“ऋषि दयानन्द ऐसी मातायें चाहते थे जो अपनी सन्तानों को प्राचीन ऋषियों जैसा बनायेः आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ”

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24 Oct 19
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-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

“ऋषि दयानन्द ऐसी मातायें चाहते थे जो अपनी सन्तानों को  प्राचीन ऋषियों जैसा बनायेः आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ”

वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून के पांच दिवसीय शरदुत्सव में दिनांक 18-10-2019 को महिला-सम्मेलन का अयोजन किया गया। कार्यक्रम आश्रम के सभागार में पूर्वान्ह 10.00 बजे आरम्भ हुआ। प्रथम प्रस्तुति आर्य भजनोपदेशक श्री आजादसिंह आजाद जी का एक भजन था। इसके बाद  आश्रम के विद्यालय की छात्रा अनामिका ने कविता पाठ किया जिसके शब्द थे ‘सम्मान करो नारी का इसके दर्द को पहचानों’। यह एक प्रभावशाली कविता थी जिसमें नारी के जीवन के त्याग व तप का परिचय दिया गया था। महिला सम्मेलन का संचालन आर्य विदुषी श्रीमती सुरेन्द्र अरोड़ा जी ने किया। तपोवन विद्या निकेतन की छात्रा वैष्णवी ने ‘माता निर्माता होती है’ इस विषय पर अपने धाराप्रवाह विचार व्यक्त किये। अपने सम्बोधन के बीच उन्होंने कहा कि यदि नारी न होती तो पुरुष को परिवार बनाने की आवश्यकता न होती। नारी के होने से परिवार का वातावरण स्वर्ग के समान बनता होता है। इस प्रस्तुति के बाद द्रोणस्थली कन्या गुरुकुल की छात्राओं ने मंगलाचरण का गान किया। इसी गुरुकुल की एक कन्या ने नारी जाति के जीवन के विभिन्न पक्षों को प्रभावशाली रूप में श्रोताओं के सामने रखा जो प्रायः हम सभी की दृष्टि से ओझल रहते हैं। एक छात्रा ने एक कविता प्रस्तुत की जिसके कुछ शब्द थे ‘नारी यदि देश की जाग जाये तो युग स्वयं ही बदलता चला जायेगा।’

 

      माता विद्या आर्या जी ने एक भजन गाया जिसके बोल थे ‘जागो तो एक बार आर्यों जागो तो’ इस भजन के बाद आगरा से पधारे वैदिक विद्वान पंडित उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी ने महिला सम्मेलन में अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि नारी शिक्षा पर ऋषि दयानन्द ने सर्वाधिक बल दिया। इसके परिणामस्वरूप आज हमारे पास सूर्यादेवी चतुर्वेदा जैसी वेद विदुषी नारियां हैं। आचार्य जी ने कहा कि स्त्रियां पुरुषों के समान ही वेद पढ़ सकती हैं। इसको आर्यसमाज ने व्यवहारिक रूप देते हुए कन्या गुरुकुलों की श्रृखंला स्थापित की है जहां अध्ययन करने के बाद हमें अनेक वेद विदुषी देवियां प्राप्त हुईं हैं। आचार्य जी ने अनेक वेद विदुषी नारियों के नामों का उल्लेख भी किया। ऋषि दयानन्द के विचारों के अनुरूप आर्यसमाज के अनुयायियों ने देश के अनेक भागों में कन्या गुरुकुल स्थापित किये हैं जिनके द्वारा वैदिक मान्यताओं का प्रचार किया जाता है। आचार्य जी ने कहा कि हमारे देश के विद्यालयों में वेद और आर्यसमाज के विचारों के अनुरूप शिक्षा पद्धति नहीं है। इससे बच्चे अच्छे संस्कारों से वंचित रहते हैं। आचार्य जी ने दिल्ली के मिराण्डा कालेज की चर्चा की और वहां के छात्रों पर आधुनिकता के प्रभाव, उनके द्वारा सिगरेट व ड्रग्स आदि के सेवन से श्रोताओं को परिचित कराया। विद्वान आचार्य ने कहा कि एक अध्ययन के अनुसार इस कालेज की 75 प्रतिशत लड़किया नशा करती हैं। ऋषि दयानन्द स्त्री व पुरुषों दोनों के द्वारा नशीले पदार्थों के सेवन के विरुद्ध थे।

