“हमने ईश्वरप्रदत्त वेदज्ञान की उपेक्षा की है: आचार्य कुलश्रेष्ठ”

( Read 1608 Times)

23 Oct 19
Share |
Print This Page

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

“हमने ईश्वरप्रदत्त वेदज्ञान की उपेक्षा की है: आचार्य कुलश्रेष्ठ”

वैदिक साधन आश्रम तपोवन देहरादून का पांच दिवसीय शरदुत्सव रविवार 20-10-2019 को सोल्लास सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर सामवेद पारायण यज्ञ किया गया जिसके ब्रह्मा अमृतसर से पधारे वैदिक विद्वान एवं विश्व प्रसिद्ध गीतकार पं. सत्यपाल पथिक जी थे। यज्ञ में मन्त्रोचार गुरुकुल-पौंधा-देहरादून के दो ब्रह्मचारियों ने किया। वेदोपदेश के लिये आगरा के वैदिक विद्वान पंडित उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी को आमंत्रित किया गया था। इस अवसर आर्य भजनोपदेशक श्री रुहेलसिंह आर्य तथा श्री आजाद सिंह आजाद ने भी भजनों के द्वारा अपनी सेवायें ऋषिभक्तों को दीं। रविवार दिनांक 20-10-2019 को यज्ञ की पूर्णाहुति सम्पन्न हुई। यज्ञ चार वृहद यज्ञ कुण्डों में किया गया। मुख्य यजशाला में आश्रम के प्रधान श्री दर्शनकुमार अग्निहोत्री सहित अनेक लोग यजमान के आसन पर विराजमान हुए। अनेक यजमान सपत्नीक भी थे। वैदिक मर्यादा व नियम है कि पति-पत्नी सहित परिवार के सभी सदस्यों को मिलकर यज्ञ करना चाहिये। अन्तर्राष्ट्रीय कवि डा0 सारस्वत मोहन मनीषी जी भी अपने चार सहयोगी आर्य कवियों के साथ दिल्ली से पधार कर यज्ञ में उपस्थित हुए एवं सबने यज्ञ में आहुतियां दीं। यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद भजनोपदेशक श्री रुहेल सिंह आर्य का भजन तथा श्री उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी का यज्ञ पर व्याख्यान हुआ। इस अवसर पर सभी विद्वानों का शाल, स्मृति-चिन्ह तथा ओ३म् पट्टे से सम्मान किया गया। यज्ञ के बाद का कार्यक्रम आश्रम के भव्य एवं विशाल सभागार में हुआ।

 

                सभागार में कार्यक्रम का आरम्भ श्री रुहेल सिंह आर्य के भजनों से हुआ। उनका पहला भजन था जिसकी एक पंक्ति थी ‘माता को जो वचन दिया जान के साथ निभाया, जलियावाला बाग का बदला लेकर के दिखलाया।’ श्री आर्य ने कहा कि देश को आजादी चरखा चलाने से नहीं अपितु क्रान्तिकारियों के खून से मिली है। श्री रुहेल सिंह आर्य ने एक अन्य भजन भी सुनाया जिसके बोल थे ‘नौजवानों हो खड़े जाति को जगाने के लिये, नाम वेदों का जनाने व बचाने के लिये।’ इसके बाद श्री उम्मेद सिंह विशारद जी ने भी एक भजन प्रस्तुत किया जिसके बोल थे ‘मतकर तू अभिमान रे बन्दे मत कर तू अभिमान।’ द्रोणस्थली कन्या गुरुकुल की आचार्या और उनकी शिष्यायें भी उत्सव में पधारी थीं। इन कन्याओं के दो भजन हुए। प्रथम भजन के बोल थे ‘तेरा जन्म सफल हो जाये बन्दे मन में ओ३म् बसा ले।’ दूसरे भजन के बोल थे ‘आंखे मूंद के जोड़ के हाथ प्रभु जी तेरी शरण हम आये, दाता जी तेरी शरण में हम आये। मेरी विनती सुनो जी मेरे नाथ प्रभु जी तेरी शरण में आये।’ इन भजनों के बाद आर्य विद्वान पंडित उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी का व्याख्यान हुआ। उन्होंने कहा कि वेद ईश्वर का दिया हुआ ज्ञान है। उन्होंने श्रोताओं को कहा कि आपने वेद खरीदें नहीं होंगे? उन्होंने पूछा कि क्या आपने वेद खरीदने का कभी विचार किया है? यदि आप नहीं खरीदेंगे तो आपके परिवार के सदस्य और सन्ततियां धर्म का ज्ञान कहां से प्राप्त करेंगी? उन्होंने सभी श्रोताओं को कहा कि यदि वह वेद को ईश्वरीय ज्ञान मानते हैं, जो कि वस्तुतः है, तो आप वेदों का सैट खरीदकर उसे अपने घर में स्थापित कर लें। आप वेदों को पढ़े और उस ज्ञान को अपने कर्मों में परिवर्तित करें। आचार्य कुलश्रेष्ठ जी ने कहा कि यज्ञ श्रेष्ठतम कर्म है। उन्होंने पूछा कि क्या आप देनिक यज्ञ करते हैं? यदि नहीं करते हैं तो यज्ञ करना आरम्भ कर दीजिये। यज्ञ करने से आपको लाभ मिलेगा। केवल वेदोपदेश सुनने से लाभ नहीं होता अपितु पढ़े व सुने हुए ज्ञान के अनुरूप कर्म करने से लाभ होता है। आचार्य जी ने गधे का उदाहरण दिया और कहा कि गधे के ऊपर यदि चन्दन की लकड़ी, सोना व धन सम्पदा रखी हो तो उसे उसका बोध नहीं होता और उसे उसका कोई लाभ भी नहीं होता। आचार्य जी ने कहा कि गधे जैसी ही स्थिति हमारी है। आचार्य जी ने सभी श्रोताओं को वेद खरीदने और उसे अपने गृह में स्थापित करने के लिये प्रतिज्ञा करने को कहा। आप यह भी प्रतिज्ञा करें कि आप प्रतिदिन यज्ञ करेंगे और न्यूतन 16 आहुतियां यज्ञाग्नि में दिया करेंगे।

