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“ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी एवं सृष्टिकर्ता है”

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29 May 20
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-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

“ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी एवं सृष्टिकर्ता है”

हम इस संसार आये और रह रहे हैं परन्तु हमें यह नहीं पता कि हम कहां से आये, हमें यहां कौन लाया व हमारे यहां लाये जाने का प्रयोजन क्या था? हमारा सामाजिक एवं शैक्षणिक वातावरण भी ऐसा है कि हमें इन प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलते। इस कारण हम इन प्रश्नों की उपेक्षा कर देते हैं। जब इन प्रश्नों के उत्तर किसी को पता नहीं, तो फिर इन्हें जानने का प्रयत्न क्यों व कैसे करें? भारत के लोग इस दृष्टि से भाग्यशाली हैं कि यहां प्राचीन वेद एवं वैदिक साहित्य में इन सभी प्रश्नों के उत्तर उपलब्ध हैं। हमारे साथ षडयन्त्र किया गया जिससे हम इन सब बातों पर न तो विचार ही करें और न जान सकें। हमें पश्चिमी सांचे में ढालने का प्रबन्ध किया गया। लार्ड मैकाले व उससे भी पहले अंग्रेजों, उससे पहले मुस्लिम शासकों ने धर्मान्तरण आदि के द्वारा इस प्रक्रिया को आरम्भ किया था परन्तु वह इसमें पूर्ण सफल नहीं हुए। देश की आंशिक आजादी व विभाजन के बाद हमारे शासकों ने जो पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान से दीक्षित थे, वैदिक संस्कारों से दूर थे, उन्होंने जाने व अनजानें में सृष्टि विषयक अनेक रहस्यों के ज्ञान व प्रचार की पूर्णतया उपेक्षा की।

 

                महाभारत युद्ध तक हमारे देश में वेद अपने यथार्थ स्वरूप में उपलब्ध थे। वेदज्ञानी ऋषि व विद्वान बड़ी संख्या में होते थे। गुरुकुलों में वेदों की शिक्षा दी जाती थी। महाभारत युद्ध के बाद क्षत्रियों के युद्ध में मारे जाने तथा उससे व्यवस्था भंग होने के कारण अध्ययन अध्यापन की गुरुकुलीय प्रणाली ध्वस्त हो गई। समय के साथ वेदों का ज्ञान भी क्षीण व लुप्त होता गया। इसके स्थान पर समाज व देश में अन्धविश्वास, पाखण्ड, अज्ञान से युक्त मिथ्या दूषित परम्परायें तथा फलित ज्योतिष जैसी हानिकारक व मिथ्या ज्ञान का प्रचार हुआ जिससे देश पुरुषार्थ के मार्ग से भटक कर भाग्यवादी बन गया। देश दिन प्रतिदिन निस्तेज व दुर्बल होता गया। पहले देश के अधिकांश भागों को मुस्लिमों ने गुलाम बनाया और बाद में अंग्रेजों ने देश पर अधिकार कर लिया। एसे दासत्व के समय में भी हमारे देश में वीर शिवाजी, महाराणा प्रताप, गुरु गोविन्द सिंह जी सहित नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, वीर सावरकर तथा क्रान्तिकारी युवकों ने पराक्रम दिखाया और देश का एक बार विभाजन होकर आंशिक आजादी मिली।

 

                देश की आजादी से पूर्व ऋषि दयानन्द (1825-1883) का आविर्भाव हो चुका था। उन्होंने अपने अपूर्व पुरुषार्थ से सत्य ज्ञान की खोज कर वेदों को प्राप्त किया था। वेद के प्रत्येक पद व उसके पदार्थ सहित वेदों के रहस्यों को जाना था। वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तक हैं। इस तथ्य को जानकर इसका प्रचार उन्होंने देश भर में किया था। वेद अन्धविश्वासों तथा मिथ्या परम्पराओं से सर्वथा मुक्त तथा समाज व देश को ज्ञान व विज्ञान से युक्त एक आदर्श, शक्तिशाली, पक्षपातरहित तथा अन्याय से रहित देश बनाने वाले सभी विधानों से युक्त हैं। इस तथ्य का प्रचार भी ऋषि दयानन्द ने प्रमाणों सहित किया था। उनके प्रचार से देश में अन्धविश्वास कम हुए व समाप्त हुए तथा जन्मना जातिवाद तथा अनेक मिथ्या परम्परायें दूर हुईं वा उनमें सुधार हुआ था। देश की आजादी की नींव भी महर्षि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश में लिखे विचारों से पड़ी थी। देश में गुरुकुलों तथा डी0ए0वी0 शिक्षण संस्थाओं का जाल बिछ गया था। ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा होने लगी थी। बेमेल, बाल विवाह बन्द होकर गुण, कर्म व स्वभाव पर आधारित पूर्ण युवावस्था में विवाह होने लगे थे। विधवा विवाह भी आरम्भ हुए। जन्मना जातिवाद के बन्धन भी ढीले पड़े थे। लोगों को ईश्वर का सत्यस्वरूप एवं गुण-कर्म-स्वभाव विदित हुए जिससे वह जीवात्मा व सृष्टि से जुड़े सभी प्रश्नों व शंकाओं का सत्य समाधान प्राप्त करना सरल हुआ। बहुत से लोगों ने अपने जीवन को वैदिक ज्ञान विज्ञान के अनुरूप व्यतीत करना आरम्भ किया था जिसमें सन्ध्या, ईश्वरोपासना, वायुशोधक अग्निहोत्र यज्ञ आदि का महत्व था।

