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गोरी आओ मेरे गांव

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25 Sep 20
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-लक्ष्मीनारायण खत्री

गोरी आओ मेरे गांव

गोरी

तुम भीड़ शहर 

की छोड़ो 

आओ मेरे गांव 

धरती पर 

तुम्हें 

सुख का सागर 

दिखलाता हूं।

घास और लकड़ी 

के झोपड़े में ठहरता हूं।

बाजोट पर थाल 

रख 

काचर,ग्वार फली 

की सब्जी और 

चूल्हे पर सिकी 

बाजरे की रोटी 

देसी घी की धार 

अपने हाथों 

परोसता हूं।

तुम्हें 

ऊंचे लहराते शांत

मखमली रेत के धोरों 

में ऊंट की सवारी 

करवाता हूं।

हरे भरे लहराते 

खेत दिखलाता हूं।

तीतर,मोर,पपैया,गोडावण

स्वच्छंद विचरण 

करते दिखलाता हूं।

दुनिया के

खुशनसीब  

सोने चांदी 

के आभूषणों 

रंगीन वस्त्रों 

से सजे-धजे 

नर-नारी 

तुम्हें

दिखलाता हूं।

मांगणियारों

से तुम्हें मूमल 

के गीत सुनाता हूं।

गांव मै

मानवता की 

प्रीत की रीत 

दिखलाता हूं।


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