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अग्निहोत्र हवन-यज्ञ से वायु-वर्षा जल एवं पर्यावरण की शुद्धि सहित अनेकानेक स्वास्थ्य एवं आध्यात्मिक लाभ

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06 Nov 19
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मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

अग्निहोत्र हवन-यज्ञ से वायु-वर्षा जल एवं पर्यावरण की शुद्धि  सहित अनेकानेक स्वास्थ्य एवं आध्यात्मिक लाभ

मनुष्य के सुख का मुख्य आधार शुद्ध वायु एवं जल के सेवन सहित भूख से कुछ कम सीमित मात्रा में शुद्ध शाकाहारी भोजन का सेवन है। हमारे पूरे शरीर में रक्त भ्रमण करता है जो अनेक कारणों से दूषित होता रहता है। ईश्वर ने हमारे रक्त को शुद्ध करने का शरीर के भीतर एक यन्त्र बनाया है जिसे हम हृदय के नाम से जानते हैं। पूरे शरीर से दूषित रक्त धमनियों के द्वारा हृदय में आता है। यहां दूषित रक्त एकत्र होता है। वह दूषित रक्त हमारी श्वास प्रक्रिया द्वारा बाहर से शरीर के भीतर ली गई वायु वा आक्सीजन के सम्पर्क में आता है जिससे दूषित रक्त के विजातीय तत्व आक्सीजन से मिलकर कार्बन डाई आक्साईड गैस वा वायु में परिवर्तित होकर श्वास द्वारा बाहर आ जाते हैं। यदि हम शुद्ध वायु, जिसमें पर्याप्त मात्रा में आक्सीजन व लाभकार नाइट्रोजन आदि गैसे हैं, उसे श्वास द्वारा हृदय में पहुंचाते हैं तो इससे हमारा रक्त अधिक मात्रा में शुद्ध होने से हम अनेक रोगों से बचे रहते हैं। इससे हमारा शारीरिक बल न्यूनता को प्राप्त नहीं होता। हमारे काम करने की क्षमता में वृद्धि होती है, न्यूनता नहीं आती। अग्निहोत्र से शुद्ध वायु को उत्पन्न कर उसके सेवन से हम जीवन भर निरोग रह सकते हैं। इससे हमारा मनुष्य जन्म सार्थक एवं सुखी बनता है। अतः हमें शुद्ध वायु के सेवन सहित अपने आसपास की वायु को दूषित होने से बचाना चाहिये और जो हमारे घर में रसोई, वाहनों के चलाने, उद्योगों आदि से दूषित वायु उत्पन्न होती है उनसे होने वाले प्रदुषण को वेद निर्दिष्ट उपाय अग्निहोत्र यज्ञ से दूर व कम करने का प्रातः व सायं प्रयास करना चाहिये। 

 

                अग्निहोत्र यज्ञ से अनेक लाभ होते हैं, इनमें से कुछ लाभ निम्न हैं:

 

1-  यज्ञ में आहुति रूप में डाले गये देशी गाय के घृत व ओषधियों यथा गिलोय, गुग्गल आदि, सुगन्धित पदार्थ केसर, कस्तूरी, मिष्ट पदार्थ देशी शक्कर तथा पुष्टि व बलवर्धक पदार्थ बादाम, काजू, छुआरे आदि मेवों सहित अन्न घृत व शक्कर युक्त भात की आहुति देने से वायु का दुर्गन्ध एवं प्रदुषण दूर व कम होता है।

 

2-  अग्निहोत्र यज्ञ से वायु तथा वायुमण्डलीय जल के कणों पर भी लाभप्रद प्रभाव पड़ता है।

 

3-  यज्ञ से वर्षा में वृद्धि होती है। यज्ञ करने से यज्ञकर्ता यजमान की इच्छानुसार समय व मात्रा की दृष्टि से आवश्यकता के अनुरूप वर्षा हो सकती है परन्तु इसके लिये यजमान का उच्च गुणों व ज्ञान से युक्त एवं अत्यन्त पवित्र आचरण वाला होना आवश्यक है। इस प्रकार यज्ञ करने से भी वायु शुद्ध होकर रोगों का शमन तथा सुखों की वृद्धि सहित अन्न उत्पादन में भी वृद्धि होती है।