                                                                  

                आचार्य जी ने प्रश्न किया कि हिन्दू समाज के पतन का क्या कारण है? उन्होंने कहा कि हमने वेद ज्ञान के अध्ययन की उपेक्षा की और उसका आचरण नहीं किया। आचार्य जी ने कहा कि अंग्रेजों ने दो शताब्दियों के लगभग देश पर राज किया। वह अपने ज्ञान को कर्म में परिवर्तित करते थे। वह सात समुद्र पार से आकर हमें गुलाम बना गये और हम पर राज कर चले गये। आचार्य जी ने कहा कि हमारे बन्धु बीड़ी, सिगरेट, अंडे, मांस आदि का सेवन करते हैं। यह सभी पदार्थ हानिकारक हैं और हमारे मन एवं शरीर को दूषित करते हैं। इनसे अनेक प्रकार के रोग होते हैं। इनके सेवन व ऐसे ही कारणों से हमारा पतन हुआ था और हम मुसलमानों और अंग्रेजों के गुलाम बने थे।

 

                आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी ने कहा कि वेद मनुर्भव का सन्देश देता है। वेद कहता है कि तू मनुष्य है, मनुष्य बन। हिन्दू, सिख, ईसाई या मुसलबान बनने की शिक्षा वेद में नहीं है। हमें ईसाई, मुसलमान, बौद्ध, जैन या सिख नहीं बनना है। हममे मनुष्यता होगी तभी हम मनुष्य बन सकते हैं। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि ईश्वर हमें सत्य का ज्ञान कराये और हम सत्य का आचरण करें। आचार्य जी ने कहा कि हम आचमन करते हुए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह हमें यश प्रदान करे। उन्होंने कहा कि हमें मनुष्य जीवन केवल रोटी खाने, बच्चे पैदा करने और मरने के लिये नहीं मिला है। हमें यह मानव जीवन परमात्मा ने शुभ काम के द्वारा यश अर्जित करने के लिये दिया है। आचार्य जी ने आचमन के मन्त्र में आये ‘‘श्री” शब्द का भी उल्लेख किया और कहा कि धर्म पूर्वक अर्जित धन को श्री कहते हैं। मनुष्य के मानवीय गुण भी श्री कहलाते हैं। वैदिक विद्वान आचार्य श्री कुलश्रेष्ठ ने कहा कि हम पशुओं से डरते नहीं है। हमें उन पर विश्वास होता है। इसके विपरीत रात के अन्धेरे में मनुष्य मनुष्य को देख कर डरता है। यह समाज की दुर्दशा की अवस्था है। आदमी आदमी से भयभीत है। इंसानियत समाप्त हो रही है। हम प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि ईश्वर हमें मानवीय गुणों से ओतप्रोत करे।

 

