“ईश्वर ने मुनष्य को विवेक बुद्धि क्यों दी है?”

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12 Jun 19
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-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

“ईश्वर ने मुनष्य को विवेक बुद्धि क्यों दी है?”

परमात्मा ने सृष्टि और इसमें विद्यमान सभी पदार्थों और प्राणियों को बनाया है। संसार में दो प्रकार की सत्तायें हैं जिन्हें चेतन व जड़ कहा जाता है। ईश्वर और जीवात्मा चेतन सत्तायें वा पदार्थ हैं तथा प्रकृति, सृष्टि तथा पृथिवी, अग्नि, वायु, जल और आकाश पंच-महाभूत कहलाते हैं। यह सभी पंच-महाभूत जड़ पदार्थ हैं। मनुष्यों व अन्य सभी प्राणियों के शरीर पंचभौतिक जड़ पदार्थों से बने हैं और इन शरीरों में परमात्मा ने अनादि, नित्य, अविनाशी, अमर, जन्म-मरण धर्मा तथा कर्म-फल बन्धनों में बन्धी हुई जीवात्माओं को उनके कर्म-फल भोगने, पुरुषार्थ कर सुख प्राप्त करने व सद्कर्मों को करके मुक्ति प्राप्त करने के लिये शरीर में प्रतिष्ठित किया हुआ है। हम सब जानते हैं कि मनुष्य और अन्य सभी प्राणियों में कुछ मौलिक अन्तर हैं जिनमें से एक बुद्धि का अन्तर मुख्य है। मनुष्य के पास जिस प्रकार की मेधा व विवेक प्राप्त करने वाली बुद्धि है, वैसी बुद्धि व शारीरिक उपकरण यथा हाथ, पैर, वाणी आदि पशु-पक्षी आदि प्राणियों के पास नहीं हैं। परमात्मा न्यायकारी सत्ता है। वह सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता एवं प्रलयकर्ता है। उस परमात्मा ने जीवों को सुख व कर्मफल देने के लिये ही इस सृष्टि का निर्माण किया है। मनुस्मृति के अध्ययन से यह भी ज्ञात होता है कि जिन जीवों के पूर्वजन्म में मनुष्य योनि में आधे से अधिक कर्म शुभ वा पुण्य होते हैं तो उन जीवात्मा को अगला जन्म मनुष्य का मिलता है। यदि पूर्वजन्म में मनुष्य के शुभ व पुण्य कर्म आधे से कम होने पर जीवात्मा को नाना प्रकार की पशु-पक्षी आदि अनेक योनियों में जन्म की प्राप्ति हुआ करती है।

संसार में हम जितने भी मनुष्यों को देखते हैं उनसे यह अनुमान करते हैं कि जिन मनुष्यों को परमात्मा ने मनुष्य योनि में जन्म दिया है, वह उनके पूर्वजन्मों के शुभ कर्मों के आधार पर दिया है। मनुष्य योनि उभय योनि है। मनुष्य जन्म में पूर्वजन्मों के पुण्य व पापों कर्मों का फल भी भोगना होता है और अपनी बुद्धि व ज्ञान का उपयोग करके नये शुभ कर्म, जिसे धर्माचार कहा जाता है, करने होते हैं। मनुष्य की बुद्धि में यदि विवेक व सद्ज्ञान होगा तभी वह सत्य व असत्य तथा पाप व पुण्य कर्मों का निश्चय कर सकती है। इसके लिये उसके पास सत्यासत्य का विवेचन करने वाली बुद्धि सहित ईश्वर का दिया हुआ आचार-शास्त्र वेद का ज्ञान भी होना चाहिये। हम देखते हैं कि सृष्टि के आरम्भ से हमारे सभी ऋषि व विद्वान वेदज्ञान का अध्ययन व आचरण करते चले आये हैं। अतीत काल में ऋषियों ने योग की रीति से ईश्वर की उपासना की और सभी ऋषियों व योगियों ने समाधि अवस्था को प्राप्त करके ईश्वर का साक्षात्कार किया था। उन्होंने समाधि व ईश्वर साक्षात्कार से अपनी बुद्धि को पवित्र व शुद्ध करके यथार्थ ज्ञान से युक्त अनेक ग्रन्थों का निर्माण किया। ऐसे ग्रन्थों में दर्शन व उपनिषदों सहित आयुर्वेद व ज्योतिष सहित वेदांग आदि ग्रन्थों को सम्मिलित कर सकते हैं। इन सभी ग्रन्थों का अध्ययन कर इनकी सत्य शिक्षाओं का आचरण ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है। इसके साथ ही सभी ऋषि व मनुष्य कृषि व गोपालन सहित ज्ञान-विज्ञान को बढ़ाकर शत्रुओं से अपने देश की रक्षा करते हुए जीवनयापन किया करते थे। जब तक हमारे देश में वैदिक परम्पराओं का प्रचलन था तथा ऋषियों द्वारा सत्य का प्रचार और असत्य का खण्डन किया जाता था, तब तक विश्व में सर्वत्र सुख-शान्ति का विस्तार था। सभी को अपनी बुद्धि के विकास के अवसर प्राप्त थे। सत्य ज्ञान पर आधारित वेदमत ही सर्वत्र प्रचारित व प्रचलित था। कोई अवैदिक व अविद्या से युक्त मत-मतान्तर पांच हजार वर्ष पूर्व विश्व में कहीं नहीं था।

