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“वीर सावरकर की अण्डमान की कालापानी जेल से मुक्ति की यथार्थ कथा”

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05 Apr 18
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वीर विनायक दामोदर सावरकर जी (1883-1966) का देश की आजादी की लड़ाई में प्रमुख व सर्वोपरि योगदान है। उन्हें देश की आजादी के लिए अंग्रेजों की जेल में जो यातनायें सहन की, उसके लिए उन्हें जीवित शहीद कहा जा सकता है। शायद ही किसी अन्य देशभक्त मुख्यतः अहिंसात्मक आन्दोलन के किसी नेता ने उन जैसी यातनायें सहन की हां। वह कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैण्ड गये थे और वहां ऋषि दयानन्द जी के भक्त पं. श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा स्थापित इण्डिया हाउस में रहे थे। उन्हें पं. श्यामजी कृष्ण वर्मा से अपनी पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति भी प्राप्त हुई थी। पढ़ाई पूरी कर लेने पर भी अंग्रेजों के प्रति वफादारी की शपथ न लेने के कारण उन्हें बैरिस्टर की उपाधि नहीं दी गई थी। इंग्लैण्ड में रहते हुए उन्होंने देश की आजादी के लिए प्रशंसनीय योगदान किया। उनकी क्रान्तिकारी गतिविधियों के कारण उन्हें वहां गिरिफ्तार किया गया और भारत लाया गया। समुद्री मार्ग से भारत आते हुए उन्होंने समुद्री जलयान के शौचालय से समुद्र में छलांग लगा दी थी और समुद्र में तैरते हुए फ्रांस के समुद्री तट पर जा पहुंचे थे। वहां राजनीतिक शरण न मिलने के कारण गिरिफ्तार कर लिया गया था। गिरिफ्तार कर उन्हें भारत लाया गया। यहां उन पर अनेक मिथ्या आरोप लगाये गये और मुकदमें चलाये गये। देशभक्ति के आरोप जिसे अंग्रेज उनकी सरकार के प्रति विद्रोह की संज्ञा देते थे, उन्हें दो जन्मों के सश्रम कारावास की सजा दी गई। यह सजा 50 वर्षों की थी। सावरकर जी ने अण्डमान की सेल्युलर जेल जिसे कालापानी कहा जाता था, उस जेल में रखकर उन्हें के स्थान पर जोत कर कोल्हू चलवाकर तेल निकालने का काम लिया। उनके थोड़ा सा भी रूकने पर उन्हें कोड़ों से पीटा जाता था जबकि हमारे अहिंसा के आन्दोलन के कुछ नेताओं को ‘ए’ श्रेणी की जेल में रखा जाता था। हमें सेल्युलर जेल को देखने का अवसर मिला और वहां लाइट एण्ड साउण्ड शो देखकर सावरकर जी ने क्या क्या सहा, उसे जानने व समझने का अवसर मिला। आजाद भारत की सरकारों ने सावरकर जी की उपेक्षा की। श्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय उनका चित्र संसद की दर्शक दीर्घा में लगा कर उन्हें सम्मानित किया गया। सावरकर जी पर अंग्रेजों के मानस पुत्रों व विरोधी विचारधारा के लोगों ने मिथ्या आरोप लगाये गये कि वह माफी मांग कर जेल से बाहर आये थे। यह आरोप सर्वथा मिथ्या है। इसी विषय को इस लेख में प्रस्तुत किया गया है। यह भी जान लें कि वीर सावरकर जी ने सन् 1857 की क्रान्ति का इतिहास लिखा था जिसे प्रकाशन से पूर्व ही प्रतिबन्धित कर दिया था। इस पुस्तक की पाण्डुलिपि इंग्लैण्ड से कैसे भारत पहुंच सकी और प्रकाशित हो सकी, यह आज भी एक रहस्य है। जिसने यह पुस्तक नहीं पढ़ी वह सन् 1857 की देश की आजादी को जान व समझ नहीं सकता। आज की पीढ़ी उन महापुरुषों के प्रति कृतघ्नता का परिचय देती प्रतीत हो रही है। हम नहीं समझते कि दुर्भाग्य से अगर आज वैसी परिस्थितियां पुनः उत्पन्न हो जायें तो इस देश के लोग उन महापुरुषों जैसी कुर्बानी दे भी सकते हैं? इसके शंका होती है। अस्तु।
