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राजस्थान आये तो जरूर देखें गौरव के साक्षी ये  किले

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17 Jan 21
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राजस्थान आये तो जरूर देखें गौरव के साक्षी ये  किले

 भारत में वैसे तो अनेक महत्वपूर्ण किले हैं परंतु राजस्थान जिसे पहले राजपूताना कहा जाता था और उस समय राजाओं ने जगह -जगह किले बनाये वह किसी चमत्कार से कम नहीं हैं। इन किलों में गूंजती है शौर्य, वीरता,बलिदान,त्याग,स्वामिभक्ति और वीरांगनाओं के जौहर की गाथाएं। यही नहीं किलों की स्थिति, संरचना, महल,मंदिर,कलात्मकता, स्थापत्य सभी कुछ आश्चर्यचकित कर देते हैं। जल दुर्ग,स्थल दुर्ग एवं पहाड़ी दुर्ग सभी प्रकार के किले यहां देखने को मिलते हैं। यूं तो राजस्थान में छोटे-बड़े अनेक किले हैं पर हम यहां उन कुछ प्रमुख किलों की चर्चा कर रहे हैं जन्हें राजस्थान आने वाले सैलानियों को अवश्य ही देख कर जाना चाहिए। इनको देखे बिना उनकी राजस्थान यात्रा अधूरी रह जायेगी। इन्हें देख कर वे महसूस करेंगे कि यदि हम किले नहीं देखते तो बहुत कुछ अनदेखा छोड़ जाते और यहां के गोरवशाली अतीत और इतिहास से महरूम रह जाते।

 

आमेर का किला     

  जयपुर राज्य के कछवाहा राजवंश की प्राचीन राजधानी जयपुर में थी। कछवाहा राजपूतों के आगमन से पहले आमेर पर सूसावत मीणों का अधिकार था। 11वीं शताब्दी में सोढ़देव कछवाहा के पुत्र दूलाराम (लोकभाषा में दोला) ने ढूंढाड़ प्रदेश में कछवाह राजवंश की नींव रखी। उसके पुत्र काकील ने सूसावत मीणों से आमेर को अपने अधिकार में लिया। महत्वाकंक्षी मानसिंह प्रथम ने आमेर में पुराने महलों के स्थान पर अरावली पर्वत श्रंखला की पहाडि़यों के बीच 16वीं शताब्दी के अन्तिम चरण में वर्तमान राजमहलों का निर्माण प्रारम्भ किया। मानसिंह प्रथम के बाद के शासकों-मिर्जा राजा जयसिंह प्रथम तथा सवाई जयसिंह द्वितीय ने अपने स्थापत्य प्रेम और अपनी कल्पना के अनुरूप समय-समय पर आवश्यकतानुसार मानसिंह द्वारा बनवाये गये भवनों में संशोधन, संवर्धन, आन्तरिक सज्जा तथा अलंकरण के कार्य करवाये। सम्पूर्ण महल परिसर चार स्तरों में निर्मित हुआ।       

      आमेर महलों का सौंदर्य अंगूडी में नगीने की तरह हैं। महलों का ही करिश्मा है कि हर वर्ष लाखों सैलानी इसका दीदार करने आते है। चाहे पैदल, कार अथवा हाथी पर जाये चारों तरफ बिखरा प्राकृतिक सौंदर्य अविभूत करता है। सूरजपोल अथवा चांदपोल से प्रवेश कर आमेर महल के जलेब चौक के अन्दर आते हैं, जहाँ सिंहपोल के निकट मानसिंह प्रथम द्वारा बंगाल से लाई गयी श्री शिलादेवी की प्रतिमा मंदिर में स्थापित है। यह मंदिर दर्शनार्थियों के लिये प्रातः 6 से 12 तथा सायं 4 से 8 बजे तक खुला रहता है। शिलादेवी के मंदिर के बांयी ओर दोहरी सुरक्षा प्रणाली युक्त विशाल सिंहपोल है। सिंहपोल के दाहिने भाग में बने हुए भित्ति चित्रों में 19वीं शताब्दी के मुगल प्रभाव को देखा जा सकता है।  सिंह पोल के अन्दर से प्रवेश कर दीवाने आम परिसर में पहुँचते हैं। यहाँ राजा का आम दरबार होता था। यह इस्लामी व हिन्दू स्थापत्य कला के सम्मिश्रण का बेहतरीन नमूना है। ऊपर से समतल लेकिन अन्दर से अर्द्ध-गुम्बदाकर छत वाले दीवाने आम का निर्माण मिर्जा राजा जयसिंह प्रथम द्वारा (1622-1667 ई.) कराया गया था। दीवाने आम के पीछे कम्पनी कालीन भारतीय-ब्रिटिश स्थापत्य शैली का बना मजलिस विलास है। इसे सवाई रामसिंह ने (1835-1880 ई.) बनवाया था, जहाँ विभिन्न प्रकार के मनोरंजन के कार्यक्रम होते थे।       

