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“वेदों की रक्षा और स्वाध्याय क्यों करें?”

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16 Feb 18
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-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।
मनुष्य उसी वस्तु की रक्षा करता है जिसका उसके लिए कोई उपयोग हो व जिससे उसे लाभ होता है। वेद सृष्टि की प्राचीनतम ज्ञान की पुस्तकें हैं। इसमें मनुष्य जीवन के लिए उपयोगी, तृण से लेकर ईश्वर पर्यन्त, सभी पदार्थों का ज्ञान उपलब्ध है। वेदों की भाषा भी संसार की आदि भाषा है। अन्य सभी भाषायें समय समय पर और संसार के अनेक स्थानों पर मनुष्यों के फैलने पर अनेक कारणों से वहां अपभं्रंस आदि होकर बनी हैं। वेदों की भाषा संसार की सभी भाषाओं की जननी है। वेदों के अर्थ महर्षि पाणिनी की अष्टाध्याय व महाभाष्य आदि व्याकरण ग्रन्थों सहित निरुक्त और निधण्टु आदि ग्रन्थों की सहायता से जाने जाते हैं। संसार में व्याकरण के जितने भी ग्रन्थ हैं, उनमें पाणिनी की अष्टाध्यायी को व्याकरण का सर्वोत्तम ग्रन्थ सभी विद्वान भाषाविद् स्वीकार करते हैं। वेदों के पद भी रूढ़ न होकर घातुज व यौगिक हैं। व्याकरण की सहायता से वेदों के पदों के एकाधिक अर्थ होते हैं जिसे प्रकरणानुसार ग्रहण किया जाता है। महाभारत काल पर्यन्त भारत सहित संसार के सभी देशों में वेदों का ही मानव मात्र के धर्म ग्रन्थ के रूप में प्रचार प्रसार रहा है। सभी वेदों द्व़ारा प्रदर्शित मार्ग पर चलते थे।

वैदिक युग में ज्ञान विज्ञान अपनी चरम सीमा तक उन्नत था। ऐसे संकेत प्राचीन अनेक ग्रन्थों के आधार पर उपलब्ध होते हैं। महाभारत व उससे पूर्व काल में वेद सर्वमान्य धर्म ग्रन्थ सहित मनुष्यों के आचार विचार व व्यवहार के ग्रन्थ थे। वेदों में सभी सत्य विद्यायें विद्यमान हैं। वेदों के अपूर्व व अद्वितीय विद्वान ऋषि दयानन्द की मान्यता है कि वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तक है। इसलिये वेदों को सभी मनुष्यों को पढ़ना चाहिये। सभी मनुष्यों का परम धर्म भी वेद है। जो मनुष्य वेद का स्वाध्याय करता है और वेद की शिक्षाओं का आचरण करता है वह जीवन में उन्नति करता है और उसे धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति होती है। वेद पढ़कर और उसका आचरण कर मनुष्य विद्वान, महात्मा, ज्ञानी, योगी, ऋषि, मुनि व वैज्ञानिक बनता है। उसका यश व कीर्ति बढ़ती है। उसे आत्म शान्ति व आत्म सन्तोष प्राप्त होता है। वह स्वस्थ रहता है और उसकी आयु बढ़ती है। वेदों का विद्वान अभक्ष्य पदार्थों मांस, मदिरा, घूम्रपान आदि का सेवन नहीं करता। वह प्रकृति प्रेमी होता है इसलिए वह पर्यावरण का संरक्षक व रक्षक होता है। वेदों की शिक्षाओं के प्रभाव से मनुष्य सत्य मान्यताओं का पालन करता है और असत्य व भ्रामक विचारों से दूर रहता है। आजकल की स्कूली शिक्षा इसके सर्वथा विपरीत है। बड़े बड़े पदों पर बैठे लोग भी असत्य का आचरण करते हैं। अधिकांश का आचरण सत्य पर आधारित नहीं होता, वह मिथ्याचारी व भ्रष्टाचारी भी होते हैं। सत्य का आचरण कम ही लोग करते ही हैं। इसीलिए सरकार ने अनेक कानून बनाये हैं फिर भी देश में भ्रष्टाचार की घटनायें होती रहती हैं। वेदों के प्रचार से समाज में समरसता का विस्तार व वृद्धि होती है।