सृष्टि को अस्तित्व में आये हुए 1.96 अरब वर्ष हो गये हैं। इस दीर्घ अवधि में महाभारत युद्ध तक वेद ही संसार के सभी मनुष्यों का एकमात्र धर्म व मत हुआ करता था। महाभारत युद्ध के बाद संसार में चार वेदों व ऋषि प्रणीत विद्याओं के ग्रन्थों का प्रचार न हो पाने के कारण अज्ञान व अन्धविश्वास उत्पन्न हुए जिसका परिणाम भारत व सुदूर स्थानों पर अविद्यायुक्त मतों की उत्पत्ति हुई। पहले भारत में बौद्ध व जैन मतों का आविर्भाव हुआ जिन्हें ईश्वर के वैदिक स्वरुप का ज्ञान नहीं था। ऐसा लगता है कि इन्होंने यज्ञों में पशु-हिंसा के कारण वैदिक धर्म की सत्य मान्तयाओं का भी विरोध किया। उन्होंने सम्भवतः ईश्वर व जीवात्मा से सम्बन्धित सत्य सिद्धान्तों की भी उपेक्षा की। इसके बाद संसार के अन्य देशों में भी वेदविरुद्ध वा अविद्यायुक्त मत-मतान्तर प्रचलित हुए जिन्हें ईश्वर व जीवात्मा का सत्य व यथार्थ ज्ञान नहीं था। इसका प्रमाण उन ग्रन्थों में ईश्वर व जीवात्मा विषयक सत्य के विपरीत मान्यताओं का होना तथा ज्ञान-विज्ञान सहित आदर्श समाज के नियमों से विपरीत मान्यताओं व प्रथाओं का पाया जाना है। इन सबका सम्बन्ध मनुष्य की बुद्धि से है। बुद्धि यदि शुद्ध व पवित्र होती है तो मनुष्य सत्य व असत्य का विचार कर सत्य को प्राप्त होता है। यदि बुद्धि में अज्ञानता हो और वह वेद एवं ऋषियों के सत्य ज्ञान से युक्त ग्रन्थों के अध्ययन व आचरण से पृथक हो तो ऐसा मनुष्य सत्य ज्ञान को प्राप्त नहीं हो सकता। इस लेख में हम यह विचार कर रहे हैं कि परमात्मा ने मनुष्यों को अन्य प्राणियों से उच्च कोटि की क्षमतावान बुद्धि दी है, उसका कारण क्या है? क्या मनुष्य अपनी बुद्धि का सदुपयोग कर रहे हैं अथवा वह मतमतान्तरों के अविद्यायुक्त कथनों को बिना बुद्धि से विचार किये अन्धपरम्परा के अनुसार स्वीकार कर अपने जीवनों को मुक्ति का लाभ प्राप्त करने के स्थान पर जीवन को भावी जन्मों में दुःखों व अवनति की ओर ले जा रहे हैं?

