हनुमानगढ़ : सभ्यता का पालन स्थल

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25 May 19
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हनुमानगढ़ : सभ्यता का पालन स्थल

कभी सिन्धु घाटी का हिस्सा रहा हनुमानगढ़ जिला सभ्यता का पालन स्थल एवं मरू गंगा का प्रवेश द्वार कहा जाता है। ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक दृष्टि से जिले का विशिष्ट स्थान है। इस क्षेत्र में हुई खुदाई से युगों के परिवर्तन बताने वाली प्राचीन सभ्यताओं का पता लगा है जो यहाँ की हजारों साल पुरानी समृद्ध संस्कृति की महिमा को बताती है। सिन्धु घाटी सभ्यता का एकमात्र केन्द्र कालीबंगा इस जिले में है। प्राचीन समय में यहाँ शिवालिक पहाड़ियों से निकली सरस्वती एवं दृषद्वती नदियां बहती थी। आज भी वैदिक युग की चर्चित यह सरस्वती नदी घगघर के नाम से यहाँ प्रवाष्टि होती है। पूर्व में यह नगर भटनेर के नाम से प्रसिद्ध था। अनेक रक्तरंजित युद्धों के कारण इसका इतिहास रंग-बिरंगा रहा है। भटनेर का प्राचीन दुर्ग घग्घर नदी के किनारे स्थित है जो आज खण्डरों में बदल गया है। यह दुर्ग प्राचीन समय में जैसलमेर के राजा भाटी के पुत्र भूपत द्वारा सन् 295 ई. में बनवाया था और अपने पिता की स्मृति में इसका नाम भटनेर, रखा। सन् 1805 ई. में बीकानेर के राजा सूरत सिंह ने भाटियों को हरा कर भटनेर पर अपना अधिकार कर लिया। भटनेर विजय का दिन मंगलवार था, जिसकी वजह से भटनेर का नाम हनुमानजी के नाम पर हनुमानगढ़ हो गया। गंगानगर जिले का विभाजन हो कर 12 जुलाई 1994 को हनुमानगढ़ नव सृजित 31 वें जिले के रूप में अस्तित्व में आया। 
भौगोलिक दृष्टि से राजस्थान के उŸारी भाग में स्थित जिला है। जिला 290 5’ उŸारी अक्षांश एवं 740 3’ पूर्वी देशान्तर पर स्थित है। जिले का क्षेत्रफल 9659.09 वर्ग किमी., वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार जनसंख्या 17,74,692 एवं साक्षरता दर 68.37 प्रतिशत है। हरियाणा एवं पंजाब राज्य तथा गंगानगर, चुरू एवं बीकानेर जिलों की सीमाएं इस जिले से लगती हैं। घग्घर यहाँ राजस्थान की सबसे बड़ी आन्तरिक नदी है। तलवाड़ा झील प्रमुख जलाशय है। जिले की जलवायु अर्द्धशुष्क है। गर्मियों में अधिकतम तापमान 480 से.ग्रे. रहता है तथा सर्दियों में अत्यधिक ठंडा रहता है। जिले में 225 से 300 मि.मि. औसत वर्षा होती है। समुद्रतल से जिले की ऊॅचाई 177 मीटर है। राजीव गांधी सिद्धमुख नहर परियोजना से जिले में सिंचाई सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसके अलावा भाखड़ा नहर एवं इंदिरा गांधी नहर से भी सिंचाई होती है। जिले में अमेरिकन कपास, देसी कपास, धान, बाजरा, तिल, गेहूँ, सरसों, चना एवं तारामीरा की फसलें की जाती हैं। रावतसर, नोहर एवं भादरा में जिप्सम खनिज पाय जाता है। सूती सहकारी वस्त्र उद्योग स्थापित है एवं यहाँ खेल के सामान बनाये जाते हैं।
