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“परमात्मा अवतार अर्थात् कभी जन्म नहीं लेताः पं. विद्यापति शास्त्री”

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05 Dec 18
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-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

“परमात्मा अवतार अर्थात् कभी जन्म नहीं लेताः पं. विद्यापति शास्त्री” आर्यसमाज धामावाला देहरादून का दिनांक 2-12-2018 का रविवारीय साप्ताहिक सत्संग सोल्लास सम्पन्न हुआ। प्रातः आर्यसमाज की यज्ञशाला में विद्वान पुरोहित पं. विद्यापति शास्त्री जी ने यज्ञ सम्पन्न कराया। यज्ञ के पश्चात का कार्यक्रम आर्यसमाज के भव्य सभागार में हुआ। सत्संग के आरम्भ में पं. विद्यापति शास्त्री जी ने पं. सत्यपाल पथिक रचित एक मधुर भजन सुनाया। भजन के बोल थे ‘प्रभु जी मुझे वरदान दो मैं कभी न तुमसे जुदा रहूं। जैसे घी व दूध मिले रहें वैसे मैं भी तुमसे मिला रहूं। प्रभु जी मुझे वरदान दो।’ इस भजन की समाप्ति पर श्री श्रद्धानन्द बाल वनिता आश्रम, देहरादून के एक बालक ने सामूहिक प्रार्थना कराई। उन्होंने प्रार्थना के आरम्भ में एक भक्ति गीत की पंक्तियां प्रस्तुत कीं जिनमेंएक पंक्ति थी ‘मिले भरोसा आपका हमें सदा जगदीश आशा देरे धाम की बनी रहे मम ईश।’ इसके बाद बालक ने गायत्री मन्त्र गाया और उसका पद्यानुवाद भी प्रस्तुत किया। भाषा में की गई प्रार्थना के कुछ शब्द थे ‘हम सब सत्य मार्ग पर आगे बढ़े। अविद्या रूपी अंधकार के मार्ग से हटकर विद्यारूपी प्रकाश मार्ग पर आगे बढ़े। हम ईश्वर की भक्ति प्रेम व समर्पण भाव से भाव विभोर होकर करें।’

सामूहिक प्रार्थना के बाद पं. विद्यापति शास्त्री जी ने सत्यार्थप्रकाश के बारहवें समुल्लास का लगभग 10 मिनट तक पाठ किया। आज बारहवां समुल्लास समाप्त हो गया। आज के सत्यार्थप्रकाश में जैन बन्धुओं के मोक्ष विषयक विचारों की ऋषि दयानन्द जी द्वारा की गई समीक्षा से पंडित जी ने ऋषिभक्तों को अवगत कराया। उन्होंने बताया कि जैन बन्धु मोक्ष को एक स्थान विशेष में स्थित मानते हैं जबकि आर्यसमाज की मान्यता इससे भिन्न है। वैदिक मोक्ष कोई एक स्थान विशेष न होकर पूरा ब्रह्माण्ड है जिसमें मोक्ष को प्राप्त होकर जीवात्मा ईश्वर के सान्निध्य से अनन्त आनन्द को भोगते हुए पूरे ब्रह्माण्ड में अपनी इच्छानुसार विचरण करती है। पंडित जी ने जैन ग्रन्थों की कुछ मान्यताओं का उल्लेख किया जो सर्वथा अविश्वसनीय था। जैन बन्धुओं के ग्रन्थों में ऐसे मनुष्यों का वर्णन किया गया है जिनके शरीर 4000 कोस जितने बड़े थे। ऋषि ने कहा है कि ऐसा होना सर्वथा असम्भव है। यदि ऐसे मनुष्य वास्तव में होते तो न तो उनके रहने के लिये घर बन सकता था, न उनके पहनने के लिये वस्त्र और न ही वाहन व अन्य साधन। पंडित विद्यापति जी ने जैन मान्यताओं के प्रतिवाद में ऋषि दयानन्द द्वारा प्रस्तुत आपत्तियों को भी प्रस्तुत किया। पंडित जी ने जैनमत के ग्रन्थों में कुरुक्षेत्र का उल्लेख कर उसमें वर्णित असम्भव व अविश्वसनीय कथाओं पर भी प्रकाश डाला। इन आलोचनाओं के साथ ऋषि दयानन्द ने जैनियों की जल छान कर पीने की मान्यता सहित जीवों पर दया तथा सन्ध्या के समय सूर्यास्त से पूर्व भोजन करने की मान्यताओं की प्रशंसा की है। पंडित जी ने कहा कि ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश में जैन मत व अन्य मतों की बहुत संक्षिप्त समीक्षा व आलोचना की है। उन्होंने समुल्लास की समाप्ति पर लिखा है कि बुद्धिमान लोग थोड़े से उल्लेख से ही समझ जाते हैं।