     दीवाने आम की दक्षिणी दिशा में भव्य भित्ति चित्रों से सजा हुआ बड़ा दरवाजा गणेशपोल कहलाता है। गणेशपोल राजमहल के आवासीय भाग का मुख्य प्रवेश द्वार है। द्वार के बाहरी भाग में ललाट बिन्दु में अंकित गणेश और फारसी-मुगल शैली के सज्जात्मक चित्रों से द्वार की भित्तियां अलंकृत हैं। अन्दर परिसर के मध्य में फव्वारों से युक्त उद्यान मुगल शैली का परिचायक है। उद्यान के पूर्व में आमेर महल का सबसे सुन्दर और महत्वपूर्ण खण्ड जय मंदिर है, जिसे दीवाने खास व शीशमहल भी कहा जाता है। चूने और गज मिट्टी से बनी दीवारों और छतों पर जामिया कांच या शीशे के  टुकड़ों से की गयी सजावट के कारण इसे शीशमहल कहा जाता है। सफेद पत्थर से बने इसके स्तम्भों और दीवारों पर भैसलाना के काले पत्थर की पट्टिकाओं तथा फूल पौधों तितलियों की बारीक विशिष्ट कलाकारी और एक ही आकृति में दो या दो से अधिक आकृतियों का समावेश शिल्पकला का अनूठा नमूना है। शीशमहल के दोनों ओर के बरामदों में भी रोशनदानों में धातु की जालियां काटकर बनाये हुए राधा-कृष्ण, कृष्ण-गोपिकाएं और पुष्प सज्जा में भी रंगीन कांच के छोटे टुकड़े लगाकर कलात्मक सज्जा की गयी है।       शीशमहल के बरामदे के उत्तरी कोने से जा रही सीढि़यों और खुर्रा मार्ग से हम गणेशपोल के ऊपर बने सुहाग मंदिर में पहुँचते हैं। सुहाग मंदिर से पूर्व में उतर कर छतरी के नीचे बांये हाथ की ओर गलियारे के अन्त में जो खुली छत है, उसे चांदनी कहा जाता है। इस चांदनी पर राजाओं के समय में नृत्य एवं संगीत के आयोजन किये जाते थे। चांदनी से वापस लौटकर सीढि़यों से ऊपर चढ़कर शीशमहल की छत पर बना सुन्दर जस मंदिर है। शीश महल की तरह जस मंदिर की सजावट भी मुगल फारसी शैली के प्रतीकों तथा कांच के टुकड़ों से की गयी है। इसमें ग्रीष्म काल में शीतल वायु की व्यवस्था की हुई है।            जस मंदिर से आगे छोटे दरवाजे से एक कक्ष में होते हुए हम लम्बे गलियारे में पहुंच जाते हैं। इस गलियारे की ऊंची दीवार महल को दो भागों में विभाजित करती है। गलियारे से होते हुए हम मानसिंह महल में प्रवेश करते हैं जो पत्थरों के सुन्दर झरोंखों से सुसज्जित है। इसमें महाराजा मानसिंह प्रथम का निजी आवासीय कक्ष व पूजा गृह है। इसके दरवाजों व दीवारों पर धार्मिक चित्र बने हुए हैं। मानसिंह महल के नीचे उतरने वाले किसी भी सीढ़ी या खुर्रा मार्ग से मानसिंह महल के चांक में पहुँच सकते हैं। महल के भूतल पर रानियों के 12 आवासीय कमरे बने हैं। मानसिंह महल के चौंक के बीच में सवाई रामसिंह के समय की बनी खुली बारादरी है। चौक के उत्तरी-पूर्वी भाग में जो  वृताकार दिखाई देते हैं इसके नीचे एक बड़ा जल भण्डार (भूमिगत टांका) है। मानसिंह महल के नीचे के हिस्से से पश्चिम-उत्त्तर की ओर बांयी तरफ खुर्रा मार्ग से लौटने पर शीशमहल के सामने उद्यान के पश्चिमी दिशा में बने रानियों के आवासीय खण्ड को सुख निवास कहा जाता है। यहाँ भी ग्रीष्म ऋतु में शीतल वायु की व्यवस्था है। यहाँ से वापस गणेशपोल और दीवाने आम होते हुए सिंहपोल की सीढि़यां उतर कर पुनः बाहर जलैब चौक में आ जाते हैं। जहाँ से हम आमेर के पूर्व वैभव के प्रतीक स्मारकों आदि का आनन्द ले सकते हैं।

चित्रित स्थापत्य का आकर्षण  गणेशपोल                      स्थापत्य एवं चित्रकला की दृष्टि से आमेर का गणेशपोल आज विश्व प्रसिद्ध प्रवेश द्वार है तथा राजस्थान की कलात्मक धरोहर भी। यह लगभग 50 फीट ऊंचा व 50 फीट चौड़ा है। इसके ऊपर गणेश की आकृति चित्रित है। इसीलिए इसे गणेशपोल कहते हैं। इसका निर्माण मिर्जा राजा जयसिंह ने (1700-1743 ई.) करवाया। पहले यह द्वार बहुत सादगी लिए था परन्तु मिर्जा राजा जयसिंह द्वारा इसे भव्य एवं कलात्मक स्वरूप दिया गया। संगमरमर की सीढि़यों पर चढ़कर ही इस द्वार तक पहुँचा जा सकता है। इस द्वार पर पाँच मेहराबें बनी हुई हैं। इन पांचों मेहराबों के खण्डों में चारों ओर फूल-पत्तियों का चित्रण है। हरे रंग के आराइश पद्धति के इजारे बने हैं तथा इन पर चारों ओर पीली पट्टियां बनी हुई हैं। इस पोल का सम्पूर्ण बाहरी हिस्सा  भित्ति  चित्रों से सुसज्जित है। यह चित्र आलागिला (फ्रेस्को) पद्धति से बने हैं। द्वार के ऊपर चतुर्भुज गणेश चौकी पर पद्मासन मुद्रा में विराजमान है। गणेशपोल के बांयी ओर एक अन्य दीवार पर गणेश के साथ रिद्धि-सिद्धि का अंकन है। आज यह पोल अपने उत्कृष्ट स्थापत्य, चित्रों के भव्य संयोजन, मेहराबों के उचित अनुपात के कारण पर्यटकों के विशेष आर्कषण का केन्द्र बिन्दु बना हुआ है।

