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“हमारा हर श्वास ईश्वर की आज्ञा के पालन के लिये चलना चाहिये: आचार्य धनंजय आर्य”

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22 Oct 19
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-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

“हमारा हर श्वास ईश्वर की आज्ञा के पालन के लिये चलना चाहिये: आचार्य धनंजय आर्य”

वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून का पांच दिवसीय शरदुत्सव रविवार दिनांक 20 अक्टूबर, 2019 को सोल्लास सम्पन्न। उत्सव के चैथे दिन आश्रम की पर्वतीय इकाई में यज्ञ एवं सत्संग का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में स्वामी वेदानन्द सरस्वती, उत्तरकाशी सहित आचार्य डा0 धनंजय आर्य, डा0 विनोद कुमार शर्मा तथा आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी के व्याख्यान हुए। हम स्वामी वेदानन्द सरस्वती जी का व्याख्यान प्रस्तुत कर चुके हैं। इस लेख में आचार्य धनंजय जी एवं डा0 विनोद कुमारशर्मा जी का व्याख्यान प्रस्तुत कर रहे हैं। आचार्य डा0 धनंजय जी ने श्रोताओं को सम्बोधित करते हुए आश्रम की पर्वतीय ईकाई तपोभूमि को पावन धरा बताया। उन्होंने बताया कि जब वह गुरुकुल गौतमनगर, दिल्ली में कक्षा 8 में पढ़ते थे तब वह इस आश्रम में पहली बार आये थे। आचार्य जी ने कहा कि आश्रम के इस परिसर में आने पर मन व आत्मा शान्ति का अनुभव करती हैं। उन्होंने कहा कि दुःखों से छूटने के लिये निरन्तर प्रयत्न करना चाहिये। जो मनुष्य ज्ञान की दृष्टि से जागा हुआ होता है उसी की वेद चाहना करते हैं। जो व्यक्ति सो रहा है, ज्ञान प्राप्ति के साधनों को प्राप्त नहीं है और इसके लिए प्रयत्नशील नहीं है, उसे ज्ञान प्राप्त नहीं होता। ऐसे व्यक्ति को वेद चाहते नहीं हैं। आचार्य जी ने श्रोताओं को दीपक की उपमा देकर अपने जीवन को वेदज्ञान के सूर्य से प्रकाश लेकर आलोकित करने की प्रेरणा की।

 

                आचार्य डा0 धनंजय आर्य जी ने कहा कि सामवेद उपासना, भक्ति तथा ईश्वर को ज्ञान की संगीत विधा में स्मरण, चिन्तन व ध्यान द्वारा उपासना करने का वेद है। आचार्य जी ने संगीत का जीवन के साथ सम्बन्ध होने का परिचय कराया। सामवेद के अध्ययन से मनुष्य ईश्वर की उपासना से जुड़ जाता है। उसको वैदिक उपासना का सत्य स्वरूप भी विदित हो जाता है जिससे उसे ईश्वर का सान्निध्य एवं सहाय प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि हमारा हर श्वास व प्रश्वास ईश्वर के लिये अर्थात् उसकी वेदाज्ञाओं के पालन के लिये चलना चाहिये।

 

                गुरुकुल पौंधा के विद्वान आचार्य डा0 धनंजय जी ने कहा कि हमारे प्राण जीवन को गति प्रदान करते हैं। हमारे जन्म का कारण हमारे पूर्वजन्मों के कर्म हैं जिनका इस जन्म में भोग करने के लिये परमात्मा से हमें यह जन्म मिला है। आचार्य जी ने मृत्यु की चर्चा की और उसके स्वरूप पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मृत्यु होने पर हमारे शरीर का कोई उपयोग नहीं होता। इसको अग्नि में जला देते हैं और 70 किलोग्राम का हमारा शरीर मात्र 70 ग्राम राख में परिवर्तित हो जाता है। हमारी आत्मा सूक्ष्म शरीर सहित स्थूल शरीर का त्याग कर परमात्मा की प्रेरणा से पुनर्जन्म को प्राप्त होती है। आचार्य जी ने कहा कि परमात्मा ने हमें मनुष्य जन्म देकर आत्मा को जन्म व मरण के बन्धनों को काटने का अवसर प्रदान दिया है। हमें अपने जीवन में वेद की शिक्षाओं के अनुसार ईश्वर की उपासना करते हुए जीवन व्यतीत करना चाहिये। उन्होंने कहा कि जब हम कर्म करते हैं तो उसके साथ हमारी कुछ इच्छायें तथा किन्हीं के प्रति द्वेष उत्पन्न हो सकता है। उन्होंने कहा कि हमारे जीवन का मुख्य उद्देश्य ईश्वर की भक्ति करना है। हमें जीवन को सामवेद के अनुसार उपासना में प्रवृत्त कर आत्म-कल्याण सहित देश व समाज का उपकार करना है।