इसके बाद आर्यसमाज के विद्वान प्रधान डॉ. महेश कुमार शर्मा ने सत्यार्थ प्रकाश के लेखन की भूमिका और इससे जुड़ी प्रमुख बातों का सप्रमाण उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि ऋषि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश के दो संस्करण तैयार किये थे। पहला संस्करण सन् 1874 में प्रकाशित हुआ था और दूसरा संस्करण उनकी मृत्यु के बाद सन् 1884 में प्रकाशित हुआ था। वर्तमान में इस दूसरे संस्करण का ही व्यवहार व प्रयोग होता है। स्वामीजी ने प्रथम व दूसरे संस्करण को कहां-कहां लिखवाया और सत्यार्थप्रकाश के लेखकों पं. चन्द्रशेखर आदि के नाम भी श्रोताओं को अवगत कराये। शर्मा जी ने आर्यसमाज के विद्वान पुरोहित पं. विद्यापति शास्त्री को 35 मिनट के व्याख्यान के लिये आमंत्रित किया। अपना प्रवचन आरम्भ करते हुए पंडित विद्यापति जी ने यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय के आठवें मन्त्र को प्रस्तुत कर उस पर अपने विचारों को केन्द्रित किया।

पं. विद्यापति शास्त्री ने कहा कि संसार में ईश्वर के स्वरूप व उसकी उपासना के विषय में जितनी भ्रान्तियां है उतनी भ्रान्तियां अन्य किसी विषय में नहीं हैं। परमात्मा इस भौतिक च चेतन प्राणी जगत का बीज है। उन्होंने कहा कि परमात्मा कभी जन्म नहीं लेता, वह कभी रोगी नहीं होता तथा वह नस-नाड़ियों के बन्धन से भी पृथक है। परमात्मा शुद्ध स्वरूप है। वह सभी पापों से मुक्त है। परमात्मा चेतन एवं विचारशील है। वह सर्वव्यापक है। परमात्मा का जन्मदाता व उत्पादक कोई नहीं है। वह अनादि व नित्य है। उसका कभी नाश या मृत्यु नहीं होती। परमात्मा सबसे बड़ा है, उससे बड़ा संसार में कोई नहीं है। परमात्मा का कोई स्वामी नहीं है, वह अपना स्वामी आप है अर्थात् वह स्वयंभू है। परमात्मा ने जीवों को न्याय देने के लिए अपनी न्याय व्यवस्था बनाई है। परमात्मा का विधान सबके लिये समान है। वह किसी एक जीव के प्रति भी पक्षपात नहीं करता। सबको अपने प्रत्येक कर्म का फल भोगना पड़ता है। पंडित जी ने कहा कि मनुष्य का आत्मा सत्यासत्य को जानने वाला होता है। अविद्या व स्वार्थ आदि में फंस कर मुनष्य अनुचित कर्म व पाप करता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य पहली बार जब कोई बुरा काम करता है तो उसे डर लगता है। बार-बार बुरा काम करने पर उसका डर दूर हो जाता है। मनुष्य को बुरा कर्म करने में जो डर लगता है वह परमात्मा की आवाज होती है जो मनुष्य को बुरे काम से बचाना चाहती है। पंडित विद्यापति जी ने कहा कि परमात्मा की न्याय व्यवस्था पूरे ब्रह्माण्ड में प्रत्येक स्थान पर है। पंडित जी ने संसार में विद्यमान तीन प्रकार के वादों विवर्तवाद, लीलावाद तथा द्वन्दवाद की चर्चा कर इनके स्वरूप पर विस्तार से प्रकाश डाला और इसके उदाहरण भी दिये।

आचार्य विद्यापति जी ने कहा कि कुछ लोग परमात्मा को इंसान की तरह से शरीरवाला मानते हैं। इसे उन्होंने लोगों की अविद्या व भ्रम बताया। उन्होंने कहा कि ईश्वर ने मनुष्यों को अपनी सूरत का नहीं अपितु हमने अपनी सूरत जैसा परमात्मा का काल्पनिक रूप बनाया है। आचार्य जी ने कहा कि कुछ भ्रमित लोगों की मान्यता है कि परमात्मा जो चाहे सो कर सकता है। यह लोग परमात्मा का जन्म लेना और मृत्यु को प्राप्त होना भी मानते हैं। यह भ्रान्त लोग कहते हैं कि संसार में हमें जो दिखाई दे रहा है यह परमात्मा की लीला है। पुरोहित विद्यापति जी ने इन सभी काल्पनिक मान्यताओं का प्रमाणों सहित खण्डन किया। उन्होंने कहा कि कुछ धार्मिक विद्वान भ्रमित हैं, वह ईश्वर के स्वरुप के विषय में विवेक पूर्वक निर्णय नहीं कर पाते। पंडित जी ने कहा कि परमात्मा संसार की बीज शक्ति है। परमात्मा को उन्होंने सभी पदार्थों में विद्यमान वा व्यापक बताया। उन्होंने कहा कि परमात्मा सगुण व निर्गुण दोनो है। सगुण व निर्गुण के यथार्थ अन्तर को जानकर ईश्वर की भक्ति व उपासना करनी चाहिये। पंडित जी ने ईश्वर के सगुण व निर्गुण स्वरूप की व्याख्या करके श्रोताओं को समझाया। ईश्वर में जो-जो गुण हैं, उनसे युक्त होने के कारण ईश्वर सगुण और ईश्वर में जो गुण नहीं है, उनके न होने से वह निर्गुण कहलाता है। पं. विद्यापति जी ने कहा कि सगुण का अर्थ साकार और निर्गुण का अर्थ निराकार नहीं है। हम ईश्वर के यथार्थ स्वरूप व गुणों को जानकर ही उसकी भक्ति कर सकते हैं।