कला एवं संस्कृति की दृष्टि से नृत्य, नीत, एवं संस्कृति में गंगानगर जिले की छाप नजर आती है। कालीबंगा, पीलीबंगा, रंगमहल, बडोपाल एवं पल्लू पुरातत्व महत्व के स्थल हैं। गोगामेड़ी-गोगा जी प्रमुख तीर्थ है। यहाँ गोगा जी का मेला, भद्रकाली मेला, पल्लू मेला, एवं शीतलामाता मेला यहाँ के प्रमुख मेले हैं। कालीबंगा संग्रहालय, सांगरिया संग्रहालय तथा स्वामी केशवानंद संग्रहालय काला-संस्कृति का दर्शन कराते हैं। सभी भारतीय पर्व यहाँ उल्लासपूर्वक मनाये जाते है। पंजाबी एवं हरियाणवी संस्कृति की छाप भी यहाँ स्पस्ट दिखाई देती है। टिडियासर गांव में पावडिया लोक कला प्रसिद्ध है। पावडिया काव्यरस, सुरीले स्वर एवं कर्णप्रिय लहजे में धूम-धूम कर गीत गा कर लोगों को लुभाते हैं। 
आवागमन की दृष्टि से हनुमानगढ़ सड़क द्वारा प्रमुख नगरों से जुड़ा है। हनुमानगढ़ रेलवे सेवा भी जुड़ा है। हनुमानगढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 62 से 65 किमी. दूरी पर है। 
दर्शनीय स्थल
भटनेर दुर्ग
हनुमानगढ़ का दुर्ग लगभग 52 बीघा भूमि में फैला हुआ है और सुदृढ़ ईंटों से बना है। इसका जीणोंद्धार होते-होते सारा-का-सारा किला नया हो गया है। चारों ओर की दीवारों पर बुर्ज बने हैं। प्रधान प्रवेशद्वार पर संगमरमर काम के चिह्न अब तक विद्यमान हैं। पहले इस किले में गुम्बज आदि बने हुए थे, पर वे सब तोड़ डाले गये और ईटें आदि मरम्मत के काम में लगा दी। किले के एक द्वार के एक पत्थर पर वि. सं. 1677 खुदा है। उसके नीचे राजा का नाम तथा छः राणयों की आकृतियां भी बनी थीं जो स्पष्ट नहीं हैं। कहीं-कहीं ईंटों पर फ़ारसी एवं अरबी के अक्षर खुदे हुए हैं। किले के भीतर का जैन उपासरा प्राचीन है। उसके भीतर की मूर्तियों में से तीन की पीठ पर लेख खुदे हैं, जिनमें उक्त मूर्तियों की स्थापना के सम्बन्ध के उल्लेख हैं। किले में एक लेख हि.सं. 1017 (वि.सं.1665त्रई. सं. 1608) का फ़ारसी लिपि में लगा है, जिससे पाया जाता है कि उस (बादशाह) की आज्ञा से कछवाहे राय मनोहर ने उक्त संवत् में यहां मनोरपोल नाम का दरवाज़ा बनवाया। पहले यह स्थान निर्जन पड़ा हुआ था, केवल दो कोस की दूरी पर दो गुम्बद् थे, जिनके पास के टीले पर कुछ लोगों की बस्ती थी, जो भाटी थे। बलवन के सम्बन्धी शेर खां ने भटिंडा और भटनेर के किलों की मरम्मत कराई। वि.सं.1326 (ई.सं.1269) में भटनेर में उसका देहांत हुआ, जहां उसकी स्मृति में एक क़ब्र बनी है। वर्तमान में किले में शिवजी, हनुमानजी एवम् माताजी के मंदिरों के अलावा एक जैन मंदिर तथा मस्जिद भी स्थित है। 
किले के भीतर के एक टीले के नीचे 15 फुट की गहराई में पकी हुई मिट्टी के बने स्तम्भ के दो शिरोभाग पाये गये, जिनके किनारों पर सीढ़ी सहित शंकु आकृति की मीनारें बनी हैं। भीतर के तीसरे द्वार के निकट से दो भाग में टूटी हुई पक्की मिट्टी की चौकी मिली, जो उसी समय की बनी है, जिस समय के उपर्युक्त शिरोभाग हैं। भीतर के दूसरे अथवा मध्य-द्वार के निकट लाल पत्थर का बना द्वार-स्तम्भ है, जिसके ऊपर तीन चतुष्कोण पटरियां बनी हैं, जिनमें से दो पर मनुष्य की आकृतियां और तीसरे पर सूर्य की बैठी हुई मूर्ति बनी है, जो हाथों में दो कमल के फूल लिए है। हनुमानगढ़ के निकट ही भद्रकाली, पीर सुलतान, मुंडा, डोवेरी, कालीबंगा आदि स्थान हैं, जहां से प्राचीन काल के अवशेष मिले हैं। मुंडा का स्तूप अन्य स्तूपों से बड़ा है। 
