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पद्म पुरस्कार 2021 की घोषणा : राजस्थान के तीन व्यक्तियों को पद्मश्री अवार्ड मिलेगा

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26 Jan 21
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-नीति गोपेंद्र भट्ट-

पद्म पुरस्कार 2021 की घोषणा : राजस्थान के तीन व्यक्तियों को पद्मश्री अवार्ड मिलेगा

नई दिल्ली।भारत सरकार ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर देश के सर्वोच्च नागरिक पद्म पुरस्कारों- 2021 की घोषणा की हैं।

इन पुरस्कारों में राजस्थान के तीन व्यक्तियों को भी नामित किया गया है।
इनमें जोधपुर जिले के प्रख्यात लोक कलाकार लखा खान को कला के क्षेत्र में, राजसमन्द जिले के श्याम सुन्दर पालीवाल को सामाजिक सेवा और पर्यावरण सुरक्षा एवं पाली जिले के वयोवृद्ध साहित्यकार अर्जुन सिंह शेखावत को साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय सेवाओं के लिए पद्मश्री से विभूषित करने के लिए नामित किया गया है।



इस वर्ष राष्ट्रपति ने 119 पद्म पुरस्कारों को मंजूरी दी है।  इस बार किसी भी हस्ती को  देश के सर्वोच्च अलंकरण भारत रत्न से सम्मानित नही किया गया है।

इस वर्ष पद्म अलंकारों की  सूची में 7 पद्म विभूषण, 10 पद्म भूषण और 102 पद्मश्री पुरस्कार शामिल हैं।
  
पुरस्कार पाने वालों में से 29 महिलाएं हैं ।इस सूची में विदेशियों की श्रेणी के 10 व्यक्ति / एनआरआई / पीआईओ / ओसीआई, 16 मरणोपरांत पुरस्कार पाने वाले और 1 ट्रांसजेंडर पुरस्कार विजेता भी शामिल हैं।

    यह पुरस्कार राष्ट्रपति द्वारा मार्च / अप्रैल के आसपास राष्ट्रपति भवन में आयोजित अलंकरण समारोह में दिए जायेंगे।  

पद्म पुरस्कारों में विभिन्न  श्रेणियों में, पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री से सम्मानित किया जाता है।  पुरस्कार विभिन्न विषयों / गतिविधियों के क्षेत्रों, अर्थात- कला, सामाजिक कार्य, सार्वजनिक मामलों, विज्ञान और इंजीनियरिंग, व्यापार और उद्योग, चिकित्सा, साहित्य और शिक्षा, खेल, सिविल सेवा आदि में दिए जाते हैं, जिन्हें 'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया जाता है।  असाधारण और प्रतिष्ठित सेवा के लिए;  ‘पद्म भूषण’ उच्च क्रम की विशिष्ट सेवा के लिए और किसी भी क्षेत्र में विशिष्ट सेवा के लिए पद्म श्री ’।  इन पुरस्कारों की घोषणा हर साल गणतंत्र दिवस के अवसर पर की जाती है।

 राजस्थान की जिन विभूतियों को इस वर्ष पद्मश्री से विभूषित किया जायेगा उनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-

लाखा खान

राजस्थान के जोधपुर जिले के रनेरी गाँव में मंगणियार समुदाय के पारंपरिक संगीतकारों के परिवार में, जन्मे लाखा खान सिंधी सारंगी के निर्विवाद गुरु और  एक जीवित किंवदंती है। लाखा खान कला का एक राष्ट्रीय खजाना है। वे सिंधी सारंगी जटिल वाद्य के देश में बची आख़िरी पीढ़ी के संभवत अंतिम सिद्धहस्त कलाकार हैं । उन्होंने राजस्थानी और मुल्तानी लोक और सूफी संगीत की सदियों पुरानी संगीत परंपरा को आगे बढ़ाने में अपना अपूर्व योगदान दिया है। 

लाखा खान को राजस्थानी लोक संगीत में योगदान के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला है।

