“संस्कृत ही विश्व की प्राचीनतम भाषा है, अन्य कोई नहीं है”

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03 Oct 19
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-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

“संस्कृत ही विश्व की प्राचीनतम भाषा है, अन्य कोई नहीं है”

हम भारत के एक हिन्दी प्रदेश उत्तराखण्ड में निवास करते हैं और यहीं हमारा जन्म हुआ है। इससे पूर्व उत्तरखण्ड उत्तर प्रदेश राज्य का अंग हुआ करता थां। हमारी मातृ भाषा हिन्दी है। हिन्दी को संस्कृत की पुत्री कहा जाता है और वस्तुतः यह सत्य ही है। इसी प्रकार से देश व विश्व की भी सभी भाष्य किसी न किसी रूप में संस्कृत के शब्दों का विकार होकर व भौगोलिक कारणों से उच्चारण में अन्तर आने से लम्बे समय तक उसका प्रयोग करने के बाद परिवर्तित रूप में आकर बनी हैं। संस्कृत की प्राचीनता का प्रथम प्रमाण हमें वेद और वैदिक साहित्य प्रतीत होता है। संसार में कोई ग्रन्थ वेद से प्राचीन नहीं है। इसकी पुष्टि जर्मनी में जन्में और इंग्लैण्ड में निवास करने वाले प्रोफेसर मैक्समूलर ने भी की है। उन्होंने ऋग्वेद को संसार का सबसे प्राचीनतम ग्रन्थ स्वीकार किया है। सृष्टि के आरम्भ में वेदों की उत्पत्ति हुई थी जिसका आधार सृष्टिकर्ता परमात्मा हैं। परमात्मा ने चार ऋषियों को उत्पन्न कर उनकी आत्माओं में अपने जीवस्थ वा सर्वान्तर्यामी स्वरूप से वेदों का ज्ञान दिया था। संस्कृत भाषा में आविर्भूत वेदज्ञान का प्रचार इन ऋषियों ने व ब्रह्मा जी ने किया जो वर्तमान समय में भी जारी है। वेदों का वर्णन भारत के सभी प्राचीन ब्राह्मण ग्रन्थों, मनुस्मृति, उपनिषदों, दर्शनों, रामायण एवं महाभारत आदि में मिलता है। वेद के समान किसी अन्य भारतीय भाषा व विश्व की भाषा का कोई ग्रन्थ वेद व उसकी संस्कृतभाषा से प्राचीन नहीं है। मनुस्मृति के श्लोक ‘एतददेशस्य प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मः स्वं स्वं चरित्रं शिक्षरेन पृथिव्यां सर्वमानवाः।’ से भी वैदिक धर्म व संस्कृति सहित संस्कृत भाषा विश्व की प्राचीनतम भाषा सिद्ध होती है। हमारे विचार से कहीं कोई पुरात्व की खुदाई कर देने और वहां मिली आवासीय आदि भवनों की हजार व दो हजार वर्ष पुरानी श्रृंखला से यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि वह स्थान क्योंकि वर्तमान की किसी संस्कृतेतर भाषा का प्रयोग किये जाने वाले क्षेत्र में है, अतः वहां की भाषा ही विश्व की प्राचीनतम भाषा है। कौन सी भाषा किस भाषा से प्राचीन है, इसका ज्ञान उसके साहित्य से होता है। यदि वेद से प्राचीन किसी भाषा का कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता तो वेद व उसकी भाषा को ही प्राचीनतम मानना होगा। वेद और संस्कृत भाषा ही प्राचीनतम हैं इसके अनेक प्रमाण हैं।

 

                देश के सभी भागों में जिन देवताओं की पूजा आदि की जाती है वह सब भी वहीं हैं जिनकी उत्तर भारत के मन्दिरों में स्तुति व उपासना आदि की जाती है। इसका अर्थ यही प्रतीत होता है प्राचीन काल में पूरा देश सांस्कृतिक आधार पर एक था जबकि सृष्टि के आरम्भ होने के बाद समय समय पर उत्तर भारत जो स्थान जितना जितना उत्तर भारत रूपी केन्द्र से दूर होता गया, वहां-वहां की भाषा संस्कृत से भिन्न होती गई परन्तु उन सभी भाषाओं में संस्कृत के शब्दों का होना संस्कृत की प्राचीनता को सिद्ध करता है। संस्कृत भाषा में किसी अन्य भाषा के शब्द नहीं मिलते। कोई यह नहीं कह सकता कि वेदों का अनुक शब्द वेदेतर किसी अन्य भाषा से आया है जबकि अन्य प्रायः सभी भाषाओं में वेदों के शब्द प्रचुरता से मिलते हैं। वेदों के सभी शब्द यौगिक व योगरूढ़ हैं। उसका आधार मनुष्य नहीं अपितु परमात्मा ही हैं। तिब्बत में वेदों के अस्तित्व में आ जाने के बाद वहां से लोगों का पलायन देश-देशान्तर में होना आरम्भ हो गया था। उनकी भाषा संस्कृत थी परन्तु वह जहां जाते थे वहां के भौगोलिक कारणों से अनेक शब्दों के उच्चारण में कुछ अन्तर आता गया और नई पीढ़ियों द्वारा संस्कृत के केन्द्र से दूरी रहने के कारण भाषा का परिवर्तन होता रहा। नई भाषाओं के अस्तित्व में आने में हजारों व लाखों वर्ष लगे और यह प्रक्रिया चलती रही। अतः संस्कृत विश्व की प्राचीनतम भाषा है और अन्य भाषायें संस्कृत का ही विकार हैं, ऐसा विद्वानों का मत है। इस विषय को विस्तार से जानने के लिये पं. रघुनन्दन शर्मा जी की पुस्तक वैदिक सम्पत्ति का अध्ययन कर उससे सहायता ली जा सकती है।