 

                वर्तमान समय में भी आर्यसमाज विश्व में वेदों का प्रचार करते हुए ईश्वर व आत्मा के सत्य स्वरूप का प्रचार कर अविद्या को दूर करने के साथ लोगों को सत्य का ग्रहण करने और असत्य का त्याग करने की प्रेरणा देता है। वह ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना का प्रचार करता है और बताता है कि संसार के सभी मनुष्य एक सर्वव्यापक परमात्मा की सन्तानें होने से परस्पर भाई बहिन है। इस कारण से किसी भी मनुष्य को किसी के प्रति अन्याय व शोषण सहित पक्षपात का व्यवहार नहीं करना चाहिये और सबको वेदमार्ग पर चलना चाहिये। सत्याचरण के प्रतीक वेद ही सब मनुष्यों के लिये आचरणीय हैं और यही मनुष्य का धर्म भी है। यह कार्य अभी अधूरा है। इसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये आर्यसमाज का संगठन अस्तित्व में है। उसे आशा के अनुरूप समर्पित विद्वान नहीं मिले और लोग भी अविद्या में फंसे होने के कारण सत्य ज्ञान व विद्या के हितकारी सिद्धान्तों की उपेक्षा कर रहे हैं जिससे वेद प्रचार में बाधा आने से वसुधैव कुटुम्बकम् व जाति, मत, पन्थ, सम्प्रदाय, रंग, आकृति आदि के भेदों से रहित धर्म व समाज व्यवस्था अस्तित्व में नहीं आ सकी है।

 

                वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तके हैं। इस कारण वेदों में मनुष्य की सभी शंकाओं का समाधान विद्यमान है। ऋषि दयानन्द ने वेदों की महत्ता के कारण वेदों के प्रत्येक मन्त्र व शब्द का अर्थ करने का कार्य आरम्भ किया था। उन्होंने यजुर्वेद का भाष्य संस्कृत व हिन्दी में पूर्ण कर लिया था। उनके वेदभाष्य में मन्त्रों का पदच्छेद, अन्वय, प्रत्येक पद व शब्द के अर्थ, पदार्थ व्याख्या एवं मन्त्र का भावार्थ भी प्रस्तुत किये गये हैं। बहुत सी स्वार्थ व वेद विरोधी शक्तियां उनके अज्ञान व अविद्या से मुक्त विद्वतापूर्ण उपदेशों व ज्ञान प्रचार के यज्ञ के विरुद्ध थी। उन्होंने षडयन्त्र करके उनको विष देकर मार डाला। यदि वह कुछ वर्ष और जीवित रहते तो वेदों के भाष्य का कार्य पूरा हो जाता। इस पर भी वह जितना वेदभाष्य कर गये हैं वह भी अज्ञान व अन्धविश्वासों को दूर करने तथा मनुष्यों की सभी शंकाओं का समाधान करने के लिये पर्याप्त है। उनके भावी शिष्य व अनुयायियों ने उनके वेदभाष्य के कार्य को पूरा किया। वर्तमान समय में ऋषि द्वारा रचित तथा उनके अनुयायी विद्वानों द्वारा किया गया वेदभाष्य उपलब्ध है जो अविद्या, अन्धविश्वास तथा मिथ्या परम्पराओं से सर्वथा रहित है। यह ऋषि दयानन्द, उनके आर्यसमाज तथा वैदिक विद्वानों की देश, समाज सहित विश्व को बहुत बड़ी देन है।

 