उनको अपनी बहुत कम उम्र में ही मंगणियारों के मुल्तान स्कूल में प्रक्षिक्षित किया गया । भारत में उनका पहला सार्वजनिक प्रदर्शन 60 और 70 के दशक के उत्तरार्ध में हुआ था। कला मर्मज्ञ दिवंगत कोमल कोठारी के मार्गदर्शन में 90 के दशक में उन्होंने यूरोप, ब्रिटेन, रूस और जापान का दौरा किया।  उन्होंने 2013 में अपने पहले अमेरिकी दौरे के साथ छह अंतर्राष्ट्रीय दौरे किए, और भारत में जोधपुर के मशहूर आरआरआइएफ, महिंद्रा कबीरा महोत्सव सहित अन्य उल्लेखनीय समारोहों में अपनी कला का प्रदर्शन किया।
 
 लाखा खान का संगीत वास्तव में पश्चिम भारत के शास्त्रीय और लोक कला दोनों ही क्षेत्रों में फैला हुआ है ।साथ ही धर्मनिरपेक्ष की मिसाल भी है । उनके विशाल गीत-संगीत के ख़ज़ाने में हिंदू भजन (भक्ति गीत), सूफी कलाम, लोकप्रिय हिंदी धुनें और प्राचीन भारतीय कथाएँ और क्षेत्र की प्राचीन कथाएँ आदि शामिल हैं।  वह हिंदी, मारवाड़ी, सिंधी, पंजाबी और मुल्तानी सहित छह भाषाओं में शक्तिशाली और सुरीली आवाज के साथ गाते हैं।  उनके वाद्ययंत्र की  सभी प्रशंसा करते है। लाखा खान का संगीत सीमाओं के  पार पूरे विश्व में लोकप्रिय है और यह  आध्यात्मिक एकता स्थापित करता है।  उनके साथ ढोलक पर उनके बेटे डेन खान डबल हेडेड इंडियन फोक ड्रम के साथ संगत करते हैं -।
 


श्याम सुन्दर पालीवाल 

राजस्थान के राजसमंद जिले की ग्राम पंचायत पिपलांत्री के पूर्व सरपंच श्याम सुंदर पालीवाल समाज सेवा और पर्यावरण रक्षक के रूप में सारे देश में मशहूर हुए है।


राजस्थान भीलवाड़ा से 130 किलो मीटर व उदयपुर से 75 किलो मीटर बीच में राजसमंद से 15 किलो मीटर की दूरी पर है। यह गांव तब सुर्खियों में आया जब इसरो के सर्वे में सेटेलाइट ने सुर्ख खदानों के बीच से हरियाली की तस्वीरें भेजी। इसरो के वैज्ञानिक देखकर हैरान रह गए थे। गांव में लगभग 5 लाख पौधे लगाए जा चुके हैं। पिपलांत्री में हुए कार्यों और in कार्यों के सूत्रधार श्याम सुंदर पालीवाल की तारीफ  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ,काँग्रेस नेता राहुल गांधी, सिने अभिनेता अक्षय कुमार समेत कई हस्तियां कर चुकी है। श्याम  सुंदर पालीवाल कौन बनेगा करोड़ पति केबीसी में अमिताभ बच्चन के साथ अपने शो के लिए भी देश भर में प्रसिद्ध हुए हैं। 

