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“वैदिक समाज व्यवस्था में शूद्र वर्ण के कर्तव्य एवं अधिकार”

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29 Mar, 18 10:34
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-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।वैदिक समाज व्यवस्था को वैदिक वर्ण व्यवस्था के नाम से जाना जाता है। वर्ण का अर्थ चुनना या चयन करना होता है। ब्राहमण आदि श्रेष्ठ वर्णों का चयन मनुष्य को अपने गुण, कर्म व स्वभाव सहित अपनी योग्यता के अनुसार ही करना होता है। सभी मनुष्य विद्यालय जाते हैं। एक कक्षा में औसत तीस से पचास विद्यार्थी पढ़ते हैं। स्कूल के अध्यापक कक्षा के सभी बच्चों को समान रूप से पढ़ाते हैं परन्तु जब परीक्षा होती है तो कोई 99 प्रति अंक लाता है, कुछ लोग उससे कुछ कम, कुछ 40 से 60 प्रतिशत के मध्य लाते हैं और कुछ 40 से भी कम प्रतिशत अंक लाते है। इससे यह ज्ञात होता है कि सभी बच्चों व विद्यार्थियों में समान योग्यता नहीं होती। जिन बच्चों को परिवार में अच्छी सुविधायें मिलती हैं उनमें भी किसी की अध्ययन में अधिक रूचि होती है और किसी की नहीं होती। हमने अपने साथ पढ़ने वाले सुखी व समुद्ध परिवारों के बच्चों के हमसे भी कम अंक व उन्हें कक्षा में असफल होते देखा है। इससे अनुमान होता है कि एक समान आयु के सभी बच्चों की शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक योग्यता समान नहीं होती। हम यह भी जानते हैं कि समाज में सभी मनुष्यों का विद्वान होना सम्भव नहीं है। यदि हो भी जायें तो भी समाज चलेगा नहीं। समाज में विद्वानों की आवश्यकता है भले ही वह शारीरिक दृष्टि से शक्तिहीन ही हों, वहीं समाज को बलशाली व अल्प ज्ञानी लोगों की आवश्यकता भी होती है जो छोटे मोटे श्रम, कृषि, सेवा, घर की सफाई, रसोई आदि अनेक प्रकार के काम कर सकें।

वैदिक समाज व्यवस्था में मनुष्यों का वर्गीकरण उनके ज्ञान, गुण, कर्म व स्वभाव के अनुसार किया जाता रहा है और इसी को वर्ण व्यवस्था कहते हैं। वैदिक व्यवस्था इस बात को भी स्वीकार करती है कि सभी बच्चों को अनिवार्य, निःशुल्क व समान शिक्षा बिना किसी भेदभाव से दी जाये। सभी मनुष्यों को विद्या प्राप्त करने का उतना ही अधिकार है जितना किसी राजपुरुष या अन्य साधन सम्पन्न व्यक्ति को। प्राचीन काल में गुरुकुलों में शिक्षा पूरी होने पर स्नातक बने युवाओं का वर्ण निर्धारण किया जाता था। विद्या व आचरण में श्रेष्ठ को ब्राह्मण की संज्ञा होती थी, बलवान व अन्याय दूर करने के कार्यों में रूचि रखने वाले पठित व विद्वान मनुष्यों की क्षत्रिय संज्ञा होती थी। वैश्य उन युवाओं का वर्ण निर्धारित होता था जिन्होंने अन्यों के समान ज्ञान प्राप्त किया हो परन्तु उनकी रूचि वाणिज्य, व्यापार, गोपालन, कृषि आदि कार्यों में हो। इसके साथ ही जो बालक व युवा अपनी कमियों के कारण विद्या प्राप्त नहीं कर पाते थे उन्हें शूद्र संज्ञा से पुकारा जाता था। यह वर्ण गुरुकुलों के आचार्यों व राजव्यवस्था से निर्धारित होते थे। आजकल भी शिक्षा पूरी करने पर जिस प्रकार स्नातक व स्नात्कोत्तर के प्रमाण पत्र मिलते हैं, जिनसे स्नातक की योग्यता का ज्ञान होता है, उसी प्रकार आचार्य आदि से प्राप्त वर्ण से भी मनुष्य के गुण, कर्म व स्वभाव का ज्ञान होता था। वैदिक काल व महाभारत से कुछ सौ पूर्व तक चारों वर्ण परस्पर सहृदयता व प्रेम से मिलकर एक साथ रहते थे। चारों वर्णों में परस्पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था। महाभारत युद्ध के समय यह व्यवस्था कुछ कुछ क्षीण होने लगी थी जो बाद में ध्वस्त प्रायः हो गयी और एक नई व्यवस्था जिसे जन्मना जाति व्यवस्था कह सकते हैं, समाज में प्रचलित हो गई। यह जाति व्यवस्था वैदिक वर्ण व्यवस्था का विकृत रूप कहा जा सकता है।

