logo

सदियों तक सुनाई जायेगी जिनकी कहानी वे है-महाराणा प्रताप

( Read 24933 Times)

16 Jun 18
Share |
Print This Page

सदियों तक सुनाई जायेगी जिनकी कहानी वे है-महाराणा प्रताप डॉ. प्रभात कुमार सिंघल-लेखक एवं पत्रकार, कोटा/ स्वाभिमानी, देषभक्त, वीरयोद्धा, हौंसले का धनी, घास की रोटी खाकर जिन्दा रहने तथा दोबारा मेवाड राज्य का आधिपत्य स्थापित करने वाले महाराणा प्रताप राश्ट्र नायक के रूप में इतिहास और दुनिया में अमर हो गये। महाराणा प्रताप के समय में जब मुगल षासक राजपूताने के राज्यों को अपने साम्राज्य का हिस्सा बना रहे थे, उस समय अनेक राजपूत षासकों ने मुगल षासक से विविध प्रकार संधि व समझौते कर लिए और नतमस्तक हो गये। ऐसे वातावरण में मेवाड के षासक महाराणा प्रताप किसी भी प्रकार से अकबर के सामने नहीं झुके। अकबर ने चार बार संधि के लिए दूत भेजे परन्तु स्वाभिमानी प्रताप ने संधि के बदले या अकबर के सामने झुकने की जगह युद्ध को चुन कर स्वाभिमान और देषभक्ति का परिचय दिया।
महाराणा प्रताप अकबर की सेना से युद्ध करने पर कायम रहे और इसी का परिणाम ”हल्दीघाटी युद्ध“ के रूप में सामने आया। एक ओर महाराणा प्रताप की सेना थी तो दूसरी ओर मानसिंह के नेतृत्व में मुगलों की सेना थी। मुगलों की सेना में जहां युद्ध कोषल में दक्ष सेनिक तलवारों आदि से लेस थे वहीं प्रताप की सेना में भील धनुशबाण लेकर मुकाबले को तैयार थे। मुगल सेना हाथियों पर तो प्रताप की सेना घोडो पर युद्ध लडी। पहाडी क्षेत्र होने व हल्दीघाटी का एक सकरा रास्ता होने के स्थान पर एक ओर प्रताप की सेना थी, वहीं दूसरी ओर मुगलों की सेना थी। यह रास्ता इतना तंग था कि कई लोग एक साथ इस रास्ते से नहीं निकल सकते थे।


हल्दीघाटी के युद्ध को “राजस्थान का थर्मोपोली” कहा जाता है। इस युद्ध में जहां प्रताप की सेना में कुल २० हजार सैनिक थे वहीं मुगल सेना ८५ हजार सैनिक थे। मुगलों की इतनी बडी सेना को देखकर भी प्रताप ने हार नहीं मानी और स्वतंत्रता के लिए संघर्श किया। यह युद्ध १८ जून १५७६ इस्व में लडा गया। मुगलो की सेना राजामानसिंह और आसफ खाँ के नेतृत्व में लडी। मुगलों के पास जहां सैन्य षक्ति अधिक थी वहीं प्रताप के पास जुझारू षक्ति का बल था। भीशण युद्ध में दोनों तरफ के योद्धा घायल होकर जमीन पर गिरने लगे। प्रताप अपने स्वामीभक्त घोडे चेतक पर सवार होकर षत्रु की सेना में मानसिंह को खोजने लगे। युद्ध में चेतक ने अपने अगले दोनों पैर सलीम (जहांगीर) के हाथी की सूंड पर रख दिये। प्रताप के भाले से महावत मारा गया और सलीम भाग खडा हुआ। महाराणा प्रताप को युद्ध में फंसा हुआ देखकर झाला सरदार मन्नाजी आगे बडा प्रताप के सिर से मुकुट उतार कर स्वयं अपने सिर पर रख लिया और तेजी से कुछ दूरी पर जाकर युद्ध करने लगा। मुगल सेना उसे ही प्रताप जानकर उस पर टूट पडे और प्रताप को युद्ध भूमि से दूर जाने का अवसर मिल गया। उनका पूरा षरीर अनेक घावों से लहुलुहान हो चुका था। स्वामीभक्त घोडा चेतक २६ फीट लम्बे नाले को पार कर गया और अपने स्वामी के प्राण बचाये। इस प्रयास में चेतक की मृत्यु हो गयी और प्रताप के भाई षक्तिसिंह ने उन्हें अपना घोडा दिया। प्रताप यहां से जंगलो की ओर निकल पडे। यह युद्ध केवल एक दिन चला परन्तु इस युद्ध में १७ हजार लोग मारे गये।
जिस समय १५७९ से १५८५ तक मुगल अधिकृत प्रदेषों उत्तरप्रदेष, बंगाल, बिहार और गुजरात में विद्रोह हो रहे थे उसी समय महाराणा प्रताप फिर से मेवाड राज्य को जीतने में जुट गये। अकबर अन्य राज्यों के विद्रोह दबाने में उलझा हुआ था जिसका लाभ उठाकर महाराणा ने भी मेवाड मुक्ति के प्रयास तेज कर दिये और उन्होंने मेवाड में स्थापित मुगल चौकियों पर आक्रमण कर उदयपुर सहित ३६ महत्वपूर्ण स्थानों पर अधिकार कर लिया। महाराणा प्रताप ने जिस समय सिंहासन ग्रहण किया। उस समय सम्पूर्ण मेवाड की भूमि उनकी सत्ता फिर से कायम हो गयी थी। यह युग मेवाड के लिए स्वर्ण युग बन गया। उन्होंने चावण्ड को अपनी नई राजधानी बनाया और यहीं पर उनकी मृत्यु हो गयी। उनकी मृत्यु सुनकर अकबर ने भी उनकी षूरवीरता की प्रषंसा की और उसकी आंख में आंसू आ गये।
महाराणा प्रताप का जन्म कुभंलगढ दुर्ग में हुआ था। उनकी माता जैवन्ताबाई पाली सोनगरा अखैराज की बेटी थी। बचपन में प्रताप को कीका के नाम से पुकारा जाता था। इनका राज्याभिशेक गोगुन्दा में हुआ। विभिन्न कारणों से प्रताप ने ११ विवाह किये। महाराणा प्रताप से सम्बंधित सभी स्थलों पर स्मारक बनाये गये है।
हल्दीघाटी में घोडे चेतक का स्मारक भी बनाया गया है तथा एक पहाडी पर महाराणा प्रताप स्मारक के साथ-साथ इसकी तलहटी में एक निजी ट्रस्ट द्वारा आकर्शक प्रताप संग्रहालय स्थापित किया गया है। प्रताप के जीवन से जुडी तमाम घटनाओं को इस संग्रहालय में मॉडल, झांकी एवं चित्रों द्वारा बखूबी दर्षाया गया है। यहां प्रताप के जीवन से सम्बंधित एक लघु फिल्म भी दर्षकों को दिखाई जाती है। उदयपुर के सिटी पैलेस में बनी प्रताप दीर्घा में महाराणा प्रताप का ८१ किलो का भाला, ७२ किलो का छाती का कवच, ढाल, तलवारों सहित अन्य स्मृतियां देखने को मिलती है।



Source :
This Article/News is also avaliable in following categories : Headlines , Education
Your Comments ! Share Your Openion

You May Like