जयगढ़ किला     

      जयपुर-दिल्ली राजमार्ग पर अवस्थित जयपुर से 15 किमी. दूर आमेर के महलों पर एक दृष्टि डालें तो पहाडि़यों के ऊपर एक पतली पट्टी सी दिखाई देती है। उस पट्टी के बीचों-बीच खड़ी एक मीनार और एक कोने के दो बुर्जे बस नीचे से इतना ही दिखाई देता है। यही जयगढ़ का प्रसिद्ध दुर्ग है।       इस स्थान के महत्व को देखते हुए इसे और सुरक्षित कर राजा मानसिंह (1589-1614) ने यहाँ अपना खजाना छिपाया, यह किंवदन्ती है। तब यह स्थान जयगढ़ नहीं कहलाता था। इसे चिल्ह का टोला कहा जाता था और सिटी पैलेस में सुरक्षित नक्शों में भी इसे चिल्ह का टोला ही कहा गया है।       

      जयगढ़ किले का निर्माण सवाई जयसिंह (1699-1743) ने करवाया था यों तो सभी किलों में तोपें बनती थीं, किन्तु सब जगह इनका अस्तित्व समाप्त हो गया है। एकमात्र यही एक स्थान है यहाँ अभी पुरानी लेथ मशीन अपने मूल स्वरूप में सुरक्षित है। तोपों के सांचे और ढलाई की भट्टी भी है। मध्यकालीन भारत के प्रख्यात विद्वान स्व. प्रो, नुरूल हसन ने इस कारखाने को देखकर कहा था कि सम्पूर्ण एशिया में कोई भी पुराना कारखाना इतनी अच्छी हालत में सुरक्षित नहीं बचा है। आपातकालीन यह दुर्ग अपने खजाने के लिए विशेष चर्चित हुआ।       

       विश्व की पहियों पर रखी हुई सबसे बड़ी तोप जयबाण इसी किले में स्थित है। यह तोप 1720 में जयसिंह द्वारा बनवाई गई थी। इससे 35 किमी. दूरी तक गोले दागे जा सकते थे।  राजस्थान के दुर्गो में जलसंग्रह के लिए बनाये गये टाकों में यहाँ का टाकां बहुत बड़ा है। महल में विलास, ललित मंदिर, विलास मंदिर एवं आराम मंदिर सहित बारूदखाना, टकसाल, मधुसूदन और शीतला माता के मन्दिर, सूफी सन्त मिट्ठे साहब की दरगाह तथा औरंगजेब द्वारा निर्मित बुलन्द दरवाजा एवं तोपों का संग्रहाल्य प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं।

नाहरगढ़  दुर्ग      

      गुलाबी नगर के पूर्व और उत्तर का क्षेत्र अरावली पर्वत श्रेणियों और शिखरों से परिपूर्ण है। ये पर्वत श्रेणियां न केवल शहर की सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण रही हैं। पर्वत श्रेणियों के अधिकांश शिखरों पर शहर की सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए दुर्ग और चौकियों का निर्माण कराया गया था। गुलाबी नगर के उत्तर-पश्चिम की ओर स्थित पहाड़ी पर विशाल दुर्ग नाहरगढ़ का निर्माण जयपुर के संस्थापक सवाई जयसिंह ने सन् 1734 में कराया था। मराठा आक्रमणों से शहर की सुरक्षा की दृष्टि से साढ़े तीन लाख रूपये की राशि से बने इस किले का नाम सुदर्शन रखा गया। गढ़ में सर्वप्रथम सुदर्शन कृष्ण का मन्दिर बनवाया गया। गढ़ के प्रवेश द्वार के निकट ही नाहरसिंह की छतरी बनी और इस गढ़ का नाम नाहरगढ़ रखा गया। गढ़ की सुरक्षा के लिए 10 फीट चौड़ी दीवार बनायी गई।       महलों में प्रवेश द्वार, चतुष्कोणीय चौक, घुमावदार गुम्बज, झुके हुए छज्जे गुलाबी नगर की स्थापत्य कला के सुन्दर नमूने हैं। जयपुर के राजाओं को बाहरी विजेताओं का सामना नहीं करना पड़ा इसलिए नाहरगढ़ दुर्ग सुरक्षा के साथ ही आमोद-प्रमोद केन्द्र के रूप में विकसित हुआ। किले पर राजघराने में विवाह, जन्मोत्सव, अतिथि आगमन, वर्षगांठ और अंग्रेजों द्वारा प्रदत सम्मान सूचक तोपें छोड़ी जाती थी।     

     नाहरगढ़ किले में प्रवेश करने के लिए आमेर से जयगढ़ होते हुए मार्ग बनाया गया था। किले में सुदर्शन मन्दिर, सिलहखाना और रक्षकों के लिए बनायी गयी बैरकें दर्शनीय हैं। पेयजल व्यवस्था के लिए विशाल टैंक का निर्माण करवाया गया। किले का वर्तमान स्वरूप सन् 1868 में सवाई रामसिंह के समय में दिया गया। पुरातत्व विभाग के अधीन स्मारक घोषित किये जाने के बाद इस किले को सन् 1957 से सामान्य जनता के दर्शनार्थ खोल दिया गया।

 

अजेय तारागढ़ का दुर्ग (गढ़ बीटली)     

