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ब्रह्मचर्य व ऋषित्व से वेदों पर लगी कालिमा को धो दिया

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09 Jun, 18 11:21
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ब्रह्मचर्य व ऋषित्व से वेदों पर लगी कालिमा को धो दिया
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श्रीमद्दयानन्द आर्ष ज्योतिर्मठ गुरुकुल, देहरादून के वार्षिकोत्सव में दिनांक 1 जून, 2018 को सायं आयोजित वेद-वेदांग सम्मेलन में वैदिक विद्वान आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय द्वारा दिए गए व्याख्यान को प्रस्तुत कर रहें हैं।

व्याख्यान के आरम्भ में आचार्य वेद प्रकाश श्रोत्रिय जी ने कहा कि ऋषि दयानन्द के आने से पूर्व वेद की दुर्दशा हो रही थी, उसे उन्होंने दूर किया। वैदिक विद्वान श्रोत्रिय जी ने अपने मन की कल्पना प्रस्तुत करते हुए कहा कि वह वेद के गौरव को न तो गिरने देंगे और न ही ऋषि दयानन्द के यश को कम होने देंगे। महर्षि दयानन्द ने अपने ब्रह्मचर्य के तप व वेदों के ऋषित्व को प्राप्त कर वेदों के नाम पर लगी कालिमा को धो दिया है। अब वेद पर कोई वेद विरोधी व अज्ञानी दुबारा कालिमा लगाने की कोशिश नहीं कर सकता। आचार्य जी ने 2 बीजों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा वेदों की उत्पत्ति वा वेदों का प्रकाश करते हैं। वृक्ष की आकृति की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वृक्ष की जड़ नीचे भूमि के भीतर होती है। उसका तना होता है, शाखायें होती हैं व उसके पत्र व पुष्प आदि होते हैं। इनसे मिलकर वृक्ष बनता व कहलाता है। वृक्ष का आधार उसका बीज होता है अथवा यह कह सकते हैं कि जो वृक्ष होता है वह साकार होने से पूर्व बीज में समाहित होता है। यह समस्त वृक्ष अपने बीज में समाया हुआ होता है। सूर्य, चन्द्र व पृथिवी आदि मूल प्रकृति रूपी बीज से उत्पन्न होती हैं जिसे सृष्टि रूपी वृक्ष की शाखायें कह सकते हैं। बीज रूपी मूल प्रकृति अव्यक्त होती है।

विद्वान आचार्य ने कहा कि जैसे जैसे यह सृष्टि बनती है वैसे वैसे ज्ञान का वृक्ष बनता है। उन्होंने कहा कि ज्ञान रूपी वृक्ष की शाखाओं को केवल योगी ही देख सकता है। ऋषि दयानन्द ने उसे देखा तो उन्हें वेद ज्ञान की 1127 शाखायें दिखीं। ज्ञान का बीज ईश्वर ही है। आचार्य वेद प्रकाश श्रोत्रिय जी ने बीज का उल्लेख किया और कहा कि उसमें अग्नि घुसती है, केन्द्र बनता है, गति उत्पन्न होती है, उसका व्यास बनता है, मण्डल बनता है आदि। विद्वान आचार्य जी ने कहा कि वृक्ष का पूरा स्वरुप बीज व उसके केन्द्र में समाहित होता है। अग्नि सदा भूखी रहती है। यह समस्त सृष्टि और वेद ज्ञान विषयक सभी शब्द, उनके अर्थ व सम्बन्ध ईश्वर के ज्ञान में सृष्टिकाल व प्रलयकाल दोनों में रहते हैं। आचार्य जी ने कहा कि ज्ञान उत्पन्न नहीं होता। आचार्य जी ने उदाहरण से समझाते हुए कहा कि गायक अपने गीत के अनुसार बाजा, हारमोनियम, ढोलक, तबला आदि, बजाता व बजवाता है। उन्होंने कहा कि बाजे में हिम्मत नहीं कि गायक के गीत की आवश्यकता कुछ और हो और बाजा स्वतः कुछ और धुन बजाये। श्रोत्रिय जी ने कहा कि गायक गीत के आधार पर बाजे को बजाता है और बाजा उसी के अनुसार बजता है। बाजा वैसा ही बजता है जैसा गायक बजाता है व जैसा वह चाहता है। उन्होंने कहा कि जब प्रलय हुई थी तब सृष्टि में कई योगी व ऋषि आदि वेदों के विद्वान थे। प्रलय होने पर वह सब सो गये थे। प्रलय काल समाप्त होने बाद प्रलयरूपी रात्रि समाप्त हुई, ईश्वर ने नई सृष्टि को उत्पन्न किया तथा सो रहे ऋषियों व योगियों की निद्रा समाप्त हुई। सृष्टि पूरी बन जाने पर वह जागे। सृष्टि के आरम्भ काल में परमात्मा से वह ऋषि व योगी अमैथुनी सृष्टि के द्वारा पैदा हुए।