उनकी सरपंच पत्नी श्रीमती अनिता ने भी श्यामसुंदर पालीवाल और गांव पिपलांत्री का नाम बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ के लिए रोशन किया ।
पंचायत चुनाव में जब श्याम सुंदर 2005 में चुनाव जीतकर आये थे उस समय गांव की हालत बेहद खराब थी। चारो तरफ खदाने, उड़ती धूल, पानी की भारी कमी आदि समस्याएँ थी । उनकी सबसे प्रिय बिटिया का निधन हो गया था। बिटिया की स्मृति में उन्होंने पौधे लगवाए। गांव में जब भी किसी के घर पुत्री होती है तो उस परिवार को 111 पौधे लगाने होते है। उन पौधों की देखभाल पूरा परिवार करता है व पुत्री जब 18 वर्ष की हो जाती है तो उन्ही पेड़ो को बेचकर आर्थिक सहायता दी जाती है। पेड़ो को कोई भी, पंचायत क्षेत्र में कही भी लगा सकता है। साथ ही गांव वाले सभी मिलकर 21000₹ एकत्र कर ओर ग्राम पंचायत की तरफ से 10000₹ मिलाकर 31000₹ की एफडी करवाते है। गांव में किसी की भी मृत्यु  पर परिजनों से 11 पौधे लगाने का प्रावधान है।
पिपलांत्री गांव की तारीफ विदेशों में  होती है ।गांव को विदेश के प्राईमरी पाठ्यक्रमो में जगह मिली है और भी तारीफ में बहुत सारी बाते है। महत्वपूर्ण बात श्याम सुंदर पालीवाल अक्सर अपने संबोधनों में लोगों से कहते हैं, सरकार की तमाम कल्याणकारी योजनाएं हैं। सरकारी मशीनरी है, सरकार का पैसा है, सरकार की ही जमीनें हैं। मैने अपनी तरफ से कुछ नहीं किया। सिर्फ सरकारी योजनाओं को सही तरीके से लागू कराया और सरकारी बजट का सही इस्तेमाल किया है। जो भी ग्राम पंयायतें या सरपंच ऐसा कर रहे हैं, उनके भी गांव पिपलांत्री की तरह खुशहाल हैं, हालांकि श्याम सुंदरपालीवाल लगातार सरपंच नही बने है पर यह एक परंपरा बन गई है। कोई भी सरपंच बिना भेदभाव के पर्यावरण रक्षा की परंपरा को आगे बढ़ाते आया है। उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके है। ये सब करना उनके लिए मुश्किल था पर नामुमकिन.. नहीं ऐसा उन्होंने कर दिखाया।

 

अर्जुनसिंह शेखावत

नौ दशक की जीवन यात्रा एवं छह दशक के साहित्यिक सफर के राही अर्जुनसिंह शेखावत का जीवन ही अपने आप में साधना है। शेखावत का 1967 में राजस्थान के पाली जिले के बाली कस्बे में अध्यापक के रूप में सफर शुरू हुआ । इसके बाद यहीं उपजिला शिक्षा अधिकारी के रूप में नियुक्त हुए। 

शेखावत अब तक 50 सेअधिक पुस्तकों का लेखन-संपादन कर चुके हैं। भारतीय साहित्य अकादेमी सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं।

बाली में रहते हुए उन्हें आदिवासियों के जीवन को जानने का अवसर मिला। उन्होंने आदिवासियों की संस्कृति का लेखन का उद्देश्य बना लिया। 

शेखावत का कहना है कि अध्यापक के रूप में कार्य करते हुए उनके शिष्य जब वे शिक्षा अधिकारी के रूप में बाली गए तो कई शिक्षक, प्रधान एवं ग्रामसेवक बन चुके थे और ये लोग ही आदिवासियों के जीवन के नजदीक ले जाने में माध्यम बने।
आदिवासी आज भी विकास की बयार से दूर
शेखावत का कहना है कि आदिवासियों से संवाद बनाना अब भी आसान नहीं है। आज भी ये लोग विकास की बयार से दूर है। कई क्षेत्रों में तो वाहन तो दूर मोटरसाइकिल से भी पहुंचा नहीं जा सकता, लेकिन मन में साध थी और शिष्यों का सहयोग मिला तो आदिवासियों के जीवन एवं संस्कृति को नजदीक से देखा और वन के ऐसे वीर पुरुषों के जीवन पर लेखन की प्रेरणा प्राप्त हुई। इसके बाद लगातार भाखर रा भौमिया, आड़ावळ अरड़ायौ से लेकर सतत आदिवासियों के जीवन और संस्कृति से संबंधित पुस्तकों का लेखन किया।
उत्थान के प्रयास अब भी नाकाफी
आदिवासियों के जीवन को लेकर उनसे चर्चा की तो उन्होंने बताया कि ऋगवेद में वृत्तासुर नामक राक्षस का कथानक आया है। वस्तुत: वृत्तासुर भील था। इस राक्षस ने इंद्र को हाथी समेत पछाड़ दिया था। इसी तरह राजा बलि,हिरण्यकश्यप, शबर, किष्किंधा आदि भी भीलों के क्षेत्र थे। जंगल में रहने के कारण इनकी जीवन शैली ऐसी ही थी। 