     गढ़ बीटली के नाम से विख्यात अजमेर की पश्चिमी पर्वत श्रेणियों के शिखर पर तारे के समान प्रकाशित, तारागढ़ पूर्वी राजस्थान का एक सुदृढ़ दुर्ग है। बारहवीं शताब्दी तक यह अजयमेरू दुर्ग के नाम से ही जाना जाता था। इसके प्रमाण चौहान शासकों के अभिलेखों से प्राप्त होते हैं। सन् 1141 के जैन ग्रन्थ आवश्यक निर्युक्ति से भी ज्ञात होता है कि शाकम्भरी के चौहान शासक अजयराज ने अजय दुर्ग के नीचे पृथ्वीपुर नामक नगर की स्थापना की थी। अजयराज ने अपने पिता पृथ्वीराज प्रथम की स्मृति में 12वीं शताब्दी में यह नगर बसाया जो बाद में अजयमेरू या अजमेर नाम से विख्यात हुआ। तारागढ़ को गढ़ बीटली नाम 17वीं शताब्दी में प्राप्त हुआ जब शाहजहॉ के सेनाध्यक्ष बीठलदास गौर द्वारा 1644 से 1656 ईस्वी के मध्य इसका जीर्णोद्धार कराया गया।       अजमेर की पश्चिमी पहाड़ी पर 80 एकड़ क्षेत्र में विस्तृत यह दुर्ग समुद्र की सतह से 2.855 फीट की ऊंचाई तथा भूमि की सतह से 1.300 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। गिरि दुर्ग होने के कारण पहाडि़यों की बनावट तथा घुमावों को आधार बनाकर ही इसके प्राचीरों की रचना की गई जो अजमेर नगर के शीर्ष पर प्रहरी के समान खड़ा पश्चिमी भारत के प्रवेश द्वार की रक्षा करता है। मध्यकालीन भारतीय इतिहास में अजमेर अपनी केन्द्रीय स्थिति के कारण राजस्थान एवं गुजरात में प्रवेश के लिए महत्वपूर्ण रहा है। यह दुर्ग अपनी दुर्भेद्यता, घुमावदार चढ़ाई के कारण गिरि दुर्गों में महात्वपूर्ण स्थान रखता है। तारागढ़ का विस्तृत वर्णन जेम्स टॉड, कनिंघम, काइन, हरविलास शारदा आदि इतिहासकारों द्वारा तथा समकालीन साहित्यिक ग्रन्थों में भी प्राप्त होता है।      

     सन् 1832 में दुर्ग की प्राचीर को तोड़ने तथा सैनिक आरोग्य निवास के रूप में परिवर्तित करने के साथ दो पक्की सड़कों के निर्माण से प्रवेश सरल एवं सुविधाजनक हो गया। तारागढ़ दुर्ग उŸार भारतीय इतिहास एवं राजस्थान की अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं से सम्बद्ध होने के कारण इतिहासकारों के लिए आज भी अध्ययन का विषय बना हुआ है। सन् 1192 में मोहम्मद गौरी ने अजमेर पर अधिकार कर लिया था। उसके लौटते ही पृथ्वीराज तृतीय के भाई ने पुनः दुर्ग पर अधिकार कर लिया। कुतुबुद्दीन ऐबक ने दुर्ग को फिर 1195 ई. में हस्तगत कर लिया तथा सैय्यद हुसैन मशहीद को किलेदार नियुक्त किया था।       मुगल सम्राट अकबर ने भी गुजरात तथा राजस्थान के विजय अभियानों तथा विजित प्रदेशों पर प्रशासन की पकड़ मजबूत रखने के लिए अजमेर को ही केन्द्र बनाया। स्वतंत्रता प्रापित के पश्चात् एक बार पुनः जीर्णोद्धार के क्रम में यहाँ पृथ्वीराज तृतीय की प्रतिमा की स्थापना की गई जो इसके गौरवमय इतिहास का स्मारक है। तारागढ़ दुर्ग लम्बे समय की यात्रा कर अब ऐतिहासिक स्मारक बन गया है। राजस्थान के रक्त रंजित दुर्गों में इसका दूसरा स्थान माना जाता है।

रणथम्भोर का दुर्ग     

      हम्मीर की आन-बान शान का प्रतीक रणथम्भोर राजस्थान का एक प्राचीन एवं प्रमुख गिरि दुर्ग है। बीहड़ वन और दुर्ग  घाटियों के मध्य अवस्थित यह दुर्ग विशिष्ट सामरिक स्थिति और सुदृढ़ संरचना के कारण अजेय माना जाता था। दिल्ली से उसकी निकटता तथा मालवा और मेवाड़ के मध्य में स्थित होने के कारण रणथम्भोर दुर्ग पर निरन्तर आक्रमण होते रह। सवाईमाधोपुर से लगभग 13 किमी. दूर रणथम्भोर अरावली पर्वतमाला की श्रंखलाओं से घिरा एक विकट दुर्ग है। रणथम्भोर दुर्ग एक ऊंचे गिरि शिखर पर बना है और उसकी स्थिति कुछ ऐसी विलक्षण है कि दुर्ग के समीप जाने पर ही यह दिखाई देता है। रणथम्भोर का वास्तविक नाम रन्त : पुर है अर्थात् ’रण की घाटी में स्थित नगर’। ’रण’ उस पहाड़ी का नाम है जो किले की पहाड़ी से कुछ नीचे है एवं थंभ (स्तम्भ) जिस पर यह किला बना है। इसी से इसका नाम रणथम्भारै हो गया। यह दुर्ग चतुर्दिक पहडि़यों से घिरा है जो इसकी नैसर्गिक प्राचीरों का काम करती हैं। दुर्ग की इसी दुर्गम भौगोलिक स्थिति को लक्ष्य कर अबुल फजल ने लिखा हैं-यह दुर्ग पहाड़ी प्रदेश के बीच में है।      