 

4-  यज्ञ से ईश्वर की उपासना का अतिरिक्त लाभ भी होता है।

 

5-  यज्ञ में संगतिकरण से हम दूसरों के दुःखों की निवृत्ति में सहायक बनते हैं और सबके सुखों का विस्तार होता है। अग्निहोत्र यज्ञ घर में भी किया जाता है और आर्यसमाज के सत्संगों, धार्मिक व सामाजिक समारोहों में भी होता है। इससे हमें वैदिक विद्वानों के वेद विषयक उपदेशों को सुनने का अवसर मिलता है जिससे जीवन व चरित्र को सुधारने की प्रेरणा व मार्गदर्शन प्राप्त होता है।

 

6-  अग्निहोत्र यज्ञ में हम समाज व देश को शुद्ध वायु, शुद्ध वर्षा जल का योगदान करते हैं। यज्ञीय वातावरण से होने वाली वर्षा हमारे कृषकों के लिये वरदान होती है। इससे अन्न की गुणवत्ता में वृद्धि होती है। विषैली रसायनिक खाद के स्थान पर जैविक खाद से जो अन्न उत्पन्न होता है वह रोग निवारक एवं आयु की रक्षा करने वाला होता है। यज्ञ का पर्यावरण सहित वृक्षों व वनस्पतियों पर लाभकारी प्रभाव पड़ता है। इससे खेतों में उत्पन्न अन्न अधिक पौष्टिक वा स्वास्थ्यवर्धक होता है।

 

7-  यज्ञ से हमें वेदाध्ययन की प्रेरणा भी मिलती है। वेदाध्ययन से हमारी शारीरिक, आत्मिक एवं सामाजिक उन्नति होती है।

 

8-  यज्ञ करने से विद्वानों की संगति होने से हमारी अविद्या का नाश होता है और विद्या की वृद्धि होती है।

 

9-  यज्ञ करने से हमें यज्ञ एवं अन्य विषयों पर प्रामाणिक जानकारी प्राप्त करने की प्रेरणा सहित वैदिक ग्रन्थों के स्वाध्याय की प्रेरणा भी मिलती है जिससे हमारे अज्ञान का नाश होकर हम आस्तिक, ईश्वर विश्वासी, धार्मिक, सत्य के ग्राहक तथा असत्य कार्यों का त्याग करने वाले बनते हैं।

 

10-  यज्ञ करते हुए पूरा परिवार एक साथ एक स्थान बैठकर सन्ध्या व यज्ञ करता है। यह दोनों कार्य हमें प्रातः व सायं ईश्वर से जोड़े रखते हैं और बुरे काम करने से बचाते हैं। यदि हमने दिन में कोई बुरा काम किया है तो सायं सन्ध्या व यज्ञ करते हुए हमारी आत्मा हमें धिक्कारती है। परमात्मा भी हमें दुर्गुणों व दुराचारों को छोड़ने की प्रेरणा करने के साथ हमें शक्ति प्रदान करते हैं जिससे हमारा भविष्य बिगड़ने के स्थान पर सुधरता है।

 

11-  अग्निहोत्र यज्ञ करने वाले व्यक्तियों को अपने समाज व पड़ोसियों से सम्मान प्राप्त होता है। वह जानते हैं कि यज्ञ करने वाला व्यक्ति धार्मिक हैं और यह कभी गलत व अधर्म का काम नहीं करते।

 

