली प्रकार से जानता है। ईश्वर को जीवों के कर्मों के लिए दूसरों की साक्षी की भी आवश्यकता नहीं होती। वह अपनी सर्वव्यापकता से सब जीवों के हर क्षण व हर पल के सभी कर्मों का साक्षी होता है। ईश्वर सभी जीवों के कर्मों के अनुसार उन्हें अच्छे कर्मो के लिए प्रसन्नता व सुख देकर प्रोत्साहित करता है और अपराध करने वाले दुष्ट प्रवृत्ति के मनुष्यों को दुःखरूपी दण्ड देकर उन्हें पापों से विमुख करने की शिक्षा व प्रेरणा भी करता है।
हम यह भी जानते हैं कि मनुष्य का शरीर अविनाशी नहीं है। यह लगभग 100 वर्षों तक ही जीवित रह सकता है। इस आयु तक आते आते अधिकांश मनुष्यों की मृत्यु हो जाती है। बहुत से लोग अनेक कारणों से रोग व दुर्घटना आदि होने से पहले भी मृत्यु का ग्रास बन जाते हैं। मृत्यु के आने पर मनुष्यों के जो अच्छे व बुरे कर्म बिना भोगे हुए रह जाते हैं, उन बचे हुए कर्मों के अनुसार ईश्वर उन-उन जीवात्माओं के जाति, आयु और भोग निर्धारित कर उन्हें भिन्न भिन्न प्राणी योनियों में जन्म देता है। इस न्याय प्रक्रिया को पूरा करने के कारण ईश्वर संसार का एक अनोखा न्यायाधीश सिद्ध होता है। वेदों में आये ‘अर्यमा’ शब्द से ईश्वर का न्यायाधीश होना ही बताया गया है। विद्वान मनुष्य जानते हैं कि यदि हम एक छोटे से छोटा अनुचित कर्म करेंगे तो हमें ईश्वर की व्यवस्था से उसका दण्ड वर्तमान व भविष्य के अनेक जन्मों में भोगना पड़ सकता है। इसलिये वेद के विद्वान वा धार्मिक लोग परोपकार एवं दान आदि श्रेष्ठ कर्म करते हुए अपना अधिकांश समय ईश्वर को जानने व उसकी स्तुति, प्रार्थना व उपासना आदि में ही लगाते हैं क्योंकि विवेक से वह जान चुके होते हैं कि इसी से उनकी इस जन्म व परजन्म में उन्नति व सुख व शान्ति की प्राप्ति होगी।
आज का युग ज्ञान विज्ञान का युग होते हुए भी ईश्वर व जीव के ज्ञान की दृष्टि से अविकसित व अवनत युग ही कहा जा सकता है। आज भौतिक विज्ञानियों ने भौतिक उन्नति करते हुए मनुष्यों की सुख सुविधाओं की अनेक वस्तुयें बनाई हैं परन्तु इन वस्तुओं से मनुष्य ईश्वरोपासना, अग्निहोत्र, मातृ-पितृ की सेवा व पूजन, सभी प्राणियों के प्रति प्रेम व अहिंसा का भाव, सबसे समानता व प्रेम का भाव रखने व अन्याय व शोषण से मुक्त जीवन बनाने में आज भी बहुत पीछे व दूर है। इसका परिणाम उसके जीवन के अन्तिम समय व परजन्म में बुरा ही होना है, ऐसा वेद आदि शास्त्रों का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है। अतः सभी मनुष्यों का कर्तव्य है कि वह अपने जीवन में वेद आदि प्राचीन आर्ष ग्रन्थों सहित सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों का भी अध्ययन व स्वाध्याय करें और ईश्वर, प्रकृति, माता-पिता, समाज एवं देश के प्रति अपने कर्तव्यों को जानकर उसका पालन करें। ऐसा करके ही मनुष्य इस जन्म व परजन्म में उन्नति कर सकते हैं अर्थात् सुखी रह सकते हैं। हमने यहां संकेत मात्र किया है। किसी अच्छी सलाह को मानना या न मानना प्रत्येक मनुष्य का अपना अधिकार है। जो उचित सलाह को मान लेते हैं वह भविष्य में लाभ प्राप्त करते हैं अन्य नहीं।
हमें हमारा यह मनुष्य जन्म हमें अपने पूर्व जन्मों के कर्मों अर्थात् प्रारब्ध के आधार पर मिला था। अन्य प्राणियों को भी उनके उनके प्रारब्ध के अनुसार मिला है। आगे भी यही परम्परा चलनी है। वृद्धावस्था पूर्ण होने पर हमारी व अन्य सभी की मृत्यु होनी है। उसी के आधार पर हमारी परजन्म की योनि अर्यमा-न्यायाधीश परमेश्वर करेगा। अतः हम ज्ञान व कर्म का अपने जीवन में समन्वय कर पापों से बचते हुए उन्नति को प्राप्त हों। हमें ईश्वर के न्याय में विश्वास रखना चाहिये। आज कोई ईश्वर व आत्मा को भूल कर व भुलाकर चाहे कितना ही अन्याय व शोषण कर लें, उसका भविष्य निश्चय ही खराब होगा। यही वेदादि ग्रन्थों का सार है। ईश्वर न्यायकारी होने से सर्वश्रेष्ठ न्यायाधीश है। कोई उसके न्याय से बच नहीं सकता। छोटे से छोटे कर्म का भी फल उसके करने वाले जीवात्मा को जन्म जन्मान्तर में भोगना ही होगा। किसी मनुष्य व प्राणी का कोई कर्म ईश्वर से छुप नहीं सकता। वह हर काल में हर जीव के कर्मों को देखता व उसे हमेशा स्मरण रखता है। बुरे कर्मों का परिणाम दुःख ही है। जो मनुष्य दुःख भोगना नहीं चाहते उन्हें आज ही बुरे कर्म करने छोड़ देने चाहिये और परोपकार व दान सहित ईश्वरोपासना व यज्ञीय कार्य अधिक से अधिक करने चाहियें। इति ओ३म् शम्।


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