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“अनन्त ब्रह्माण्ड में अल्प बिन्दुवत् जीवात्मा नामी अभिमानी मनुष्य”

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12 Oct, 17 09:36
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हम जिस संसार में रहते हैं उसमें हमारे समान अनन्त जीवात्मायें हैं जो विभिन्न प्राणी शरीरों में रह रहीं हैं। इन सब प्राणियों को इन योनियों में इस ब्रह्माण्ड के स्वामी अनन्त परमेश्वर से कर्म करने के लिए जन्म वा शरीर मिले हैं। सब अपनी अपनी मति व स्वभाव के अनुसार कर्म करते हैं जिनका परिणाम बन्धन व मोक्ष दोनों ओर प्रवृत्ति के रूप में होता है। यदि बन्धन में डालने वाले सभी कर्म समाप्त हो जायें तो फिर वह मनुष्य मोक्ष आदि प्राप्ति के लिए कर्म करेगा और मोक्ष की वैदिक वा शास्त्रीय अर्हता प्राप्त होने पर उसको मोक्ष मिलना सम्भव हो सकता है। हम मनुष्य हैं और हमारा शरीर लगभग 6 फीट लम्बा है। हमारे से कुछ कम व कुछ अधिक परिमाण वाले अनन्त मनुष्य इस पूरे ब्रह्माण्ड में विभिन्न लोक लोकान्तरों में विद्यमान हैं। इतने अनन्त जीव व उनके शरीर होने पर भी संसार खुला खुला ही दृष्टिगोचर होता है। ब्रह्माण्ड की विशालता पर विचार करें तो एक सामान्य मनुष्य की तरह हमें यह ब्रह्माण्ड इतना विशाल व अनन्त अनुभव होता है कि जिसकी विशालता का पूरा पूरा अनुमान हम व अन्य मनुष्य भी नहीं लगा सकते। कारण यह है कि इन्द्रियों व मन आदि करणों की सामर्थ्य सीमित है। शायद हम सब अनन्त गुण व सामर्थ्य युक्त परमात्मा और उसकी यह अनन्त परिमाण वाली कृति ब्रह्माण्ड की ठीक से कल्पना भी नहीं कर सकते।
इस ब्रह्माण्ड की एक इकाई एक सौर मण्डल को मान सकते हैं। सार्य मण्डल में एक सूर्य व अनेक ग्रह व उपग्रह होते हैं। हमारे सौर मण्डल में भी एक सूर्य, लगभग 8 या 9 ग्रह और ग्रहों के भी भिन्न भिन्न संख्या में उपग्रह हैं। पृथिवी ही इतना बड़ा ग्रह है कि मनुष्य इस पूरी पृथिवी पर अपने पूरे जीवनकाल में भी भ्रमण भी नहीं कर सकता। अतः असंख्य सूर्य व असंख्य व अनन्त ग्रहों व उपग्रहों वाले इस ब्रह्माण्ड की विशालता की कल्पना बुद्धि में ठीक से समझ में नहीं आती है। आर्यसमाज का एक भजन हमें बहुत प्रिय लगता था व अब भी लगता है। इसके बोल हैं ‘तेरा पार किसी ने भी पाया नहीं, दृष्टि किसी की तू आया नहीं, तेरा पार किसी ने भी पाया नहीं।’ इसमें यह भी शब्द है कि ईश्वर ‘मात-पिता-सुत जाया नहीं।’ यह पंक्तियां यहां पर सटीक बैठती हैं। यह आश्चर्य की बात है कि हमारे आज के आधुनिक वैज्ञानिक इस ब्रह्माण्ड की विशालता से धार्मिक लोगों से कहीं अधिक विज्ञ व परिचित हैं और यह भी मानते हैं कि यह सृष्टि सदा से बनी नहीं है, करोड़ों व अरबों वर्ष पूर्व बनी हैं, इसका उपादान कारण जड़ परमाणु हैं, इस पर भी वह इसे एक चेतन सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान ईश्वर की कृति नहीं मान पा रहे हैं। हमें वैज्ञानिक सहित ऐसे सभी लोगों को जो ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखते, आश्चर्य होता है। जहां विधान है वहां विधायक अवश्य होता है, रचना जहां हो वहां रचयिता के अस्तित्व को भी अस्वीकार नहीं कर सकते, रचना विशेष को देखकर रचयिता का ज्ञान होता है, इसी सिद्धान्त से ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होता है। यह भी सिद्धान्त हम भुला देते हैं कि गुणों का प्रत्यक्ष होता है गुणी का नहीं। गुण सदैव गुणी के आश्रय से ही रहते हैं। अतः सृष्टि में सर्वज्ञता, सृष्टि की रचना, पालन व प्रलय आदि के गुण प्रत्यक्ष व अनुमान से भी अनुभव होते हैं तो इनका गुणी तो ईश्वर ही सिद्ध होता है। अतः कोई माने व न माने, यदि ईश्वर है तो रहेगा ही, किसी वैज्ञानिक व विद्वान के मानने न मानने से उसके अस्तित्व का अभाव नहीं होगा। विज्ञान को आज लगभग 250-300 वर्ष पुराना ही माने तो आने वाली एक, दो तीन शती बाद विज्ञान ईश्वर के अस्तित्व को मानेगा भी और दर्शनों के अनुसार वेद प्रमाण को स्वीकार कर, पूर्ण सम्भव है, स्वीकार भी करेगा और प्रचार भी करेगा।
