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“बच्चों के चरित्र निर्माण के लिए माता-पिता को अपना जीवन आदर्श बनाना होगाः आचार्य आशीष”

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12 May, 18 11:58
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“बच्चों के चरित्र निर्माण के लिए माता-पिता को अपना जीवन आदर्श बनाना होगाः आचार्य आशीष”
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वैदिक साधन आश्रम तपोवन देहरादून के ग्रीष्मोत्सव में आज दिनांक 11-5-2018 को महिला सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन का विषय था ‘सन्तान की चारित्रिक उन्नति के व्यवहारिक उपाय।’ इस आयोजन में आश्रम में पधारे ऋषि भक्तों सहित तपोवन विद्या निकेतन जूनियर हाई स्कूल के प्रायः सभी 370 बच्चों सहित निकटवर्ती राजकीय इण्टर कालेज के बालक व बालिकायें भी सम्मिलित हुए। महिला सम्मेलन का संचालन श्रीमती सुरेन्द्र अरोड़ा जी ने कुशलतापूर्वक किया। कार्यक्रम के आरम्भ में रोहतक से आई तो बहिनों में ओ३म् संकीर्तन किया। इस संकीर्तन को सुनकर श्रोताओं ने आनन्द लाभ लिया। इसके बाद पाणिनी कन्या गुरूकुल वाराणसी की 6 छात्राओं ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया। इसके अन्तर्गत छात्राओं ने वेद मन्त्रों के विकृति पाठ को भी बहुत ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया। एक बहिन जी ने भजन प्रस्तुत किया जिसके बोल थे ‘देश की बहनों तुमको देख रही दुनियां सारी तुम पर बड़ी है जिम्मेदारी।‘ इसके बाद कार्यक्रम का संचालन कर रही श्रीमती सरेन्द्र अरोड़ा जी ने अपने सम्बोधन में कहा कि जहां पर यज्ञ होते हैं वहां अकाल मृत्यु नहीं होती। यज्ञ करने वाले परिवारों में निर्धनता भी नहीं रहती। उन्होंने कहा कि हमें अपने बच्चों के साथ मित्रता पूर्वक रहना चाहिये। श्रीमती सुरेन्द्र अरोड़ा जी आर्यसमाज के विख्यात विद्वान महात्मा दयानन्द वानप्रस्थी जी की पुत्री हैं। उन्होंने महात्मा दयानन्द जी के कुछ संस्मरण भी सुनाये। उन्होंने बताया कि महात्मा जी छोटे छोटे बच्चों के साथ खेलते थे। बच्चों से मधुर व्यवहार करते थे। आजकल के बच्चे अपने घर के बड़े सदस्यों से खींचे खींचे से रहते हैं। आजकल के बच्चों पर पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव है। उन्होंने कहा कि यज्ञ हमारे जीवन में उतरना चाहिये। उन्होंने यह भी कहा कि जीना है तो हंस कर जीओ। जीवन जीना एक कला है। जिसे यह कला आ जाती है वह खुश रहता है। इसके बाद श्रीमती सन्तोष आर्या जी का एक भजन ‘औलाद की खातिर इंसान फिरता है मारा मारा। उसको वक्त भला क्या मारे जिसको औलाद ने मारा।।’ हुआ। बहिन शकुन्तला कालरा जी का भी एक भजन हुआ। इसके बाद श्रीमती राजकरणि अरोड़ा, फरीदाबाद का सम्बोधन हुआ।