      रणथम्भोर दुर्ग तक पहुँचने का मार्ग संकरी व तंग घाटी से होकर सर्पिलाकार में आगे जाता है। हम्मीर महल, रानी महल, कचहरी, सुपारी महल, बादल-महल, जौरां-भौरां, 32 खम्भों की छतरी, रनिहाड़ तालाब, पीर सदरूद्दीन की दरगाह, लक्ष्मीनाराण मंदिर (भग्न रूप में) जैन मंदिर तथा समूचे देश में प्रसिद्ध गणेश जी का मंदिर दुर्ग के प्रमुख दर्शनीय स्थान हैं। किले के पार्श्व में पद्मला तालाब तथा अन्य जलाशय हैं। इतिहास प्रसिद्ध रणथम्भोर दुर्ग के निर्माण की तिथि तथा उसके निर्माताओं के बार में प्रामाणिक जानकारी का अभाव है।      

     रणथम्भोर को सर्वाधिक गौरव मिला यहाँ के वीर और पराक्रमी शासक राव हम्मीर देव चौहान के अनुपम त्याग और बलिदान से। हम्मीर ने सुलतान अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोही सेनापति मीर मुहम्मदशाह (महमांशाह) को अपनी यहाँ शरण प्रदान की जिसे दण्डित करने तथा अपनी साम्रज्यवादी महत्वाकांक्षा की पूर्ति हेतु अलाउद्दीन ने 1301 ई. में रणथम्भोर पर एक विशाल सैन्य दल के साथ आक्रमण किया। पहले उसने अपने सेनापति नुसरत खां को रणथम्भोर विजय के लिए भेजा लेकिन किले की घेराबन्दी करते समय हम्मीर के सैनिकों द्वारा दुर्ग से की गई पत्थर वर्षा से वह मारा गया। क्रुद्ध हो अलाउद्दीन स्वयं रणथम्भोर पर चढ़ आया तथा विशाल सेना के साथ दुर्ग को घेर लिया। पराक्रमी हम्मीर ने इस आक्रमण का जोरदार मुकाबला किया।  अलाउद्दीन के साथ आया इतिहासकार अमीर खुसरो युद्ध के घटनाक्रम का वर्णन करते हुए लिखता है कि सुल्तान ने किले के भीतर मार करने के लिए पाशेब (विशेष प्रकार के चबूतरे) तथा गरगच तैयार करवाये और मगरबी (ज्वलनशील पदार्थ फेंकने का यन्त्र) व अर्रादा (पत्थरों की वर्षा करने वाला यन्त्र) आदि की सहायता से आक्रमण किया। उधर हम्मीरदेव के सैनिकों ने दुर्ग के भीतर से अग्निबाण चलाये तथा मंजनीक व ढेकुली यन्त्रों द्वारा अलाउद्दीन के सैनिकों पर विशाल पत्थरों के गोले बरसाये। दुर्गस्थ जलाशयों से तेज बहाव के साथ पानी छोड़ा गया जिससे खिलजी सेना को भारी क्षति हुई। इस तरह रणथम्भोर का घेरा लगभग एक वर्ष तक चला। अन्ततः अलाउद्दीन ने छल और कूटनीति का आश्रय लिया तथा हम्मीर के दो मंत्रियों रतिपाल और रणमल को बूंदी का परगना इनायत करने का प्रलोभन देकर अपनी और मिला लिया। इस विश्वासघात के फलस्वरूप हम्मीर को पराजय का मुख देखना पड़ा। अन्ततः उसने केसरिया करने की ठानी। दुर्ग की ललनाओं ने जौहर का अनुष्ठान किया तथा हम्मीर अपने कुछ विश्वस्त सामन्तों तथा महमांशाह सहित दुर्ग से बाहर आ शत्रु सेना से युद्ध करता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ। जुलाई, 1301 में रणथम्भोर पर अलाउद्दीन का अधिकार हो गया। हम्मीर के इस अदभुत त्याग और बलिदान से प्रेरित हो संस्कृत, प्राकृत, राजस्थानी एवं हिन्दी आदि सभी प्रमुख भाषाओं में कवियों ने उसे अपना चरित्रनायक बनाकर उसका यशोगान किया है। रणथम्भोर अपने में शौर्य, त्याग और उत्सर्ग की एक गौरवशाली परम्परा संजोये हुए है।

 