पंडित विद्यापति शास्त्री ने कहा कि मनुष्य मरणधर्मा प्राणी है। मनुष्य की तरह अन्य सभी प्राणी भी मरणधर्मा हैं। उन्होंने कहा कि किसी का सत्कार करना पूजा कहलाता है। माता-पिता की आज्ञा पालन कर उनका सत्कार करना भी पूजा है और ईश्वर की वेदाज्ञा का पालन करना ईश्वर की पूजा है। पंडित जी ने श्रोताओं को ईश्वर के सगुण व निर्गुण स्वरूप को जानने व उसी की उपासना करने की प्रेरणा की। पंडित जी ने कहा कि ईश्वर को सर्वगुणसम्पन्न बताया जाता है। उन्होंने कहा कि ईश्वर सबसे महान व महान गुणों वाला है परन्तु उसमें मानवीय प्रकृति के जड़त्व आदि गुण नहीं है। विद्वान पुरोहित जी ने कहा कि हम सबको ईश्वर को जानने का प्रयत्न करना चाहिये। हमें यह जानना चाहिये कि परमात्मा शरीर धारण नहीं कर सकता। परमात्मा न कभी जन्म लेता है और न कभी मृत्यु को प्राप्त होता है। ईश्वर सभी गुरुओं का भी गुरु व आदि गुरु है।

आर्यसमाज के विद्वान ऋषि भक्त प्रधान डॉ. महेश कुमार शर्मा जी ने विद्वान वक्ता पंडित विद्यापति शास्त्री जी को विद्वतापूर्ण प्रवचन देने के लिये धन्यवाद दिया। उन्होंने आज का वैदिक विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि ‘सफलता एक बीज के वृक्ष होने की प्रक्रिया है’। इस कारण सफलता प्राप्त करने के लिये मनुष्य को धैर्य रखना पड़ता है। डॉ. शर्मा ने श्रोताओं को बताया कि ऋषि दयानन्द देहरादून दिनांक 7 अक्टूबर, 1880 को पधारे थे। इस दिन बृहस्पतिवार था। ऋषि दयानन्द के आगमन के पश्चात एक विज्ञापन प्रकाशित व प्रचारित किया गया था। इस विज्ञापन में कहा गया था कि ऋषि दयानन्द वैदिक विचारधारा को मानते हैं। अन्य मतों के आचार्य व जनसाधारण जो शंका समाधान व शास्त्रार्थ करना चाहें, सम्पर्क कर सकते हैं। शर्मा जी ने बताया कि स्वामीजी लिपिबद्ध शास्त्रार्थ को महत्व देते थे। स्वामीजी इस प्रवास में देहरादून के रईस श्री बलदेव सिंह जी के डालनवाला स्थित निवास पर ठहरे थे। यहां लीची व आम का बगीचा एवं एक मैदान था। इसी मैदान में ऋषि दयानन्द जी के प्रवचन होते थे। इस आगमन पर ऋषि दयानन्द जी ने 6 व्याख्यान दिये थे। दो प्रवचन ऋषि के डेरे पर हुए तथा अन्य श्री माधव नारायण जी, श्री गोपाल सिंह जी, पं. कृपा राम जी और पं. कृपा राम जी के बड़े भाई श्री गोपाल के निवास पर हुआ था। आर्यसमाज के प्रधान डॉ. महेशकुमार शर्मा जी ने 21 से 23 दिसम्बर, 2018 तक के आगामी आर्यसमाज के 139 वें वार्षिक उत्सव की जानकारी भी दी। इस आयोजन में आर्य विद्वान डॉ. वागीश शास्त्री, एटा को आमंत्रित किया गया है। भजनोपदेशक श्री कुलदीप आर्य, बिजनौर हैं। प्रधान जी ने सदस्यों को दान देने की अपील भी की। इसके साथ शर्मा जी ने समाज के सदस्यों श्री ब्रहमदेव गुलाटी, श्री सूर्यदेव चावला सहित श्री ज्ञानचन्द गुप्त जी विषयक समाचार भी दिये। श्री ज्ञानचन्द गुप्त जी सितम्बर, 2018 में एक दुर्घटना से पीड़ित होने के बाद स्वस्थ होकर आज सत्संग में सपत्नीक पधारे थे। इसके बाद संगठन सूक्त एवं शान्तिपाठ हुआ और सत्संग के समाप्त होने की घोषणा की गई। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001
फोनः09412985121

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