ऋषि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में वर्णव्यवस्था की चर्चा की है। वह कहते हैं कि विवाह वर्णानुक्रम से होने चाहियें और वर्णव्यवस्था भी गुण, कर्म, स्वभाव के अनुसार होनी चाहिये। यह बता दें कि ऋषि दयानन्द ने जन्मना जातीय व्यवस्था को अपने साहित्य में कहीं पर भी स्वीकार नहीं किया है। वह सर्वत्र वर्णव्यवस्था की बात ही करते हैं। वह कहते हैं कि जब तक सब ऋषि-मुनि राजा महाराज आर्य लोग ब्रह्मचर्य से विद्या पढ़ के ही स्वयंवर विवाह करते थे तब तक इस देश की सदा उन्नति होती थी। जब से यह ब्रह्मचर्य से विद्या का न पढ़ना, बाल्यावस्था में पराधीन अर्थात् माता पिता के आधीन विवाह होने लगा, तब से क्रमशः आर्यावर्त देश की हानि होती चली आई है। इससे इस दुष्ट काम (माता-पिता द्वारा अपनी सन्तानों के विवाह का निर्धारण जिसमें वर्ण अर्थात् गुर्ण, कर्म व स्वभाव की उपेक्षा होती है) को छोड़ के सज्जन लोग अपने वर्ण की कन्या व वर से स्वयंवर विवाह किया करें। आज का समाज ऋषि दयानन्द के विचारों को अपना रहा है। आजकल सन्तानें जो विवाह करती हैं उन्हें स्वयंवर विवाह कहा जा सकता है क्योंकि उसका निर्धारण व चयन सन्तानों के अधिकार में होता है। सन्तान भी अपने समाज व अपने से श्रेष्ठ युवक व युवती से विवाह करना चाहते हैं। समाज में विगत 50-60 वर्षों से यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है जो स्वागतयोग्य है। इससे जन्मना जाति व्यवस्था कुछ सीमा तक ध्वस्त हो रही है ऐसा अनुमान होता है।

वैदिक वर्णव्यवस्था में वर्ण परिवर्तन हुआ करता था, इसका संकेत व प्रमाण भी ऋषि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश में प्रस्तुत किया है। वह प्रश्नोत्तर शैली में प्रश्न करते है कि क्या जिसके माता-पिता ब्राह्मण हों वह ब्राह्मणी ब्राह्मण हाता है और जिसके माता-पिता अन्य वर्णस्थ हों उनका सन्तान कभी ब्राह्मण हो सकता है? इसका उत्तर देते हुए ऋषि कहते हैं कि हां बहुत से (अन्य शूद्र आदि वर्णों के लोग ब्राह्मण) हो गये, होते हैं और होंगे भी। जैसे छान्दोग्य उपनिषद में जाबाल ऋषि अज्ञातकुल, महाभारत में विश्वामित्र क्षत्रिय वर्ण और मातंग ऋषि चाण्डाल कुल से ब्राह्मण हो गये थे। अब भी जो उत्तम विद्या स्वभाव वाला है वही ब्राह्मण के योग्य और मूर्ख शूद्र के योग्य होता है और वैसा ही आगे भी होगा। इसके बाद ऋषि दयानन्द ने मनुस्मृति के श्लोक को उद्धृत कर बताया है कि अध्ययन करने व कराने से, विचार करने कराने, नानाविध होम के अनुष्ठान, सम्पूर्ण वेदों को शब्द, अर्थ, सम्बन्ध, स्वरोच्चारणसहित पढ़ने पढ़ाने, पौर्णमासी, इष्टि (अमावस्या व पूर्णिमा) आदि के करने, विधिपूर्वक धर्म से सन्तानोत्पत्ति, ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, बलिवैश्वदेवयज्ञ और अतिथियज्ञ, अग्निष्टोमादि यज्ञ, विद्वानों का संग व सत्कार, सत्यभाषण, परोपकारादि सत्कर्म और सम्पूर्ण शिल्पविद्यादि पढ़के दुष्टाचार छोड़ श्रेष्ठाचार में वर्त्तने से यह मानव शरीर ब्राह्मण का किया जाता है अर्थात् अन्य वर्ण के मनुष्य का शरीर इन उपायों से ब्राह्मण का हो जाता है।