मनुष्य के अन्तःकरण में मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार चार करण हैं। ऋषियों ने बताया है कि मनुष्य का बाह्य शरीर जल से, मन सत्य से, बुद्धि ज्ञान से तथा आत्मा विद्या और तप से शुद्ध व पवित्र होते हैं। जल से शरीर की शुद्धि तो प्रायः सभी मनुष्य करते हैं परन्तु मन, बुद्धि और आत्मा की शुद्धि क्रमशः सत्य, ज्ञान, विद्या और तप से करते हुए कम ही मनुष्य दीखते हैं। हमारे वैज्ञानिक इस दिशा में मत-मतान्तरों से अधिक सचेष्ट व प्रयत्नशील दृष्टिगोचर होते हैं, परन्तु उनका अध्ययन केवल भौतिक पदार्थों तक ही सीमित है। हमारे वैज्ञानिक अन्धविश्वासों से दूर हैं परन्तु ईश्वर व आत्मा का अध्ययन न करने, जो कि भौतिक नहीं अपितु अभौतिक पदार्थ हैं, उनका अध्ययन व ज्ञान सर्वांगपूर्ण न होकर एकांगी होता है। ईश्वर व जीवात्मा पर वेद के आधार पर हमारे ऋषि-मुनियों व योगियों ने विवेचन किया है। उनका भोजन व जीवन आज के वैज्ञानिकों की दृष्टि से कहीं अधिक शुद्ध व पवित्र था, ऐसा सहज ही अनुमान होता है। हमारे ऋषि आदि पूर्वज अन्न व जल का अल्प मात्रा में प्रयोग करते थे और अपना सारा समय विद्याध्ययन, तप, स्वाध्याय, वेद-व्याख्याओं, विद्वानों के प्रवचनों के श्रवण व मनन आदि में ही व्यतीत करते थे। वह सामिष भोजन व विकृत अन्न का सेवन नहीं करते थे। गोदुग्ध ही उनके जीवन का प्रमुख आहार कहा जा सकता है। घंटों ईश्वर के ध्यान व चिन्तन में रहने के कारण उन्हें सर्वव्यापक और सर्वान्तर्यामी ईश्वर की अनुभूतियां व प्रत्यक्ष ज्ञान होता था। इस कारण ईश्वर व जीवात्मा विषयक उनका ज्ञान, प्रवचन व लेख सत्य ज्ञान की कोटि में आते हैं। वैज्ञानिक भी चाहें तो योग विधि से साधना कर ईश्वर व जीवात्मा का प्रत्यक्ष अनुभव व ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। यदि वह दर्शन, उपनिषद तथा सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों का पक्षपातरहित होकर, पूर्वाग्रहों का त्याग कर व सदाशयता से अध्ययन करें, तो वह ईश्वर व जीवात्मा के अस्तित्व को से समझ व स्वीकार कर सकते हैं। ऐसा न करना उन्हें ईश्वर व जीवात्मा के अस्तित्व के ज्ञान से दूर कर रहा है। आर्यसमाज में भी उच्च कोटि के कुछ वैज्ञानिक तथा विज्ञान में शिक्षित व दीक्षित विद्वान व वैज्ञानिक हुए हैं। यह सभी ईश्वर व जीवात्मा के अस्तित्व को मानते थे तथा ईश्वर की उपासना भी करते थे। इसका कारण इनका वेद और वैदिक साहित्य का अध्ययन व अनुभूतियां थी। वैज्ञानिक भी यदि वेद आदि साहित्य का अध्ययन व अभ्यास करेंगे तो निश्चय ही उनकी आत्मा भी निर्मल होकर उनमें ईश्वर के सत्य ज्ञान का प्रकाश होगा।

परमात्मा ने मनुष्य को बुद्धि चिन्तन-मनन, अध्ययन, ज्ञानार्जन, सत्यासत्य विवेचन, सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग, ईश्वर, जीवात्मा एवं भौतिक पदार्थों के गुणों का विवेचन तथा उनसे लाभ उठाने के लिये दी है। क्या हम सभी अपनी बुद्धियों का इस प्रकार का उपयोग करते हैं? इसका उत्तर यह है कुछ लोग ही ऐसा करते हैं, सभी नहीं। विश्व के अधिकांश लोग मत-मतान्तरों की मध्यकालीन अविद्यायुक्त बातों में फंसे हैं। साधारण लोगों को उनके मतों के आचार्य जो भी सत्यासत्य युक्त बातें बताते हैं या जो उनके मतों की पुस्तकों में अज्ञानता के दिनों मध्यकाल में लिखी गई हैं, उनकी सत्यासत्य की परीक्षा न करके वह सब उन्हें बिना विचारे तथा बिना परीक्षा के स्वीकार कर उसके अनुरूप आचरण और व्यवहार करते हैं। इस कारण संसार के सभी मनुष्य विशेषकर ईश्वर व जीवात्मा के विषय में अपनी बुद्धि का सदुपयोग करते हुए दिखाई नहीं देते। आज का युग आधुनिकता का युग है। भौतिक शास्त्रियों ने विज्ञान की उन्नति कर लोगों को ईश्वर व जीवात्मा के सत्य ज्ञान व साधना से दूर कर उन्हें सुविधाभोगी, आलस्य व प्रमादी स्वभाव का बनाया है। धनैश्वर्य की प्राप्ति ही उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य है। वह बुद्धिनाशक मांस-मदिरा सहित मर्यादाहीन आचरण करते हैं। इसे ही उन्होंने उच्च व आदर्श जीवन का पयार्य मान लिया है। इसके विपरीत वैदिक मर्यादायें जो सत्य पर आधारित हैं, उसे आधुनिक लोग हेय व त्याज्य मानते हैं। वह नहीं जानते कि वह जो सुविधाओं से युक्त तथा ईश्वर की उपासना व सत्याचरण से पृथक जीवन व्यतीत कर रहे है, वह उनके परजन्म को नष्ट कर जीवात्मा को दुःख प्रदान करने वाला हो सकता है।

