‘ईश्वर की स्तुति तथा प्रार्थना क्यों व कैसे करें?’

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07 Oct 19
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-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

‘ईश्वर की स्तुति तथा प्रार्थना क्यों व कैसे करें?’

मनुष्य को जीवन में दुःखों की निवृत्ति और सुखों की प्राप्ति के लिये अनेक कार्य व पुरुषार्थ करना होता है उसमें से एक ईश्वर को जानना और उसके यथार्थ गुणों से उसकी स्तुति करलना व उससे अपने जीवन को उन्नत व श्रेष्ठ बनाने सहित सुख प्राप्ति व दुःखों की निवृत्ति की प्रार्थना करना एक प्रमुख साधन व कार्य होता है। हमारी इस बात से कुछ बुद्धिमान व तर्कशील मनुष्य शायद सहमत नहीं होंगे और हमसे पूछेंगे कि ऐसा होना सम्भव प्रतीत नहीं होता। ऐसे ही लोगो को सन्तुष्ट करने के लिये ऋषि दयानन्द जी ने ‘सत्यार्थप्रकाश’ में ईश्वर की स्तुति तथा प्रार्थना मनुष्यों क्यों करनी चाहिये, इस प्रसंग को उठाया है। स्तुति का अर्थ होता है कि उस संसार की रचना व पालन करने वाली सत्ता परमेश्वर में जो गुण आदि हैं, उसे जानना और उसके प्रति प्रेम व हृदय में सम्मान की भावना रखते हुए उसका बारम्बार स्मरण व उच्चारण करना। ईश्वर की स्तुति वही मनुष्य कर सकता है जो ईश्वर और उसके गुण, कर्म तथा स्वभाव को जानता है। ईश्वर को जानने के लिये मत-पन्थ व सम्प्रदाय आदि उतने उपयोगी नहीं हैं जितने कि ऋषि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, आर्याभिविनय तथा ऋग्वेद-यजुर्वेद के भाष्य व भाष्य-भाषानुवाद सहित आर्य विद्वानों के वेद विषयक ग्रन्थ हैं।

 

                वेद धर्म के विषय में परम प्रमाण हैं। यह बात मनु जी ने अपनी विश्व प्रसिद्ध पुस्तक मनुस्मृति में कही है। वेद अलौकिक ईश्वरीय संस्कृत भाषा में है। संस्कृत भाषा हम सभी लोग जानते नहीं है। जो लोग लौकिक संस्कृत जानते हैं वह भी वेदों की प्राचीनता और वेदों की विशेष व्याकरण अष्टाध्यायी, महाभाष्य तथा निरुक्त पद्धति से अपरिचित होने व उसमें यथोचित योग्यता न होने के कारण वेदों के यथार्थ अर्थ व आशय नहीं समझ सकते। अतः वेदों के प्रामाणिक विद्वान और सिद्ध योगी महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के ग्रन्थों से ईश्वर विषयक यथार्थ ज्ञान प्राप्त करना ही मुख्य साधन व उपाय है। ईश्वर विषयक ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों का अध्ययन कर लेने पर मनुष्य ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव व स्वरूप से भलीभांति परिचित हो जाता है और वह ईश्वर की स्तुति करने के योग्य हो जाता है। महर्षि दयानन्द ने आर्याभिविनय की रचना ही ईश्वर के प्रति भक्ति भाव रखने वाले भक्तों, उपासकों व साधकों के लिये ईश्वर की स्तुति तथा प्रार्थना की आवश्यकता की पूर्ति के लिये की है। महर्षि दयानन्द से पूर्व ईश्वर की स्तुति व प्रार्थना के ग्रन्थ जिनमें तार्किक रूप से स्तुति और प्रार्थना पर प्रकाश पड़ता हो, उपलब्ध नहीं थे। उपासना के क्षेत्र में सत्यासत्य से युक्त भ्रमपूर्ण मान्यतायें व पुराणादि ग्रन्थ उपलब्ध होते थे जिसका एक परिणाम यह भी होता था कि अंग्रेजी और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान पढ़कर लोग नास्तिक हो जाते थे। ऋषि दयानन्द ने एक शिक्षित, ज्ञानी व तार्किक मनुष्य के सभी सम्भावित प्रश्नों को सामने रखकर व सभी भ्रमों को दूर करने के लिये ही सत्यार्थप्रकाश सहित आर्याभिविनय, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका और ऋग्वेद-यजुर्वेद भाष्य का प्रणयन किया था। ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों ने विश्व के सभी मनुष्य का अपूर्व कल्याण किया है। यह बात कष्टप्रद है कि संसार के लोगों ने ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों से जितना लाभ व उपकार उठाना था वह लाभ उठाया नहीं है।

 