कालीबंगा
 हनुमानढ़-सूरतगढ़ मार्ग पर स्थित पीलीबंगी से करीब 5 किलोमीटर दूर हड़प्पाकालीन एवं पूर्व हड़प्पा कालीन सभ्यता का अवशेष स्थल कालीबंगा स्थित है। यहां से खुदाई में युगों के परिवर्तन की सभ्यता का पता चला है। खुदाई के दौरान मिली काली चूड़ियों के टुकड़ों की बहुतायत को देखते हुए इस जगह का नाम काली बंगा पड़ा। यह स्थान 1952 में उस समय प्रकाश में आया जब पुरातत्व विभाग के महानिदेशक ए.डी. घोष को घग्घर नदी के किनारे एक पुरानी थेड़ का पता लगा। यह थेड़ 400 मीटर लम्बी व 250 मीटर चौड़ी थी। करीब 9 वर्ष बाद पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के विशेषज्ञों बी.के. थापर, जे.वी. जोशी और वी.वी. लाल के निर्देशन में जब इस थेड़ की 1961-62 में खुदाई की गई तो यहां मोहन जोदड़ो व हड़प्पा कालीन सभ्यता से भी साढ़े चार सौ वर्ष पुरानी सभ्यता के अवशेष मिले। 
खुदाई के दौरान उस समय के खान-पान, रहन-सहन, रीति-रिवाज, सामाजिक व्यवस्था तथा अन्य बातों की जानकारियां मिली हैं। यहां से मिले एक चबूतरे पर 1-25/1 मीटर में बने एक गड्ढे में मिली हिरण और बैल की हड्डियों से अनुमान लगाया जाता है कि उस काल में भी जानवरों की बली चढ़ाने की प्रथा थी। खुदाई में तीन विशेष प्रकार के कब्रिस्तानों के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा यहां की सभ्यता को दो भागों में बांटा गया है। पहला भाग हड़प्पा संस्कृति युग (2400-2250 ई.पू.) था। इस काल में कच्ची ईटों से निर्मित प्राकार में यह सभ्यता स्थित थी। हड़प्पा युग में पक्की ईंटों का प्रयोग सीमित भाग में ही मिला है। कुछ दीवारों पर कहीं-कहीं मिट्टी का लेप चढ़ाया हुआ मिला है।
खुदाई के दौरान निकली दीवारों पर दरारें पड़ी होने से अनुमान लगाया गया है कि यहां कभी भूकम्प आया होगा। जोते हुए खेतों के अवशेष, खेती व अन्य कामों में आने वाले उपकरण, ताम्बा, पत्थर के बने शंख भी मिले हैं। इसका दूसरा भाग हड़प्पा पूर्व सभ्यता (2200-1700 ई. पू.) का था। इस सभ्यता के लोग पुराने स्थलों को अपना कर यहां बस गए थे। इस युग में यह बस्ती पश्चिम की ओर बने दुर्ग व पूर्व की ओर निचले नगर से संबंधित दो भागों में विभाजित थी। दुर्ग में 40ग20ग10 तथा 30ग15ग7ग1ध्2 आकार की ईटों का कुंआ, अस्तर लगा आयताकार कुण्ड, कुएं के निकट सात आयताकार अग्निवेदिकाएं व धनवान वर्ग के लोगों के आवास मिले हैं। यह दुर्ग उŸार-दक्षिण दिशा में 240 मीटर तथा पूर्व पश्चिम में 120 मीटर की लम्बाई में बना था तथा यहां पर बसे नगर की लम्बाई पूर्व से पश्चिम में 240 तथा उŸार से दक्षिण में 360 मीटर है। यहां पर कच्ची ईंटों का निर्माण मिला है। पक्की ईंटों का प्रयोग नालियों, कुओं व दहलीजों में किया गया है। कुछ जगहों पर पक्की ईंटों के फर्श भी मिले हैं। पत्थर के खिलौने, शतरंज चौसर की गोटी, पशु-पक्षियों की मूर्तियां, छोटे ढेलों से मिलते-जुलते मृदापिण्ड, मुद्राएं व छापे मिले हैं, जिन पर काल्पनिक व वास्तविक पशुओं के चित्र हैं। घीया पत्थर आदि के भी अवशेष मिले हैं।
सर छोटूराम संग्रहालयः सांगरिया