सन् 1885 में पहली बार ब्रिटिश सरकार ने मुम्बई मे बैठक रखी, जिसमें इनेटसन, बेस फिल्ड और रिजले आदि ने भाग लिया। इस बैठक में तय हुआ कि भारत में बड़ी संख्या में आदिवासी जातियां हैं, इनका सामाजिक, सांस्कृतिक एवं शास्त्रीय अध्ययन जरूरी है। उनका उद्देश्य आदिवासियों के माध्यम से अपनी सत्ता को सुरक्षित रखना था। 
आजादी के बाद 1956 में मध्यप्रदेश में मर्दुमशुमारी हुई। 1961 में राजस्थान में आदिवासियों का सर्वे हुआ, लेकिन कोई विशेष कार्य नहीं हुआ। लगातार पिछड़ते जा रहे आदिवासी समाज के उत्थान को लेकर अब तक भी कोई विशेष कार्य नहीं हो रहा है। ये हमारे जंगल के रक्षक रहे, लेकिन अब भी मुख्यधारा से विलग है।
अनूठी संस्कृति है आदिवासियों की
शेखावत बताते हैं कि आदिवासियों की जीवन शैली आज भी वैसी ही है। वे सुदूर जंगल में रहते हैं और इनके कई बड़े मेले भरते हैं। यहां गंधर्व विवाह की रस्म निभाई जाती है। यहां आदिवासी युवा अपने मनपसंद की युवती से शादी रचाते हैं। इनके मेलों में अब भी दूसरे लोगों का प्रवेश वर्जित है। होली व दीपावली पर वे अपने ढंग से इसे मनाते हैं। होली पर महिलाएं समूह बनाकर नाचती है। हाथ व पांवों पर मेहंदी लगाते हैं और भुजा पर अपना या पति का नाम गुदवाने की परम्परा है। शेखावत कहते हैं ये आदिवासी लोग संस्कृति के सच्चे संवाहक है। झोंपड़ी में रहने वाले इन लोगों को मानवता का तीर्थ कह सकते हैं। शेखावत ने बताया कि भाखर रा भौमियां, संस्कृति री वसीयत, संस्कृति रा वड़ेरा, आड़ावळ अरड़ायौ आदि पुस्तकें पूरी तरह से आदिवासी संस्कृति से केंद्रित हैं।

आयुर्वेद रत्न शेखावत ने बताया स्वस्थ रहने का राज

शेखावत 87 वर्ष की आयु के हैं और अब भी पूर्णत: स्वस्थ जीवन जी रहे हैं। अपनी सेहत का राज बताते हुए वे कहते हैं मैंने आयुर्वेद रत्न का अध्ययन किया हुआ है। आयुर्वेद की जीवन शैली अपनाकर ही जीवन को स्वस्थ बनाया जा सकता है। शेखावत बताते हैं कि नियमित दिनचर्या से बढकऱ कोई औषधि नहीं है। युवाओं को संदेश देते हुए शेखावत कहते हैं कि तनाव ही मुख्य रोग है। जीवन को आनंद से जीना चाहिए। हमारी रसोई में ही कई रोगों को औषधियां विद्यमान है। हल्दी, सौंठ, अजवायन आदि ऐसे पदार्थ है जो सहज सुलभ है और इनके नियमित सेवन से बीमारी नजदीक ही नहीं फटक सकती। उनका कहना है कि कोरोना से डरने की नहीं, सजग रहने की जरूरत है। सरकार की गाइडलाइन की पालना करने के साथ आयुर्वेदिक काढ़े के सेवन से इस महामारी से बचा जा सकता है।


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