उदयपुर, संपूर्ण मेवाड़ अंचल इन दिनों लोकनृत्य गवरी की रंगीन छटा से सराबोर है। भगवान शिव के प्रिय इस लोकनृत्य में भील समाज के कलाकार परंपरागत वाद्य मादल और थाली की ताल पर घूंघरू की झनकार के साथ महादेव से जुड़े कथानकों का जीवंत मंचन कर रहे हैं।
<br /><img src="http://www.pressnote.in/upload/520075A.jpg" style="max-width:400px; padding:5px;" align="left"><br />
युवा समाजसेवी सुनिल व्यास ने बताया कि मान्यता है कि जिस गांव में गवरी का व्रत लिया जाता है, वहां की विवाहित बहन-बेटियों के घर जाकर गवरी नृत्य का आयोजन किया जाता है। इस अनुष्ठान में भील समुदाय के लोग सवा महीने तक कठोर नियम और व्रत का पालन करते हुए भगवान शिव-पार्वती की साधना करते हैं। गवरी के मुख्य पात्र कालूकीर, गोमामीणा, भीयावड, वरजू कांजरी, बादशाह की फौज, लाखा बंजारा, कान गुजरी आदि मुख्य आकर्षण का केन्द्र बने हुए है। गवरी केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि भक्ति, अनुशासन और सामूहिक उत्सव का प्रतीक है। इसे गांव की अच्छी वर्षा, खुशहाली और समृद्धि की कामना से मनाया जाता है। हर ओर गूंजते गीत, थाप और अद्भुत लोकाभिनय ने वातावरण को आध्यात्मिक और उल्लासमय बना दिया है। मेवाड़ की धरती पर गवरी आज भी संस्कृति और परंपरा की धड़कन बनी हुई है।