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“वैदिक धर्म एवं संस्कृति के लिये समर्पित विद्वान पं. चमूपति जी”

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15 Apr 19
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-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

“वैदिक धर्म एवं संस्कृति के लिये समर्पित विद्वान पं. चमूपति जी”

वेद संसार की सबसे प्राचीन पुस्तक है। वेदों से ही वैदिक धर्म एवं संस्कृति का उद्भव व प्रचलन हुआ है। वैदिक धर्म व संस्कृति ही संसार की आद्य वा प्रथम धर्म-संस्कृति है। यह अन्य मतों की तरह किसी अल्पज्ञ जीवात्मा द्वारा प्रचलित मत नहीं है। वेदों का प्रादुर्भाव ईश्वर से होने के कारण वैदिक धर्म भी ईश्वर से आविर्भूत है। प्राणी मात्र के हित की दृष्टि एवं देश व काल के भेद के बिना यह संस्कृति संसार के सभी मनुष्यों के लिए अनुकरणीय एवं उपादेय है। महाभारत युद्ध में जो महाविनाश हुआ यदि वह न होता तो संसार में वर्तमान में वेदेतर कोई मत अस्तित्व में न आता। सभी मतों के प्रचलन का कारण उनके समय में देश व समाज में अविद्या का विद्यमान होना था। इसी कारण अल्पज्ञ मनुष्यों द्वारा प्रचलित सभी मतों में अविद्यायुक्त मान्यतायें व सिद्धान्त पाये जाते हैं। महाभारत काल के लगभग 5000 वर्ष बाद महर्षि दयानन्द हुए जिन्हें ज्ञान पिपासा के गुण एवं वैराग्य ने सच्चे ईश्वर की प्राप्ति का पथिक बनाया। उन्होंने एक विद्वान व वैज्ञानिक की तरह सभी धार्मिक मान्यताओं को सत्य व तर्क की कसौटी पर कसने के बाद ही स्वीकार किया जिससे वह अविद्या को धर्म से मुक्त करा सके। ऋषि दयारनन्द जी ने जो ज्ञान अर्जित किया और अपने उपदेशों और ग्रन्थों के द्वारा प्रस्तुत किया वह अत्यन्त महत्वपूर्ण होने से आश्चर्यजनक है। उनके द्वारा प्रदत्त ज्ञान ने अपने समकालीन व बाद के सभी विद्वानों को भी आश्चर्य में डाल दिया। हमारा सौभाग्य है कि हम उनके ज्ञान से लाभान्वित हुए और उसे आगे बढ़ाने का प्रयत्न करते हैं।

 

                अज्ञान व स्वार्थों में फंसे देश, समाज व संसार ने ऋषि दयानन्द जी के विचारों व सिद्धान्तों से लाभ नहीं उठाया। इसका प्रमाण देश व संसार में अविद्या पर आधारित अनेक मत-मतान्तरों का विद्यमान होना है जो विश्व के लिये अशान्ति आदि की समस्यायें उत्पन्न कर रहे हैं। स्वामी दयानन्द जी की सन् 1883 में मृत्यु हुई थी। उनके जाने के बाद उनके शिष्यों ने आर्यसमाज के माध्यम से वेद प्रचार के कार्य को आगे बढ़ाया। इसका परिणाम देश की आजादी सहित शिक्षा व अन्य सभी सामाजिक क्षेत्रों में नाना प्रकार की उन्नति के रूप में देखने को मिलता है। आचार्य पं0 चमूपति जी महर्षि दयानन्द जी के मिशन को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख महापुरुषों में से एक महापुरुष थे। वह अतीव प्रतिभा सम्पन्न मनीषी, त्यागी, तपस्वी, विद्वान तथा वैदिक धर्म व संस्कृति के लिये सर्वात्मा समर्पित असाधारण मनुष्य थे। 

 

                पंडित चमूपति जी का जन्म बहावलपुर के खैरपुर ग्राम में 15 फरवरी, 1883 ईसवी को एक प्रतिष्ठित महता परिवार में हुआ था। बहावलपुर अब पाकिस्तान में है। आपके पिता का नाम वसन्दाराम वं माता का नाम उत्तमी देवी था। मैट्रिक तक की शिक्षा आपने अपने जन्म ग्राम खैरपुर में उर्दू एवं अंग्रेजी भाषाओं मे प्राप्त की। बहावलपुर के इजर्टन कालेज से आपने उर्दू, फारसी एवं अंग्रेजी में बी0ए0 किया। बी0ए0 तक आप देवनागरी अक्षरों से अनभिज्ञ थे। आर्यसमाज से प्रभावित होकर आपने संस्कृत में एम0ए0 करने का संकल्प लिया और परीक्षा में सफलता प्राप्त कर प्रशंसनीय उदाहरण प्रस्तुत किया।

 