 

                आचार्य जी ने कहा कि हम सबको अपनी आत्मा को वेदों का अध्ययन कर जाग्रत होना, आत्मा को जगाना व उसे सद्कर्मों में लगाना है। आचार्य जी ने स्वामी चित्तेश्वरानन्द जी के ज्ञान व उनकी आत्मोन्नति का उल्लेख किया। अपने वक्तव्य को विराम देते हुए उन्होंने कहा कि हमें अपने जीवन को वेदों के स्वाध्याय तथा वेदज्ञान के अनुसार प्रकाशित एवं आनन्दित करना चाहिये।

 

                डा0 धनंजय जी के बाद प्राकृतिक चिकित्सक डा0 विनोदकुमार शर्मा का व्याख्यान हुआ। उन्होंने कहा कि हम जो यज्ञ करते हैं यह एक धार्मिक अनुष्ठान है। यज्ञ पर्यावरण का शोधक तथा पोषक है। यज्ञ में गोघृत की हम जो आहुतियां डालते हैं वह घृत के सूक्ष्म परमाणुओं में बदल जाती हैं और वायु के साथ संयुक्त व उसमें प्रविष्ट होकर वायु की अशुद्धि का नाश करती हैं। इससे हमारा वायुमण्डल शुद्ध व सुगन्धित हो जाता है। डा0 शर्मा ने स्वास्थ्य की चर्चा भी की। उन्होंने कहा कि यदि हम अस्वस्थ होंगे तो धर्म-कर्म नहीं कर सकेंगे। प्रातः उठकर जल का सेवन करना जिसे उषापान कहते हैं उस जल को मुंह से नहीं अपितु नाक से ग्रहण करना व पीना चाहिये। इससे अनेक लाभ प्राप्त होंगे। नेत्रज्योति तीव्र होगी और मस्तिष्क की उष्णता दूर होगी। आचार्य जी ने अधिक मात्रा में जल पीने का निषेध किया और कहा कि उचित मात्रा में ही जल पीना चाहिये। उन्होंने बताया कि यदि हम बिना प्यास के पानी पीयेंगे तो हमें हानि हो सकती है। आचार्य जी ने आर0ओ0 के जल से होने वाली बीमारियों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि आर0ओ0 के जल से प्रतिकूल पदार्थों सहित अनुकूल खनिज व आवश्यक तत्व भी नष्ट हो जाते हैं जिससे जल से होने वाले लाभों से भी वंचित होकर हम भविष्य में किसी खनिज की अल्पता के रोग से प्रभावित हो सकते हैं। उन्होंने आर0ओ0 पानी को खोखला पानी बताया। उन्होंने कहा कि आर0के0 जल में खनिज व लवण नहीं होते। इससे शरीर की पुष्टि को नुकसान होता है। प्राकृतिक चिकित्सक डा0 विनोद कुमार शर्मा ने कहा कि जिस घर में आर0ओ0 का जल प्रयोग में लाया जाता है उसके सदस्य स्वस्थ नहीं रह सकते। डा0 शर्मा जी ने यज्ञ से स्वास्थ्य लाभ होने की भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि यज्ञ में रोग निवारक औषधियों व वनस्पतियों से युक्त सामग्री की आहुतियां देने से मधुमेह तथा हृदयरोग भी ठीक हो सकते हैं।

 

                डा0 विनोद कुमार शर्मा जी ने स्वस्थ रहने के लिए पौष्टिक भोजन करने की सलाह दी। उन्होंने अपने आगामी प्राकृतिक चिकित्सा शिविरों की जानकारी भी दी। इसके बाद आश्रम में आगरा से पधारे विद्वान आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी का प्रवचन हुआ। इस प्रवचन का विवरण हम पृथक से प्रस्तुत करेंगे। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

पताः 196 चुक्खूवाला-2

देहरादून-248001

फोनः 09412985121

 


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