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संस्कृत को जन जन तक पहुंचाने के लिए जूटेगें कार्यकर्ता

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15 May 18
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आवासीयसंस्कृत - प्रशिक्षणवर्गः की तैयारीयो को लेकर उदयापोल शिवाजी नगर में स्थित संस्कृतभारती कार्यालय पर एक बैठक रखी गई । वर्ग की विभिन्न व्यवस्थाओ को लेकर व्यापक चर्चा की गई । व प्रत्येक विभागो के एक एक प्रमुख बनाये गये जो वर्ग का सञ्चालन करेगें ।
इस बैठक में प्रमुख रूप से प्रो नीरज शर्मा, डाॅ भगवती शड्कर व्यास, डाॅ यज्ञ आमेटा, अर्चना जैन, दूष्यन्त नागदा व प्रान्त संगठन मंत्री देवेंद्र पड्ण्या उपस्थित थे ।
संस्कृत भारत की सभ्यता और सांस्कृतिक-प्रवाह की भाषा है। भारत के सांस्कृतिक पुनरुत्थान हेतु यह आवश्यक है कि संस्कृत भाषा जन-जन तक पहुँचे और भारतवासी संस्कृत का अध्ययन करके संस्कृत-शास्त्रों में निहित विशाल ज्ञान-भंडार का उपयोग अपने और राष्ट्र के उत्थान के लिए करें। इस हेतु जनसाधारण को संस्कृत से जोड़ने के लिये उसका संस्कृत के विराट स्वरुप से परिचय करवाना अत्यावश्यक है, साथ ही समाज में संस्कृत को बढ़ावा देने के लिये अधिकाधिक लोगों को संगंठित करने की भी आवश्यकता है।
इन्ही सब बातों को ध्यान में रखते हुए संस्कृत-भारती संगठन ने इस वर्ष पूरे देश में 48 प्रान्तो में आवासीयसंस्कृत - प्रशिक्षणवर्गः करने का निर्णय किया है।
इसी क्रम में चित्तौडप्रान्त का आवासीयसंस्कृत - प्रशिक्षणवर्गः का आयोजन उदयपुर महानगर में दिनांक 21मई , सोमवारा से 1 जून 2018 शुक्रवार मध्याह्नपर्यन्तम् विद्यानिकेतन-हिरणमगरी-सेक्टर 4 उदयपुर में होना तय हुआ है ।
इस आवासीय वर्ग में 12 जिलो 300 से अधिक (स्त्री , पुरुष ) वर्गार्थी भाग लेगे । जो कि गुरूकुल दिनचर्या का पालन करते हुए संस्कृत बोलने, लिखने व शास्त्रो का अध्ययन कर समाज में निशुल्क रूप से संस्कृत सिखाने का संकल्प लेकर दीक्षित होगें ।
इसके अतिरिक्त प्रांगण में विभिन्न प्रकार की संस्कृत प्रदर्शिनियाँ व साहित्य, पत्रिका आदि की स्टॉल लगाई जायेगी। प्रांगण में एक विशाल संस्कृत वस्तु-प्रदर्शिनी लगाई जायेगी, जहाँ पाँच सौ से अधिक नित्योपयोगी वस्तुओं का उनके संस्कृत-नाम सहित प्रदर्शन किया जाएगा। वहीं पर एक विज्ञान प्रदर्शिनी का आयोजन भी किया जाएगा, जिसमें विभिन्न तथ्यों और चित्रों के माध्यम से संस्कृत-शास्त्रोंमें निहित वैज्ञानिक-तत्वों का परिचय करवाया जाएगा। विभिन्न संस्कृत क्रीडाओं,़ संस्कृत संवादशाला, संस्कृत चलचित्रों का प्रदर्शन भी प्रांगण में किया जाएगा। महानगर में एक भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी । साथ ही जागरूकोभव नामक नूक्कड़ नाटक के माध्यम से जनसाधारण को संस्कृत भाषा के भव्य स्वरुप का दर्शन कराया जायेगा । वर्ग में प्रति दिन राष्ट्रीय, सांस्कृतिक व शास्त्रीय विषयो को लेकर विद्वानो द्वारा चर्चा की जाएगी ।
वर्ग के आकर्षण में खेल खेल में संस्कृत सिखाना, संस्कृत सम्भाषणम्, संस्कृत में सांस्कृतिक कार्यक्रम जैसे -संस्कृत चूटकले, संस्कृत गीतम्, संस्कृत में अन्त्यराक्षी, संस्कृत में नाटक ,स्तोत्र पाठ, गीता परायण, संस्कृत में नाटक ,ध्यान योग, बालिकाओ को आत्मरक्षा ( self defense ) का विशेष प्रशिक्षण, संस्कृत मय वातावरण आदि
संस्कृत-भारती का परिचय