 

                आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी ने होटलों में महिलाओं द्वारा नशा करना, डांस करना और पार्टियों में मर्यादा विरुद्ध आचरण करने को वैदिक परम्पराओं के विरुद्ध और नारी जाति सहित देश एवं धर्म के लिए अहितकर बताया। आचार्य जी ने कहा कि आर्य महिलाओं को इन विकृतियों का सामना करना है एवं इनका सुधार करना है। विद्वान वक्ता श्री कुलश्रेष्ठ ने कहा कि ऋषि दयानन्द ऐसी माता चाहते थे जो अपनी सन्तानों का प्राचीन काल के महान ऋषियों के अनुरूप निर्माण करे। आचार्य जी के अनुसार हमारा ध्यान विकृतियों की ओर नहीं जा रहा है। आचार्य जी ने बताया कि मुम्बई के घाटकोपार क्षेत्र की एक आधुनिक महिला ने आर्यसमाज के सम्पर्क में आकर आधुनिक जीवन का त्याग कर दिया। यह महिला गरीब दलितों व पीड़ितों की बस्तियों में जाती है और वहां के बच्चों को शिक्षित व संस्कारित करती है। इस महिला ने झुग्गी-झोपड़ियों के बच्चों को साफ-सफाई तथा प्रतिदिन स्नान का महत्व बताया। इन लोगों को कंबल व वस्त्र आदि बांटे। इन्होंने वर्षों तक ऐसा किया। आर्यसमाज के एक उत्सव में इस महिला ने अधिकारियों से एक घंटे का समय मांगा। इन्होंने उत्सव में आर्य सज्जनों को बताया कि किस तरह से उनके इस कार्य से झुग्गी-झोपड़ियों के बच्चे व उनके परिवारों के जीवन का सुधार एवं कल्याण हुआ है। आर्यसमाज के सभी सदस्य उनके विचारों को सुनकर दंग रह गये। उस महिला ने समाज मन्दिर में अपने अनुभव बताते हुए कहा था कि उसे इस कार्य से आत्मसन्तुष्टि और प्रसन्नता का अनुभव हुआ है। आचार्य जी ने कहा कि ऐसे लोग समाज में हों तो समाज का कल्याण हो सकता है। इसके बाद बहिन मंजु गुप्ता जी का एक संक्षिप्त संबोधन हुआ जिसमें उन्होंने बच्चों को संस्कारों एवं सत्कर्मों को करने की प्रेरणा की।

 

                आर्य विद्वान श्री शैलेशमुनि सत्यार्थी जी ने अपना सम्बोधन गायत्री मन्त्र बोलकर आरम्भ किया। उन्होंने महिलाओं के नाम के साथ देवी शब्द लगाने की परम्परा का उल्लेख किया। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि एक पत्नी अपने पति को भोजन करा रही थी। पति को खीर प्रिय थी। पति ने पूछा कि क्या आज खीर बनाई है? पत्नी ने कहा कि हां बनाई हैं। पति को खीर अच्छी लगी और वह बार-बार खीर मांगते रहे। पति के खाने के बाद पत्नियां भोजन करती हैं। घर में सबके खा लेने के बाद जो बचा-खुचा भोजन बचता है उसे खा कर ही गृहणियां सो जाती है। पतियों को पता भी नहीं होता कि उसके लिए पर्याप्त भोजन बचा या नहीं। सभी पत्नियां घर के सब सदस्यों को भोजन खिला कर ही बचाखुचा भोजन खाती हैं और प्रसन्न रहती हैं। कभी किसी से शिकायत नहीं करती। इसीलिये नारियों के नाम के साथ देवी शब्द लगाते हैं। श्री शैलेशत्रमुनि सत्यार्थी जी ने कहा कि घर की मातायें ब्रह्मा के समान हैं। उन्होंने कहा कि यदि आपको अधिक सुख की कामना हैं तो आप परिवार की माताओं व बहनों को भोजन, वस्त्र, आभूषण आदि से सन्तुष्ट रखें। इन तीनों वस्तुओं में स्त्रियों की रुचि होती है। आचार्य सत्यार्थी जी ने कहा कि महिलाओं का मन अति कोमल तथा कठोर भी होता है। उन्होंने कहा कि माता अपनी सन्तानों की रक्षा व पोषण के लिये प्राणों का त्याग तक कर देतीं हैं। उन्होंने जापान के भूकम्प का एक उदाहरण देकर बताया कि वहां एक माता ने अपनी बच्ची को अपने वक्षस्थल से चिपका कर उल्टी लेट गई। भवन की छत उस पर गिरी जिससे माता तो मर गई परन्तु बाद में उसकी बच्ची सुरक्षित बाहर निकाल ली गई। नारी का यह त्याग ही संसार में उसे महान व आदर्श रूप प्रदान करता है। उन्होंने बताया कि माता और सन्तान का एक अद्भुद सम्बन्ध होता है। जो बात मनुष्य अपने पिता व अन्य लोगों को कहने में संकोच करता है उसे वह अपनी माता को बता देता है। वह अपने सारे दुःख भी अपनी माता को बता देता है। सत्यार्थी जी ने इसे माता की विशेषता बताया। माता का सन्तान पर जो भार है वह भूमि माता से भी अधिक है। इससे सम्बन्धित महाभारत के यक्ष-युधिष्ठिर संवाद की उन्होंने चर्चा की।

