“ऋषिभक्त महात्मा वेदभिक्षु जी का प्रशंसनीय जीवन व वेदप्रचार कार्य”

( Read 2021 Times)

02 Nov 19
Share |
Print This Page

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

“ऋषिभक्त महात्मा वेदभिक्षु जी का प्रशंसनीय जीवन व वेदप्रचार कार्य”

महात्मा वेदभिक्षु जी ऋषि दयानन्द के प्रमुख अनुयायियों में से एक थे। आपने वेद प्रचार के क्षेत्र में प्रशंसनीय कार्य किया। हिन्दुओं के घर-घर में वेद पहुंचाने की आपने योजना बनाई थी और चारों वेदों का आकर्षक व भव्य रूप में भाष्य प्रकाशित कर उसका पत्र-पत्रिकाओं में विज्ञापनों के द्वारा प्रचार कर उसे सहस्रों लोगों के घरों में पहुंचाया। आज भी उनका स्थापित किया हुआ दयानन्द-संस्थान, दिल्ली एवं उनकी जनज्ञान मासिक पत्रिका उनके द्वारा प्रकाशित चतुर्वेद-भाष्य एवं प्रभूत वैदिक साहित्य का प्रचार कर उनके मिशन को आगे बढ़ा रहे हंै। अपने जीवन में महात्मा वेदभिक्षु जी ने जिस उत्साह एवं समर्पण भाव से वेद प्रचार किया, खण्डनात्मक साहित्य प्रकाशित किया, सरकार एवं विरोधियों के मुकदमें झेले, उनसे वह ऋषि दयानन्द के एक निर्भीक, साहसिक एवं समर्पित योद्धा सिद्ध होते हैं। उनका जीवन हमें व सभी ऋषि भक्तों को प्रेरणा देने के साथ मार्गदर्शन करता है। वह जनज्ञान पत्रिका में जो लिख गये हैं वह आज भी प्रासंगिक एवं उपयोगी है। हमें उससे लाभ उठाना चाहिये। इससे हमारा जीवन भी सार्थक एवं उपयोगी हो सकेगा और हम वैदिक धर्म एवं संस्कृति की रक्षा में अपना योगदान कर अपने जीवन को सफल कर सके। इसी दृष्टि से हम पाठकों के लाभार्थ उनके जीवन एवं कार्यों का संक्षिप्त परिचय दे रहे हैं।

                महात्मा जी का वानप्रस्थ में प्रवेश करने से पूर्व का नाम श्री भारतेन्द्रनाथ था। आपका जन्म 14 मार्च सन् 1928 को डफरिन अस्पताल कानपुर में हुआ था। आपकी माताजी का नाम श्रीमती विद्यावती था जो भारत की प्रथम महिला मजिस्टेªट रहीं थीं। आपके पिता का नाम श्री गयाप्रसाद शुक्ल था जो उन्नाव के एक ग्राम बीघापुर के निवासी थे। आपके माता व पिता दोनों किसी कांग्रेसी नेता की प्रेरणा से नहीं अपितु ऋषि दयानन्द के विचारों से प्रभावित होकर स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानी रहे। ऋषि दयानन्द ही देश के वह महापुरुष थे जिन्होंने प्रथम देश को स्वदेशी, स्वराज्य और सुराज्य का मन्त्र दिया था और विदेशी राज्य को स्वदेशी राज्य की तुलना ने अश्रेयस्कर एवं अप्रशस्त बताया था। उन्होंने सत्यार्थप्रकाश में लिखा था कि स्वदेशी राज्य सर्वोपरि उत्तम होता है। आर्यसमाज की विचारधारा में अहिंसा का सम्मान किया जाता है परन्तु इसके साथ ही आर्यसमाज यथायोग्य व्यवहार करने का पक्षधर है। आर्यसमाज की यह विचारधारा ईश्वर और वेद की देन है और यह तर्क की कसौटी पर भी सुदृण व खरी है। आजादी के क्रान्तिकारी व अहिंसात्मक आन्दोलन में भाग लेने वाले अधिंकाश लाखों लोग ऋषि दयानन्द के विचारों से प्रेरित थे। एक अनुमान के अनुसार प्रत्येक आर्यसमाजी देश की आजादी की भावना से युक्त था। वह भीतर से अंग्रेजों का चापलूस व सहयोगी नहीं था। सभी आर्यजन वैदिक धर्म सापेक्ष देशवासी थे। मनुष्य का धर्म एक ही होता है। धर्म से निरपेक्ष होने का मतलब सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, श्रेष्ठ आचरण के प्रति निरपेक्ष व उदासीन होना होता है जो कि किसी समाज व देश के लिये श्रेयस्कर नहीं होता। महात्मा वेदभिक्षु जी के माता पिता दोनों ही ने देश की आजादी के लिये आन्दोलन किया था। आर्यसमाज और देश के प्रति भक्ति सहित स्वदेशी व स्वराज्य के सर्वोपरि उत्तम संस्कार महात्मा जी को अपने माता-पिता से मिले थे। इन्होंने ही महात्मा जी के जीवन की भावी दिशा को निर्धारित किया था।