                आचार्य कुलश्रेष्ठ जी ने कहा कि भारत विश्व गुरु तभी बनेगा जब देश में ज्ञानियों की संख्या अधिक होगी। धार्मिक मनुष्य ही ज्ञानी होता है। आचार्य जी ने कहा कि आजकल के धार्मिक गुरुओं से भारत विश्व गुरु नहीं बन सकता। यह धार्मिक विद्वान व आचार्य सच्चे ज्ञानी नहीं है। आचार्य जी ने केरल के धार्मिक मन्दिरों में दासी प्रथा का उल्लेख किया। उन्होंने इस प्रथा की निस्सारता बताई और धर्मगुरुओं के ज्ञान को समाज के लिये अहितकर एवं अव्यवहारिक बताया। आचार्य जी ने कहा कि केरल के मन्दिरों में दासी प्रथा का व्यवहार होता है। वहां वहां छोटी आयु की कन्याओं का पत्थर की मूर्ति के साथ विवाह कराते हैं। उन कन्याओं को उस मठ मन्दिर को भेंट कर देते हैं जहां वह नारकीय जीवन व्यतीत करती हैं। उनके माता-पिता को यह झूठ प्रचारित किया गया है ऐसा करके उन्हें सुख मिलेगा और उनकी मुक्ति हो जायेगी। आचार्य जी ने वहां के मठाधीशों व धर्मगुरुओं को इस प्रथा को बन्द न कराना व इस अन्याय के प्रति मूक दर्शक बने रहना की आलोचना की। उन्होंने इस अनुचित प्रथा को शीघ्र समाप्त करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि हमारे धर्मगुरुओं का इस प्रथा पर मौन और इस अन्याय का विरोध न करना उनका असत्य व अनुचित प्रथा को बढ़ावा दे रहा है। कन्याओं का पत्थर की मूर्तियों के साथ विवाह करना, उन्हें दासी बनना और जीवन में नरक ढोना इन धर्मगुरुओं को ज्ञानी व समाज का हितैषी सिद्ध नहीं करता। इन कन्याओं की उम्र बढ़ने के साथ और नई कन्याओं के इस मिथ्या प्रपंच में फंसते जाने से इन कन्याओं को कुछ समय बात वहां से निकाल दिया जाता है जिन्हें कुछ दलाल, मुसलमान व ईसाई ले जाते हैं। इनमें से कुछ बहिन-बेटियां वैश्यायें बन जाती हैं। आचार्य जी ने इसपर गहरा दुःख जताया।

 

                वेदों एवं शास्त्रों के विद्वान आचार्य कुलश्रेष्ठ जी ने कहा कि वैदिक धर्म पर आधारित राजनीति करने पर ही देश विश्व गुरु बन सकता है। उन्होंने कहा कि हमारे न्यायाधीशों को भी धार्मिक होना चाहिये। आचार्य जी ने समलैंगिक विवाह और लिव-इन-रिलेशन पर भी प्रश्न उठाये और कहा कि यह वेदविरुद्ध एवं सृष्टि के नियमों के विपरीत है। आचार्य जी ने कहा कि राजनीति में धर्म नहीं होगा तो समाज व्यवस्थित नहीं हो सकता। देश के सभी राजकीय अधिकारियों को धर्म का ज्ञान होना चाहिये और वह सत्य धर्म का पालन करने वाले होने चाहियें। आचार्य जी ने अन्धविश्वासों के उदाहरण भी दिये। उन्होंने कहा कि सभी मत-मतान्तरों तथा सामाजिक संस्थाओं में अज्ञान भरा पड़ा हुआ है। ऐसी स्थिति में भारत विश्व गुरु कैसे बन सकता है?

 