नीमराणा का किला       

       दिल्ली से करीब 122 किलोमीटर दूर अलवर जिले के नीमराणा किले का निर्माण सन् 1464 में करवाया गया था। चौहान वंश के इस किले के अंतिम उत्तराधिकारी राजा राजेन्द्र सिंह चौहान द्वारा छोड़ देने के बाद  तो यह धीरे-धीरे खण्डहर का रूप लेने लगा। लगभग तीन एकड़ पहाड़ी भूमि पर बना पांच मंजिला यह किला पंचमहल के नाम से भी जाना जाता है। वर्तमान में इस किले ने एक होटल का रूप ले लिया है।मेहरानगढ़ का दुर्ग       राठौड़ों के शौर्य का साक्षी मेहरानगढ़ का निर्माण जोधपुर के यशस्वी संस्थापक राव जोधा ने करवाया था। उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार राव जोधा ने विक्रम संवत् 1515 की ज्येष्ठ सुदी 11 शनिवार (13 मई. 1459 ई.) को इस किले की नींव रखी। उसके चारों ओर नगर बसाया जो उसके नाम पर जोधपुर कहलाया। किले वाली पहाड़ी प्रसिद्ध योगी चिडि़यानाथ के नाम पर चिडि़या टूंक कहलाती थी। मयूराकृति का होने के कारण जोधपुर के किले को मयूर ध्वजगढ़ (मोरध्वजगढ़) भी कहते हैं।       जोधपुर का यह सुदृढ़ और विशाल दुर्ग भूमि तल से लगभग 400 फीट ऊंचा है। किले के चारों ओर मजबूत परकोटा है जो 20 फीट से 120 फीट तक ऊंचा और 12 फीट से 20 फीट चौड़ा है। किले का क्षेत्रफल लम्बाई में 500 गज और चौड़ाई में 250 गज है। इसकी प्राचीर में विशाल बुर्जें बनी हुई है। उन्नत प्राचीर और विशाल बुर्जों ने जोधपुर के किले को एक दुर्भेद्य दुर्ग का स्वरूप प्रदान किया। इस दुर्ग के प्रवेश द्वारों में लोहापोल, जयपोल और फतेहपोल प्रमुख हैं।       

 

जोधपुर का किला 

          अपने अनूठे स्थापत्य और विशिष्ट संरचना के कारण  अपनी विशेष पहचान रखता है। लाल पत्थरों से निर्मित और अलंकृत जाली-झरोखों से सुशोभित इस किले के महल राजपूत स्थापत्य कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इनमें महाराजा सूरसिंह द्वारा विक्रम संवत् 1602 के लगभग निर्मित मोती महल सुनहरी अलंकरण व सजीव चित्रांकन के लिए प्रसिद्ध है। किले के देव मन्दिरों में चामुण्डा माता, मुरली मनोहर जी तथा आनन्दघन जी के मन्दिर प्रमुख हैं। इनमें चामुण्डा माता मंदिर का निर्माण दुर्ग की स्थापना के साथ ही राव जोधा ने करवाया था। किले की तलहटी में बसे जोधपुर नगर के चारों ओर एक सुदृढ़ प्राचीर (शहरपनाह) बनी हुई है जिसमें 101 विशाल बुर्जे और 6 दरवाजे हैं।जालोर दुर्ग       जालोर का किला पश्चिमी राजस्थान के सबसे प्राचीन और सुदृढ दुर्गो में गिना जाता है। सूकड़ी नदी के दाहिने किनारे पर अवस्थित इस किले को प्राचीन साहित्य और शिलालेखों में जाबलीपुर, जालहुर आदि नामों से अभिहीत किया गया है। जिस विशाल पर्वत शिखर पर यह प्राचीन किला बना है उसे सोनगिरि (स्वर्णगिरी) व कनकाचल तथा किले को सोनगढ़ अथवा सोनलगढ़ कहा गया है। इतिहासकार डॉ. दशरथ शर्मा के अनुसार प्रतिहार नरेश नागभट्ट प्रथम ने जालोर में अपनी राजधानी स्थापित की और संभवतः उसने ही इस सुदृढ़ ऐतिहासिक दुर्ग का निर्माण करवाया। प्रतिहारों के पश्चात् जालोर पर परमारों (पंवारों) का शासन स्थापित हुआ।      

    दिल्ली के सर्वाधिक शक्तिशाली और साम्राज्यवादी सुलतान अलाउद्दीन खिलजी ने रणथम्भोर और चित्तौड़गढ़ विजय के बाद जालोर दुर्ग को अपना लक्ष्य बनाया। जालोर का यह घेरा लम्बे अरसे तक चला। अंततः 1311-12 ई. के लगभग अलाउद्दीन का जालोर पर अधिकार हो गया। सोनगिरि पर्वतमाला पर बना जालोर का किला गिरि दुर्ग का सुन्दर उदाहरण है। आसपास की भूमि से यह लगभग 1200 फीट ऊंचा है। जालोर दुर्ग के एतिहासिक स्थलों में महाराजा मानसिंह के महल और झरोखे दो मंजिला रानी महल, प्राचीन जैन मंदिर, चामुण्डा माता और जोगमाया के मन्दिर, दहियों की पोल, सन्त मल्लिकशाह की दरगाह प्रमुख और उल्लेखनीय हैं। किले में स्थित परमार कालीन कीर्तिस्तम्भ कला का उत्कृष्ठ नमूना है।

 

सिवाणा  दुर्ग-जोधपुर       

     मारवाड़ के पर्वतीय दुर्गों में सिवाणा के किले का विशेष महत्व है। यह किला जोधपुर से लगभग 60 मील दक्षिण में पर्वत शिखरों के मध्य अवस्थित है। ज्ञात इतिहास के अनुसार सिवाणा के इस प्राचीन दुर्ग का निर्माण वीरनाराण पंवार ने दसवीं शताब्दी में करवाया था। वह प्रतापी पंवार शासक राजा भोज का पुत्र था। तद्नन्तर सिवाणा जालोर के सोनगर चौहानों के अधिकार में आ गया। सिवाणा को सबसे प्रबल चुनौती मिली सुलतान अलाउद्दीन खिलजी से। अलाउद्दीन के आक्रमण के समय सिवाणा का अधिपति सातल देव था जो जालोर का शासक कान्हडदेव का भतीजा था। दुर्ग की रक्षा का कोई उपाय न देख वी सातल सोम सहित अन्य क्षत्रिय योद्धा केसरिया वस्त्र धारण कर शत्रु सेना पर टूट पड़े तथा वीरगति को प्राप्त हुए। अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के साथ ही सिवाणा पर उसके वंश का आधिपत्य समाप्त हो गया।       

