जैविक खेती से ही खाद्यान्न की गुणवत्ता में वृद्धि संभव

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27 Jun 19
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जैविक खेती से ही खाद्यान्न की गुणवत्ता में वृद्धि संभव

 

उदयपुर। खेती में निरंतर बढते रासायनिक खाद और पेस्टीसाईड के अधिकाधिक उपयोग ने कृषि को जीवन के आधार की जगह व्यावसायिक रूप दे दिया हैं। जिसके दुश्परिणामों से हम बच नहीं सकते। रासायनिक उर्वरको एवं कीट नाषक दवाओं ने उच्च रक्तचाप , हार्टअटेक ,कैंसर एवं किडनी रोग जैसे प्राणघातक रोगों का जानलेवा उपहार न चाहते हुए भी झेलने हेतु आम आदमी मजबूर हैं। खेती के इस स्वरूप को बदलने की जरूरत हैं। जैविक खेती को प्रोत्साहन और जैविक उत्पादों के उपभोग से ही जैविक कृषि संस्कृति विकसित करना ही एकमात्र विकल्प हैं। यह विचार आज कट्स इंटरनेषनल जयपुर एवं प्रयत्न समिति उदयपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित प्रेसवार्ता में बोलते हुए कट्स क धर्मेन्द्र ने व्यक्त किए। इससे पूर्व प्रयत्न समिति के अनिल व्यास ने प्रेस वार्ता में अतिथियों को स्वागत करते हुए कट्स एवं प्रयत्न समिति द्वारा जैविक खेती के प्रेात्साहन हेतु किए जा रहे प्रयासों पर जानकारी दी। कट्स की निमिशा गौड ने विशय विषेशज्ञ के रूप में बोलते हुए जैविक उत्पादन एवं उपभोग की सतत जीवन षैली संस्कृति को बढावा देने की जरूरत पर जोर दिया और किसानों, स्वैच्छिक संगठनों में जागरूकता के साथ-साथ सरकारी कृषि नीति में जैविक खेती को प्रोत्साहन की जरूरत बता*ं। उन्होंने कहा कि कृषि नीति में खाद्यान्न उत्पादन हेतु अधिकाधिक जोर रासायनिक खाद एवं कीटनाषक दवाओं के इस्तेमाल पर ज्यादा ध्यान केदि्रंत हैं यही कारण हैं की सरकार २.६ लाख करोड की सब्सिडी रासायनिक खाद एवं कीटनाषक दवाओं पर कृषि बजट में देती आ रही हैं। परम्परागत रूप से भारतीय कृषि जैविक खाद पर निर्भर रही हैं। पर आज भारतीय कृषि भूमि की ५७.८ मिलियन हेक्टर भूमि पर किसान रासायनिक खाद और कीटनाषक दवाओं का इस्तेमाल कर रहें हैं और मात्र २.५९ प्रतिषत हेक्टर भूमि पर ही जैविक खेती की जा रही हैं। भारत जैसे देष में जैविक कृषि को बढावा देने हेतु सरकार को जनपक्षीय नीतिगत बदलाव पर ध्यान देने की जरूरत हैं। प्रयत्न समिति के सचिव मोहन डांगी ने पत्रकार वार्ता में कहा कि वर्तमान कृषि व्यवस्था न केवल स्वास्थ्य के लिए घातक है अपितु रासायनिक उर्वरकों, कीटनाषकों ने मिट्टी के स्वास्थ्य को भी खराब करने का काम किया हैं। जमीन के पोशक तत्वों की कमी ने मिट्टी की उपजाऊ षक्ति को कम कर दिया हैं। अब जरूरत हैं कि हम पुनः परम्परागत खेती के संरक्षण पर ध्यान दें। डांगी ने कट्स एवं प्रयत्न द्वारा किए जा रहे प्रयासों पर बताया कि वर्मी कम्पोस्ट, जीवामृत, परम्परागत कृषि विकास योजना, किसानों को जैविक कृषि अपनाने हेतु जागरूकता कार्यक्रम, प्रषिक्षण, क्षमतावर्धन कार्यक्रमों ,विद्यालयों में जैविक उद्यान की स्थापना, षैक्षणिक भ्रमण, बीज बैंक की स्थापना जैसे कार्यक्रमों के बारे में बताया। पत्रकार वार्ता के दौरान दर्पण छाबडा भा मौजूद थे।


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