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योग किसी विशेष दिवस पर ही क्यों? यह रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा क्यों नहीं बनें?

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21 Jun 22
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-डॉ मनजीत कौर

योग किसी विशेष दिवस पर ही क्यों? यह रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा क्यों नहीं बनें?

संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनओ) ने 21 जून को सारे विश्व में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने की स्वीकृति प्रदान की  है। यह सारी दुनिया में वर्ष 2015 में पहली बार मनाया गया। भारत को यूएनओ से योग को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस  के रूप में मान्यता दिलाने का श्रेय जाता है।

इस वर्ष हम पूरे विश्व में आठवाँ अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मना रहे हैं।प्रकृति का नियम हैं जब इंसान पर रोगों का साया बढ़ता है तों उससे निजात पाने के लिए,हमारी दृष्टि अतीत के इतिहास पर पड़ती है,कि क्यों आख़िर पहले जमाने के लोग ऐसा क्या करते थे कि अर्वाचीन काल में वे वर्तमान युग से अधिक  स्वस्थ और निरोगी रहते थे।

हम यदि अपने समृद्ध अतीत को देखें पाते है कि प्राचीन समय में लोग ईश्वर यानि प्रकृति को जानने की जुगत में ही ज़्यादा रहते थे। जीव जन्तु और मनुष्य को किसने बनाया? इस सृष्टि का निर्माण कैसे हुआ ? मानव जन्म का उद्देश्य क्या है? ईश्वर से साक्षात्कार कैसे किया जा सकता है? आदि अनेक बातों की जिज्ञासा लेकर लोग अपने  घर से दूर प्रकृति की गोद में मुख्य रुप से पर्वतों की गौद में बैठकर तपस्या करते थे और समाधिस्थ मुद्रा में जीवन का रहस्य ढूँढते थे।
वैसे तो प्राचीन काल से योग का हर जगह वर्णन मिलता है परंतु उसका  लिपिबद्ध और विहंगम दृष्टि से वर्णन पतंजलि शास्त्र में मिलता है और इस तरह हम कह सकते है कि आज भी पतंजलिकृत योगदर्शन ही सबसे लोकप्रिय ग्रंथ है।

माना जाता है कि पौराणिक युग से ही भारतीय योग की जड़े गहराई से जुडी हुई हैं। ऐसा कहा जाता है कि यह भगवान शिव ही थे,जिन्होंने इस कला को जन्म दिया। वेदों, उपनिषदों और गीता में योग का विस्तार से वर्णन किया गया है।भगवान कृष्ण ने भी गीता में ज्ञान योग,कर्म योग और भक्ति योग का भलीभाँति सुन्दर वर्णन किया है। योग शब्द संस्कृत की युज् धातु से बना है, जिसका अर्थ है संयोजन, एकीकरण,जोड़ना,संतुलन बनाना  इत्यादि।इस अर्थ में योग का रसायन शास्त्र, चिकित्सा शास्त्र, अर्थ शास्त्र, ज्योतिष शास्त्र अथवा अन्य कोई भी शास्त्र में सदैव प्रयोग होता आया है।आयुर्वेद में मुख्य रुप से योग का  परिष्कृत रुप से वर्णन है।

दरअसल आयुर्वेद ही वह विज्ञान है जिसने शारीरिक संतुलन के साथ-साथ मानसिक संतुलन पर सबसे अधिक ध्यान और  ज़ोर दिया है। इसलिए स्वास्थ्य की सबसे सुंदर परिभाषा आयुर्वेद शास्त्र के अतिरिक्त और कहीं भी नहीं मिल सकती। इसलिए कहा इस संस्कृत के इस श्लोक में कहा भी गया है कि-“समदोषःसमाग्निश्च समधातुमलक्रियः।प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ्य इत्यभिधीयते।।”
अर्थात्त जिसके दोष सम हो,अग्नि सम हो,धातु सम हो,मलादि क्रियाएँ सम हो,आत्मा,इन्द्रिय,मन आदि सभी प्रसन्न हो वह प्राणी स्वस्थ प्राणी कहलाता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि सब क्रियाओं का सम होना और संतुलन में होना यही एक अच्छे स्वास्थ्य की निशानी है।

वर्तमान युग में स्वास्थ्य से जुड़ी कई विधाएँ प्रचलित हैं चाहे वो प्राकृतिक  चिकित्सा हो,योग चिकित्सा हो,एक्यूप्रेशर प्रणाली हो,आहार विज्ञान हो,कृषि विज्ञान हो,पशु विज्ञान हो यें सभी विधाएं आयुर्वेद से ही निकली हैं और आयुष के रूप में जानी जाती है। सरकारों ने भी इसे एक एकीकृत  आयुष विभाग के रूप में मान्यता देकर व्यवस्था का एक अभिन्न अंग बनाया हैं।कहने का तात्पर्य यह है कि बिना आयुर्वेद के योग  कुछ नहीं अथवा यूँ कहें कि अधूरा है।दोनों एक दूसरे के पूरक हैं और इनका सम्मिश्रण ही जीवन और स्वास्थ्य को परिपूर्ण बनाता है।

