’२.५ किलो वजनी स्प्लीन (तिल्ली) का सफल ऑपरेशन गीतांजली में‘

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05 Apr 19
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’२.५ किलो वजनी स्प्लीन (तिल्ली) का सफल ऑपरेशन गीतांजली में‘

२१वर्षिय  किशोरी की स्प्लीन (तिल्ली) के दोगुना से भी अधिक आकार में बढ जाने पर गीतांजली मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल, उदयपुर में सफल सर्जरी कर नया जीवन प्रदान किया। लगभग २५ सेंटीमीटर बडी स्प्लीन (तिल्ली), जो सामान्यतः १२ सेंटीमीटर के आकार की होती है, को ऑपरेशन कर सफलतापूर्वक बाहर निकाला गया। इस सर्जरी को ’प्रोक्सिमल स्प्लीनो रीनल शंट विद् स्प्लीनेक्टोमी* (PSRS) कहते है। इस सफल सर्जरी करने वाली टीम में गेस्ट्रोएंटोरोलोजिस्ट डॉ पंकज गुप्ता व डॉ धवल व्यास, जीआई सर्जन डॉ कमल किशोर बिश्नोई, न्यूरो वेसक्यूलर इंटरवेंशनल रेडियोलोजिस्ट डॉ सीताराम बारठ, एनेस्थेटिस्ट डॉ एसएस जैतावत, डॉ ललिता एवं डॉ भगवंत तथा ओटी इंचार्ज हेमन्त गर्ग शामिल है। यह सफल इलाज दक्षिणी राजस्थान में प्रथम गीतांजली हॉस्पिटल में संभव हुआ है।

जीआई सर्जन डॉ कमल किशोर ने बताया कि डूंगरपुर निवासी प्रियंका साल्वी (उम्र २१ वर्ष) ’एक्स्ट्रा हेपेटिक पोर्टल वेन ऑब्स्ट्रक्षन* (EHPVO) नामक बीमारी से पीडत थी। यह बीमारी बचपन में ही हो जाती है परंतु इसके लक्षण बडे होने पर सामने आते है। ऐसे रोगियों में पेट दर्द, खून की उल्टी होना, पेट में भारीपन, कमजोरी लगना, शारीरिक विकास न होना जैसे लक्षण शामिल है। यह रोगी पेट दर्द एवं शारीरिक विकास न होने की शिकायत के साथ गीतांजली हॉस्पिटल आई थी। हीमोग्लोबिन भी केवल ६ ग्राम रह गया था एवं प्लेटलेट भी बहुत कम हो गए थे। लाल रक्त कोशिकाएं (RBC), श्वेत रक्त कोशिकाएं (WBC) एवं प्लेटलेट सब स्प्लीन (तिल्ली)  में जमा होने लगे थे जिससे शरीर के किसी भी हिस्से से रक्तस्त्राव का खतरा बढ गया था। श्वेत रक्त कोशिकाएं के कम होने पर शरीर में संक्रमण का खतरा भी बढ गया था। सोनोग्राफी, एंडोस्कोपी एवं सीटी स्केन की जांचों में स्प्लीन (तिल्ली) का काफी बडा होना पाया गया। इस कारण लिवर तक रक्त की आपूर्ति करने वाली पोर्टल वेन भी ब्लॉक हो गई जिससे लिवर में रक्त जाना बंद हो गया। इससे छोटी-छोटी नसों द्वारा लिवर में रक्त जाना शुरु हो गया जिससे इन नसों पर रक्त का दाब बहुत अधिक था। इस स्थिति को ’एसिम्पटोमेटिक पोर्टल बिलिओपैथी‘ कहते है।

इन जटिलताओं को नियंत्रित करने के लिए रोगी को सर्जरी के लिए लिया गया। सर्जरी के दौरान स्प्लीन (तिल्ली) की धमनी (जिससे रक्त स्प्लीन (तिल्ली) में जमा हो रहा था) को बंद किया गया। मात्र ६ ग्राम हीमोग्लोबिन होने के कारण रोगी के लिए अतिरिक्त रक्त की व्यवस्था भी की गई थी किन्तु शिरा के रास्ते रोगी के शरीर में रक्त की आपूर्ति षुरु हो गई जिससे रोगी का हीमोग्लोबिन ऑपरेशिन थियेटर के अंदर ही ११ ग्राम हो गया और उसे रक्त चढाने की आवश्यकता नहीं पडी। इसके बाद स्प्लीन (तिल्ली) को बाहर निकाल, स्प्लीन (तिल्ली) की शिरा को किडनी की शिरा से जोड दिया। रोगी अब बिल्कुल स्वस्थ है और निकट भविश्य में भी उसे कभी पीलिया नहीं होगा, रक्तस्त्राव की कोई परेशनी नहीं होगी, सामान्य विकास होगा एवं पित्त की नली पर दबाव भी कम हो जाएगा।

डॉ कमल ने बताया कि स्प्लीन (तिल्ली) हमारे शरीर में रोग प्रतिरोधक शक्ति बढाने का कार्य करती है। ऐसे रोगी जिनमें स्प्लीन (तिल्ली) को हटा दिया जाता है उनका टीकाकरण कर एहतियाती उपायों का इस्तेमाल किया जाता है। उन्होंने यह भी बताया कि ऐसी गर्भवती महिलाएं जिनकी डिलीवरी घर पर होती है, तो बच्चे की गर्भनाल( Umbilical Cord ) से निकली हुई अम्बिलिकल वेन जो पोर्टल वेन में खुलती है, उसमें संक्रमण हो जाता है जिससे वह इस बीमारी का शिकार हो जाते है। ऐसे बच्चों का शारीरिक विकास भी बहुत धीरे होता है।

गीतांजली मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल के सीईओ प्रतीम तम्बोली ने गेस्ट्रोएंटरोलोजी, गेस्ट्रो सर्जरी एवं न्यूरो वेसक्यूलर इंटरवेंशनल रेडियोलोजी की टीम को बधाई देते हुए कहा कि, ’यह एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण सर्जरी थी जिसमें यह टीम बखूबी सफल हुई है। जैसा कि विदित है कि गीतांजली हॉस्पिटल एक ऐसा अस्पताल है जहां एक ही छत के नीचे सभी व्यापक एवं सुपर स्पेशियालिटी सुविधाएं उपलब्ध है। इस सर्जरी के लिए भी एक मल्टी डिसिप्लिनरी एप्रोच और विशेषज्ञों की टीम की आवश्यकता थी जो गीतांजली में मौजूद है। हम बच्चे के उज्जवल भविश्य एवं अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते है।‘


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