श्रीमती राजकरणि अरोड़ा ने कहा कि नारी संसार का केन्द्र बिन्दु व परिवार की नींव है। उन्होंने वेदों में आये नारी के अनेक विशेषणों को प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि चरित्र का निर्माण घर व परिवार में होता है। जीवन में निष्काम सेवा कोई करता है तो वह मां करती है। वह त्याग व समर्पण की मूर्ति है। दिव्य व भव्य राष्ट्र का निर्माण दिव्य व भव्य नागरिकों से होता है। नारी में सहनशीलता अधिक होती है। इसी कारण उसमें कार्यक्षमता भी अधिक होती है। उन्होंने कहा कि यदि हम चाहते हैं कि हमारे यहां राम व कृष्ण जन्म लें तो इसके लिए माताओं को कौशल्या, देवकी व यशोदा बनना होगा। श्रीमती अरोड़ा ने कहा कि माता जैसा चाहे वैसा अपनी सन्तान को बना सकती है। उन्होंने कहा कि सन्तान को शिवाजी बनाने के लिए माताओं को जीजाबाई बनना होगा। श्रीमती रोशनी आर्या और एक बहिन जी का एक एक भजन हुआ। इसके बाद आचार्य आशीष दर्शनाचार्य, डा. नन्दिता शास्त्री और आचार्या डा. अन्नपूर्णा जी के व्याख्यान हुए। आर्शीवाद स्वामी चित्तेश्वरानन्द जी ने प्रदान किया।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विद्यालय के छात्र छात्राओं को देखकर आचार्य आशीष जी ने उनसे प्रश्न किया कि क्या आपके छोटे भाई बहिन हैं? उत्तर में अधिकांश बच्चों ने अपने हाथ खड़े किये। आचार्य जी ने कहा कि जब कभी आपका छोटा भाई बहिन किसी बात या आवाज से सहम या डर जाता है तो आप उसे सम्भालते हैं या नहीं? उत्तर में बच्चों ने कहा कि सम्भालते हैं। उन्होंने कहा कि सभी बड़े बच्चे अपने से छोटो भाई बहिनों की बुरी बातों से रक्षा करते हैं। उन्होंने सभी छात्र छात्राओं को अपने से छोटों का चरित्र निर्माण करने के तरीके भी बताये। उन्होंने कहा कि हमें अपने बच्चों व अपने से छोटे परिवारजनों का सुधार व निर्माण करने के लिए स्वयं को सुधारना वा अच्छा बनाना होगा। आप अवश्य ही किसी से तो बड़े होंगे ही। आपको स्वयं अच्छा बनना होगा तभी आपसे छोटा भी अच्छा बन सकता है। छोटे बच्चे बड़ों को देखकर उनकी नकल करते हैं और जैसा वह अपनों व दूसरों को देखते हैं वैसा ही वह बन जाते हैं। आचार्य जी ने कहा कि हम जिसे अच्छा बनाना चाहते उसके सामने हमें स्वयं को आदर्श मनुष्य बनाकर प्रस्तुत करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि सबसे पहले हमें अपना निर्माण करना होता है। बच्चे सुनने से अधिक अपनों को देखकर समझते हैं। बच्चा आपकी हर बात को देखता है व उसे समझता भी है। घर में यदि छोटा बच्चा है तो वह हर समय अपने घर के सभी लोगों को देखता व सुनता है। वह बच्चा हमारी एक एक चीज को पकड़ता व जानता है। बच्चे जीवन में कैसे सीखते हैं इसका उदाहरण भी आचार्य आशीष जी ने दिया। बच्चा अपने माता-पिता की नकल करता है। वह सुन कर उनके शब्दों को याद कर लेता है और उन्हें दोहराता है। उन्होंने कहा कि बच्चा वो बनता है जो हम उसे बनाते हैं। आचार्य जी ने समझाया कि हमें बच्चों के सम्मुख गलत भाषा व शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिये। ऐसा करके हम छोटे सदस्यों का चरित्र निर्माण कर सकेंगे।

पाणिनी कन्या गुरूकुल, वाराणसी की प्राचार्या डा. नन्दिता शास्त्री जी ने कहा कि चरित्र के निर्माण के लिए संस्कारों की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि 16 संस्कार होते हैं। हमें इन संस्कारों को जानना चाहिये। मनुष्य का निर्माण माता-पिता, परिवार के सदस्यों व आचार्यों के सान्निध्य में होता है। उन्होंने कहा कि निर्माण का काल गर्भ काल होता है। माता को गर्भ धारण करने से पूर्व विचार करना चाहिये कि वह अपनी सन्तान को कैसा बनाना चाहती है? गर्भ में आने वाली सन्तान को कैसा बनाना है यह माता-पिता को निर्धारित कर उसके अनुसार अपना जीवन बनाना होता है। उन्होंने कहा कि सन्तान के निर्माण के बारे में यदि माता-पिता के विचार समान हां तो अच्छा रहता है। गर्भ काल में माता जैसा सुनती, विचारती, बोलती, देखती है व जैसे उसके आचार विचार आदि होते हैं वैसी ही सन्तान बनती है। अच्छी सन्तान के निर्माण के लिए माता का जीवन संयमपूर्ण होना चाहिये। बच्चों के निर्माण में जो बातें हितकर व सहायक हों उनका माता को आचरण करना चाहिये। आचार्या जी ने बताया कि वेदों के मन्त्रों में कहा गया है कि मेरी सन्तान मेरे अंग अंग से उत्पन्न हुई है। उन्होंने कहा कि अपने बच्चों को अच्छी शिक्षाप्रद व प्रेरणादायक कहानियां सुनाईये। अच्छी पुस्तकें पढ़े व उन्हें पढ़ायें। इसके साथ ही घर में सन्ध्या, यज्ञ व स्वाध्याय आदि का क्रम भी नियमित रूप से जारी रहना चाहिये।