ईश्वर के ज्ञान व उसकी उपासना से रहित मनुष्य का जीवन कृतघ्नता और मूर्खता का प्रतीक कहा जा सकता है। जिस ईश्वर ने जीवों के कल्याण के लिये इस संसार को बनाया, हमें मानव शरीर तथा माता-पिता-आचार्य, मित्र एवं कुटुम्बी-जन दिये हैं, सुख के साधन भोजन व अन्य पदार्थ भी दिये हैं, उस ईश्वर के उपकारों को न जानना व मानना और उसके विपरीत कृतघ्नों के समान आचरण करना बुद्धि का सदुपयोग नहीं अपितु दुरुपयोग है। ऐसा करना बुद्धि से सत्यासत्य को विचार कर लाभ न लेना कहा व माना जा सकता है। बुद्धि की सार्थकता तभी है जब हम सच्चे आचार्यों व गुरुओं को प्राप्त हों, उनसे विद्या प्राप्त करें, विद्या ग्रहण में यथाशक्ति तर्क-वितर्क करें और विषय की पूरी परीक्षा कर सन्तुष्टि होने पर ही किसी बात को स्वीकार करें। महर्षि दयानन्द के शिष्य आर्यसमाज के अनुयायी ऐसा ही करते हैं। इस कारण उनका ज्ञान अन्य समानधर्मी बन्धुओं से अधिक होता है। इसी कारण आर्यसमाज सत्य विद्याओं के प्रचार-प्रसार के लिये कार्य करता रहता है। उसका उद्देश्य मनुष्य का कल्याण व उत्थान है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना से ही वह वेद-प्रचार जो सत्य-ज्ञान प्रचार का पर्याय है, उस कार्य में संलग्न व गतिशील है। लोगों को कर्म-फल सिद्धान्त तथा ईश्वर व आत्मा का सत्यस्वरूप ज्ञात न होने सहित आधुनिक जीवन के प्रति लुभावनी दृष्टि में फंसे होने के कारण वह अपनी बुद्धि का सदुपयोग न कर अपने परजन्म के सुख-दुःख को विस्मृत कर रहे हैं। अज्ञान में फंसे ऐसे सभी बन्धु दया के पात्र हैं। जिस प्रकार एक विवेक बुद्धि से युक्त मनुष्य पुरुषार्थ से धन कमाता है, सत्कार्यों में दान करता है और अपने भविष्य के लिये कुछ धन का संचय भी करता है जिससे रोग आदि विपरीत परिस्थितियों, आवास निर्माण व बच्चों की शिक्षा व विवाह आदि के अवसर पर वह उन कार्यों को कर सके, इसी प्रकार से सभी मनुष्यों को भी अपनी बुद्धि का प्रयोग करते हुए सद्कर्मों का संचय करना चाहिये जिससे परजन्म में वह उसे कल्याण व सुख प्राप्त करा सकें।

जगतपति परमात्मा ने हमें बुद्धि वेदाध्ययन करने, सत्य व असत्य की परीक्षा कर सत्य को स्वीकार करने तथा असत्य को छोड़ने व छुड़ाने सहित मत-मतान्तरों के स्वार्थपूर्ण एवं अज्ञानपूर्ण जाल में न फंसने के लिये दी है। हमें अपनी-अपनी बुद्धियों का वैसा ही प्रयोग करना चाहिये जैसा कि मानवता के सच्चे मित्र व हितैषी ऋषि दयानन्द ने अपने ग्रन्थों के माध्यम से तथा आर्यसमाज के नियमों में सलाह दी। ऐसा करके ही हम अपनी-अपनी बुद्धियों का सदुपयोग करके अपना व दूसरों का कल्याण कर सकेंगे। इसी के साथ लेखनी को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

 


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