                वेदों में ईश्वर का सत्य स्वरूप उपलब्ध है। वेदों के अनुसार ईश्वर एक चेतन तथा आनन्द स्वरूप सत्ता है जो सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, निराकार, सर्वज्ञ, न्यायकारी, अनादि, नित्य, अनुपम तथा सृष्टिकर्ता है। आर्यसमाज के दूसरे नियम में ऋषि दयानन्द ने ईश्वर के प्रमुख गुण, कर्म तथा स्वभाव को सूत्रबद्ध किया है। उन्होंने लिखा है ‘ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। उसी की उपासना (ईश्वर के सत्य गुणों, सत्यस्वरूप, उपकारों, उसके कर्मों का चिन्तन व ध्यान तथा उसका धन्यवाद करना) करनी योग्य है। ईश्वर ने इस सृष्टि की रचना अविनाशी व अनादि सत्व, रज व तम गुणों वाली त्रिगुणोत्मक प्रकृति से की है। सृष्टि जीवों के उपभोग के लिये है। जीव जन्म-मरण धर्मा हैं। जीवों को उनके मनुष्य जन्म के शुभाशुभ वा पाप-पुण्य कर्मों के अनुसार जन्म देना ईश्वर का काम है।

 

                जीव इच्छा व द्वेष में फंस कर कर्म के बन्धों में बन्धता है जिसका परिणाम ही सुख व दुख सहित जन्म व मृत्यु होता है। वेद मार्ग पर चलकर आसक्ति रहित तथा वेदाध्ययन करते हुए ईश्वरोपासना व परोपकार आदि कार्यों को करके जीव मुक्त हो सकता है। मुक्ति वा मोक्ष जीव को प्राप्त होने वाली सभी प्रकार के दुःखों से पूर्ण मुक्ति होती है। यह निश्चित अवधि 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्षों के लिये होती है। जीव व जीवात्मा चेतन व अल्पज्ञ है। यह अनादि, नित्य, अमर, अविनाशी, अजर, एकदेशी, ससीम तथा जन्म-मरण धर्मा है। वेदाध्ययन कर यह ईश्वर व आत्मा आदि पदार्थों के सत्य स्वरूप को प्राप्त होता है और वेदाचरण वा सदाचरण करते हुए दुःखों से मुक्त होता है। समस्त वेद मनुष्य के लिये प्रत्येक परिस्थिति के अनुरूप कर्मों व आचरणों का विधान करते हैं। वेदों के समान संसार का कोई ग्रन्थ व धर्म नहीं है जो पूर्ण विद्या से युक्त तथा अविद्या से मुक्त हो। जो वेद को छोड़कर अन्य मनुष्यकृत ग्रन्थों में श्रम करते हैं वह पूर्ण सत्य को प्राप्त न होने के कारण भ्रमित जीवन व्यतीत कर पाप-पुण्य करते हुए बन्धनों में फंसते हैं जिसका परिणाम अनेक योनियों में जन्म लेकर सुख व दुःख का भोग करना होता है। वेद का ज्ञान व्यापक एवं विस्तृत है। इसके अध्ययन के लिये वेदाध्ययन सहित ऋषि दयानन्द का सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, उपनिषद, षडदर्शन, मनुस्मृति, रामायण तथा महाभारत का अध्ययन भी लाभप्रद है।

 

                सत्यार्थप्रकाश एवं वेदाध्ययन कर मनुष्य ईश्वर, जीवात्मा, प्रकृति सहित अपने कर्तव्य व अकर्तव्यों को भली प्रकार से जान लेता है और वेदानुकूल वा वेदमय जीवन व्यतीत कर दुःखों से निवृत्त होकर सुखी जीवन व्यतीत करते हुए जीवनमुक्त होकर मुक्ति को प्राप्त हो जाता है। ईश्वर और जीवात्मा का सत्यस्वरूप जान लेने पर मनुष्य को वैराग्य होता है। वैराग्यवान मनुष्य पापों को छोड़कर निःश्रेयस प्राप्ति के कर्मों को करते हुए अपना जीवन सफल करता है। ईश्वर एक पिता, आचार्य, राजा, न्यायाधीश के समान धर्मपालक मनुष्य की रक्षा एवं पोषण करते हैं। ईश्वर व जीवात्मा का व्याप्य-व्यापक, साध्य-साधक, उपास्य-उपासक, स्वामी-सेवक, गुरु-शिष्य आदि का सम्बन्ध है। इसे जानकर व तदनुरूप आचरण कर ही मनुष्य का जीवन सफल होता है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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देहरादून-248001

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