                आचार्य जी ने गंगा की आरती की चर्चा की। उन्होंने कहा कि गंगा पानी की एक नदी है। इसकी मूर्ति नहीं बन सकती। किसी बात को तर्क से सिद्ध किए बिना मनुष्य सत्य को प्राप्त नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि हिन्दू कौम ऐसी है कि कहीं कोई तमाशा खड़ा कर दो, यह वहीं पैसा चढ़ाने लगती है। मत-मतान्तरों के लोग वेदों की सत्य व हितकारी बातें मानने को तैयार नहीं है। मनुष्य जानता है कि मूर्ति में कोई शक्ति नहीं होती। इसी कारण से मन्दिरों में ताला लगाया जाता है और वहां चौकीदार बैठाये जाते हैं। आचार्य जी ने जम्मू एवं कश्मीर केन्द्र शासित राज्य में सन् 1990 से आतंकवाद में वृद्धि का भी उल्लेख किया। इस आतंकवाद ने हमारे चालीस हजार भाई बहिनों व बच्चों की हत्या की है। कश्मीर घाटी हिन्दुओं से खाली हो चुकी है जहां कभी शत-प्रतिशत हिन्दू व आर्य होते थे। हमारे ब्राह्मण व पण्डित भाई अपने प्राणों व इज्जत की रक्षा के लिये कश्मीर छोड़ कर भाग आये हैं। वहां हमारे मन्दिरों को तोड़ा गया है। उन्होंने पूछा कि यदि वैष्णोदेवी में शक्ति होती तो क्या यह सब कुछ होता? देवी में कोई शक्ति नहीं है। हम अपनी सेना के कारण सुरक्षित है। आचार्य जी ने लोगों को आर्यसमाज के सत्संग में परिवार सहित जाने की सलाह दी। उन्होंने वेद पढ़ने का भी आग्रह किया। यज्ञ करने और गुरुकंुलों में बच्चों को पढ़ाने का भी आपने आह्वान किया। उन्होंने कहा कि राजनीति में धर्म का प्रवेश होने पर पाखण्डों एवं अधर्म के सभी काम बन्द हो जायेंगे। ऐसी स्थिति होने पर ही देश आगे बढ़ेगा। उन्होंने तपोवन आश्रम के अधिकारियों एवं श्रोताओं का धन्यवाद किया। आचार्य जी ने ज्ञान को कर्म में बदलने का भी सन्देश दिया। उन्होंने कहा कि इसे अपनाये बिना हम सुरक्षित नहीं हो सकते।

 

                द्रोणस्थली कन्या गुरुकुल की आचार्या डा0 अन्नपूर्णा जी ने कहा कि परमात्मा जी द्वारा बनाई गई सभी योनियों में मनुष्य श्रेष्ठ है। जो मनन करके कार्यों को करता है उसी को मनुष्य कहते हैं। मनुष्य का जन्म मिलना दुर्लभ है। वेदों का ज्ञान भी मनुष्यों के लिये ही है। धर्म की बात भी मनुष्यों के लिये ही की जाती है। मनुष्य विवेक ज्ञान प्राप्त कर सकता है। भारत विश्व गुरु धर्म को धारण करके ही बन सकता है। आचार्या जी ने धर्म के दस लक्षणों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि धर्म का सबसे बड़ा प्रमाण वेद है। मनुष्य के अन्दर मनुष्यता ही धर्म है। सम्प्रदाय को दूर करना आवश्यक है। धर्म सबका और सबके लिये एक है। सदाचार सबके लिये धर्म है। मत, पन्थ व सम्प्रदायों को धर्म नहीं कह सकते। हमें संसार से जाना है। हमारा धन हमारे साथ नहीं जायेगा। वह यहीं रह जायेगा। उन्होंने कहा कि जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।

 

                आचार्या अन्नपूर्णा जी ने कहा कि पाप का फल दुःख देता है और पुण्य कर्मों का फल सुख देता है। जो दुष्टों को रुलाता है उसका नाम रूद्र है। सुख का मूल धर्म है। अधर्म पर चलने से दुःख मिलेगा। जहां धर्म होता है वहीं व उसी को विजय मिलती है। राजा व राज्याधिकारियों को धार्मिक होना चाहिये। धर्मविहीन राजनीति नहीं होनी चाहिये। धन को धर्मपूर्वक कमाना चाहिये। उन्होंने कहा कि कमाये धन का व्यय परोपकार के कामों में करना चाहिये। हमारे प्राचीन राजा धर्म पर चले थे। धर्म पर चलने के कारण ही यह राजा महान बने थे। इन्हीं से देश महान बना था। आचार्या जी ने अपने वक्तव्य को विराम देते हुए कहा कि हम धर्म को समझें व इसको धारण करें। धर्म को सुनकर, पढ़कर, आत्म चिन्तन तथा विवेचन कर धारण करना चाहिये। मनुष्य को दूसरों के प्रति वही व्यवहार करना चाहिये जो वह दूसरों से अपने प्रति चाहते हंै। इसी के साथ विदुषी वक्ता ने अपनी वाणी को विराम दिया।

 