                महात्मा जी की शिक्षा जेहलम में हुई। यह स्थान हमारे कुछ नेताओं की अदूरदर्शिता के कारण वर्तमान में पाकिस्तान में है। महात्मा जी की शिक्षा जेहलम में आर्यसमाज द्वारा संचालित एक वैदिक गुरुकुल में हुई थी। शिक्षा पूरी कर आपने डा0 श्याम स्वरूप सत्यव्रत जी की पत्रिका ‘‘संघ” के सम्पादन का कार्यभार सम्भाला था। इन दिनों स्वतन्त्रता आन्दोलन अपनी निर्णायक व लक्ष्य प्राप्ति की स्थिति में पहुंच चुका था। इस कारण आपका अधिकांश समय व शक्ति देश की आजादी के आन्दोलन से जुड़े कार्यों में लगती थी। सन् 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में आपकी सक्रिय भूमिका रही। आपने अपनी 14 वर्ष की आयु में ‘‘स्वराज्य” नामक एक हस्तलिखित समाचारपत्र निकाला। इस पत्र की कार्बन प्रतियां आप स्वयं वितरित करते थे। आपके इस कृत्य का ज्ञान शासक के प्रतिनिधियों को हो गया जिससे आप उनकी आंखों की किरकिरी बन गये। आपकी गिरिफ्तारी के लिये पुलिस आपकी तलाश कर रही थी। आपने गिरफ्तार होने से अच्छा भूमिगत रहकर देश की आजादी की प्राप्ति से जुड़े कार्यों को करना उचित समझा। इस कारण आप 6 माह तक योगेश्वरानन्द आश्रम में रहे। आपने जेहलम के गुरुकुल में रहकर भी 6 माह तक अध्यापन कार्य किया था।

                सन् 1950 में मुम्बई की एक संस्था ने आपको पत्रकार के रूप में नियुक्ति का पत्र भेजा जिसमें 250 रुपये मासिक वेतन सहित गाड़ी व निवास की सुविधाओं का भी प्रस्ताव था। आपने स्वात्म प्रेरणा से ईश्वर, वेद एवं ऋषि दयानन्द का कार्य करने का निर्णय लिया। इस नियुक्ति पत्र को आपने महत्व नहीं दिया। आर्यसमाज के प्रति आपके निःस्वार्थ प्रेम व समर्पण के कारण आचार्य रामदेव जी के पुत्र पं0 यशपाल सिद्धान्तालंकार और पूर्व आर्य सांसद पं0 शिवकुमार शास्त्री की प्रेरणा से आप आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब में 60 रुपये मासिक वेतन पर उपदेशक वा धर्म प्रचारक बन गये। उपदेशक बन कर आपने पंजाब प्रान्त में वैदिक वा आर्य धर्म का पूरे उत्साह से प्रचार प्रसार किया। इसके पश्चात आपने आर्यसमाज के पत्रों ‘आर्य’, ‘आर्यमित्र’ तथा ‘आर्योदय’ आदि के सम्पादक के रूप में भी आपने अपनी सेवायें दी। आप इन पत्रों में अपने लेखों में पाठकों को वैदिक धर्म के प्रति निष्ठावान रहते हुए वैदिक सिद्धान्तों का पालन करने की प्रेरणा देते थे।

                पं0 भारतेन्द्र नाथ जी का विवाह गाजियाबाद निवासी पं0 राम चरण शर्मा जी की सुपुत्री आयु0 राकेश रानी जी से सन् 1950 में हुआ था। विवाह के बाद आपने करनाल के प्रसिद्ध दानवीर चैधरी प्रताप सिंह एवं ईसाई मत व इनके इतिहास का गहन ज्ञान रखने वाले पं0 ब्रह्मदत्त भारती जी के सहयोग से हिन्दी मासिक ‘‘जनज्ञान” पत्र का प्रकाशन व सम्पादन आरम्भ किया। यह पत्रिका अद्यावधि प्रकाशित हो रही है जिसकी सम्पादिका पं0 राकेशनानी जी एवं बहिन दिव्या आर्या जी हैं। अतीत में जनज्ञान के अंग्रेजी व मराठी संस्करण भी प्रकाशित किये गये हैं। वेद प्रचार के कार्यों को विस्तार देने के लिये आपने सन् 1972 में जनज्ञान पत्रिका के साथ-साथ वैदिक साहित्य का प्रकाशन भी किया। आपके द्वारा प्रकाशित साहित्य में चारों वेदों का चार जिल्दों में हिन्दी भाष्य सहित अनेक विद्वानो के महत्वपूर्ण ग्रन्थ एवं खण्डन-मण्डन विषयक साहित्य सम्मिलित है। आपने वेद भाष्य की पचास हजार से भी अधिक प्रतियां देश-देशान्तर में प्रसारित की। दयानन्द-संस्थान से प्रकाशित कुछ प्रमुख ग्रन्थ हैं सामवेद-भाष्य, सोम-सरोवर, ऋषि-जीवन-चरित, यज्ञ-मीमांसा, वैदिक-सम्पत्ति, श्री-मद्दयानन्द-प्रकाश एवं संक्षिप्त-महाभारत आदि। अपने पवित्र संकल्पों को सुदृण एवं सफल करने के लिये आपने दो वर्ष तक अन्न, नमक व शक्कर का परित्याग भी किया था।