12-  अग्निहोत्र यज्ञ करने से हमारे पुण्य कर्मों का संचय बढ़ता जाता है जो हमें इस जन्म में परमात्मा के द्वारा सुख दिलाता है और मृत्यु होने के बाद यज्ञ कर्म के जो फल हमें प्राप्त होने से छूट जाते हैं उनके प्रभाव से हमें अगला जन्म श्रेष्ठ मानव योनि में धार्मिक, अर्थ-सम्पन्न एवं सुशिक्षित माता-पिता के परिवारों में मिलता है। यज्ञ के प्रभाव से हमें भावी जन्म में श्रेष्ठ बुद्धि, बलिष्ठ व आकर्षक शरीर मिलता है। यज्ञ न करने से यह लाभ प्राप्त नहीं होता है।

 

13-  प्रतिदिन प्रातः व सायं सन्ध्या व यज्ञ करने से परमात्मा हमसे प्रसन्न होते हैं। इसका कारण यह है कि इन कर्मों को करके हम परमात्मा की वेदों में की गई आज्ञा का पालन कर रहे होते हैं। जिस प्रकार माता-पिता व आचार्यों की आज्ञा पालन करने से वह प्रसन्न होकर आशीर्वाद व अपना उत्तराधिकार हमें प्रदान करते हैं, ऐसा ही परमात्मा भी करते हंै। अतः सन्ध्या व यज्ञ करने से एक महत्वपूर्ण यह लाभ भी यज्ञकर्ता को होता है।

 

14- देश में आपदा यथा दुर्भिक्ष, अकाल मृत्यु, भयंकर रोग, अति वृष्टि, भूकम्प, बाढ़ आदि न हों इसके लिये भी हमें यज्ञ करने चाहियें। यज्ञ करने और परमात्मा से इन संकटों से बचने की प्रार्थना करने पर परमात्मा हमें इनसे बचा सकते हैं।

 

                यज्ञ में कुछ बातों का हमें ध्यान रखना होता है। इस विषय में हम सामवेद भाष्यकार वेदमूर्ति डा0 आचार्य रामनाथ वेदालंकार जी का मन्तव्य प्रस्तुत कर रहे हैं। हमारे यज्ञ करने वाले बन्धुओं को इन निर्देशों को देख लेना और समझ लेना चाहिये। आचार्य रामनाथ वेदालंकार जी के सुझाव निम्न हैं:

 

1-  घर-घर में किये जाने वाले नैत्यिक दैनिक अग्निहोत्र का प्रचार अधिकाधिक हो। घर के सब सदस्य यज्ञ में सम्मिलित हों।

 

2-  यज्ञों में स्वच्छता और पवित्रता का पूरा ध्यान रखा जाये।

 

3-  सामूहिक यज्ञों में यजमान, व्रती और दर्शक तीन श्रेणियां हों। यजमान सब आहुतियां डालें, व्रती केवल व्रत-ग्रहण की आहुतियां तथा पूर्णाहुति डालें। दर्शकों को आहुति डालने का अधिकार नहीं होगा।

 

4-  यजमान और व्रती नियत वेश में बैठें तथा प्रतिदिन सारे समय उपस्थित रहें।

 

5-  वेद प्रचार के उद्देश्य से वेदपारायण-यज्ञ बिना आहुति वाले किये जायें, अर्थात् स्तुति-प्रार्थना-उपासना, स्वस्तिवाचन, शान्तिकरण के समान प्रतिदिन यज्ञार्थ निर्धारित समय में होम सेे पूर्व वेदमन्त्र-पाठ हुआ करे, तत्पश्चात् सामान्य होत्र हो। होम के अनन्तर वेदोपदेश हों।

 

6-  वेदप्रचार के अतिरिक्त अन्य किसी उद्देश्य से दीर्घयज्ञों का आयोजन हो, तो उसके अनुरूप मन्त्रों का चयन करके उनके पाठपूर्वक आहुति दी जाए। साथ में कुछ मन्त्र ईश्वर-स्तुति-प्रार्थना-उपासना के रखे जा सकते हैं।

 