                विद्यार्थी जीवन में आप सिख मत की ओर आकर्षित हुए थे। आपने सिख मत की पुस्तक ‘‘जपुजी” का उर्दू में काव्यानुवाद किया। इस पुस्तक से निकटवर्ती क्षेत्रों में आपको प्रसिद्धि प्राप्त हुई। हमें जीवन में यह अनुवाद देखने को नहीं मिला। जन्म से दार्शनिक प्रवृत्ति के कारण पौराणिक विचारधारा से आपकी संस्तुष्टि नहीं हुई जिसका परिणाम यह हुआ कि आप नास्तिक बन गए। इसके पश्चात आपने स्वामी विवेकानन्द के साहित्य का अध्ययन किया और कुछ समय पश्चात महर्षि दयानन्द के साहित्य का पारायण किया। इस साहित्यिक ऊहापोह से आप पुनः आस्तिक बन गए। अब आप प्राणपण से आर्यसमाज के कार्यों में रुचि लेने लगे। सन् 1919 में आपने स्वामी दयानन्द के पद्यमय उर्दू जीवन चरित्र ‘‘दयानन्द आनन्द सागर” का लेखन व प्रकाशन किया। इस ग्रन्थ में आपने स्वामी दयानन्द जी के लिये ‘‘सरवरे मखलूकात” अर्थात् मानव शिरोमणी विशेषण का प्रयोग किया है।

 

                आर्यप्रतिनिधि सभा, पंजाब द्वारा संचालित दयानन्द सेवा संस्थान के भी आप सदस्य बने। संस्थान के समाजोत्थान के कार्यों को करने के उद्देश्य को पूरा करते हुए आपने आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब द्वारा प्रकाशित अंग्रेजी पत्र ‘‘वैदिक मैगजीन” एवं हिन्दी पत्र ‘‘आर्य” के सम्पादन का कार्य भी किया। आपकी विद्वता एवं निष्ठा के प्रभाव से इन पत्रों ने अपूर्व सफलतायें प्राप्त कीं और अविभाजित पंजाब सहित देशभर में यह पत्र लोकप्रिय हुए। सन् 1926 से आरम्भ कर आठ वर्षों तक आपने गुरुकुल कांगड़ी में उपाध्याय, अधिष्ठाता एवं आचार्य आदि पदों को सुशोभित किया। आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब की ओर से सन् 1925 में आप वैदिक धर्म एवं संस्कृति के प्रचारार्थ अफ्रीका यात्रा पर गये। इस अफ्रीका यात्रा के समय पौराणिक विद्वान पं0 माधवाचार्य ने आपको शास्त्रार्थ के लिये आमंत्रित किया जिसमें वह पंडित चमूपति जी को अपमानित कर सके और अपने शिष्यों पर अपना प्रभाव जमा सके। अनेक लोगों की उपस्थिति में शास्त्रार्थ आरम्भ हुआ।

 

                शास्त्रार्थ में प्रसंगवश पंडित चमूपति जी ने शालीनतापूर्वक कहा कि पं0 माधवाचार्य की पत्नी को पुत्री मानने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं अपितु प्रसन्नता है। निराले अन्दाज में पं0 चमूपति जी द्वारा कहे गए इन शब्दों का लोगों पर इच्छा प्रभाव पड़ा। शास्त्रार्थ पं0 चमूपति जी के इन्हीं शब्दों पर समाप्त हो गया। पं0 माधवाचार्य की पं0 चमूपति जी का अपमान करने की योजना विफल हो गई। उर्दू कवि एवं पाकिस्तान के विचार के जन्मदाता डॉ0 इकबाल एक बार पंडित चमूपति जी से मिलने गये। पं0 चमूपति जी से बातचीत का डॉ0 इकबाल पर गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने चमूपति जी से आदर पूर्वक कहा कि आपके व्यवहार ने मेरे गुरु की स्मृति को ताजा कर दिया।

 

                अपने जीवन काल में एक बार पं0 चमूपति जी वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून आये थे। एक दिन जब उन्होंने तपोवन के निकट सरोवर में एक हिन्दू को मछलियां पकड़ते हुए देखा तो उनके मुख से निकला ‘‘देखो यह इस्लामी हिन्दू धर्म है”। अपने एक व्याख्यान में एक बार पंडित जी ने मुसलमानों की हज की रीति एवं व्यवहार का उल्लेख कर भावपूर्ण शब्दों में कहा ‘‘हज करते समय कोई मोमिन सिर की जूं तक नहीं मार सकता, सिला हुआ वस्त्र भी नहीं पहन सकता। यह है वैदिक इस्लाम”। इस्लाम के इस अहिंसक रूप के पंडित चमूपति जी समर्थक थे।

 

