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जो तुम कहो

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12 Jun 19
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सोच रहा हूं, मैं सोच रहा हूं

जो तुम कहो

नवोदित लेखक प्रशान्त श्रीवास्तव जी पहली कृति “जो तुम कहो” में 100 कविताओं का समावेश किया गया है| लेखक ने हिंदी के अलावा उर्दू और फारसी शब्दों को अपनी कविताओं में पिरोया है पुस्तक का प्रकाशन notion press द्वारा किया गया है आपने प्राकृथन लेखक के बारे में कुछ यूँ लिखा गया है |

जो तुम कहो को आप एक शायराना गुलदस्ता कह सकते हैं | लेकिन, इस गुलदस्ते के फूल गुजरते वक्त के साथ और भी ताजा, खुशनुमा और शोख हो जाते हैं | प्रशान्त की लिखी शायरियां जो पिछले 20 सालों से इंटरनेट और अखबारों में जगह बनाती रही है, अब एक किताब की शक्ल में ढल चुकी है| हर गीत या नज़्म अपने आप में एक कहानी का सा मज़मू पेश करती हैं | सीधे-सादे अल्फाज को लेकर इस खूबसूरती से अहसासों और जज़्बात की माला में पिरोया गया है के हर शायरी खुद-ब-खुद पढ़ने वाले के जहन में एक तस्वीर सी खींच देती है और कहानी अपने आप बयां हो जाती है|

शायर ने गहरी और बड़ी बातों को बयां करने के लिए जिन लफ्ज़ों को चुना है, वो आसानी से समझ आते हैं | और यही वो अदा है जो इस दीवान की खूबसूरती को हर दिल में मुकाम पाने के लिए मजबूर कर देती है | इतने रंग लेकर जो गीत लिखे गए हैं,वो यकीनन आपकी जिंदगी के हम सफर साबित होंगे |

प्रशान्त हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में समान रूप से पारंगत है उनका पहला उपन्यास “life is like that” लगभग 4 वर्ष पूर्व पाठकों के मध्य पहुंचा उसकी चहु ओर मिश्रित प्रक्रिया हुई उनकी कविता ये सोच रहा हूं हृदय स्पर्शी है इस कविता में –

 

“नज़्मों का अंदाज कहूँ, या ग़ज़ल का चेहरा

सोच के तुमको आंखों का, रंग हुआ सुनहरा

सोच रहा हूं, मैं सोच रहा हूं

तुम को दूँ या खुद रखूँ, मैं सारा इल्ज़ाम

तुम बिन कितनी तनहा, होती है मेरी शाम”

 

“मेरे हाथों की हल्दी पे, छोटी सी उंगली फिरा दो न

इस शाम की हल्की सर्दी, आंखों से मिटा दो ना

सोच रहा हूं, मैं सोच रहा हूं

आंखों से आंखें मिले, और जरा आराम

तुम बिन कितनी तनहा, होती है मेरी शाम”

 

हर उस व्यक्ति के मन को कहीं न कहीं कचुटता है जिसने कभी जाने अनजाने इश्क की राह पर दो कदम चलने की जुर्रत की | पुस्तक के पृष्ठ संख्या 45 पर फिर तेरी याद आई पृष्ठ संख्या 34 पर यह कौन आया, यादो को मुस्कुराती है, शाखाएं गुल को छूकर ढूंढता हूं, में तुझ जैसी कविताएं अक्सर इस बात की पुष्टि करती है कि पुस्तक का शीर्षक जो तुम कहो कहीं न कहीं चरितार्थ होता है | पुस्तक में ऐसी कोई कविता नहीं जो पाठकों को पढ़ने के लिए विवश न करती हो पुस्तक का मुख पृष्ठ आकर्षक है ही प्रकृथन और लेखक की जीवनी पढ़ने योग्य निसंदेह है इस पुस्तक को notion press.com पर लॉग इन कर के मंगवाया जा सकता है इसकी कीमत मात्र 165 है |


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