7-  दीर्घयज्ञों के उद्देश्य अनेक हो सकते हैं, यथा--स्वराज्य और सुराज्य की भावना जगाना, किसी फैली हुई महामारी से बचाव, स्वास्थ्य-प्राप्ति एवं दीर्घायुष्य, धन-समृद्धि, कृषि-पुष्टि, दुर्भिक्षनाश, वृष्टि, सन्तान-प्राप्ति, पाप-नाशन, धर्मप्रचार आदि। प्रत्येक उद्देश्य के वेदमन्त्र-संग्रह तैयार किये जा सकते हैं। यज्ञों के अनन्तर प्रत्येक उद्देश्य की पूर्ति के निमित्त वेदोपदेश या धर्मोपदेश होंगे ही।

 

8-  यज्ञों में श्रद्धा और मेधा दोनों का प्रयोग हो। श्रद्धा के साथ वैज्ञानिकता का भी ध्यान रखा जाए।

 

9-  घृत एवं अन्य हव्य पदार्थ शुद्ध, सुसंस्कृत हों। सुगन्धित, मिष्ट, पुष्टिप्रद एवं रोगहर चारों प्रकार के हव्य होने चाहियें। हवन-सामग्री पर अनुसंधान होने उचित हैं।

 

10-  आहुति डालने से मुक्ति मिल जाएगी--ऐसा प्रचार करके पूर्णाहुति के लिए जनता को आकृष्ट करना और जो भी पूर्णाहुति के समय आ जाए, उससे आहुति डलवा देना उचित नहीं है। यजमानों के अतिरिक्त यदि किन्हीं को पूर्णाहुति का अधिकार देना है, तो उन्हीं को मिलना चाहिए जो व्रती बनकर प्रतिदिन प्रारम्भ से अन्त तक यज्ञ में उपस्थित रहे हों। जिन्होंने यज्ञ आरम्भ ही नहीं किया, उन्हें पूर्णाहुति का अधिकार कैसे मिल सकता है।

11-  मान्य पुरोहितवर्ग, विद्वद्वर्ग तथा सुधीजनों को यह भी सोचना होगा कि यज्ञ को आवश्यकता से अधिक महिमा-मण्डित न करें। मध्यमार्ग ही उचित रहता है। देश की भूखी-नंगी जनता को देखना और उसके प्रति अपने कर्तव्य को पालन करने का विचार भी करना होगा। दुर्भिक्ष, बाढ़, भूकम्प, तूफान, अग्निकाण्ड, दुर्घटनाओं आदि की त्रासदी से पीड़ित जनता के लिए भी अपना तन-मन-धन देना होगा।

   हमने इस लेख में यज्ञ के लाभों की एक हल्की झलक प्रस्तुत की है। यज्ञ से अनेकानेक लाभ होते हैं। यज्ञ का मुख्य उद्देश्य दुःखों की निवृति एवं सुखों की वृद्धि वा स्वर्ग-प्राप्ति होता है। हम जो भी इच्छा करते हैं और उसकी पूर्ति के लिये श्रद्धा और मेधा के साथ यज्ञ करते हैं तो परमेश्वर हमारा कोई भी शुभ व उचित काम पूर्ण कर देते हैं। अतः हमें निज हित व लाभ सहित समाज व देश हित के कामों के लिये यज्ञों का अनुष्ठान करना चाहिये जिससे हमारा समाज व देश सभी प्रकार की विपत्तियों व आपदाओं से मुक्त रहें। हम सदैव सुखी, स्वतन्त्र, निर्भय, स्वस्थ तथा दीर्घजीवी हों।

   हमने यह लेख हमारे अत्यन्त हितैषी अमृतसर निवासी ऋषिभक्त श्री मुकेश आनन्द जी की प्रेरणा से लिखा है। हम उनके आभारी हैं। ईश्वर उन पर सुख-समृद्धि तथा आनन्द की वर्षा करें। उनकी प्रेरणा से हम यह कार्य कर पाये, इसके लिये ईश्वर का भी धन्यवाद है। ओ३म् शम्।


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