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“ऋषि दयानन्द का महत्वपूर्ण कार्य धर्म, अधर्म आदि लगभग 51 विषयों को परिभाषित करना”

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09 Jul 19
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-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

“ऋषि दयानन्द का महत्वपूर्ण कार्य धर्म, अधर्म आदि लगभग 51 विषयों को परिभाषित करना”

धर्म क्या है, धर्म क्या नहीं है सहित ईश्वर, जीव, प्रकृति आदि से सम्बन्धित अनेक ऐसे विषय हैं जिनके बारे में देश व विश्व के लोगों को ज्ञान नहीं है। इन सब विषयों को किसी एक छोटी सी पुस्तक में परिभाषित करने का काम हमारी जानकारी में ऋषि दयानन्द से पूर्व किसी महापुरुष या विद्वान ने नहीं किया। ऋषि जानते थे कि मनुष्य को इन विषयों व शब्दों के ज्ञान की आवश्यकता पड़ेगी और मत-मतान्तरों के स्वार्थी लोग उन्हें इन विषयों में तरह-तरह की अज्ञानयुक्त बातें बताकर भ्रमित करेंगे, अतः उन्होंने ईश्वरीय ज्ञान वेदों के आधार पर अपने दो संक्षिप्त एवं लघु ग्रन्थों स्वमन्तव्यामन्तव्य प्रकाश एवं आर्योद्देश्यरत्नमाला में उन्हें परिभाषित करने का अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं प्रशंसनीय कार्य किया है। महर्षि दयानन्द जी से पूर्व यदि हम कुछ ग्रन्थों पर दृष्टि डालें तो हमें ऐसे अनेक सूत्र मिलते हैं जहां कुछ विषयों को परिभाषित किया गया है परन्तु लोगों का उधर ध्यान ही नहीं जाता और न ही हमारे विद्वान आचार्य व मंदिरों के पुजारी ही अपने भक्तों को इनसे परिचित कराने का प्रयास करते हैं। विपक्षी विद्वान व मन्दिरों के पुजारी अपने अनुयायियों को परिचित तो तब करायें जब उनमें अपने भक्तों का पूर्ण हित करने की भावना हो और उन्हें स्वयं भी इन विषयों का ज्ञान हो। योगदर्शन पर दृष्टि डाले तो उसमें आरम्भ में ही कहा गया कि ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:’ अर्थात् चित्त की वृत्तियों के निरोध वा उन्हें रोकने को योग कहते हैं। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये योग के अष्टांगों को साधा व सिद्ध किया जाता है। योगदर्शन में ईश्वर के विषय में कहा गया है ‘क्लेशकर्मविकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः’ अर्थात् क्लेश, कर्म, कर्मों के फलों से जो रहित व मुक्त है उस पुरुष विशेष सत्ता को ईश्वर कहते हैं। इससे हम यह सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि शरीरधारी सभी मनुष्यों को जन्म लेने तथा जीवन जीनें में अनेक प्रकार के क्लेश होते हैं। जन्म लेने वाले मनुष्यों वा जीवात्मा ही होते हैं और उनमें से कोई भी ईश्वर नहीं हो सकता। योग दर्शन के इस सूत्र में हमें ईश्वर के अवतार लेने का खण्डन होता हुआ भी प्रतीत होता है। अतः राम, कृष्ण व ऐसे सभी महापुरुष जिनका इस सृष्टि में जन्म हुआ है, वह ईश्वर नहीं हो सकते क्योंकि वह क्लेश, कर्म एवं कर्मफलों से सर्वथा मुक्त नहीं थे।

 

                श्रीमद्-भगवद्-गीता ग्रन्थ में भी ईश्वर के लिये कहा गया है कि ‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृदयेषु अर्जुन तिष्ठिति’ अर्थात् हे अर्जुन, ईश्वर वह है जो सब प्राणियों के हृदय वा हृदस्थ आत्मा में विद्यमान है। वैशेषिक दर्शन में भी धर्म की परिभाषा करते हुए कहा गया है कि ‘यतोभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः’ अर्थात् धर्म वह कर्म व आचरण हैं जिनको करके मनुष्य को अभ्युदय एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है। ईश्वर के विषय में यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय के प्रथम मन्त्र को भी ईश्वर का सत्यस्वरूप प्रकाशित करने वाली परिभाषा कह सकते हैं। मन्त्रः में कहा गया है ‘ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किंच्जगत्याम् जगत’ अर्थात् ईश्वर इस जड़ चेतन जगत में भीतर व बाहर सर्वव्यापक है। इस वेद वाक्य से ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होने सहित वह सर्वव्यापक है, यह भी विदित होता है।

 