                ईश्वर की स्तुति क्यों करनी चाहिये? इस प्रश्न का उत्तर है कि ईश्वर की स्तुति करने से उससे प्रीति वा प्रेम, उसके गुण, कर्म व स्वभाव का जानना व उन्हें जानकर अपने गुण, कर्म व स्वभावों को सुधारना होता है। जब हम ईश्वर की स्तुति करते हैं तो हमारे गुण, कर्म व स्वभाव में सुधार होता है। ऐसा होने से हमारे स्तुति से पूर्व जो दुर्गुण, दुव्र्यस्न और दुःख होते हैं, उनमें स्तुति के प्रभाव से स्वतः सुधार होता जाता है। हम जब राम, कृष्ण व दयानन्द जी के जीवन सहित अन्य महापुरुषों व ऋषियों के जीवन पर विचार करते हैं तो यह स्पष्ट होता है कि इन महापुरुषों का निर्माण वेदों व वैदिक साहित्य का स्वाध्याय तथा ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना का ही परिणाम था। हमारे कुछ पौराणिक बन्धुओं को यह बात आश्चर्यजनक लग सकती है कि राम व कृष्ण ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना करते थे? वह तो इन्हें परमात्मा का अवतार मानते हैं। परमात्मा का अवतार स्वयं की स्तुति व उपासना करे, यह तर्कसंगत एवं उचित नहीं है। इसका उत्तर यही है कि राम व कृष्ण ईश्वर का अवतार न होकर उच्च कोटि की श्रेष्ठ आत्मायें थीं और वह भी अपने जीवन के सुधार व निर्माण के लिये तथा मोक्ष प्राप्ति के लिये सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी तथा सृष्टिकर्ता ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना किया करते थे। स्वाध्याय तथा प्रतिदिन ईश्वर विषयक चिन्तन व मनन न करने से मनुष्य की आत्मा सद्ज्ञान से दूर होकर अवतारवाद तथा मूर्तिपूजा जैसी बातों में विश्वास करने लग जातीं हैं। यह बातें वेद व विद्वानों की दृष्टि में अविद्या तथा हमारे अज्ञान के संस्कारों के कारण से हैं। कुछ लोगों को अवतार की कल्पना और मूर्तिपूजा को उचित मानने से अनेक प्रकार के लाभ होते हैं। अतः वह इन भ्रमों को दूर करने में सहायक न होकर बाधक बनते हैं और इसी का परिणाम है कि अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि व विद्या का प्रकाश नहीं हो पा रहा है। ऋषि दयानन्द ने अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करने का प्राणपण से प्रयत्न और पुरुषार्थ किया था जिसका परिणाम है कि आज वेदों के सत्य अर्थ और ईश्वर व जीवात्मा विषयक निभ्र्रान्त ज्ञान हमें उपलब्ध है। इसी आधार पर हमें स्तुति का महत्व ज्ञात होने के साथ स्तुति से ईश्वर में प्रीति होने तथा जीवात्मा वा मनुष्य के अविद्या आदि के दोषों के दूर होने सहित आत्मा की उन्नति होने का रहस्य व ज्ञान उपलब्ध हुआ है।

 

                ईश्वर अल्पज्ञ जीवात्माओं से महान व महानतम सत्ता है। वह सर्वज्ञ अर्थात् पूर्ण ज्ञान रखने वाली सत्ता है। संसार में जो ज्ञान व विज्ञान उपलब्ध है उसका अधिष्ठाता व प्रकाशक परमात्मा ही है। इसे ऋषि दयानन्द ने आर्यसमाज के प्रथम नियम में प्रस्तुत करते हुए कहा है कि ‘सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उनका आदि मूल परमेश्वर है।’ यह सिद्धान्त ज्ञान व विज्ञान की कसौटी पर शत प्रतिशत सत्य है। यदि विज्ञान इसकी उपेक्षा करता है तो यह उनका दोष है। आर्यसमाज का यह नियम विज्ञान का पोषक है। ईश्वर सर्वज्ञ है, इसका अर्थ यही है कि ईश्वर समस्त ज्ञान व विज्ञान से युक्त व संसार में ज्ञान व विज्ञान का प्रकाश करने वाला है। विज्ञान का प्रकाश उसने इस संसार की रचना करके तथा वेदों का ज्ञान देकर किया है। जब हम ईश्वर की प्रार्थना करने पर विचार करते हैं तो इससे होने वाले प्रमुख लाभों में हमें निरभिमानता, उत्साह और उसकी सहायता का मिलना होता है। ईश्वर की उपासना से भी लाभ ही लाभ है। मुख्य लाभ यह है कि ईश्वर की उपासना करने से परब्रह्म परमात्मा से मेल होता है, आत्मबल में वृद्धि होती है और ईश्वर का साक्षात्कार होता है।

 