अपने बच्चों को सदाचारी बनाने के लिए राम व कृष्ण के शुद्ध जीवन चरित्र पढ़ने चाहिये। आचार्या जी ने जातकर्म संस्कार व उसमें की जाने वाली कुछ क्रियाओं की चर्चा की व उनके महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जिह्वा पर मधु से ओ३म् इस लिये लिखते हैं कि जिससे यह ईश्वर भक्त बने। मधु का प्रयोग इस लिये करते हैं कि इसकी वाणी में मिठास व मधुरता हो। बच्चे को यह भी बताया जाता है कि वह वेद अर्थात् ज्ञान है। उसे जीवन में वेदों का स्वाध्याय व वेदों का प्रचार करना है। आचार्या जी ने माताओं को कहा कि अपने बच्चों को वेदों के अच्छे मन्त्र व अन्य शास्त्रीय वचन स्मरण करायें। उन्हें सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा करें। बच्चों पर गहरी दृष्टि रखें जिससे वह मार्गच्युत व भ्रमित न हों। लक्ष्य के प्रति ध्यान भंग होने से हानि होती है। लक्ष्य से बच्चों का ध्यान न हटने दें। उनसे निकटता बना कर रखें। विद्यार्थी जीवन में बच्चों को सुखार्थी नहीं बनना है। बच्चों को सम्बोधित कर उन्होंने कहा कि यदि आप आराम करेंगे तो अध्ययन करते हुए आपको नींद आ जाया करेगी। अपने बच्चों को यम व नियम बतायें व इनकी शिक्षा समय समय पर करते रहा करें। बच्चों को ऋषि दयानन्द व अन्य आर्य महापुरुषों के जीवन की कहानियां भी सुनाया करें तो बच्चों के चरित्र का अवश्य निर्माण होगा।

अपने सम्बोधन में आचार्या डा. अन्नपूर्णा ने कहा कि परमात्मा ने सार्थक व सुन्दर संसार बनाया है। मनुष्य सभी प्राणियों में श्रेष्ठ प्राणी है। जो मनन करके कार्य करता है वह मनुष्य कहलाता है। मनुष्य का चरित्र निर्माण व उसे महान बनाने के लिए उसे उपदेश दिया जाता है। आचार्या जी ने मनुर्भव बोलकर अच्छा मनुष्य बनने की प्रेरणा की। उन्होंने कहा कि अच्छा मनुष्य बनाने की विधि वा उपाय क्या है? उन्होंने कहा कि धरती हमारी मां है और हम इसकी सन्तान हैं। आचार्या जी ने कहा कि मनुष्य का जीवन व चरित्र निर्माण करने वाली मां होती है। उन्होंने कहा कि माता के सोचने व व्यवहार का प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पड़ता है। मां की गोद में मनुष्य का निर्माण होता है। आचार्या जी ने कहा कि मदालसा ने अपने पुत्रों को ब्रह्म ऋषि बनाया था। मदालसा जी ने यह महान कार्य विचार, चिन्तन, शिक्षा व आचरण कर कराकर किया। उन्होंने अपने पुत्रों को आत्म ज्ञान संस्कार व लोरी के द्वारा दिया। आचार्या जी ने आधुनिक माताओं का चित्रण करते हुए कहा कि आज की मातायें चलचित्र देखती हैं। टीवी पर नाटक देखती हैं व किट्टी पार्टी आदि में जाया करती हैं। आचार्या जी ने मनु को उद्धृत कर कहा कि प्राचीन काल में हमारा देश ही विद्वानों, देवों, ऋषियों व अग्रजन्मा मनुष्यों को उत्पन्न करता था। उन्होंने कहा कि हमारे देश के आचार्य संसार के लोगों को चरित्र का पाठ पढ़ाते थे। वह लोगों को सत्य व व्यवहारिक ज्ञान देते थे। उन्होंने कहा कि आजकल की बेटियों से यदि मां पानी मांगती है तो बेटी कह देती है कि वह व्यस्त है। उन्होंने कहा कि यदि बच्चों का चरित्र नहीं है तो वह कुछ भी नहीं हैं।

