“जग को जगाने वाला, देश को बचाने वाला तथा शुद्धियां कराने वाला आर्यसमाज है: पं0 शैलेश मुनि सत्यार्थी”

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19 Oct 19
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-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

“जग को जगाने वाला, देश को बचाने वाला तथा शुद्धियां कराने वाला आर्यसमाज है: पं0 शैलेश मुनि सत्यार्थी”

वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून का पांच दिवसीय शरदुत्सव दिनांक 18-10-2019 को तीसरे दिन भी जारी रहा। आज प्रातः आर्यसमाज के सुप्रसिद्ध विद्वान एवं गीतकार पंडित सत्यपाल पथिक जी के ब्रह्मत्व में सन्ध्या एवं यज्ञ सम्पन्न किया गया। चार वृहद यज्ञ कुण्डों में यज्ञ किया गया जिसमें मन्त्रोच्चार गुरुकुल पौंधा-देहरादून के दो ब्रह्मचारियों ने किया। यज्ञ की समाप्ति पर कार्यक्रम का संचालन कर रहे आर्य विद्वान श्री शैलेश मुनि सत्यार्थी जी ने सब श्रोताओं से आर्यसमाज विषयक एक गीत सामूहिक रूप से बुलवाया। गीत की कुछ पंक्तियां थीं ‘जग को जगाने वाला आर्यसमाज है। देश को बचाने वाला आर्यसमाज है। शुद्धियां कराने वाला आर्यसमाज है। यज्ञ को रचाने वाला आर्यसमाज है। गुरुकुल खुलवाने वाला आर्यसमाज है। ये आर्यसमाज है जी ये आर्यसमाज है।’ यह भजन काफी लम्बा है जिसे लेख का अत्यधिक विस्तार होने के भय से पूरा दिया जाना सम्भव नहीं है। आचार्य सत्यार्थी जी ने कहा कि यह महत्वपूर्ण भजन आर्यसमाज के प्रत्येक सदस्य को याद होना चाहिये। इसके बाद पं0 रुहेल सिंह आर्य जी का एक भजन हुआ। भजन के बोल थे ‘तेरी याद जब से भुलाई हुई है, मुसीबत उसी दिन से आई हुई है।’ भजन बहुत ही प्रभावशाली था।

 

                इस भजन के बाद आर्य विद्वान आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी ने यज्ञ में ‘प्रजापति ईश्वर’ को दी जाने वाली मौन आहुति की चर्चा की। यह आहुति ओ३म् प्रजापते स्वाहा बोलकर यज्ञ में दी जाती है। सभी मन्त्रों को बोल कर आहुतियां दी जाती हैं तो इस आहुति को मौन बोलकर क्यों दिया जाता है? इस प्रश्न पर विद्वान वक्ता ने प्रकाश डाला। आचार्य जी ने इससे सम्बन्धित आख्यान को प्रस्तुत कर बताया कि एक बार वाणी और मन में विवाद हो गया कि दोनों में से कौन बड़ा है? वाणी ने स्वयं को बड़ा बताया और मन ने स्वयं को। वाणी ने तर्क प्रस्तुत किये कि वह ईश्वर के गुणों की व्याख्या करती है। वह सब वेदमन्त्रों का उच्चारण भी करती है। वाणी से ही संसार के सब व्यवहार चलते हैं। इसलिये वह बड़ी है। मन ने तर्क दिये कि वह जिस इन्द्रिय के साथ लगता है वही इन्द्रिय काम करती है। इसका विद्वान वक्ता ने एक उदाहरण दिया जिसमें एक व्यक्ति किसी कार्य में अतिव्यस्त होने के कारण सामने से गुजरने वाली बारात को नहीं देख पाता और पूछने पर कहता है कि वह अपने कार्य में व्यस्त था इसलिये उसने बारात को नहीं देखा। उसका मन बारात के साथ जुड़ा नहीं था। जिस काम को वह कर रहा था उसको उसी कार्य का ज्ञान था। कई बार लोग टीवी देख रहे होते हैं परन्तु मन किसी अन्य बात का विचार कर रहा होता है, तब टीवी में क्या दिखाया गया उसका ज्ञान उस अन्यमनस्क दर्शक को नहीं होता। मन का साथ देने से ही वाणी काम करती है। बिना मन की सहायता के वाणी काम नहीं कर सकती। दोनों निर्णय के लिये प्रजापति के पास गये। वाणी और मन ने प्रजापति के सम्मुख अपने अपने तर्क प्रस्तुत किये। मन ने प्रजापति को यह भी कहा कि वाणी जो शब्द बोलती है, वह शब्द उसका अपना नहीं होता। शब्द तो आकाश का गुण है। मन ने प्रजापति को कहा कि परमात्मा और आत्मा दोनों सूक्ष्म हैं। मन की एकाग्रता से ही आत्मा को समाधि की अवस्था प्राप्त होती है और उसे परमात्मा का साक्षात्कार होता है। वाणी यह काम नहीं करती न कर सकती है। प्रजापति ने मन के इस तर्क को स्वीकार कर लिया। उन्होंने कहा कि जब यज्ञ में प्रजापति को आहुति दी जाये तो यह वाणी से बोलकर नहीं मन में मन्त्र को बोल कर दी जाये।