वेद का अध्ययन व आचरण करने वाला व्यक्ति किसी पर अन्याय व अत्याचार नहीं कर सकता। वह किसी का शोषण भी नहीं कर सकता। वेदों की रक्षा करना सभी मनुष्यों का धर्म इसलिए है कि यह ईश्वर प्रदत्त हैं एवं ईश्वर की मनुष्यों के पास एक धरोहर है जिसकी रक्षा से हमारी अपनी इहलोक व परलोक की उन्नति होती है। वेदों का आचरण करने से मनुष्य का यह जीवन तो सुधरता ही है और परजन्म भी उन्नत होता है। वेदों से पुनर्जन्म का सिद्धान्त मिला है जो तर्क व युक्ति की कसौटी पर सत्य सिद्ध है। ईसाई व मुस्लिम मत में पुनर्जन्म का सिद्धान्त ही नहीं है। पुनर्जन्म का सिद्धान्त न होने से उसे सुधारने के उपाय भी वहां उपलब्ध नहीं है। गीता में डंके की चोट पर कहा गया है कि ‘जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु धु्रवं जन्म मृतस्य च’ अर्थात् जन्म लेने वाले मनुष्य व प्राणियों की मृत्यु निश्चित है और उतना ही निश्चित मरे हुए मनुष्य का जन्म होना है। पुनर्जन्म इस सिद्धान्त से भी सत्य सिद्ध होता है कि भाव से अभाव उत्पन्न नहीं होता और अभाव से भाव की उत्पत्ति नहीं होती। मनुष्य व अन्य प्राणियों की आत्मा अभाव नहीं भाव सत्ता हैं। इन जीवात्माओं, ईश्वर व प्रकृति में से किसी का कभी भी अभाव नहीं हो सकता। इसलिए जीवात्मा का मृत्यु के बाद पुनर्जन्म अवश्यम्भावी है। ऐसे अनेक सिद्धान्त है जो मनुष्यों को वेदिक धर्म की शरण में आने पर ही मिलते हैं और वह इस जीवन सहित अपने परजन्म को भी उन्नत व सुरक्षित बना सकते हैं। वैदिक धर्म में मनुष्य अपने इस जन्म में भी सुखी हो सकते हैं और परजन्म में सुखी होने के लिए इस जन्म में सद्कर्म कर उसे भी सुरक्षित कर सकते हैं।

वेदों की उत्पत्ति के विषय में जानना भी महत्वपूर्ण है। वेद संसार के अन्य ग्रन्थों के समान नहीं है। अन्य सभी ग्रन्थ मनुष्य व विद्वानों द्वारा लिखे गये हैं, इस कारण वह सभी पौरुषेय हैं। मनुष्य अल्पज्ञ होते हैं। अतः उनके ग्रन्थों में भ्रान्तियों का विद्यमान होना स्वाभाविक है। वेदों की उत्पत्ति ईश्वर वा परमात्मा से हुई है, इस कारण से यह अपौरुषेय ज्ञान व ग्रन्थ हैं। परमात्मा सर्वज्ञ है अर्थात् वह सर्वज्ञानमय है। इस कारण ईश्वर व उसकी कृतियों में कहीं कोई न्यूनता व अल्पज्ञता का दोष नहीं पाया जाता। वेदों को देखने पर इस विचार की पुष्टि होती है। वेदों में कहीं कोई दोष नहीं है। यदि कोई अयोग्य व्यक्ति वेदों को देखेगा तो वह वेदार्थ न जानने व अपनी न्यूनताओं व दोषों के कारण वेदों के साथ न्याय नहीं कर सकता। इसलिए ऐसे अनेक भाष्यकार हुए हैं जो वेदार्थ करने की योग्यता नहीं रखते थे। अतः वह, सायण व महीधर आदि, वेदार्थ करने में न्याय नहीं कर सके। इसका दोष उन्हीं भाष्यकारों को जाता है। वेदों के यथार्थ अर्थ ऋषि व ईश्वर का साक्षात्कार किये हुए योगी ही ठीक ठीक कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त वेदों को अंग व उपांगों सहित पढ़े व्यक्ति जो पवित्र व शुद्ध अन्तःकरण वाले हों, वेदों के यथार्थ अर्थ कर सकते हैं।

वेदों का ज्ञान परमात्मा से सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न चार ऋषि अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा को मिला था। परमात्मा ने यह ज्ञान अपने सर्वव्यापकत्व एवं सर्वान्तर्यामी स्वरूप से इन चार ऋषियों की आत्मा में प्रेरणा के द्वारा दिया था। ऐसा होना सम्भव कोटि में आता है। बाद में इन ऋषियों ने यह ज्ञान ब्रह्मा जी नाम के अन्य ऋषि को दिया। हमारा अनुमान है कि जब इन चार ऋषियों ने ब्रह्माजी को ज्ञान दिया होगा तो अन्य ऋषियों ने भी उसे सुनकर उस वेद का ज्ञान प्राप्त कर लिया होगा। इस प्रकार सृष्टि के आरम्भ में पांच ऋषि वेद ज्ञान सम्पन्न हुए जिन्होंने अन्य मनुष्यों को वेदों का ज्ञान बोल कर, उपदेश व प्रवचन आदि के द्वारा दिया। सृष्टि के आदि काल में मनुष्यों की स्मरण शक्ति बहुत अच्छी थी। वह जो सुनते थे, उन्हें स्मरण हो जाता था। कालान्तर में जब मनुष्यों की स्मरण शक्ति में कमी आयी तो ग्रन्थ रचना का कार्य आरम्भ हुआ और वेदों को लिपीबद्ध किया गया। महाभारत काल तक ऋषियों व उनके शिष्यों द्वारा वेदों का उपदेश आदि के द्वारा प्रचार किया जाता रहा। महाभारतयुद्ध में हुई जान व माल की भारी क्षति के कारण वेदाध्ययन अवरुद्ध हो गया। जिससे कालान्तर में देश में अन्धकार फैल गया और अविद्याजन्य, अंधविश्वासों से युक्त मान्यताओं का प्रचार होने लगा। ऐसा चलता रहा और बाद में अनेक मत-मतान्तर भारत व विश्व के अनेक स्थानों में फैले। अब विद्या का प्रकाश हो जाने पर भी प्रायः सभी मत अपने अस्तित्व को बनाये हुए हैं जिसका कारण उनकी अविद्या व हित-अहित प्रतीत होते हैं। वेदों के बारे में यह भी बता दें कि चारों वेद ईश्वर की रचना अर्थात् उसका दिया हुआ ज्ञान हैं। यह अन्य ग्रन्थों की भांति किसी मनुष्य की कृति नहीं है।