 

                महिला सम्मेलन में द्रोणस्थली कन्या गुरुकुल की कन्याओं का एक सामूहिक भजन हुआ जिसके बोल थे ‘सदियों की गहरी निद्रा में सोया देश जगाया जिसने दयानन्द ने दयानन्द ने।’ भजन की समाप्ती पर डीएवी महाविद्यालय देहरादून की संस्कृत की आचार्या डा0 श्रीमती सुखदा सोलंकी जी का सम्बोधन हुआ। उन्होंने कहा कि माता जैसी होगी अर्थात् जैसे उसके गुण, कर्म व स्वभाव होंगे वैसे ही वह अपनी सन्तानों का निर्माण करेगी। परिवार में माता ही अपनी सन्तानों का मार्गदर्शन करती है। डा0 सोलंकी जी ने स्त्री जाती के जीवन में आयी विकृतियों पर भी प्रकाश डाला और उनकी यथार्थ स्थिति से श्रोताओं को अवगत कराया। बहिन सुखदा सोलंकी जी ने नारी के गौरव पर एक कविता भी सुनाई जिसमें प्राचीन आदर्श माताओं के गुणों व उनकी त्याग व तपस्या का उल्लेख था। आचार्या सुखदा सोलंकी जी ने कहा कि पति कैसा भी हो, पत्नी को अपने पति की सेवा करनी चाहिये। ऐसा करने पर ही नारी का धर्मपारायणा होना नाम सार्थक होता है। बहिन जी ने स्वामी श्रद्धानन्द जी का अपनी धर्मपत्नी के साथ संवाद का उल्लेख किया और उसे इसके प्रमाण में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि स्वामी श्रद्धानन्द को महान बनाने में उनकी पत्नी का बड़ा योगदान था। आचार्या जी ने कहा कि यदि स्त्रियां धर्मपारायणा नारी नहीं बनती तो वह पाप की भागी होती हैं। विदुषी आचार्या सोलंकी जी ने कहा कि महिला चाहे तो वह कुछ भी कर सकती है। उन्होंने सावित्री-सत्यवान की कथा को आधुनिक रूप में प्रस्तुत किया और बताया की उनके धर्मपारायणा होने के गुण से ही सत्यवान को जीवन-दान हता व उन्हें दीर्घायु प्राप्त हुई थी। आचार्या सुखदा जी ने नारी वा माताओं को वेद की शिक्षाओं के अनुरूप नारी व माता बनने की प्रेरणा की।

 