वैदिक विद्वान आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय ने कहा कि मनुष्य योनि में जीवात्मा के किये हुए कर्म कभी नष्ट नहीं होते। उन्होंने कहा कि परमात्मा गायक है और ऋषि व योगी उसका बाजा व वाद्य यन्त्र हैं। विद्वान वक्ता ने उपमालंकार की सहायता से वेदोत्पत्ति को समझाया। उन्होंने कहा परमात्मा गायक है और ऋषि मुनि व योगी उसका बाजा हैं। परमात्मा ने जैसा गीत गाया वैसा ही स्वरोच्चारण ऋषि व योगी जनों ने बाजे की तरह से किया। श्रोत्रिय जी ने कहा कि परमात्मा ने सृष्टि के आरम्भ में ऋषियों को बोलने की प्रेरणा की। आचार्य जी बोले ‘अहमेव स्वयं वदामि’ परमात्मा कहता है कि मैं ही बोलता हूं। इसके बाद आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय ने ब्रह्मा जी को वेदज्ञान की प्राप्ति व उसके प्रथम गुरु होने की चर्चा की। उन्होंने कहा कि राम ने जनक की सभा में धनुष को तोड़ा। वहां उपस्थित परशुराम उन पर चढ़ बैठे। लक्ष्मण ने परशुराम को कहा कि आप क्रोध क्यों कर रहे हो? धनुष के टूटने में राम की गलती नहीं है। राम ने तो धनुष को छुआ ही था। यह धनुष राम के छुने से ही टूट गया। श्रोत्रिय जी ने कहा कि राम में बल था। वह विश्वामित्र के यहां पढ़े थे। राम ने कर्म किया। उन्होंने कहा कि तुलसी दास जी ने यहां अतिश्योक्ति अलंकार का सहारा लेकर उस समय के भाव का वर्णन किया है।

आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय ने कहा कि सृष्टि की उत्पत्ति भाव व कर्म दोनों के आधार व कर्त्ता ईश्वर ने की। आचार्य जी ने ब्रह्मचर्य की महत्ता पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वेदों का ज्ञान हमेशा यथार्थ ही रहता है। यह समस्त पृथिवी व ब्रह्माण्ड के वेद ज्ञान के अनुसार ही बनी है। संसार व वेद ज्ञान में परस्पर एकता है, कहीं विरोध नहीं है। वेद ज्ञान से ही हम संसार को यथार्थ रूप में जान सकते हैं। आचार्य जी ने एक राजा, उसके वृद्ध बीमार हाथी और प्रजाजन सेवक का एक वृतान्त भी सुनाया। राजा ने उस ने व्यक्ति को कहा था कि हाथी मर जाये तो मुझे सूचना देना। राजा उस व्यक्ति को फांसी पर चढ़ायेगा। कुछ दिनों बाद हाथी मर गया। वह व्यक्ति राजा के पास आया। राजा ने पूछा तो वह कहता है कि हाथी ठीक है पर वह उठता बैठता नहीं, कभी कहता है कि वह कुछ खाता नहीं, फिर कहता है कि वह कई दिनों मल-मूत्र भी विसर्जन नहीं कर रहा है। अन्त में कहता है कि हाथी तो ठीक है पर उसकी सूंढ में चींटिया चल रही हैं। राजा को गुस्सा आता है और उस व्यक्ति को कहता है कि तू कहता क्यों नहीं कि हाथी मर गया है। वह व्यक्ति कहता है कि महाराज आपने ही कहा है कि हाथी मर गया, यह शब्द मेरे नहीं है। यह मैंने नहीं कहा, महाराज आपने कहा है। मैं यह शब्द नहीं कह सकता। इस संवाद में हमें वह साधारण व्यक्ति व्यवहार कुशल व अपने जीवन की रक्षा करता हुआ दिखाई देता है। राजा अपने ही जाल में फंस जाता है। जो बात उस व्यक्ति को कहनी थी वह उसे स्वयं कह देता है।

अपने व्याख्यान को विराम देते हुए आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय जी ने कहा कि जब आचार्य अपने ब्रह्मचारी को वेद ज्ञान और विद्या से सम्पन्न देखता है तो उसे अतीव प्रसन्नता होती है। उन्होंने गुरुकुल के ब्रह्मचारियों को कहा कि तुम अपने आचार्य और इस गुरुकुल की भूमि को मत भूलना। जीवन भर वेद धर्म का पालन और वेद, धर्म और संस्कृति की रक्षा करना। वेद वेदांग सम्मेलन के अध्यक्ष डा. यज्ञवीर ने अपने निष्कर्ष में डा. रघुवीर वेदालंकार और आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय जी के ज्ञान से पूर्ण व्याख्यानों की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि श्रोत्रिय जी ने सृष्टि व ज्ञान के बीज की चर्चा की है। आचार्य यज्ञवीर ने पं. सत्यपाल पथिक जी के भजनों की भी प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि शास्त्र के अनुसार आततायी को मारने में दोष नहीं है। इसी के साथ वेद वेदांग सम्मेलन समाप्त हुआ। ओ३म् शम्।

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