 

                सृष्टि बनने के बाद परमात्मा ने सभी प्राणियों को अमैथुनी रीति से उत्पन्न किया था। उसके बाद से मैथुनी सृष्टि आरम्भ हुई। इस अमैथुनी सृष्टि को उत्पन्न करके परमात्मा ने इन आदि मनुष्यों में अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा इन चार ऋषियों को एक-एक वेद का ज्ञान दिया था। इसी दिन से मानव सृष्टि संवंत् आरम्भ हुआ। इसके बाद से ही हमारे पूर्वज धार्मिक अनुष्ठानों को आरम्भ करने से पूर्व एक संकल्प पाठ करते थे जिसमें सृष्टि संवंत् सहित अनेक बातें जैसे यजमान का नाम, गोत्र, जम्बू द्वीपे भरत खण्डे सहित स्थान का नाम आदि का उल्लेख किया जाता है। वर्तमान में भी यह परम्परा जारी है। आज हमारे पंडित जिस किसी परिवार में अग्निहोत्र आदि शुभ व श्रेष्ठ कर्म कराते हैं तो प्रथम इस संकल्प पाठ को यजमान से बुलवाते है। इसके अनुसार सृष्टि संवत् 1,96,08,53,120 वां चल रहा है। इतना ही समय सृष्टि बने तथा मानव को सृष्टि में आये हुआ है। इससे वेदों का उत्पत्ति काल यही 1.96 अरब वर्ष सिद्ध होता है। वेद से पुराना संसार में अन्य कोई ज्ञान व पुस्तक नहीं है। विचार करने पर संसार की सभी लिपियों में संस्कृत की देवनागरी लिपि भी प्राचीनतम एवं सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होती है। इसमें जो कहा जाता है वही लिखा जाता है। अन्य कुछ भाषाओं की तरह से शब्दों को आगे पीछे करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। हमारे मुंह से जितनी भी ध्वनियां निकल सकती हैं वा निकलती हैं उन सबके लिये एक एक अक्षर है जिनके द्वारा सभी ध्वनियों को निर्दोष रूप में लिख सकते हैं जबकि अंग्र्रेजी आदि भाषा व लिपि में यह सुविधा नहीं है। यहां हमें पता ही नहीं होता कि पी यू टी अल्फाबेट मिलकर पुट कैसे बनता है और बी यू टी मिलकर बट क्यों बनता है। पुट की तरह से बुट क्यों नहीं होता? यह भी जान लें कि वेदज्ञान को सृष्टि के आरम्भ से सैकड़ों वर्ष तक सुन कर उसको स्मरण वा कण्ठ किया जाता रहा जिस कारण से वेदों का एक नाम श्रुति भी है। आज भी दक्षिण भारत व देश के कुछ अन्य भागों में कुछ पंडित वेदों के मन्त्रों को उसके आठ प्रकार के जटा, घन आदि पाठों के द्वारा स्मरण करते हैं जिससे इसमें किसी भी प्रकार की कौमा या पूर्ण विराम की अशुद्धि न हो सके। इससे भी यह सिद्ध है कि संस्कृत ही विश्व की प्राचीनतम भाषा है। अन्य किसी भाषा के साहित्य को ऐसा महत्व नहीं मिला है। अन्य भाषाओं पर विचार करें तो किसी भी भाषा का इतिहास एक दो हजार वर्ष और बहुत अधिक कहें तो तीन से पांच हजार वर्षों से अधिक पुराना नहीं है। वेद सबसे पुराना व प्राचीनतम ग्रन्थ है अतः हमारी संस्कृत भाषा ही सबसे प्राचीन व तुलनात्मक दृष्टि से सर्वोत्तम व सर्वश्रेष्ठ है। 