 

                मनुष्य का मन जड़ पदार्थों से बना होने के कारण जड़ है। इस पर भी यह काम चेतन वाले करता है। क्षण भर में मन सूर्य चन्द्र आदि पर पहुंच जाता है और लौट भी आता है। आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी ने आत्मा की चर्चा की और उसके गुण बताये। आत्मा के शरीर के निकल जाने पर मन काम नहीं करता। आचार्य जी ने कहा कि मन प्रकृति के सूक्ष्म कणों से बना हैं। प्रकृति त्रिगुणात्मक अर्थात् सत्, रज तथा तम इन तीन गुणों की साम्यावस्था को कहते हैं। जिस प्रकार से कारण का गुण कार्य में आते हंै उसी प्रकार प्रकृति के सत्, रज और तम गुणों का प्रभाव इनसे बने मन पर भी होता है। उन्होंने कहा कि सतोगुण से युक्त मन पाप नहीं करता। यह मनुष्य को श्रेय मार्ग पर ले जाता है। आचार्य जी ने रजोगुण और तमोंगुण युक्त मन के कार्य भी बताये। उन्होंने कहा कि रज व तम गुणों से युक्त मन पाप भी करता है।

 

                आचार्य कुलश्रेष्ठ जी ने मन में लोभ की प्रवृत्ति के उदाहरण दिये। उन्होंने कहा कि एक मनुष्य सत्संग में जाता है। वहां वह अपने से अच्छी चप्पल देखता है। वह उसे उठा लाता है और अपनी वहीं छोड़ आता है। बाद में मन में सतोगुण का प्रभाव होने पर वह अपने को धिक्कारता है और सत्संग के स्थान पर जाकर उसे छोड़ अपनी पुरानी चप्पल ले आता है। आचार्य जी ने कहा कि हमारे मन में भी कभी सतोगुण प्रधान होता है तो हम अच्छे धर्म के काम करते हैं और जब दूसरे गुण प्रधान होते हैं तो हम लोभ, काम, क्रोध में फंस कर बुरे काम करते हैं। आचार्य जी ने श्रोताओं को मन को सतोगुण से युक्त करने का प्रयास करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि मनुष्य तामसिक गुण से युक्त होने पर दूसरों की हत्या तक कर देते हैं। संसार में सभी बुरे काम मनुष्यों के तामसिक मन से होते हैं। मनुष्य का सात्विक मन बुरे काम करने की बात कभी नहीं सोचता।

 