सन् 1918 में प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद क्रमबद्ध और निरन्तर समग्र देश में राजनैतिक बंदियों को मुक्त कराने के लिए जो मांग रखी गयी, वह बहुत प्रभावशाली तरीके से प्रचारित की गई। जनता व उसके लोकप्रिय नेताओं तथा प्रैस ने आवेदन-पत्रों, सभाओं सम्मेलनों, कांग्रेस पार्टी ने अपने अधिवेशनों तथा काउन्सिल तक के माध्यम से अपनी मांग प्रचारित की व ब्रिटिश अधिकारियों को पहुंचाईं। नेशनल यूनियन ऑफ बॉम्बे, श्री अनन्त राव गाडरे, सेनापति बापट, शिवराम पन्त परज्जपे आदि ने तन मन से हस्ताक्षर अभियान चलाया और भारत-सचिव मान्टेग्यू तक उस याचिका को पहुंचाया। भारत-सचिव ने याचिका अस्वीकार कर दी। सन् 1919 के अमृतसर के कांग्रेस अधिवेशन में पुरजोर तरीके से राजनैतिक बंदियों की मुक्ति की मांग का विशेष प्रस्ताव पारित किया गया। महराष्ट्र की जिला होम रूल लीग ने सावरकर बन्धुओं की मुक्ति के लिए वायसराय के पास तार भेजा। 24 दिसम्बर सन् 1919 को शाही दयालुता का फरमान जारी हुआ। परिणामस्वरूप सभी प्रान्तीय सरकारों ने राजनैतिक बंदियों की मुक्ति के लिए जेलों के दरवाजे खोल दिए। अण्डमान की पोर्ट ब्लेयर स्थिति सेल्युलर जेल जो कालापानी के नाम से विख्यात रही है, उस जेल से भी अनेकानेक राजनैतिक कैदी मुक्त कर दिए गए। वीर दामोदर सावरकर और उनके भाई को दस वर्ष की कैद पूरी कर लेने पर भी मुक्त नहीं किया गया जबकि पांच वर्ष की कैद बिता चुके कई राजनैतिक कैदी मुक्त कर दिए गए थे। वीर सावरकर की रूग्ण अवस्था अपने चरम पर थी। वह लगभग मृत्यु शय्या पर ही थे। सेल्युलर जेल के चिकित्सालय में फेफड़ों के क्षय रोग टी.बी. का उनका इलाज किया गया। दिन भर में दूध का एक घूंट ही उनकी खुराक रह गई थी।
सन् 1920 व 1921 में भी भारत के नेताओं और भारतीय पै्रस ने उनकी मुक्ति के लिए प्रभावशाली ढंग से मांग रखी। केन्द्रीय लेजिस्लेटिव असेम्बली में श्री सरदार विट्ठल भाई पटेल ने 24 फरवरी, 1920 को सावरकर बन्धुओं का सन्दर्भ लेते हुए राजनैतिक अवज्ञाकारी बन्दियों की मुक्ति के लिए प्रस्ताव रखा। श्री जी.एस. खापर्डे ने सावरकर बन्धुओं का ही मामला उठाया। बाल गंगाधर तिलक ने मि. मान्टेग्यू को सावरकर की मुक्ति हेतु जोरदार पत्र लिखा।
मई, 1920 में गांधी जी ने भी ‘यंग इण्डिया’ में लिखा कि सावरकर बन्धुओं के विरुद्ध कभी भी यह प्रमाणित नहीं हो पाया कि वे किसी हिंसात्मक कार्रवाई में शामिल थे। जब तक यह सिद्ध नहीं हो जाता कि सावरकर बन्धु मुक्ति के बाद किसी प्रकार से राज्य के लिए खतरा हैं, वायसराय दोनों बन्धुओं को मुक्त करने के लिए बाध्य हैं। भाई परमानन्द ने भी अपनी मुक्ति के बाद कर्नल वैगवुड (Colonel Wedgewood), जो कि उन दिनों ब्रिटेन की संसद में मजदूर दल के प्रसिद्ध नेता थे तथा भारत की यात्रा पर आये हुए थे, उनसे सम्पर्क किया। उन्होंने उनकी इंग्लैण्ड वापसी पर जनवरी-फरवरी, 1921 में ब्रिटिश प्रैस के माध्यम से सावरकर की अंडमान में हो रही दुर्दशा के विरुद्ध प्रचार-संघर्ष को चरम पर पहुंचा दिया। स्वामी श्रद्धानन्द जी के मित्र व प्रशंसक पादरी सी.