संगरिया कस्बे में स्थित सर छोटूराम स्मारक संग्रहालय में भारत की प्राचीन सामग्री का भंडार है। स्वामी केशवानंद द्वारा देश के कोने-कोने एवं विदेशों से एकत्रित करके लाई गई मिट्टी, धातु, पत्थर व काष्ठ की प्राचीन मूर्तियां, पुराने सिक्के, शिलालेख, पाम्रपत्र, शस्त्र, वस्त्र, दुर्लभ ताम्रचित्र तथा अनेक अन्य ऐतिहासिक वस्तुएं प्रदर्शित हैं। संग्रहालय की सामग्री जुटाने के लिए स्वामी जी ने न केवल पूरे भारत बल्कि एशिया के अन्य देशों का भी भ्रमण किया। बीकानेर, अलवर व भरतपुर के महाराजाओं, प्रशंसकों तथा कला संग्राहकों ने उन्हें अपने निजी संग्रह में से अनेक दुर्लभ वस्तुए भेंट में दी। 
एक छोटे से कमरे से शुरू हुआ यह संग्रहालय आज एक विशाल भवन में हजारों कलाकृतियों के साथ चार लम्बी दीर्घाओं एवं छः बड़े कमरों में प्रदर्शित है। संग्रहालय की कला दीर्घा, लघु कला दीर्घा, शहीद कक्ष, पशु जीवन शास्त्र कक्ष, बुद्ध कक्ष, सामुद्रिक सामग्री कक्ष, सांस्कृतिक मानव, शस्त्र दीर्घा, अस्त्र-शस्त्र कक्ष, पुरातत्व कक्ष और स्वामी केशवानंद कक्ष में सदियों पुरानी धरोहर रखी गई हैं। स्वामी केशवानंद कक्ष 1972 में उनके निधन के बाद स्थापित किया गया है। इसमें स्वामी जी के सेवा कार्यों से संबंधित सैकड़ों चित्र, उनके द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली वस्तुएं, उन्हें मिले सम्मान तथा अभिनन्दन पत्र संग्रहीत हैं।
संग्रहालय में गुप्तकालीन, पूर्वमध्यकालीन व उŸार मध्यकालीन युग की प्रस्तर कला के अनेक उत्कुष्ट नमूने एकत्रित हैं। गुप्त कालीन मूर्तियों में गज, भगवान बुद्ध की चरण-चौकी, ऋषिमूर्ति, देवमूर्ति तथा विष्णुमूर्ति प्रमुख हैं। 600 ई. से 900 ई. तक के समय की मूर्तियों में एक स्त्री की मूर्ति है। राजस्थान से ही मिली भैरव मूर्ति के सिर पर जटा मुकुट के कपाल और चन्द्र साफ-साफ दिखाई देते हैं। संग्रहालय में 1000 ई. से 1200 ई. के उŸार मध्यकाल की दो दर्जन से अधिक प्रस्त मूर्तियां हैं इनमें हनुमानगढ़ जिले के पल्लू से प्राप्त जैन प्रतिमा के खण्ड शामिल हैं। एक अन्य मूर्ति भगवान शिव की है, जिसमें वे सहज मुद्रा में खड़े हैं तथा गले में माला व हाथ में त्रिशुल है। यहां बहुत सी धातु मूर्तियां भी हैं। एक मूर्ति शांतिनाथ तीर्थंकर की 15 वीं शताब्दी की है। 
 धातु कक्ष में मूर्तियों के अलावा विशेष आकर्षण का केन्द्र राजस्थान का 18 वीं सदी का एक पीतल का विशाल एवं अद्भुत कमण्डल है। चौबीस अवतारों के कमण्डल के नाम से प्रसिद्ध इस कृति को लोग दूर-दूर से देखने आते हैं, इस कमण्ड की ऊंचाई पांच फुट है। धातुकक्ष में 17 वीं शताब्दी की नटराज की एक कांस्य प्रतिमा है। एक अन्य मूर्ति बंगाल में प्राप्त 17 वीं शताब्दी की वेणु गोपाल की है। श्री कृष्ण की यह मूर्ति पुरानी पड़ने से घिस गई है जिससे उसकी सुन्दरता और भी बढ़ गई है। नेपाल की अनेक मूर्तियां हैं। इनमें अवलोकितेश्वर की 17 वीं शताब्दी की मूर्ति तथा बुद्ध की 18 वीं शताब्दी की प्रतिमा शामिल हैं। 