      अपने दुर्भेद्य स्वरूप के कारण सिवाणा का दुर्ग संकटकाल में मारवाड़ के राजाओं की शरण स्थली रहा। राव मालदेव ने सुमेल के युद्ध के बाद शेरशाह की सेना द्वारा पीछा किये जाने पर सिवाणा के किले में आश्रय लिया था। मुगल आधिपत्य में आने के बाद अकबर ने राव मालदेव के एक पुत्र रायमल को सिवाणा दिया। लेकिन कुछ अरसे बाद ही रायमल की मृत्यु हो गयी और सिवाणा उसके पुत्र कल्याणदास (कल्ला) के अधिकार में आ गया। इस राठौड़ वीर कल्ला रायमलोत की वीरता और पराक्रम से सिवाणा को जो प्रसिद्धि और गौरव मिला उससे इतिहास के पृष्ठ आलोकित है। उक्त अवसर उस समय उपस्थित हुआ जब बादशाह अकबर कल्ला राठौड़ से नाराज हो गया और उसने जोधपुर के मोटा राजा उदय सिंह को आदेश दिया कि वह कल्ला को हटकार सिवाणा पर अधिकार कर ले। कल्ला राठौड़ ने स्वाभिमान और वीरता का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हुए मोटा राजा उदय सिंह की सेना के साथ भीषण युद्ध किया और लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की। कल्ला की पत्नी हाड़ी रानी (बूंदी के राव सुरजन हाड़ा की पुत्री) ने दुर्ग की ललनाओं के साथ जौहर का अनुष्ठान किया। कल्ला रायमलोक की वीरता और पराक्रम से सम्बन्धित अनेक दोहे प्रसिद्ध हैं।

 

सज्जनगढ़ का दुर्ग      

     मेवाड़ महाराणा सज्जनसिंह ने अपने दस वर्षीय शासनकाल (सन् 1874-1884) में साहित्य, संगीत, कला, सस्कृति, धर्म और आध्यात्म आदि हर क्षेत्र में राज्य का चहुंमुखी विकास किया। सज्जनगढ़ का निर्माण भी उन्ही की देन है। यह किला उदयपुर के मुकुटमणि की संज्ञा से विभूपित है।      

     यह गढ़ उदयपुर से 3 किलोमीटर पश्चिम की ओर पिछोला झील से अम्बामाता होकर जाने वाले मार्ग पर बांसदरा पहाड़ी पर बनाया गया जो भूमितल से 1100 फीट तथा समुद्रतल से 3100 फीट की ऊंचाई लिये हुए है। उदयपुर में आने वाला हर पर्यटक सज्जनगढ़ को अपनी दृष्टि से न भी निहारना चाहे तब भी यह गढ़ सबको अपनी ओर सहसा ही आकर्षित कर लेता है।       

      गढ़ तक पहुंचने के लिए बड़ी ही सुन्दर घुमावदार पक्की सड़क बनी हुई हैं। सन् 1955 में महाराणा भगवतसिंह ने कई अन्य महलों के साथ जनहितार्थ उपयोग के लिए सज्जनगढ़ को भी बिना लागत मूल्य प्राप्त किये राज्य सरकार को सौंप दिया। वर्तमान में यह पुलिस का वायरलैस केन्द्र बनकर अपने अतीत के वैभव को समेटे है।

 

अचलगढ़-माउंट आबू     

        प्राचीन शिलालेखों और साहित्यिक ग्रन्थों में आबू पर्वत को अर्बुदगिरि अथवा अर्बुदांचल कहा गया है। अर्बुदांचल स्थित अचलगढ़ एक प्राचीन दुर्ग है। यह दुर्ग आबू से लगभग 13 किलोमीटर दूर अरावली पर्वतमाला के एक ऊंचे शिखर पर स्थित है। सन् 1452 के लगभग मेवाड़ के पराक्रमी महाराणा कुम्भा ने इसी प्राचीन दुर्ग के भग्वावशेषों पर एक नये दुर्ग का निर्माण करवाया जो अचलगढ़ के नाम से प्रख्यात है। आबू पर्वतांचल में स्थित अनेक देव मंदिरों के कारण टॉड ने आबू पर्वत को हिन्दू ओलम्पस (देव पर्वत) कहा है।            

      सुदृढ़ प्राचीर और विशाल बुर्जों से युक्त अचलगढ़ दुर्ग स्थापत्य का अच्छा उदाहरण है। आबू से अचलगढ़ जाते समय मार्ग में सबसे पहले अचलेश्वर महादेव का मंदिर आता है। आबू पर्वत के अधिष्ठाता देव अचलेश्वर महादेव ही हैं। दुर्ग के भीतर कुम्भा के राजप्रासाद, उनकी ओखा रानी का महल, अनाज के कोठे (अन्न भण्डार) सैनिकों के आवास गृह, पानी के विशाल टांके, अतुल जलराशि से परिपूर्ण सावन-भादो झील, परमारों द्वारा निर्मित खतरे की सूचना देने वाली बुर्ज आदि के भग्नावशेष अद्यावधि विद्यमान हैं।

 