संस्कृत ही व्यक्ति एवं राष्ट्र के चहुमुँखी विकास की आधारशिला हैं। अतः संस्कृत के पुनरूज्जीवन से ही भारत राष्ट्र का पुनरूत्थान संभव है। इस विचार को अपना ध्येय वाक्य बनाकर समाज में कार्यरत संस्कृत भारती का उदय लगभग 37 वर्ष पूर्व जून 1981 में दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य की राजधानी बेंगलूरू में संस्कृत सम्भाषण आंदोलन के रूप में हुआ। संस्कृत शास्त्र भाषा के साथ साथ जनजन की व्यवहार भाषा बनें यही इसका प्रमुख लक्ष्य हैं। अतः संस्कृत का गुणगान करने की अपेक्षा संस्कृत द्वारा ही कार्य करते हुये जनसाधारण में संस्कृत सम्भाषण की योग्यता का विकास करना ही इसका आधारभूत कार्य रहा हैं। इसके लिये स्थान स्थान पर दस दिवसीय निःशुल्क संस्कृत सम्भाषण शिविरों का आयोजना करना ही विगत 37 वर्षों से संस्कृत भारती का प्रमुख कार्यक्रम रहा हैं।
सम्भाषण शिविरों के आयोजना के अलावा संस्कृत भारती के प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं –
1. पत्राचार के माध्यम से लोगों को घर बैठे संस्कृत के पठन पाठन की व्यवस्था करना।
2. समाज में संस्कृत का प्रचार प्रसार करने के लिये कार्यकर्ताओं को प्रश्क्षिित करना।
3. संस्कृत-शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था करना।
4. संस्कृत के पठन-पाठन के लिए स्वाध्याय सामाग्री जैसे अभ्यास पुस्तके, सी.डी., डी.वी.डी, ऑडियों कैसेट्स आदि का प्रकाशन व विनूतन संस्कृत पुस्तकों का प्रकाशन।
5. प्राचीन शास्त्र परम्परा एवं शास्त्रों की रक्षा।
6. शिक्षा नीति में संस्कृत के स्थान रक्षण एवं संवर्धन के उपायों पर चिंतन एवं तदुनुगुण कार्य-योजना।
7. संस्कृत-साहित्य में निहित वैज्ञानिक तत्वों का अनुसंधान करके उनका प्रकाशन व संस्कृत विज्ञान प्रदर्शिनियों का आयोजन।
8. सम्भाषण संदेश नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन।
9. धर्म संस्कृति के विषय में जागरण एवं समाज में संस्कृत के माध्यम से समरसता लाने का प्रयास करना।
10. संस्कृत का गृह भाषा के रूप में विकास करते हुऐ संस्कृत मातृभाषी परम्परा का पुनरूज्जीवन।
इत्यादि सब कार्यो व योजनाओं को मूर्तरूप प्रदान करते हुए संस्कृत भारती अपने विभिन्न प्रकल्पों के माध्यम से विगत 37 वर्षो से समाज में कार्यरत हैं।
संस्कृत भारती के सैकडों कार्यकर्ता निःस्वार्थ भावना से इस राष्ट्र निर्माण के पुण्य कार्यो में लगे हुए हैं। संगठन विस्तार के लिये 270 पूर्णकालिक कार्यकर्ता अपना पूर्ण समय संस्कृत माता की सेवा में लगा रहें हैं। कार्यकर्ताओं के अथक परिश्रम के परिणाम स्वरूप संस्कृत भारती का कार्य भारत संहित विश्व के 38 देशों में फेल चुका हैं। अमेरिका, कनाड़ा, ब्रिटेन, जापान, गल्फ देशों में व अन्य राष्ट्रों में संस्कृत भारती का नियत कार्य चल रहा हैं। भारत के सभी राज्यों में संस्कृत भारती का कार्य अनवरत रूप से जारी हैं।
सम्भाषण शिविरों के माध्यम से अब तक 1 करोड़ 30 लाख से अधिक लोग संस्कृत सम्भाषण सीख चुके हैं व 10 हजार से अधिक संस्कृत गृहम् (ऐसे घर जिनकी बोल चाल की भाषा संस्कृत) का निर्माण हो चुका हैं,
भारत में चार गांवों को संस्कृत गांव बनाया जा चुका हैं। जहां पर सभी ग्रामवासी संस्कृत में ही बात चीत करते हैं। वे इस प्रकार हैं:-मुत्तुरू-कर्नाटक, झिरी-मध्यप्रदेश, मोहद-मध्यप्रदेश, भंतोला-उत्तराखण्ड। संस्कृत भारती के प्रयासों के परिणाम स्वरूप संस्कृत भाषा को उत्तराखण्ड द्वितीय राज्य भाषा घोषित किया जा चुका हैं।
इस प्रकार संस्कृत भारतीय का संस्कृत भाषा के पुनरूत्थान का कार्य एक बहुत बडे आंदोलन का रूप ले चुका हैं। संस्कृत को पुनः गौरवपूर्ण स्थान दिलवाने व भारत का सर्वांगीण विकास करने का लक्ष्य लेकर कार्य करते हुए संस्कृत भारती अपने ध्येय पथ पर निरन्तर अग्रसर हैं।
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