आचार्या अन्नपूर्णा जी ने कहा कि बच्चों का जीवन निर्माण करने में माता-पिता व आचार्यों की प्रमुख भूमिका है। उन्होंने बताया कि वेदों में कहा गया है कि हमारी पुत्रियां तेजस्विनी व यशस्विनी बनें। आचार्या जी ने शास्त्र व शस्त्र की चर्चा भी की। उन्होंने कहा कि यह दोनों होंगे तभी राष्ट्र का निर्माण होगा। उन्होंने शिवाजी के निर्माण में माता जीजाबाई की भूमिका पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने मध्यकालीन मान्यता नारी नरक का द्वार है, इसकी चर्चा की। उन्होंने कहा कि माता ही अपने बच्चों का निर्माण करती है। वह नरक का द्वार नहीं हो सकती। ऐसी बात कहने वालों की बुद्धि व ज्ञान पर भी उन्होंने प्रश्न उठाया। उन्होंने कहा कि यदि माता ज्ञानी नहीं होगी तो सन्तान का निर्माण नहीं हो सकता। नारी राम, कृष्ण, दयानन्द, ऋषि-मुनियों, महाराणा प्रताप आदि की भी जननी है। उन्होंने दोहराया कि नारी नरक का द्वारा कदापि नहीं हो सकती।

आचार्या अन्नपूर्णा जी ने कहा कि काम, क्रोध व लोभ नरक के द्वार हैं। आचार्या जी ने कहा कि यदि मनुष्य आध्यात्मिक नहीं बनेगा तो ऐसे मनुष्य का किसी भी समय पतन हो सकता है। हमें अपने जीवन व आत्मा को ईश्वर से जोड़ना सीखना चाहिये। गायत्री मन्त्र से जुड़ना चाहिये। जीना भी एक कला है। यह कला हमें हमारी मातायें सिखाती हैं। हम चरित्रवान नहीं होंगे तो राष्ट्र रक्षा नहीं हो सकती। आचार्या जी ने कहा कि लोग आतंकवादी इस लिये बन रहे हैं कि उन्होंने चरित्र का पाठ नहीं पढ़ा। अगर चरित्र नही ंतो मनुष्य के पास कितना भी धन हो जाये, उस मनुष्य का महत्व नहीं है। ज्ञानी मनुष्य के अपने जीवन में ज्ञान उसके आचरण में न हो, तो वह मनुष्य किसी काम का नहीं। चरित्र का निर्माण आध्यात्म के प्रचार व प्रसार से होगा। ऐसा होने पर ही हमारा देश विश्व गुरू बन सकता है। आचार्या जी ने माताओं का आह्वान किया कि वह अपने बच्चों के चरित्र निर्माण पर ध्यान दें।

अपने आशीर्वचनों में स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी ने कहा कि आपने यहां जो सुना है उसे अपने व्यवहार में लायें। अपने बच्चों का ही नहीं अपितु दूसरों के बच्चों के चरित्र का निर्माण भी हमें करना है। स्वामी जी ने कहा कि बच्चे जो देखते हैं वैसा ही करते हैं। उन्होंने कहा कि हम अच्छा देखें, बुरा न देखें। ऐसा करके हमारा चरित्र निर्माण होगा। उन्होंने लोगों से कहा कि अपना व्यवहार व आचरण उत्तम कोटि का बनायें। सम्मेलन के समापन पर शान्ति पाठ हुआ। ओ३म् शम्।

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