                वृद्ध माता श्रीमती सरोज जी ने अपने सम्बोधन में नारी जीवन के अनेक पक्षों की चर्चा करते हुए कुछ उदाहरण भी दिये। उन्होंने परिवारों में बच्चों की संस्कारहीनता पर प्रकाश डाला और इस स्थिति पर अपना गहरा दुःख जताया। डा0 विनोद कुमार शर्मा, प्राकृतिक चिकित्सक ने कहा कि हवन पर्यावरण की शुद्धि का साधन है। अग्निहोत्र हवन से मनुष्य के साध्य एवं असाध्य रोग भी ठीक होते हैं। हमें यज्ञ को जानना व समझना है तथा इसका लाभ लेना है। आचार्य विनोद कुमार शर्मा ने कहा कि भूमि खोद कर उसमें यज्ञकुण्ड बना कर यज्ञ करने से विशेष लाभ होता है। यही शास्त्रीय पद्धति भी है। यज्ञ को आचार्य शर्मा ने विश्व का श्रेष्ठतम कर्म बताया। उन्होंने कहा कि यज्ञ करने वालों की विशेष वेशभूषा होनी चाहिये।

 

                द्रोणस्थली कन्या गुरुकुल की प्राचार्या डा0 अन्नपूर्णा जी ने अपने सम्बोधन में कहा कि भूमि हमारी माता है और हम सब मनुष्य इसके पुत्र व पुत्रियां हैं। उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति में माता, पिता, आचार्य तथा विद्वान आदि देव कहे गये हैं। आचार्या जी ने कहा कि जो किसी दूसरे को अपनी वस्तु व सेवायें देता है वह देव और जो देती है वह देवी कहलाती है। दूसरे के पदार्थ व धन को छीनने वाले राक्षस होते हैं। उन्होंने कहा कि नारी पूजा के योग्य है। परिवारों में सन्तानो का निर्माण करने तथा संस्कार देने वाली नारी ही होती है। नारी ही सभी ऋषि-मुनियों, राम, कृष्ण, दयानन्द, बिस्मिल, शिवाजी, राणाप्रताप तथा गुरु गोविन्द सिंह जी की जननी है। वह नरक का द्वार नही है। यदि कोई ऐसा मानता है तो यह उसका अज्ञान व अविवेक है। आचार्या जी ने कहा कि नरक के तीन द्वार हैं काम, क्रोध तथा मोह। नरक के इन द्वारों से मनुष्यों को दूर रहना चाहिये।

 

                आचार्या डा0 अन्नपूर्णा जी ने कहा कि जिसकी माता विद्वान होने के साथ धार्मिक होती है, वह मनुष्य बड़ा भाग्यवान होता है। संसार में सबसे बड़ी शिक्षादात्री माता होती है। आचार्या जी ने इतिहास में माता मदालसा का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि उन्होंने अपने संकल्प से अपने प्रथम 6 पुत्रों को ब्रह्मर्षि बनाया था। माता मदालसा ने वंश परम्परा को जारी रखने के लिये अपने सातवें पुत्र को राजवंश के संस्कार दिये जिससे वह सुयोग्य राजा बने। आचार्या जी ने कहा कि माता कौशल्या जी प्रतिदिन यज्ञ किया करती थी। इसके परिणाम से ही राम आदर्श राजा बने थे। उन्होंने कहा कि ऋषि दयानन्द के हम पर अनगिनत ऋण हैं जिन्हें हमें कभी नहीं उतार सकते। उन्होंने बताया कि ऋषि दयानन्द के कारण ही नारी को देश में उच्च स्थान प्राप्त हुआ है।

आचार्या अन्नपूर्णा जी ने इतिहास प्रसिद्ध भारती एवं मण्डनमिश्र के बीच हुए शास्त्रार्थ का उल्लेख कर नारी जाति के महत्व को बताया। आचार्या जी ने इतिहास प्रसिद्ध नारियों रानी लक्ष्मीबाई की वीरता तथा पन्ना धायी द्वारा देशहित में अपने नन्हें पुत्र के बलिदान का भी उल्लेख किया। उन्होंने पं0 रामप्रसाद बिस्मिल की माता के गुणों का भी वर्णन किया। आचार्या जी ने कहा कि हमारे देश की नारियां एवं मातायें आदर्श जीवन व चरित्र की धनी रही हैं। डा0 अन्नपूर्णा जी ने पाश्चात्य बुराईयों से प्रभावित आधुनिक नारी की चर्चा की और उसके गुण-दोषों पर प्रकाश डाला। अपने व्याख्यान को विराम देने से पूर्व उन्होंने कहा कि सन्तानों को संस्कार देने तथा उनके चरित्र का निर्माण मुख्यतः माता-पिता ही करते हैं। माता का महत्व निर्विवाद है। उन्होंने कहा कि परमात्मा के दिए ज्ञान वेदों तथा मनुस्मृति में नारी का गौरवगान किया गया है। इसके बाद शान्तिपाठ के साथ महिला-सम्मेलन समाप्त हुआ। नारी सम्मेलन का संचालन श्रीमती सुरेन्द्र अरोड़ा जी ने बहुत उत्तमता से किया। ओ३म् शम्।