                पं0 चमूपति संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, फारसी, अरबी आदि भाषाओं के उच्चकोटि के विद्वान, लेखक, कवि एवं वक्ता थे। हिन्दी, उर्दू व अंग्रेजी में आपने अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया। सोम सरोवर, जीवन ज्योति, योगेश्वर कृष्ण, वृक्षों में आत्मा, हमारे स्वामी आदि आपकी हिन्दी की रचनायें हैं। दयानन्द आनन्द सागर, मरसिया ए गोखले, जवाहिरे जावेद, चौदहवीं का चांद, मजहब का मकसद आदि उूर्द तथा महात्मा गांधी और आर्यसमाज, यजुर्वेद अनुवाद, गिलिम्पसेस आफ दयानन्द अंग्रेजी में आपकी कुछ प्रसिद्ध रचनायें हैं।

 

                स्वामी दयानन्द ने आर्यसमाज को कई स्वर्णिम नियम दिये हैं उनमें से एक है मनुष्य को सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये। सत्यार्थप्रकाश की भूमिका में उन्होंने लिखा है कि सत्य को मानना एवं मनवाना तथा असत्य को छोड़ना और छुड़वाना उन्हें अभीष्ट है। इसी को वह मनुष्य जीवन का लक्ष्य स्वीकार करते थे। पं0 चमूपति जी ने ऋषि दयानन्द जी के विचारों को सर्वात्मा अपनाया व उनका अपने उपदेशों व रचनाओं के द्वारा प्रचार किया। दिनांक 15 जून सन् 1937 को 44 वर्ष की आयु में आपका देहावसान हुआ। पं0 चमूपति जी ने अपने जीवन में देश, धर्म एवं संस्कृति के लिये जो कार्य किये और इन पर हिन्दी, अंग्रेजी एवं उर्दू में जो उच्च कोटि की रचनायें दी हैं, उसके कारण आप का नाम व यश सदैव अमर रहेगा। आर्यसमाज के वयोवृद्ध विद्वान प्रा0 राजेन्द्र जिज्ञासु जी ने आपकी जीवनी लिखी है। जिज्ञासु जी ने पं0 चमूपति जी के लेखों व लघु पुस्तकों का दो खण्डों में एक संग्रह सम्पादित किया था जो वर्षों पूर्व हिण्डोन सिटी से आर्य साहित्य के यशस्वी प्रकाशक श्री प्रभाकरदेव आर्य जी ने ‘‘विचार वाटिका” के नाम से प्रकाशित किया था। अब यह ग्रन्थ अनुपलब्ध है। प्रा. जिज्ञासु जी ने पं. चमूपति जी की उर्दू पुस्तक ‘‘दयानन्द आनन्द सागर” का हिन्दी अनुवाद कर उसे भी प्रकाशित कराया है। इस पुस्तक के कारण ही चमूपति जी को मुस्लिम रियासत बहावलपुर से अपने निवास गृह से निर्वासित किया गया था। कितना बड़ा त्याग उन्होंने किया था इसका शायद हम अनुमान नहीं कर सकते। पं0 चमूपति जी की अनेक उर्दू पुस्तकों के अनुवाद भी सुलभ हैं।

 

                हमारा सौभाग्य है कि हमने पं0 चमूपति जी के पुत्र श्री लाजपत राय जी को देखा है। एक बार वह हरिद्वार में वेदाचार्य डॉ0 रामनाथ वेदालंकार जी के पास आये थे। हम भी वहां पहुंच गये थे। तब आचार्य डॉ0 रामनाथ जी ने हमसे उनका परिचय कराया था। अब वह भी दिवंगत हो चुके हैं। वह कुछ समय तक गुरुकुल गौतमनगर, दिल्ली में भी रहे थे। वेदों सहित संस्कृत भाषा के भी वह अच्छे विद्वान थे। स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती, गुरुकुल गौतमनगर, दिल्ली ने एक बार हमें श्री लाजपतराय जी के कुछ संस्मरण सुनाये थे। श्री लाजपत राय जी बोलते बहुत कम थे और प्रायः एकान्तसेवी जीवन व्यतीत करते थे। यह भी बता दें कि पं0 चमूपति जी का ग्रन्थ सोम-सरोवर बहुत उच्च कोटि की रचना है। उन्होंने इस पुस्तक में सामवेद के मन्त्रों की भावपूर्ण व्याख्या की है। गद्य में होने पर भी इस पुस्तक को पढ़कर पद्य का सा आनन्द आता है। एक बार श्री वीरेन्द्र जी, सम्पादक, आर्यमर्यादा, जालन्धर ने सम्पादकीय में लिखा था कि इस पुस्तक पर उन्हें नोबेल पुरस्कार दिया जा सकता था परन्तु पुरस्कार देने में पक्षपात के कारण वह इस पुस्तक पर पुरस्कार प्राप्त नहीं कर सके। हमने सोम सरोवर पुस्तक पढ़ी है ओर यह बहुत ही उत्तम कोटि का ग्रन्थ है। पाठकों को इस पुस्तक से लाभ उठाना चाहिये। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

पताः 196 चुक्खूवाला-2

देहरादून-248001

फोनः09412985121


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