एफ. एन्ड्रूज ने भी अनेक लेख अण्डमान की सेलुलर जेल में राजनैतिक बन्दियों की अमानवीय यातनाओं व जेल से मुक्ति के लिए लिखें। सावरकर के अण्डमान से लिखे गए पत्रों को देश की प्रैस व समाचार पत्रों ने भी प्रकाशित किया। जनता और नेताओं ने उन समाचारों को पढ़ा जिससे देशवासियों की भावनायें अपने इन बन्धक नेताओं की जेल से मुक्ति के लिए आन्दोलन के चरम बिन्दु तक पहुंच गयीं। अगस्त, 1920 में बाल गगाधर तिलक की मृत्यु ने देश को हिला कर रख दिया। अण्डमान की सेलुलर जेल के कैदियों ने भी अपने इस लोकप्रिय नेता के सम्मान व वियोग के दुःख में एक दिन का उपवास वा अनशन रखा। गांधी जी ने खिलाफल आन्दोलन के पक्ष में अपना अहिंसात्मक असहयोग आन्दोलन आरम्भ कर दिया और एक वर्ष में ‘स्वराज्य’ प्राप्त करने का निश्चय किया। सावरकर ने घोषणा की थी कि गांधी जी का यह खिलाफत आन्दोलन भविष्य में देश के लिए आफत सिद्ध होगा।
केन्द्रीय असेम्बली के शीर्ष अेताओं ने सावरकर के मामले में प्रभावशाली तरीके से रुचि लेना आरम्भ किया। मार्च, 1921 में श्री के.वी. रंगास्वामी अय्यंगर जो कि असेम्बली के सदस्य थे, गवर्नर-जनरल को सावरकर को मुक्त करने के लिए दमदार पत्र लिखा। इन सबके परिणामस्वरूप सावरकर बन्धुओं के सेल्युलर जेल से स्थानान्तरण के आदेश जारी किए गए। नवाब सर बहराम खां और मि. हयात खां ने सावरकर जी की रिहाई का पुरजोर विरोध किया। अय्यंगर ने कहा कि सावरकर की ओर से वह स्वयं शासन को विश्वास दिलाते हैं कि सावरकर की भारत में उपस्थिति से किसी भी प्रकार का कोई खतरा नहीं होगा। सन् 1921 के प्रारम्भिक महीनों में ही सावरकर जी के गले में डला हुआ ‘D’ (Dangerous) श्रेणी का बिल्ला उतार दिया गया था। अन्ततः 2 मई, 1921 को सावरकर बन्धुओं को अण्डमान की सेल्युलर जेल जिसे कालापानी कहा जाता था और जो एक प्रकार से राजनीतिक कैदियों के लिए मृत्युलोक था, उससे सावरकर जी को विदाई मिली।
सावरकर जी की रिहाई का यह प्रामाणिक विवरण है। कुछ लोग द्वेष भाव से सावरकर जी पर यह मिथ्या आरोप लगाते हैं कि सावरकर जी ब्रिटिश सरकार से माफी मांगकर जेल से मुक्त हुए थे। यह विचार व आरोप असत्य, मिथ्या व अप्रमाणिक है। कुछ राजनीतिक दलों की सावरकर जी के यश को नष्ट करने का यह कुत्सित प्रयास है। यह भी बता दें कि यह विवरण श्री धनंजय कीर के अंग्रेजी भाषा के 570 पृष्ठीय प्रामाणिक ग्रन्थ ‘वीर सावरकर’ के आधार पर दिया गया है। यह ग्रन्थ सन् 1950, 1966 और 1988 में प्रकाशित हुआ है। यह भी बता दें की इस तथ्यात्मक पुस्तक की देश के अनेक प्रमुख समाचार पत्रों सहित एक जिला जज महोदय ने भी भूरि भूरि प्रशंसा की थी। इन प्रमाणों व लेख से सावरकर जी विषयक विरोधियों द्वारा फैलाई भ्रान्तियों का निराकरण हो जाता है। ओ३म् शम्।
मनमोहन कुमार आर्य

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