माता विद्या आर्या जी ने एक भजन गाया जिसके बोल थे ‘जागो तो एक बार आर्यों जागो तो’ इस भजन के बाद आगरा से पधारे वैदिक विद्वान पंडित उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी ने महिला सम्मेलन में अपने विचार रखे। उन्होनंे कहा कि नारी शिक्षा पर ऋषि दयानन्द ने सर्वाधिक बल दिया। इसके परिणामस्वरूप आज हमारे पास सूर्यादेवी चतुर्वेदा जैसी वेद विदुषी नारियां हैं। आचार्य जी ने कहा कि स्त्रियां पुरुषों के समान ही वेद पढ़ सकती हैं। इसको आर्यसमाज ने व्यवहारिक रूप देते हुए कन्या गुरुकुलों की श्रृखंला स्थापित की है जहां अध्ययन करने के बाद हमें अनेक वेद विदुषी देवियां प्राप्त हुईं हैं। आचार्य जी ने अनेक वेद विदुषी नारियों के नामों का उल्लेख भी किया। ऋषि दयानन्द के विचारों के अनुरूप आर्यसमाज के अनुयायियों ने देश के अनेक भागों में कन्या गुरुकुल स्थापित किये हैं जिनके द्वारा वैदिक मान्यताओं का प्रचार किया जाता है। आचार्य जी ने कहा कि हमारे देश के विद्यालयों में वेद और आर्यसमाज के विचारों के अनुरूप शिक्षा पद्धति नहीं है। इससे बच्चे अच्छे संस्कारों से वंचित रहते हैं। आचार्य जी ने दिल्ली के मिराण्डा कालेज की चर्चा की और वहां के छात्रों पर आधुनिकता के प्रभाव, उनके द्वारा सिगरेट व ड्रग्स आदि के सेवन से श्रोताओं को परिचित कराया। विद्वान आचार्य ने कहा कि एक अध्ययन के अनुसार इस कालेज की 75 प्रतिशत लड़किया नशा करती हैं। ऋषि दयानन्द स्त्री व पुरुषों दोनों के द्वारा नशीले पदार्थों के सेवन के विरुद्ध थे।

 

                आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी ने होटलों में महिलाओं द्वारा नशा करना, डंास करना और पार्टियों में मर्यादा विरुद्ध आचरण करने को वैदिक परम्पराओं के विरुद्ध और नारी जाति सहित देश एवं धर्म के लिए अहितकर बताया। आचार्य जी ने कहा कि आर्य महिलाओं को इन विकृतियों का सामना करना है एवं इनका सुधार करना है। विद्वान वक्ता श्री कुलश्रेष्ठ ने कहा कि ऋषि दयानन्द ऐसी माता चाहते थे जो अपनी सन्तानों का प्राचीन काल के महान ऋषियों के अनुरूप निर्माण करे। आचार्य जी के अनुसार हमारा ध्यान विकृतियों की ओर नहीं जा रहा है। आचार्य जी ने बताया कि मुम्बई के घाटकोपार क्षेत्र की एक आधुनिक महिला ने आर्यसमाज के सम्पर्क में आकर आधुनिक जीवन का त्याग कर दिया। यह महिला गरीब दलितों व पीड़ितों की बस्तियों में जाती है और वहां के बच्चों को शिक्षित व संस्कारित करती है। इस महिला ने झुग्गी-झोपड़ियों के बच्चों को साफ-सफाई तथा प्रतिदिन स्नान का महत्व बताया। इन लोगों को कंबल व वस्त्र आदि बांटे। इन्होंने वर्षों तक ऐसा किया। आर्यसमाज के एक उत्सव में इस महिला ने अधिकारियों से एक घंटे का समय मांगा। इन्होंने उत्सव में आर्य सज्जनों को बताया कि किस तरह से उनके इस कार्य से झुग्गी-झोपड़ियों के बच्चे व उनके परिवारों के जीवन का सुधार एवं कल्याण हुआ है। आर्यसमाज के सभी सदस्य उनके विचारों को सुनकर दंग रह गये। उस महिला ने समाज मन्दिर में अपने अनुभव बताते हुए कहा था कि उसे इस कार्य से आत्मसन्तुष्टि और प्रसन्नता का अनुभव हुआ है। आचार्य जी ने कहा कि ऐसे लोग समाज में हों तो समाज का कल्याण हो सकता है। इसके बाद बहिन मंजु गुप्ता जी का एक संक्षिप्त संबोधन हुआ जिसमें उन्होंने बच्चों को संस्कारों एवं सत्कर्मों को करने की प्रेरणा की।