                वेद प्रचार का स्थाई केन्द्र स्थापित करने की दृष्टि से आपने सन् 1973 में देश की राजधानी दिल्ली में एक विशाल ‘‘वेद-मन्दिर” के निर्माण की योजना को कार्यरूप दिया। यह वेद-मन्दिर यमुना नदी के किनारे इब्राहीमपुर ग्राम के निकट स्थित है। यही आपका स्मारक भी है। इस केन्द्र को वर्तमान में आपकी सुपुत्री बहिन दिव्या आर्या जी संचालित कर रही हैं। आपकी एक प्रमुख गतिविधि मासिक पत्रिका ‘‘जनज्ञान” का प्रकाशन निरन्तर किया जा रहा है।

                महाभारत युद्ध के बाद आर्यमत में अनेक अन्धविश्वासा एवं अतार्किक मिथ्या परम्पराओं का समावेश हुआ। इसी कारण बौद्ध व जैन मत अस्तित्व में आये थे। विदेशों में भी जरदुश्त वा पारसी मत, ईसाई व इस्लाम मतों का प्रादुर्भाव हुआ। आठवीं सदी में ही इस्लाम हमलावर मत के रूप में भारत में प्रविष्ट हुआ था और इसके बाद अंग्रेजों ने ईसाई मत का प्रचार किया। बाद के दोनों मतों ने छल, बल तथा प्रलोभन आदि के द्वारा आर्य मतानुयायी लोगों का मतान्तरण व धर्मान्तरण किया। सन् 1980 में दक्षिण भारत के तमिलनाडू राज्य के मीनाक्षीपुरम् गांव में सभी निवासियों को बलात् धर्मान्तरित कर विधर्मी बना दिया गया था। इन्हीं दिनों देश के अनेक भागों में साम्प्रदायिक दंगे हुए थे जिसमें हिन्दुओं के जानमाल की भारी क्षति हुई थी। इन घटनाओं से महात्मा वेदभिक्षु जी विक्षुब्ध एवं दुःखी थे। हिन्दुओं व आर्यों की रक्षा करने के लिये आपने ‘हिन्दू रक्षा समिति’ का गठन किया था। इस समिति के प्रधान महान आर्य-हिन्दू नेता प्रो0 रामसिंह जी थे। आपने दंगा पीड़ितों के क्षेत्रों का दौरा कर वहां अनेक आर्य-हिन्दू सम्मेलन आयोजित किये थे। आपने इस समिति के उद्देश्यों को पूरा करने के लिये अनेक राष्ट्रीय नेताओं से भेंट की थी। यह सब कार्य आपने अपने स्वास्थ्य की अत्यन्त विपरीत परिस्थितियों में किये। सन् 1979 में आपको खून की उल्टियां हुई थी और जिगर के रोग का दौरा पड़ा था। वेद धर्म में अटूट निष्ठा व समर्पण के कारण ही आप इन विपरीत परिस्थितियों में देश व धर्म रक्षा के कार्य कर रहे थे। आपके कार्यों का अनुमान मासिक परोपकारी पत्र के नवम्बर, 1983 अंक में प्रकाशित श्री अनिल लोढ़ा जी के एक लेख से लगता है। लोढ़ा जी के अनुसार हिन्दू रक्षा समिति की 1600 शाखायें स्थापित हुई थीं जिनके लाखों सदस्य थे। लगभग दो दर्जन प्रचार पुस्तिकाओं का लाखों की संख्या में प्रकाशन एवं वितरण किया गया था। आपके यह कार्य देश में जागृति उत्पन्न करने तथा विधर्मियों द्वारा हिन्दुओं का धर्मान्तरण रोकने में उपयोगी सिद्ध हुए थे।