                विद्वान आचार्य श्री उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी ने कहा कि मन को सात्विक बनाने के लिये दूषित अन्न का त्याग करना पड़ता है। अन्न की पवित्रता मन को सात्विक रखती है। आचार्य जी ने सात्विक मन के लाभ भी श्रोताओं को बताये। आचार्य जी ने एक ऐसे व्यक्ति का उदाहरण दिया जो योगाभ्यास में ऊंची स्थिति को प्राप्त हो गया था। एक बार उसके ध्यान का अभ्यास अचानक अवरुद्ध हो गया। परीक्षण करने पर ज्ञात हुआ कि उसने एक जगह भण्डारे का भोजन किया था। वह भोजन किसी पिता द्वारा धन के लोभ में अपनी एक सुकन्या का विवाह एक वृद्ध रोगी पति के साथ उसकी सहमति के विपरीत कराया था। उस कन्या के पति के पैसों से ही वह भण्डारा कराया गया था। इस दूषित अन्न के प्रभाव से उस योगी की योग में स्थिति भंग हो गई थी। आचार्य जी ने कहा कि ज्यादातर भण्डारे बेईमानी के धन से होते हैं। दूषित अन्न मन को प्रभावित करता है। इससे न चाहते हुए भी मनुष्य से पाप कर्म हो जाते हैं। उन्होंने कृष्ण-अर्जुन संवाद सुनाया जिसमें कृष्ण जी कहते हैं कि रजोगुण से उत्पन्न काम व क्रोध मनुष्य से पाप करा देते हैं। काम के वशीभूत मनुष्य भी अनैतिक व मर्यादाविहीन आचरण कर देते हैं। उन्होंने रानी पदमावती से जुड़ी चित्तौड़ की इतिहास प्रसिद्ध घटना का उदाहरण दिया। किले में रानी पदमावती के साथ चैदह हजार स्त्रियां थीं। निन्दित विचारों वाले अलाउद्दीन खिलजी व उसके सैनिकों से अपनी पवित्रता की रक्षा के लिये इन सबने चिता की अग्नि में जौहर कर स्वयं को समाप्त कर दिया था।

 

                आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी ने कहा कि सत्संग, स्वाध्याय तथा प्राणायाम आदि से मन को पवित्र कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि मन की पवित्रता के लिये बुद्धि की पवित्रता भी आवश्यक है। उन्होंने बताया कि महाराज मनु के अनुसार बुद्धि ज्ञान से शुद्ध होती है। मनुष्य को कुसंग से बचने की विद्वान वक्ता ने सलाह दी। मन को नियंत्रित करने के लिये स्वाध्याय व सत्संग आवश्यक है। बुद्धि व मन की पवित्रता के लिये आचार्य जी ने अन्न की पवित्रता और शुद्धता पर जोर दिया। आचार्य जी ने बताया कि मनुष्य के तीन मन होते हैं। देव मन ज्ञानेन्द्रियों पर नियंत्रण करता है। यक्ष मन कर्मेन्द्रियों पर केन्द्रित होता है। धृति मन से समस्याओं का समाधान होता है। आत्मा का सबसे विश्वसनीय मन धृति मन होता है। हमें अपने मन को नियंत्रित करने के लिये अभ्यास व वैराग्य के भावों को अपनाने का प्रयास करना चाहिये। उन्होंने कहा कि यहां आश्रम में तप करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। आचार्य जी ने अलीगढ़ की एक घटना भी सुनाई जिसमें एक आर्य सज्जन ने पौराणिक साधु स्वामी सर्वदानन्द जी की जी जान से सेवा की थी। उसकी विनती पर स्वामी सर्वदानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश पढ़ा जिसका परिणाम स्वामी सर्वदानन्द जी का पौराणिक विचारों का त्याग कर वैदिक विचारों का बन जाना हुआ। उन स्वामी जी ने अलीगढ़ में साधु आश्रम नाम से एक वैदिक गुरुकुल स्थापित किया था जिसमें आर्यसमाज के बड़े बड़े वैदिक विद्वान तैयार हुए। यहीं पर स्वामी जी के एक पाचक भी पढ़े। वह पं0 धुरेन्द्र शास्त्री के नाम से प्रसिद्ध हुए। संन्यास लेने पर वह स्वामी ध्रुवानन्द सरस्वती कहलाये और आर्यसमाज की सार्वदेशिक सभा के प्रधान पद को भी उन्होंने सुशोभित किया। आचार्य जी ने मन पर नियंत्रण करने की श्रोताओं को सीख दी। मन पर नियंत्रण करने से पाप से बच सकते हैं और परमात्मा को प्राप्त कर सकते हैं।

 

                कार्यक्रम का संचालन आर्यसमाज के प्रवर विद्वान श्री शैलेश मुनि सत्यार्थी जी ने किया। उन्होंने एक भ्रष्टाचारी द्वारा समय समय पर धार्मिक स्थानों पर भण्डारा कराने की जानकारी दी। सत्यार्थी जी ने मन को ठीक रखने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि भोजन को देख कर व सोच विचार कर करना चाहियें। आश्रम को प्राप्त हुए दान की सूचना भी उन्होंने सार्वजनिक की। शान्ति पाठ के साथ इस सत्र का समापन हुआ। इसके बाद सभी ने मिलकर आश्रम के भोजन-शाला में नाश्ता किया। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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देहरादून-248001

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