 

                आर्य विद्वान श्री शैलेशमुनि सत्यार्थी जी ने अपना सम्बोधन गायत्री मन्त्र बोलकर आरम्भ किया। उन्होंने महिलाओं के नाम के साथ देवी शब्द लगाने की परम्परा का उल्लेख किया। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि एक पत्नी अपने पति को भोजन करा रही थी। पति को खीर प्रिय थी। पति ने पूछा कि क्या आज खीर बनाई है? पत्नी ने कहा कि हां बनाई हैं। पति को खीर अच्छी लगी और वह बार-बार खीर मांगते रहे। पति के खाने के बाद पत्नियां भोजन करती हैं। घर में सबके खा लेने के बाद जो बचा-खुचा भोजन बचता है उसे खा कर ही गृहणियां सो जाती है। पतियों को पता भी नहीं होता कि उसके लिए पर्याप्त भोजन बचा या नहीं। सभी पत्नियां घर के सब सदस्यों को भोजन खिला कर ही बचाखुचा भोजन खाती हैं और प्रसन्न रहती हैं। कभी किसी से शिकायत नहीं करती। इसीलिये नारियों के नाम के साथ देवी शब्द लगाते हैं। श्री शैलेशत्रमुनि सत्यार्थी जी ने कहा कि घर की मातायें ब्रह्मा के समान हैं। उन्होंने कहा कि यदि आपको अधिक सुख की कामना हैं तो आप परिवार की माताओं व बहनों को भोजन, वस्त्र, आभूषण आदि से सन्तुष्ट रखें। इन तीनों वस्तुओं में स्त्रियों की रुचि होती है। आचार्य सत्यार्थी जी ने कहा कि महिलाओं का मन अति कोमल तथा कठोर भी होता है। उन्होंने कहा कि माता अपनी सन्तानों की रक्षा व पोषण के लिये प्राणों का त्याग तक कर देतीं हैं। उन्होंने जापान के भूकम्प का एक उदाहरण देकर बताया कि वहां एक माता ने अपनी बच्ची को अपने वक्षस्थल से चिपका कर उल्टी लेट गई। भवन की छत उस पर गिरी जिससे माता तो मर गई परन्तु बाद में उसकी बच्ची सुरक्षित बाहर निकाल ली गई। नारी का यह त्याग ही संसार में उसे महान व आदर्श रूप प्रदान करता है। उन्होंने बताया कि माता और सन्तान का एक अद्भुद सम्बन्ध होता है। जो बात मनुष्य अपने पिता व अन्य लोगों को कहने में संकोच करता है उसे वह अपनी माता को बता देता है। वह अपने सारे दुःख भी अपनी माता को बता देता है। सत्यार्थी जी ने इसे माता की विशेषता बताया। माता का सन्तान पर जो भार है वह भूमि माता से भी अधिक है। इससे सम्बन्धित महाभारत के यक्ष-युधिष्ठिर संवाद की उन्होंने चर्चा की।

-मनमोहन कुमार आर्य

पताः 196 चुक्खूवाला-2

देहरादून-248001

फोनः 09412985121


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