                आर्य प्रतिनिधि सभा, उत्तराखण्ड के प्रधान श्री गोविन्द सिंह भण्डारी जी ने भी अपने विचार प्रस्तुत किये। भण्डारी जी ने सत्यार्थप्रकाश की चर्चा की और कहा कि वेदों के अनुकूल वर्णव्यवस्था ज्ञान से युक्त है। समाज को शिक्षक, सैनिक और वाणिज्य कार्य करने वालों की आवश्यकता होती है। इन्हीं को वर्ण के नाम से पुकारा जाता है। वेद प्रत्येक व्यक्ति को बराबर मानता है। उन्होंने कहा कि ऋषि दयानन्द जी का वेद प्रचार आन्दोलन एक क्रान्तिकारी आन्दोलन था। भण्डारी जी ने कहा कि ऋषि दयानन्द का वेद प्रचार आन्दोलन, वेदेतर मतों की समीक्षा तथा सत्यार्थप्रकाश में वैदिक मान्यताओं का प्रकाश हमारे लिये अतीव महत्वपूर्ण हंै। उन्होंने कहा कि महर्षि दयानन्द ने पुत्र व पुत्री के मध्य अतार्किक अन्तर को दूर करने का प्रयत्न किया। भण्डारी जी ने कहा कि महर्षि दयानन्द ने ही सर्वप्रथम धार्मिक व सामाजिक सुधारों की ओर ध्यान दिलाया था और इस आन्दोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने असत्य व अज्ञान पर आधारित अन्धविश्वासों व परम्पराओं का खण्डन और सत्य वैदिक मान्यताओं का मण्डन किया। हमारा कर्तव्य है कि हम आर्यसमाज को मजबूत करें।

 

                कार्यक्रम में विश्व प्रसिद्ध गीतकार एवं भजनोपदेशक पं0 सत्यपाल पथिक जी का भजन हुआ। उनके भजन की पंक्तियां थी ‘इन्हीं पागल दिमागों ने भरे अमृत के लच्छे, हमें पागल ही रहने दो कि हम पागल ही अच्छे हैं। मैं पागल हूं मैं पागल हूं दीवाना हूं मदमस्त मदमस्त दीवाना हूं। जो शमा जलाई ऋषिवर ने उस शमा का मैं परवाना हूं।।’ कार्यक्रम की समाप्ति से पूर्व स्वामी वेदानन्द सरस्वती, उत्तरकाशी ने अपने सम्बोधन में कहा कि वेदों से मनुष्य के अभ्युदय तथा मुक्ति की प्राप्ति का ज्ञान होता है। वेदों में प्रार्थना है कि हमारे देश में सभी व अधिकांश लोग वेदों के विद्वान हों। क्षत्रिय बलवान एवं भयमुक्त होने चाहियें। ऐसा होने पर देश की उन्नति होगी। स्वामी जी ने कहा वेद धन कमाने तथा उसका दान करने की प्रेरणा करता है। स्वामी जी ने प्रेरणा करते हुए कहा कि हमें ज्ञानार्जन कर ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य के गुणों को धारण करना चाहिये। सभी नागरिकों को वेदों की शिक्षा दी जानी चाहिये। समाज में किसी से किसी प्रकार का अनुचित भेदभाव नहीं होना चाहिये। आश्रम के मंत्री श्री प्रेम प्रकाश शर्मा जी ने आश्रम की ओर से सभी सहयोगियों एवं कर्मचारियों का धन्यवाद किया। उन्होंने अनेक सूचनाये भी दी। इसी के साथ वैदिक साधन आश्रम तपोवन का पांच दिवसीय शरदुत्सव सम्पन्न हुआ। अन्त में शान्ति पाठ भी किया गया। इसके बाद सभी अतिथियों वा श्रोताओं ने ऋषि लंगर प्राप्त किया। बाहर से आये हुए एक एक करके अपने अपने गृहस्थानों को लौटने लगे। हमें भी पांच दिन कुछ अस्वस्थ होते हुए आश्रम के उत्सव में भाग लेने का अवसर मिला। इस उत्सव में हमने सभी विद्वानों को सुना और उसे लगभग 13 लेखों के माध्यम से अपने फेसबुक तथा व्हटशप मित्रों से साझा किया और इमेल से पत्र-पत्रिकाओं आदि को प्रेषित किया। ईश्वर ने हमें शक्ति दी, इसके लिए हम उसका कोटिशः धन्यवाद करते हैं। ओ३म् शम्।

                -मनमोहन कुमार आर्य

पताः 196 चुक्खूवाला-2

देहरादून-248001

फोनः 09412985121


Source :
This Article/News is also avaliable in following categories : Literature News , Chintan
Your Comments ! Share Your Openion

You May Like