                महात्मा वेदभिक्षु जी ने बड़ी से बड़ी चुनौतियों का सदैव धैर्य एवं साहस से सामना किया। आपके लेखों एवं आपके द्वारा प्रकाशित साहित्य पर सरकार की ओर से लगभग दो दर्जन मुकदमें किये गये। विधर्मियों की ओर से आपको जान से मारने की धमकियां भी मिलीं। इन सबसे आप कभी विचलित नहीं हुए और अपने लक्ष्य की ओर निर्भीकता से बढ़ते रहे। महर्षि दयानन्द जी का देहावसान 30 अक्तूबर, 1883 को अजमेर में हुआ था। सन् 1983 में आपके मोक्ष वा निर्वाण की शताब्दी का समारोह ऋषि दयानन्द की उत्तराधिकारिणी परोपकारिणी सभा अजमेर ने अजमेर में 3 से 6 नवम्बर, 1983 को वृहद स्तर पर आयोजित किया था। देश विदेश से लाखों आर्य श्रद्धालु इस आयोजन में पधारे थे। इस आयोजन को सफल बनाने में आपने परोपकारिणी सभा को अपना सक्रिय सहयोग दिया था। आपने सभामंत्री श्रीकरण शारदा जी के साथ देश भर में घूम कर धन संग्रह किया। आप देहरादून भी आये थे। हमने आर्यसमाज धामावाला देहरादून में इन दोनों आर्य नेताओं के दर्शन किये थे। इन नेताओं से हमने समारोह में सहयोग हेतु शताब्दी टिकट प्राप्त किये थे और धनराशि संग्रहित कर सभा को प्रेषित की थी।

                सन् 1969 में गोहत्या विरोधी वृहद एवं व्यापक आन्दोलन में आप परिवार सहित सक्रिय रहे। आप परिवार के सदस्यों सहित तिहाड़ जेल भी गये व रहे। अपने जीवन काल में महर्षि दयानन्द ने भी गोरक्षा पर विशेष महत्व दिया था और एक हस्ताक्षर अभियान भी चलाया था। ऋषि दयानन्द ने गोरक्षा पर एक अति महत्वपूर्ण पुस्तक गोकरुणानिधि लिखी व प्रचारित की थी। गोरक्षा के लिये आपका पुरुषार्थ एवं त्याग सराहनीय एवं अनुकरणीय है।

                महात्मा वेदभिक्षु, प्रसिद्ध आर्य वैज्ञानिक डा0 स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती तथा प्रा0 राजेन्द्र जिज्ञासु जी परस्पर अन्तरंग मित्र थे। स्वामी सत्यप्रकाश जी उन दिनों दिल्ली में थे तो आपको अपने पुत्र की मृत्यु का समाचार मिला। इससे आप कुछ विचलित हो गये थे। इस अवस्था में स्वामी जी ने महात्मा वेदभिक्षु जी को फोन करके अपने पास बुलाया और दिन भर अनेक सामाजिक विषयों पर चर्चा करते रहे। स्वामी जी ने महात्मा वेदभिक्षु जी को अपने पुत्र की मृत्यु की जानकारी नहीं दी। ऐसा उन्होंने संन्यास आश्रम की मर्यादा का पालन करने के लिये किया था। इस घटना से महात्मा वेदभिक्षु जी का आर्यसमाज के एक प्रसिद्ध एवं शीर्ष संन्यासी के साथ हार्दिक सम्बन्धों पर प्रकाश पड़ता है।

                महात्मा वेदभिक्षु जी को 5 दिसम्बर 1983 को रोग का आक्रमण हुआ था। इसका उपचार पन्त अस्पताल, दिल्ली में कराया गया। 21 दिसम्बर को प्रातः 3.00 बजे आपने अपने परिचारकों को कहा कि सभी दरवाजे खोल दो। मैं इस संसार से जाना चाहता हूं। ऐसा ही किया गया और कुछ ही देर में आपने अपना शरीर त्याग दिया। उसी दिन दिल्ली की पंचकुईया श्मशान-भूमि में आपकी अन्त्येष्टि की गई थी। इस अन्त्येष्टि में आर्य जगत् के अनेक गणमान्य व्यक्तियों के साथ दिल्ली स्थिति समाजों व सभाओं के छोटे बड़े सभी अधिकारी व सदस्य भी सम्मिलित थे।

                महात्मा वेदभिक्षु जी ने ऋषि दयानन्द को अपना आदर्श बनाकर उनके पदचिन्हों पर चलने का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया। हिन्दू समाज की विधर्मियों से रक्षा के कार्य में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दयानन्द संस्थान दिल्ली उनका पुण्य स्मारक है। यह स्थान वेद प्रचार का केन्द्र बना रहे यह हमारी कामना है। महात्मा जी को हम सश्रद्ध नमन करते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

पताः 196 चुक्खूवाला-2

देहरादून-248001

फोनः 09412985121


Source :
This Article/News is also avaliable in following categories : Literature News , Chintan
Your Comments ! Share Your Openion

You May Like