                ऋषि दयानन्द ने ईश्वर की स्तुति को स्पष्ट करते हुए कहा है कि वह परमात्मा सब में व्यापक, शीघ्रकारी, अनन्त, बलवान है। वह सर्वथा शुद्ध, सर्वज्ञ, सब का अन्तर्यामी, सर्वोपरि विराजमान, सनातन, स्वयंसिद्ध, परमेश्वर अपनी जीवरूप सनातन अनादि प्रजा को अपनी सनातन विद्या वेद से यथावत् अर्थों का बोध वेद एवं ऋषियों के द्वारा कराता है। यह सगुण स्तुति अर्थात् जिस-जिस गुण से युक्त परमेश्वर की स्तुति करते हैं वह सगुण स्तुति कहलाती है। ईश्वर अकाय है अर्थात् वह कभी शरीर धारण नहीं करता व जन्म नहीं लेता। ईश्वर वह है जिसमें छिद्र नहीं होता, वह नाड़ी आदि के बन्धन में नहीं आता और कभी पापाचरण नहीं करता। ईश्वर में क्लेश, दुःख, अज्ञान कभी नहीं होता आदि। जिस-जिस राग, द्वेषादि गुणों से पृथक् मानकर परमेश्वर की स्तुति की जाती है वह निर्गुण स्तुति कहलाती है। इन दोनों प्रकार की स्तुतियों का फल यह है कि जैसे परमेश्वर के गुण हैं वैसे गुण, कर्म, स्वभाव अपने जीवन व व्यवहार में भी ग्रहण व धारण करना। जैसे ईश्वर न्यायकारी है तो हम भी न्यायकारी होंवे। जो मनुष्य केवल भांड के समान परमेश्वर के गुणकीर्तन करता जाता है और अपने चरित्र को नहीं सुधारता उसका स्तुति करना व्यर्थ है। अर्थात् उसकी स्तुति स्तुति न होकर पाखण्ड होती है।

 

                ईश्वर की प्रार्थना का एक नूमना भी हम ऋषि दयानन्द के शब्दों में प्रस्तुत कर रहे हैं। ईश्वर से प्रार्थना इस प्रकार करनी चाहिये। हे अग्ने अर्थात् प्रकाशस्वरूप परमेश्वर! आप की कृपा से जिस बुद्धि की उपासना विद्वान्, ज्ञानी और योगी लोग करते हैं उसी बुद्धि से युक्त आप हमको इसी वर्तमान समय में हमें बुद्धिमान कीजिये। आप प्रकाशस्वरूप हैं, कृपा करके मुझ में भी विद्या व ज्ञान का प्रकाश स्थापन कीजिये। आप अनन्त पराक्रम से युक्त हैं, इसलिये मुझ में भी कृपाकटाक्ष से पूर्ण पराक्रम धरिये। आप अनन्त बलयुक्त हैं इसलिये मुझ में भी बल धारण कीजिये। आप अनन्त सामथ्र्ययुक्त हैं, मुझ को भी पूर्ण सामथ्र्य दीजिये। आप दुष्ट काम ओर दुष्टों पर क्रोधकारी हैं, मुझ को भी वैसा ही कीजिये। आप निन्दा, स्तुति और स्व-अपराधियों का सहन करने वाले हैं। कृपा कर के मुझ को भी वैसा ही कीजिये। हे दयानिधे! आप की कृपा से जो मेरा मन जाग्रत अवस्था में दूर-दूर जाता है, दिव्य-गुणयुक्त रहता है और वही मेरा मन सोते हुए सुषुप्ति को प्राप्त होता वा स्वप्न में दूर-दूर जाने के समान व्यवहार करता है। सब प्रकाशकों का प्रकाशक, एक वह मेरा मन शिवसंकल्प अर्थात् अपने और दूसरे प्राणियों के अर्थ कल्याण का संकल्प करने वाला होवे। मेरा मन किसी मनुष्य व प्राणी की हानि करने की इच्छायुक्त कभी न होवे। इस प्रकार से हमें ईश्वर की प्रार्थना करनी चाहिये। ऐसी प्रार्थनायें बहुत बड़ी संख्या में ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों में उपलब्ध होती हैं जिनको करने से हमारा परब्रह्म परमात्मा से मेल, मित्रता, संगति होकर उसका साक्षात्कार होता है। वेदों में इस प्रकार की जीवन की उन्नति व कल्याण करने वाली असंख्य प्रार्थनायें हैं जिनकी गणना करना सम्भव नहीं है।

 

                हमने संक्षेप में ईश्वर की स्तुति व प्रार्थना पर प्रकाश डाला है। हमारे इस लेख का आधार ऋषि दयानन्द प्रदत्त विचार हैं। पाठकों से निवेदन है कि वह सत्यार्थप्रकाश के सातवें समुल्लास को पढ़ कर लाभान्वित हों। ओ३म् शम्।

                -मनमोहन कुमार आर्य

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देहरादून-248001

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