संग्रहालय का ताम्र चित्र कक्ष विशिष्ट कला निधि समझा जाता है। विशाल ताम्र पट्टों पर मुगल बादशाहों ने अपनी बेगमों के चित्र उभार कर बनवाए हैं। चित्रों की विषय वस्तु ईरानी और भारतीय है। हाथी दांत के भारतीय शिल्प की वस्तुएं, बीदर के धातु पत्र, चंदन के काष्ठ सींग की कारीगरी व जयपुर की मीनाकारी के अनेक दिलकश नमूने दर्शकों को सहज ही अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं।
संग्रहालय में शस्त्रागार का भी एक अलग कक्ष है विभिन्न प्रकार की तलवारें, खंजर, कटारें, कृपाण, खांडे, तेगे, बरछे व चक्री आदि अनेक शस्त्र हैं। संग्रहालय के चित्र कक्ष में प्राचीन सुन्दर चित्रों की भरमार है। यहां मुगल कलम, राजस्थानी चित्र शैली, पहाड़ी कलम, उड़ीसा की लोक कला, सिख तथा पिरंगी कलम सहित लगभग 230 चित्र प्रदर्शित हैं। 
गोगामेड़ी 
गोगामेड़ी मेला लोकदेवता वीर गोगाजी के नाम से लगता है। पूरे देश में प्रसिद्ध यह मेला जिले की नोहर तहसील के अन्तर्गत गोगामेड़ी नामक स्थान पर भादवा बदी एकम से लेकर भादवा सुदी 11 तक चलता है। यह स्थल जिला मुख्यालय से 130 किलोमीटर दूर पड़ता है। गोगामेड़ी में स्थित गोगा पीर के मंदिर में 11 माह मुस्लिम पुजारी पूजा करता है। शेष एक भाद्र पक्ष में हिन्दू पुजारी। गोगा पीर गुरू गोरखनाथ के परम शिष्य थे। गुरू के मानव कल्याण के संदेश को सुनकर गोगा पीर इस पथ पर निकल पड़े और तपस्या करते हुए समाधि ले ली। इसी कारण से गोगाजी लोकप्रिय होकर लोकदेवता बने। पूरे देश में गोगाजी के भक्त हैं। खासकर हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, गुजरात, उŸार प्रदेश और पश्चिमी बंगाल से गोगापीर के लाखों श्रद्धालु प्रति वर्ष मेला भरने पर यहां दर्शन के लिए आते है। जातिगत संकीर्णता को तिलान्जलि देता यह मेला काफी भव्यता के साथ भरता है। विषधरों को वश में करने वाले देवता गोगाजी को ही माना जाता है। इस महान पीर का जन्म चूरू जिले के ददरेवा गांव में हुआ था। राजपूत चौहान वंश में पैदा हुए इस पीर के पिता का नाम सांवर तथा माता का नाम बाछल था। गोगा पीर के नाम से देश का प्रमुख व्यावसायिक समूह जेवीजी (जाहर वीर गोगाजी) पूरे देश में प्रसिद्ध है। 
भद्रकाली 
गोगामेड़ी मेले की भांति हनुमानगढ़ जिले का एक धार्मिक गौरव मां भद्रकाली मेला भी है। पुराना ऐतिहासिक भद्रकाली का मंदिर जिले के अमरपुरा में पड़ता है। यह श्रद्धालुओं की श्रद्धा का केन्द्र है। इसमें चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी-नवमी को विशाल मेला लगता है। मां भद्रकाली का दूसरा मंदिर दमकल शाखा के समीप बाबा अमरनाथ के डेरे में हैं। इसकी मान्यता भी मां भद्रकाली के आशीर्वाद से बनी हुई है। मां भद्रकाली का तीसरा मंदिर हनुमानगढ़ के प्रसिद्ध स्थल शीला पीर के नजदीक है। इस मंदिर में मां की मूर्ति 50 वर्ष पूर्व स्थापित की गई थी। इसे बाबा मालूराम ने अनवाया था। 
पीलीबंगा-
पीलीबंगा के पदमसिंह पुत्र रामस्वरूप शर्मा (वार्ड सं.5) के पास सिन्धु सभ्यता के अवशेष, मिट्टी का मटका, प्राचीन पाण्ड्डलिपियां एवं सिक्के आदि संग्रहीत हैं। पीलीबंगा में बाबा रामदेव का मंदिर, पुराना जोहड़ा व प्राचीन पीपल वृक्ष दर्शनीय हैं। 
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Source : Dr. Prabhat Singhal
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