कोटा का गढ़      

       राजस्थान के अनेक दुर्गों में कोटा का गढ़ पर्यटन, बनावट बसावट एवं स्थापत्य कला की दृष्टि से दर्शनीय है। हाड़ा शासकों के भू-भाग हाड़ोती का केन्द्र बिन्दु कोटा गढ़ राजस्थान के उन दुर्गों में से एक है जो नदियों के किनारे बनाये गये हैं। यह गढ़ कोटा में चम्बल नदी के किनारे बनाया गया है। कर्नल जेम्स टॉड के यात्रा व्रतांत से पता चलता है कि आगरा के किले को छोड़कर किसी भी किले का परकोटा इतना बड़ा नहीं है जितना कि कोटा गढ़ का। कोटा गढ़ के परकोटे में सूरजपोल, किशोरपुरा गेट, पाटनपोल, लाडपुरा एवं कैथूनीपोल नामक छः विशाल दरवाजे हैं एवं परकोटा दस किलोमीटर की परिधि में बनाया गया है।      

      कोटा का गढ़ एक दुर्ग के रूप में न होकर रियासत के समय में महलों के रूप में शासकों के निवास के काम आता था। यह दुर्ग अपनी अद्भुत बनावट लिये तत्कालीन शासकों की सामरिक आवश्यकता का प्रतीक था। कोटा गढ़ प्राचीन भारतीय और मुगल शैली का अद्भुत सम्मिश्रण है। दुर्ग के ऊंचे दरवाजे और विशाल परकोटा मुगल स्थापत्य कला की विशेषता लिये है। दुर्ग में बृजनाथ मंदिर, जैत सिंह महल, माधो सिंह महल, बड़ा महल, कवरपदा महल, केसर महल, दीवाने आम, हाथीपोल, दरबार हॉल, भीम महल, बारादरी और झाला हवेली दर्शनीय हैं।      

     कोटा गढ़ में बने महलों के भित्ति चित्रों में शिकार के चित्र सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। लघु चित्रों में तत्कालीन संस्कृति और परम्परा का चित्रण सम्पूर्ण भव्यता के साथ किया गया है। तीज गणगौर, हाथियों पर होली तथा दीपावली आदि पर्व चित्रों में दिखाये गये है। प्रेम के चित्रण में प्रेमियों की मनोदशा देखते ही बनती है। हाथियों के दंगल, रानी द्वारा पोलो का खेल एवं शिकार के दृश्य, नारी एवं पुरूष चित्रण, दरबारी राग-रंग, कृष्ण लीला, अवतार चित्रण, शाही सवारी के दृश्य, श्रीनाथजी की झांकी, अंगड़ाई लेती नायिका आदि के चित्र कोटा चित्र शैली की अपनी विशेषता हैं। कोटा गढ़ में स्थापित राव माधो सिंह संग्रहालय रियासती संस्कृति का प्रतिबिम्ब हैं।       

    कोटा में पर्यटन की दृष्टि से इस ऐतिहासिक गढ़ का अपना विशेष महत्व है। रचना चौकोर है तथा इसका सर्वाधिक आकर्षक भाग इसका भव्य एवं ऊंचा दरवाजा है। किले के चारों कोनों पर अष्टकोणयुक्त (सर्वाधिक 54 फीट ऊंची) समान आकार की चार उन्नत एवं सुदृढ़ बुर्जें विद्यमान हैं। किले के बीचों-बीच स्थापत्य कला की दुष्टि से महत्वपूर्ण 73 फीट 9 इंच लम्बा व 56 फीट 6 इंच चौड़ा चौकोर आकृति का एक सुन्दर भवन है।

 

चुरू का  किला       

         चूरू के ऐतिहासिक किले के बारे में यह प्रसिद्ध है कि अपनी आजादी एवं अस्मिता की रक्षा के लिए इस दुर्ग के ठाकुरों ने गोला-बारूद खत्म होने पर दुश्मनों पर चांदी के गोले दागे। इस घटना ने चूरू के किले को विश्व इतिहास में अमर कर दिया। इस किले का निर्माण ठाकुर कुशल सिंह ने करवाया था। वे सन् 1694 में चूरू की गद्दी पर बैठे। ठाकुर कुशल सिंह ने नगरवासियों को सुरक्षा प्रदान करने एवं आत्म रक्षा के उद्देश्य से चूरू किले का निर्माण कराया। चूरू के मुख्य बाजार में स्थित इस किले का परकोटा बहुत मजबूत बना है। यह किला नौ बुर्जों में विभक्त है। किले का सिंह द्वार पश्चिमाभिमुख है। किले की दीवारें अत्यन्त मजबूत, चौड़ी एवं ऊंची हैं।       यह किला अनेक लड़ाईयों का स्थल रहा है। चूरू के इस ऐतिहासिक किले के निर्माता ठाकुर कुशल सिंह के वंशज ठाकुर शिवजी सिंह एक दबंग और स्वाभिमानी व्यक्ति थे। बीकानेर के महाराजा सूरत सिंह से उनकी कभी नहीं बनी। महाराजा सूरत सिंह ठाकुर शिवजी सिंह से नाराज रहते थे। अगस्त, 1814 में बीकानेर नरेश ने अमरचंद सुराणा को भारी सैन्य बल के साथ चूरू पर आक्रमण के लिए भेजा। बीकानेर की सेना ने चूरू के किले को चारों तरफ से घेर लिया। दोनों तरफ से तोपें दागी गई। ऐसे में ठाकुर शिवजी सिंह के पास गोला बारूद खत्म हो गया। जब गोला-बारूद समाप्त हो गया तो अपनी आजादी की रक्षा के लिए चूरू के इस किले से दुश्मन की सेना पर चांदी के गोले दागे गये। विश्व के इतिहास में अपनी आजादी की रक्षा के लिए चांदी के गोले बनाकर तोपों से दागने की यह ऐतिहासिक घटना स्वर्णाक्षरों में अंकित की गई। इसी कारण चूरू के किले का नाम अमर हो गया।

 


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