                ऋषि दयानन्द ने स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश एवं आयोद्देश्यरत्नमाला ग्रन्थों की रचना करके भी देश एवं विश्व के लोगों का मार्गदर्शन किया है। इन ग्रन्थों में ईश्वर, वेद, धर्म व अधर्म, जीव, ईश्वर-जीव का परस्पर सम्बन्ध, अनादि पदार्थ, सृष्टि प्रवाह से अनादि का सिद्धान्त, सृष्टि, सृष्टि का प्रयोजन, सृष्टि सकर्तृक, बन्धन, मुक्ति, मुक्ति के साधन, अर्थ, काम, वर्णाश्रम, राजा, प्रजा, ईश्वर न्यायकारी, देव, असुर, राक्षस, पिशाच, देवपूजा, शिक्षा, पुराण, तीर्थ, पुरुषार्थ प्रारब्ध से बड़ा, मनुष्य, संस्कार, यज्ञ, आर्य, दस्यु, आर्यावर्त, आचार्य, शिष्य, गुरु, पुरोहित, उपाध्याय, शिष्टाचार, आठ प्रमाण, आप्त महापुरुष, परीक्षा, परोपकार, स्वतन्त्र, परतन्त्र, स्वर्ग, नरक, जन्म, मृत्यु, विवाह, नियोग, स्तुति, प्रार्थना, उपासना, सगुण-निर्गुण-स्तुति-प्रार्थनोपासना आदि विषयों को परिभाषित व उन्हें स्पष्ट करने का सफल प्रयास किया गया है। इन विषयों को परिभाषित व स्पष्ट करते हुए ऋषि ने कुछ महत्वपूर्ण बातें भी लिखी हैं। हम यहां उनका उल्लेख करना भी आवश्यक समझते हैं।

 

                ऋषि दयानन्द ने लिखा है कि सर्वतन्त्र सिद्धान्त अर्थात् साम्राज्य सार्वजनिक धर्म जिस को सदा से सब मानते आये, मानते हैं और मानेंगे भी। इसीलिये उस को सनातन नित्य धर्म कहते हैं कि जिस का विरोधी कोई भी न हो सके। यदि अविद्यायुक्त जन अथवा किसी मत वाले के भ्रमाये हुए जन जिस को अन्यथा जानें वा मानें उस का स्वीकार कोई भी बुद्धिमान् नहीं करते किन्तु जिस को आप्त अर्थात् सत्यमानी, सत्यवादी, सत्यकारी, परोपकारी, पक्षपातरहित विद्वान मानते हैं वही सब को मन्तव्य और जिस को नहीं मानते वह अमन्तव्य होने से प्रमाण के योग्य नहीं होता। अपने लघु ग्रन्थ स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश में उन्होंने अपने उन प्रायः सभी मन्तव्यों को परिभाषित कर प्रस्तुत किया है जो वेदादि सत्यशास्त्र और ब्रह्मा से ले कर जैमिनिमुनि पर्यन्तों के माने हुए ईश्वरादि पदार्थ हैं। इन मन्तव्यों को ऋषि दयानन्द जी भी अपने निजी जीवन में मानते व पालन करते थे।

 

                ऋषि दयानन्द जी ने अपने ग्रन्थ में यह भी लिखा है कि वह अपना मन्तव्य उसी को जानते हैं कि जो तीन कालों में सब मनुष्यों को एक सा मानने योग्य है। उनका कोई नवीन कल्पना वा मतमतान्तर चलाने का लेशमात्र भी अभिप्राय नहीं था किन्तु जो सत्य है उस को मानना, मनवाना और जो असत्य है उस को छोड़ना व छुड़वाना उन्हें अभीष्ट था। यदि वह पक्षपात करते तो आर्यावर्त में प्रचारित व प्रचलित मतों में से किसी एक मत के आग्रही होते किन्तु जो-जो आर्यावर्त वा अन्य देशों में अधर्मयुक्त चाल चलन है उसका स्वीकार और धर्मयुक्त बातें हैं उनका त्याग वह नहीं करते थे और न करना चाहते थे, क्योंकि उनके अनुसार ऐसा करना मनुष्यधर्म से बाहर था।

 

                महर्षि दयानन्द ने स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश तथा आयोद्देश्यरत्नमाला पुस्तकों में जिन व्याख्याओं को प्रस्तुत किया है उससे धर्म जिज्ञासु लोगों का बहुत उपकार हुआ है। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ऋषि दयानन्द ने अपने सभी मन्तव्यों को सत्यासत्य की परीक्षा करके प्रस्तुत किया है। हम भी ऋषि के मन्तव्यों के सत्यासत्य की परीक्षा कर सकते हैं। परीक्षा करने पर ऋषि के सभी मन्तव्य सत्य सिद्ध होते हैं। सत्य को स्वीकार करना और असत्य का त्याग करना ही मनुष्यधर्म है। अतः आर्यसमाज के अनुयायियों सहित ऋषि दयानन्द के मन्तव्य सभी मनुष्यों चाहें वह किसी भी मत-मतान्तर के अनुयायी क्यों न हों, समान रूप से माननीय हैं। सबको उनको मानना चाहिये और दूसरे लोगों में प्रचार भी करना चाहिये। सत्य का प्रचार करना भी मनुष्य का कर्तव्य व धर्म है। हम ऋषि दयानन्द के मन्तव्यों से लाभान्वित हुए हैं व हो रहे हैं। हम उनके ऋणी हैं। हम समझते हैं कि उनके वेद विषयक योगदान के लिये समूचा विश्व उनका ऋणी है। इस रहस्य को जाने या न जानें तथा कोई माने या न मानें। सत्य तो सत्य ही होता है। उसकी उपेक्षा करके उसे बदला नहीं जा सकता। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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