ऋषि दयानन्द ने जन्मना वर्ण व्यवस्था व रज वीर्य के संयोग से वर्णाश्रम व्यवस्था मानने का खण्डन करते हुए एक प्रबल तर्क दिया है। वह लिखते हैं कि जो कोई रज वीर्य के योग से वर्णाश्रम-व्यवस्था माने और गुण कर्मों के योग से न माने तो उससे पूछना चाहिये कि जो कोई अपने वर्ण को छोड़ नीच, अन्त्यज अथवा कृश्चियन, मुसलमान हो गया हो उस को भी ब्राह्मण क्यों नहीं मानते? यहां यही कहोगे कि उस ने ब्राह्मण के कर्म छोड़ दिये इसलिये वह ब्राह्मण नहीं है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि जो ब्राह्मणादि उत्तम कर्म करते हैं वे ही ब्राह्मणादि और जो जन्म से निन्दित कुल का व्यक्ति भी उत्तम वर्ण के गुण, कर्म, स्वभाव वाला होवे तो उसको भी उत्तम वर्ण में और जो उत्तम वर्णस्थ होके नीच काम करे तो उसको नीच वर्ण में गिनना अवश्य चाहिये। ऋषि दयानन्द ने आपस्तम्ब ऋषि के सूत्र का उल्लेख कर उसका तात्पर्य बताते हुए कहा है कि उनके अनुसार धर्माचरण से निकृष्ट वर्ण अपने से उत्तम उत्तम वर्ण को प्राप्त होता है और वह उसी वर्ण में गिना जावे कि जिस-जिस के योग्य होवे।

शूद्र के कर्तव्यों का उल्लेख कर ऋषि दयानन्द जी लिखते हैं कि शूद्र सब सेवाओं (श्रमिक के कामों) में चतुर, पाक विद्या में निपुण, अति प्रेम से द्विजों की सेवा (सहयोग) और उन्हीं से अपनी उपजीविका करे और द्विज लोग इसके खान, पान, वस्त्र, निवास, विवाहादि में जो कुछ व्यय हो सब कुछ देवें अथवा मासिक (वेतन) कर देवें। चारों वर्ण परस्पर प्रीति, उपकार, सज्जनता, सुख, दुःख, हानि, लाभ में ऐकमत्य रहकर राज्य और प्रजा की उन्नति में तन, मन, धन का व्यय करते रहें।

वेद से लेकर दर्शन, उपनिषद सभी प्रमुख ग्रन्थों में मानव समाज में भेदभाव, शोषण, अन्याय आदि का कहीं उल्लेख नहीं है। यजुर्वेद का एक मन्त्र चारों वर्णों एवं इतर सभी मनुष्यों को वेदाध्ययन का अधिकार देते हैं। वेदाध्ययन का अर्थ है कि ब्राह्मण आदि उच्च वर्ण को धारण करने का अधिकार देते हैं। हमने वर्णव्यवस्था विषयक कुछ बातें ही यहां प्रस्तुत की हैं। पाठकों को इसके लिए सत्यार्थप्रकाश का चतुर्थ समुल्लास पढ़ना चाहिये। वर्तमान आर्य व हिन्दू समाज में जन्मना जाति व्यवस्था के लिए वेद, मनुस्मृति आदि कारण नहीं अपितु मनुष्यों की अविद्या व स्वार्थ आदि की प्रवृत्ति कारण है। स्वार्थी लोगों ने मनुस्मृति में अपने आशय के प्रक्षेप भी किये हैं। बुद्धिमान लोगों का काम सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करना होता है। वर्तमान में भी ऐसा ही किया जाना चाहिये। वर्तमान में पं. राजवीर शास्त्री, लाला दीपचन्द आर्य एवं डा. सुरेन्द्र कुमार जी के पुरुषार्थ से मनुस्मृति का शुद्ध संस्करण उपलब्ध है। इससे सभी लोग लाभ उठा सकते हैं। आज का युग ज्ञान का युग है। संविधान ने सबको उन्नति के समान अवसर दिये हैं। आर्थिक कारणों से बहुत से लोग अपनी सन्तानों को अच्छी शिक्षा नहीं दे पाते। वैदिक काल में यह अव्यवस्था नहीं थी। कृष्ण व निर्धन सुदामा जी एक साथ एक ही गुरु से निःशुल्क पढे थे। ऐसा कोई प्रमाण भी नहीं है कि वैदिक काल में किसी प्रतिभा से युक्त बालक को अध्ययन की सुविधा न प्राप्त हुई हो। अतः लोगों को वेद और मनुस्मृति के विषय मे ंअपने पूर्वाग्रहयुक्त विचारों का त्याग कर आर्यसमाज से मिलकर देश व समाज की उन्नति में सहयोग करना चाहिये क्योंकि सबकी उन्नति में ही देश की उन्नति व व्यक्ति की निजी उन्नति भी सम्मिलित है। यदि देश व समाज कमजोर होगा तो हमारी निजी उन्नति किसी काम की नहीं होगी? आर्यसमाज का नौंवा नियम प्रस्तुत कर इस लेख को विराम देते है। नियम है ‘प्रत्येक मनुष्य को अपनी ही उन्नति से सन्तुष्ट न रहना चाहिये, किन्तु सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये।’ ओ३म् शम्।

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