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निर्मोही के कहानी संग्रह का लोकार्पण

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07 Apr 21
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डॉ. प्रभात कुमार सिंघल, कोटा

निर्मोही के कहानी संग्रह का लोकार्पण

शोध पत्र उनके विषय वैविध्य को विस्तार देकर  ऊंचाई पर खड़ा करते हैं--डॉ. दीपक

 रंगबाड़ी रोड़ स्थित गौतम ऋषि सभागार में जितेन्द्र निर्मोही के राजस्थानी भाषा साहित्य के कहानी संग्रह" कफ़न को पजामो अर दूजी कथावां" का लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए राजकीय सार्वजनिक पुस्तकालयाध्यक्ष डॉ. दीपक कुमार श्रीवास्तव में कहा निर्मोही जी का उल्लेख बार बार इंटरनेशनल बुलेटिन और मेगज़ीन में आना कोटा के साहित्यकार जगत के लिए फख्र की बात है। सौ से अधिक शोध पत्र उनके विषय वैविध्य को विस्तार देकर उन्हें ऊंचाई पर खड़ा करते हैं। एक ऐसा साहित्यकार जिसका नाम साहित्य की विविध विधाओं के साथ शोध कार्य में उल्लेख किया जाता हो बहुत कम होते हैं, जितेन्द्र निर्मोही उन बिरलो में से एक है। शोधकर्ताओं इनके व्यक्तित्व पक्ष को भी समझने की आवश्यकता है।

          समारोह के मुख्य वक्ता कथाकार-समीक्षक विजय जोशी ने कहा कि हाड़ौती अंचल के गद्य साहित्य ने राजस्थानी भाषा साहित्य को समृद्ध किया है। वर्ष1999 में ज्ञान भारती संस्था कोटा की ओर से निरन्तर होने वाले आयोजनों ने इस अंचल के राजस्थानी साहित्य को बदलाव को दिशा दी जिससे इस अंचल के राजस्थानी साहित्य का विकसित स्वरूप सामने आया। विजय जोशी ने कहा कि जितेन्द्र निर्मोही की यह कथा-कृति हाड़ौती अंचल में कथा के बदलाव का युग बोध कराती है वहीं जीवन और जगत् से जुड़ी इन कहानियों में संस्मरण और रेखाचित्र शैली में बातपोशी और कथा-कहन की परम्परा रूप सामने आता है।

     कार्यक्रम का प्रारंभ विष्णु विश्वास की सरस्वती वंदना से हुआ।नंद सिंह पंवार द्वारा विषय प्रवर्तन कर जितेन्द्र निर्मोही के कृतित्व व व्यक्तित्व की जानकारी दी। डॉ. रामावतार मेघवाल ने संचालन करते हुए कहा कि जितेन्द्र निर्मोही देश के श्रेष्ठ कथाकारों में जाने जाते हैं। शीर्ष कहानी " कफ़न को पजामो" का पत्रिका "हंस" में प्रकाशित होकर उस पर चर्चा होना उन्हें अलग ही खड़ा करता है।

 "कफ़न को पजामो अर दूजी कथावां" पर बोलते हुए वक्ता जगदीश भारती ने कहा यह संकलन भविष्य में राजस्थानी भाषा साहित्य के लिए कथा जगत में मिल का पत्थर साबित होगा। संकलन की पंद्रह कथाओं में विषय वैविध्य है। निर्मोही जी ‌कथाओ में सर्वहारा वर्ग की पीड़ा होती है,खास बात यह है इन कथाओं की नायिका भी निम्न वर्ग की है। यह संग्रह सामाजिक विद्रुपताओं पर सीधे सीधे चोट करता है।

 वरिष्ठ साहित्यकार पं लोक नारायण शर्मा ने "कफ़न को पजामो अर दूजी कथावां" संग्रह को आम कथाओं से हटकर बताया उन्होंने कहा इन कथाओं के पात्रों के कथन में जो संवेदनाएं है वह पाठक को सोचने पर मजबूर करती हैं।

      आयोजन के विशिष्ट अतिथि सुरेन्द्र शर्मा एडवोकेट ने संकलन की कथाओं को अपने परिवेश के आसपास की स्मृति से जुड़ी कथाओं का संग्रह बताया।

        अपनी रचनाप्रक्रिया पर बोलते हुए जितेन्द्र निर्मोही ने कहा जो मैं अपने आस पास देखता हूं वही लिखता हूं" मलाला को हलोलो" कहानी को मैंने मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवियों को बताया फिर संग्रह में लिया है। मैं प्रकृति समाज को जीकर लिखता हूं। मेरी एक कहानी" एक नज़र का वो प्यार" देश की हर प्रतिनिधि पत्रिका प्रकाशित हुई और चर्चित भी हुई है। आजमगढ़ के प्रसिद्ध शायर मधुर नज्मी ने इसे उपन्यास बनाने को कहा है।लेखक जो देखता है वह लिखता है।यह कहानी"जननायक" में भी प्रकाशित हुई थी।

         मुख्य अतिथि योगेन्द्र शर्मा ने जितेन्द्र निर्मोही को लेखन का एक लम्बा अनुभव इनके लेखन से छोटे बड़े साहित्यकार सभी प्रेरणा पाते हैं। इनका लेखन आदर्शोंमुखी और सांस्कृतिक विरासत जैसा है। कोटा महानगर के ही देश के जाने-माने साहित्यकार इनके साहित्य को सन्मान देते हैं ।ये देश के उन महनीय लेखकों में से हैं जिनका अनुकरण किया जाता है।

      विद्वान ‌प्रो. के बी भारतीय ने कहा कि "कफ़न को पजामो" के संवाद कहानी" उसने कहा था" और डॉ पानू खोलिया की कथा"इर्द-गिर्द" जैसे, मुझे लगता है एक दिन ये कथा लेखन से ही अकादमी उदयपुर का सर्वोच्च सम्मान मीरां पुरस्कार प्राप्त करेंगे।

        आयोजन की 

 धन्यवाद देते हुए वरिष्ठ साहित्यकार किशन वर्मा ने कहा अब साहित्य पर शोध चर्चा चिंता और मनन करने की आवश्यकता है ।आज के आयोजन के लिए मैं व्यक्तिश शिशु भारती शिक्षण संस्थान कोटा एवं आर्यावर्त साहित्य समिति का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं। संचालन डॉ. रामावतार सागर ने किया।


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