वेदों की रक्षा क्यों करनी चाहिये? इसका एक कारण यह है कि चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद संसार की सबसे प्राचीन ज्ञान की पुस्तके हैं। इसमें ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति सहित मनुष्यों के सभी कर्तव्यों का ज्ञान दिया हुआ है। आज भी वेदों की सभी शिक्षायें प्रासंगिक एवं हमारे लिए उपयोगी हैं। इस कारण से वेदों की रक्षा करनी चाहिये। वेदों की रक्षा वेदों के स्वाध्याय व विद्वानों द्वारा इसके सरलीकरण, नये नये ग्रन्थों के लेखन, उपदेश, प्रवचन एवं प्रचार से ही हो सकती है। अतः वेदों का सभी को अध्ययन एवं प्रचार करना चाहिये। ऋषि दयानन्द ने वेदों के प्रचार को सभी मनुष्यों का परम धर्म अर्थात् परम कर्तव्य बताया है। यह सत्य ही है। वेदों का अध्ययन करने व उसका प्रचार करने से मनुष्यों को ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त होता है और उसे सुख प्राप्ति सहित उसकी शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति भी होती है।

वेदों की रक्षा व स्वाध्याय हमें इसलिये भी करना चाहिये क्योंकि सृष्टि की आदि से हमारे सभी पूर्वज वेदों का अध्ययन करते आये हैं। हमें अपने पूर्वजों की ज्ञान सम्पत्ति वेदों की रक्षा करनी उचित है और यह हमारा कर्तव्य और धर्म भी है। न केवल हमारे पूर्वज अपितु मर्यादा पुरुषोत्तम राम, योगेश्वर कृष्ण, पतंजलि, गौतम, कणाद, कपिल, व्यास, दयानन्द आदि सभी वेदों के विद्वान थे और यह योग्यता व उपाधि उन्हें वेदाध्ययन से ही प्राप्त हुई थी। वेदों को पढ़कर हम भी उनके जैसे बन सकते हैं। प्राचीन व अर्वाचीन सभी विद्याओं का आधार व मूल भी वेद ही है। उपनिषद, दर्शन, गृह्य सूत्र, आयुर्वेद के ग्रन्थ चरक व सुश्रुत आदि, मनुस्मृति, ज्योतिष आदि सभी ग्रन्थों का आधार वेद है। वेद ही ईश्वर व आत्मा आदि के सच्चे स्वरूप का ज्ञान कराने वाले आधार ग्रन्थ हैं। वेदों से ही हमें अपने कर्तव्यों व ईश्वरोपासना आदि का सत्य ज्ञान प्राप्त होता है। वेदों की शिक्षायें विश्व में सुख व शान्ति उत्पन्न करने में उपयोगी व महत्वपूर्ण हैं। इसका कारण यह है कि वेद सत्य व्यवहार पर बल देते हैं और सत्य व्यवहार से ही विश्व, देश-देशान्तर व समाज में सुख व शान्ति स्थापित हो सकती है। यह भी उल्लेखनीय है कि वेदों की सभी शिक्षायें किसी एक मनुष्य समुदाय विशेष के लिए न होकर पूरी मानवता के लिए हैं। इस कारण वेद संसार का एकमात्र साम्प्रदायिकता से रहित सर्वोच्च धर्मग्रन्थ हैं। वेदों की भाषा के महत्व के विषय में हम पूर्व ही लिख चुके हैं। ऐसे अनेक कारण है जिससे हमें वेदों की रक्षा करनी चाहिये और इसका उत्तम साधन वेदों का स्वाध्याय व उपदेश आदि द्वारा प्रचार है। ऋषि दयानन्द ने भी इस कार्य का अवलम्बन लिया था। उन्होंने हमें वेदों की शिक्षाओं से परिचित कराने और वेदों का महत्व बताने वाले सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय आदि सहित वेदों का संस्कृत व हिन्दी भाष्य भी दिया है। यदि हम वेदों की रक्षा करते है ंतो इससे हमारा व विश्व का भला होगा। इसी के साथ लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।


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