 

                हम यहां भारत के राष्ट्रपति जी से संस्कृत के प्रौढ़ विद्वान के रूप में सम्मानित पद-वाक्य-प्रमाणज्ञ पं0 ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी के एक लेख ‘आदि-भाषा का प्रकाश तथा उसका स्वरूप’ से कुछ निश्चयात्मक शब्द प्रस्तुत कर रहे हैं। यह पूरा लेख ही पठनीय है। यह लेख ‘जिज्ञासु रचना-मंजरी’ के प्रथम खण्ड में प्रकाशित हुआ है। पं0 जिज्ञासु जी लिखते हैं- ‘अतः वेदवाणी (संस्कृत) ही सब भाषाओं की आदि जननी है। वेद की भाषा कभी बोली जाती रही हो, ऐसी बात नहीं। किसी भी प्राचीन ग्रन्थ में इसे भाषा शब्द से नहीं पुकारा गया है, क्योंकि अनन्त प्रभु के ज्ञान वेद में समस्त संसार के ज्ञान का समावेश होने के लिये उसकी रचना स्वभावतः ही ऐसी होनी चाहिये थी, जिसमें एक शब्द अनेक अर्थों का द्योतक हो, अनेकविध ज्ञान एक ही शब्द के द्वारा प्रकट न होने पर ईश्वर को न जाने कितनी बड़ी रचना करनी पड़ती। अतः यही मानना होगा कि आदि में वेद से ले-ले कर शब्दों का प्रयोग होने लगा।

 

                संसार में जितनी भाषायें हैं, उनमें सब से अधिक विस्तृत, पूर्ण और परिश्रम-साध्य उच्चारण वेदभाषा का ही है। उच्चारण-विषय में जितनी सावधानता वेदवाणी के विषय में की गई है, उतनी किसी में नहीं। इतना ही नहीं, लौकिक संस्कृत भाषा के ही उच्चारण में जितनी मौलिकता, स्वाभाविकता और सावधानता आज तक वर्ती गई है, संसार की किसी भी भाषा के उच्चारण में नहीं वर्ती गई। यह बात ध्यान देने योग्य है कि जो भिन्न-भिन्न ध्वनियां हम सुनते हैं, वे संख्या में भी अधिक-मात्रा में संस्कृतभाषा में ही पाई जाती है। केवल संख्या में ही अधिक पाया जाना कोई महत्व नहीं रखता, सबसे बड़े महत्व की बात तो यह है कि संस्कृतभाषा की 63 की 63 ध्वनियां अपनी स्वाभाविकता-नैसर्गिकता-मौलिकता और अनिवार्यता को लिये हुये है। संख्या के विषय में सब विद्वान् जानते हैं कि लातीनी-हिब्रू में 20 वर्ण माने जाते हैं, फ्रांस की भाषा में 25, अंग्रेजी में 26, स्पेन की भाषा में 27, तुर्की और अरबी में 28, फारसी में 31, रूसी भाषा में 35 और संस्कृत में 63। वर्तमान आर्यभाषा वा सामान्य संस्कृत में 47 अक्षर बोले जाते हैं, ऐसा किन्हीं का मत है, सो ठीक नहीं। वास्तविक 63 अक्षर ही देववाणी संस्कृत में हैं, ये ध्वनियां स्वाभाविक हैं, जो सार्थक हैं। इससे स्पष्ट है कि संस्कृत भाषा की ही वर्णमाला सब से पूर्ण वा विस्तृत है।

 

                लौकिक और वैदिक भाषा का भेद भी अवश्य ध्यान देने योग्य है। थोड़ी सी संस्कृत जाननेवाला भी समझ सकता है कि वेद के व्याकरण के नियम लौकिक व्याकरण के नियमों से भिन्न होते हैं। धातुओं की जितनी संख्या हमें संस्कृत भाषा में मिलती है, संसार की किसी भाषा में नहीं मिलती। अतः देववाणी (संस्कृत) के आदि भाषा होने और वेद-मूलक होने में कुछ भी संदेह नहीं रह जाता।’

 

 

                जब आदि भाषा वेदों की संस्कृत सिद्ध हो गई तो फिर तमिल या अन्य कोई भाषा कदापि प्राचीनतम भाषा के गौरव को प्राप्त नहीं कर सकती। संस्कृत भाषा का आविर्भाव ईश्वर से सृष्टि के आरम्भ में वेदज्ञान के साथ हुआ और यही भाषा व लौकिक संस्कृत ही संसार की प्राचीनतम भाषायें हैं न अन्य कोई भाषा या भाषायें। ओ३म् शम्।    

                -मनमोहन कुमार आर्य

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