समय, काल और परिस्थितियों के चक्र के अनुसार चीजें प्रवर्तित और परिवर्तित होती रहती हैं।इसी क्रम में दुनिया में योग का भी पिछलें आठ सालों से एक नया रूप और अवतरण देखने को मिल रहा है।क्योंकि अब न केवल भारत वर्ष बल्कि विश्व के अन्य देशों में भी योग दिवस को बड़े उत्साह और जोश के साथ बड़े पैमाने पर  मनाया जाने लगा है।जीवन में योग के महत्व और मानव कल्याण के लिए आज बस आवश्यकता इस बात की है कि हम सभी योग को केवल किसी विशेष दिवस पर ही अंगीकार नहीं करें अपितु इसे हर व्यक्ति के रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा बनायें तभी यह और अधिक प्रभावी और सार्थक बनेगा ।
ऐसा भी नहीं है कि योग मानव के लिए कोई नई विधा है अथवा पिछलें आठ सालों से पहले कोई योग को नहीं जानता था अथवा योग नहीं करता था बल्कि इस विधा को तों सदियों से प्रयोग में लाया ज़ाता रहा है। विशेष कर विश्व गुरु माने जाने वाले भारत की जीवन शैली का तों यह प्रमुख अंग रहता आया है। खुशी की बात यह है कि आज पूरी दुनिया ने भी भारत के इस बेजोड़ रहस्य योग के महत्व को समझा और जाना है एवं सभी इसे अपनी जीवन शैली का अंग बनाने की ओर अग्रसर हों रहें हैं।
विशेष रुप से कोविड -19 की विभीषिका और इसके नए नए विषाणुओं के प्रादुर्भाव और बढ़ते संक्रमण के कारण विश्व के सभी लोगों लोगों का रूझान पिछलें कुछ वर्षों में योग के प्रति विशेष रुप से बढ़ा है।साथ ही मधुमेह,मोटापा,रक्तचाप,जोड़ों एवं संधियों के अन्य रोग और उदर से जुड़ें रोगों एवं मानसिक रोग यथा तनाव,अवसाद, अनिद्रा आदि में भी भारतीय योग प्रणाली काफ़ी कारगर सिद्ध हों रही हैं और विभिन्न रोगों को  जड़मूल से समाप्त करने में भी सहायक  साबित हों रही है।
पिछलें कुछ वर्षों में पूरे विश्व ने यह देखा है कि कोरोना काल और  कोविड संक्रमण तथा कोविडजन्य दुष्प्रभावों को कम करने में योग की भूमिका कितनी अधिक महत्वपूर्ण और कारगर  रहीं है।कहने और लिखने को बहुत सारी बातें हैं क्योंकि आर्यूर्वेद एक अथाह सागर हैं परंतु निचोड़ के रूप में इतना ही कहना यथोचित होगा कि आज के हालातों और ग्लोबल वार्मिग को देखते हुए आर्यूर्वेद और योग हर दृष्टि से यथा-स्वास्थ्य की दृष्टि से,समाज संरचना की दृष्टि से,पूरे देश और विश्व में शांति की दृष्टि से, प्रकृति के संरक्षण की दृष्टि से,वातावरण को बचाने की दृष्टि से,बच्चों और देश के भविष्य को सुरक्षित रखने की दृष्टि से बहुत ही ज़रूरी है।यह एक तरफ़ जहाँ शारीरिक सौष्ठव और विभिन्न बीमारियों से लड़ने के लिए ज़रूरी है,वहीं दूसरी ओर  मानसिक सौष्ठव की दृष्टि से भी रोगों से लड़ने और उनसे निजात पाने के लिए उतना ही ज़रूरी है जितना हमें अच्छे आहार-विहार, पौष्टिक भोजन और व्यायाम आदि करने से प्राप्त हो सकता है।इस प्रकार 
एक स्वस्थ और शांतिपूर्ण समाज की संरचना के लिए योग बहुत ज़रूरी है।
योग भारत की पूरे विश्व को एक  असाधारण भेंट और अनूठी देन है।
आओ ! हम सब मिलकर आयुर्वेद और योग को अपनायें।स्वस्थ और खुशहाल राष्ट्र की रचना में एक कदम और आगे बढ़ायें।आओ ! योग दिवस को पूरे मनोयोग से मनायें .......हर घर को स्वस्थ बनायें,छोड़ चिंता और फ़िक्र की बातें,थोड़ी देर जीवन प्रकृति के संग बितायें,अपने साथ चटाई ले जाये,सुंदर प्रकृति का लुत्फ़ उठायें,बिना एक पैसा खर्च किये,सुंदर गठीला शरीर पायें।हर रोज़ सूर्य नमस्कार से दिन शुरू करके,फिर आसन पर बैठ जायें, अनुलोम विलोम करके धीरे-धीरे अन्य आसनों पर आयें,आसनों और प्राणायाम का सुंदर समायोजन बनायें, वज्रासन,सिंहासन,मंडूरासन,वीरासन धीरे-धीरे करते जायें ,फिर हस्तपादासन,ताड़ासन,
वृक्षासन आदि भी करते जायें,आख़िर में शवासन की मुद्दा में आँखें बंद करके लेट जायें, प्रकृति की गोद में लेटकर
संसार रचयिता में ध्यान लगायें
धीरे-धीरे प्रतिदिन अभ्यास से 
शरीर को स्वस्थ सुदृढ़ बनायें,
रोगों से लड़ और मुक्त होकर
स्वस्थ मन और तन पायें,सस्ता सुंदर टिकाऊ तरीक़ा है योग,घर-घर ये संदेश पहुँचायें,खुद भी स्वस्थ रहें और 
भारत को भी एक स्वस्थ और निरोगी राष्ट्र बनायें.....आओ मिलकर योग दिवस मनायें और ख़ुशहाली का एक पेड़ लगायें।


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