वैदिक धर्म पूर्ण धर्म व आचार शास्त्र है जिसमें मनुष्य के सभी कर्तव्यों व अकर्तव्यों का ज्ञान दिया गया है। वेदों में सृष्टि उत्पत्ति का भी वर्णन है जिसका विस्तार दर्शन आदि ग्रन्थों में हुआ है। वेदों व दर्शन के अनुसार संसार में ईश्वर, जीव व प्रकृति का अस्तित्व है। यह तीनों शाश्वत व नित्य पदार्थ हैं। ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वव्यापक, अनन्त, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, शुद्ध, पवित्र, अनादि, नित्य, अजन्मा, अमर, अविनाशी सत्ता है। यह संख्या में एक है। यह स्वयंभू सत्ता है। दूसरी सत्ता भी चेतन सत्ता है जिसे जीव कहते हैं। यह जीव ईश्वर की तरह सूक्ष्म, ईश्वर सर्वातिसूक्ष्म है, एकदेशी, ससीम व बाल के अग्रभाग के भी दस हजारवें भाग के बराबर है। यह भी अनादि, अमर, अविनाशी, जन्म-मरण धर्मा, पाप पुण्य रूपी कर्मों को करने वाला, बन्धन व मोक्ष के बीच फंसा हुआ है। जीव संख्या में अनन्त हैं। सृष्टि काल में सबका ईश्वर के द्वारा कर्मानुसार जन्म होता है, मृत्यु होती है, कुछ का वैदिक जीवन व्यतीत करने से व पापों के क्षय होने पर मोक्ष भी सम्भव होता है। इस प्रकार का यह जीव है। तीसरा पदार्थ व सत्ता सूक्ष्म प्रकृति है जो सत्व, रज व तम गुणों वाली प्रकृति की साम्यवस्था कहलाती है। इसी से यह दृश्य जगत विकार को प्राप्त होकर व स्थूल होकर बना है। इसकी रचना करने वाला सर्वशक्तिमान परमेश्वर है। जीवात्मा को जन्म मिलना ईश्वर के न्याय गुण पर अवलम्बित है। जीवात्मा का कल्याण भी ईश्वर की शरण में जाकर उसकी स्तुति, प्रार्थना व उपासना करने से ही होता है। ईश्वर ने सृष्टि के आरम्भ सभी मनुष्यों के कल्याणार्थ वेद ज्ञान भी दिया था। वह वेद ज्ञान आज भी विद्यमान है और आशा है कि सृष्टि की प्रलय होने तक रहेगा। लगभग 200 व कुछ अधिक वर्ष पूर्व यह विलुप्ति के कागार पर था तो ईश्वर ऋषि दयानन्द जी को भेजते हैं और वेदों की रक्षा होती है। उनकी कृपा से आज एक सामान्य व्यक्ति भी ईश्वर प्रदत्त वेद ज्ञान से परिचित हो सकता है। उन्होंने हिन्दी में वेद भाष्य करके एक क्रान्तिकारी कार्य किया था जो अनुमानतः सृष्टि के आदि काल से ऋषि दयानन्द के समय तक किसी ने भी नहीं किया था। ईश्वर, जीव व प्रकृति तत्वों की सिद्धि वेद व वैदिक साहित्य के आधार पर तो होती ही है, तर्क व युक्ति से भी इन्हें सिद्ध किया जा सकता हैं और सभी शंकाओं का उत्तर भी दिया जा सकता है।
इस लेख का हमारा तात्पर्य केवल यह जानना है कि यह विशाल व अनन्त संसार ईश्वर की रचना है। वही हमारा आदर्श है और हमारे लिए माता, पिता, आचार्य, राजा व न्यायाधीश से भी कहीं अधिक बढ़कर है। हमें उसके स्वरूप व सभी गुणों को जानने का प्रयत्न करना चाहिये और उन गुणों से उसकी स्तुति, प्रार्थना ओर उपासना करनी चाहिये। ऐसा करके ही हमारी शुभ कर्मों की ओर प्रवृत्ति बढ़ेगी, हम पापों से मुक्त हो सकते हैं और इसका परिणाम हमारी आत्मा की उन्नति व मोक्ष की यात्रा का शुभारम्भ होना हो सकता है। संसार के अनेक गुप्त रहस्यों को जानने के लिए हम सत्यार्थप्रकाश सहित ऋग्वदेदिभाष्यभूमिका, वेदभाष्य व ऋषि दयानन्द के सभी ग्रन्थों को पढ़ने का आग्रह करेंगे। इससे हमें इलहोक व परलोक दोनों में लाभ होगा, हमारी सदगति व उन्नति होना निश्चित है। ओ३म् शम्।

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